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Authored by manu kumar
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1.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है| अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुर्दे उखाड़ने से | क्या फायदा' पर हृदय नहीं मनाता; बार-बार अतीत की ओर जाता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें | कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है। और अपने शुद्ध रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है; अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेय परदा रहता है। बीती | बिसारने वाले 'आगे की सुध रखने का दावा किया करें, परिणाम अशांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं । वर्तमान को संभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटने वाले संसार में जितने ही अधिक होते हैं, संघ-शक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीता बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अंखडता और व्यापकता की | अनुभूति का विसर्जन ; सहृदयता भावुकता का भंग- केवल अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा |
Q1) अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है, क्योंकिः
मनुष्य अतीत जीवी होता है।
मनुष्य वर्तमान से भागना चाहता है।
वहाँ मनुष्य अनेक प्रकार के बंधनों से मुक्त रहता है।
मनुष्य अर्थपरायण नहीं होता है
2.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है| अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा' पर हृदय नहीं मनाता; बार-बार अतीत की ओर जाता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है। और अपने शुद्ध रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है; अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेय परदा रहता है। बीती | बिसारने वाले 'आगे की सुध रखने का दावा किया करें, परिणाम अशांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं । वर्तमान को संभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटने वाले संसार में जितने ही अधिक होते हैं, संघ-शक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीता बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अंखडता और व्यापकता की | अनुभूति का विसर्जन ; सहृदयता भावुकता का भंग- केवल | अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा।
Q2) 'वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है - इसका भाव है:
वर्तमान में बहुत-सी समस्याएँ रहती हैं
हमें वर्तमान से प्रेम होता है।
हम वर्तमान की समस्याओं में ही उलझे रहते हैं।
हमारी सारी समस्याएँ वर्तमान से संबद्ध रहती हैं।
3.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है| अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा' पर हृदय नहीं मनाता; बार-बार अतीत की ओर जाता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है। और अपने शुद्ध रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है; अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेय परदा रहता है। बीती | बिसारने वाले 'आगे की सुध रखने का दावा किया करें, परिणाम अशांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं । वर्तमान को संभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटने वाले संसार में जितने ही अधिक होते हैं, संघ-शक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीता बिसार ने का अभिप्राय है जीवन की अंखडता और व्यापकता की | अनुभूति का विसर्जन ; सहृदयता भावुकता का भंग-केवल | अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा
|Q3) अशांति किसका परिणाम है? [
वर्तमान से लगाव का
अतीत की विस्मृति का।
भविष्य की चिंता का
वर्तमान की उपेक्षा का।
4.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
अतीत की स्मृति में मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है| अर्थपरायण लाख कहा करें कि 'गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा' पर हृदय नहीं मनाता; बार-बार अतीत की ओर जाता है; अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है। हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है। और अपने शुद्ध रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है; अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूँ कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेय परदा रहता है। बीती | बिसारने वाले 'आगे की सुध रखने का दावा किया करें, परिणाम अशांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं । वर्तमान को संभालने और आगे की सुध रखने का डंका पीटने वाले संसार में जितने ही अधिक होते हैं, संघ-शक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझनें उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बीता बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अंखडता और व्यापकता की | अनुभूति का विसर्जन ; सहृदयता भावुकता का भंग-केवल | अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा।
Q
4) केवल अर्थ की क्रीड़ा निष्ठुर है, क्योंकि:
वह मनुष्य को सहृदय नहीं रहने देती है
वह वर्तमान की अधिक चिंता करती है
वह अतीत की उपेक्षा करती है।
वह उलझनों को बढ़ाती है।
5.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
30 sec • 1 pt
"फल की विशेष आसक्ति से कर्मा के लाघव की वासना उत्पत्र होती है; चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत कम या बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत-सा मिल जाये। श्रीकृष्ण ने कर्म-मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया; पर उनके समझाने पर भी | भारतवासी इस वासना से ग्रस्त होकर कर्म से तो उदास हो बैठे और फल के इतने पीछे पड़े कि गली में ब्राह्मण को एक पेठा देकर पुत्र की आशा करने लगे, चार आने रोज का अनुष्ठान कराके व्यापार से लाभ, शत्रु पर विजय, रोग से मुक्ति, धन-धन्य की वृद्धि तथा और भी न जाने क्या-क्या चाहने लगे। आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक | कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे | आसक्ति उसी में चाहिए। फल दूर रहता है, इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है।"
Q1) "फल की विशेष आसक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन होती है।" इस कथन के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि:
फल के बारे में अधिक आसक्ति से कर्म करने में रूचि घटती है।
कर्म करते समय फल के बारे में नहीं सोचना चाहिए
फल के बारे में अधिक आसक्ति से कर्म के प्रति
उत्साह में इजाफा होता है।
फल के लालच में जल्दी-जल्दी कर्म करना दुर्घटना
का कारण हो सकता है।
6.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
फल की विशेष आसक्ति से कर्मा के लाघव की वासना | उत्पत्र होती है; चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत कम या बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत सा मिल जाये। श्रीकृष्ण ने कर्म-मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया; पर उनके समझाने पर भी | भारतवासी इस वासना से ग्रस्त होकर कर्म से तो उदास हो बैठे और फल के इतने पीछे पड़े कि गली में ब्राह्मण को एक पेठा देकर पुत्र की आशा करने लगे, चार आने रोज का अनुष्ठान कराके व्यापार से लाभ, शत्रु पर विजय, रोग से मुक्ति, धन-धन्य की वृद्धि तथा और भी न जाने क्या-क्या चाहने लगे। आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक | कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे | आसक्ति उसी में चाहिए। फल दूर रहता है, इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक | बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है।"
Q2) "श्रीकृष्ण ने कर्म मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया था।" से तात्पर्य है-
श्रीकृष्ण ने कहा था कि सिर्फ कर्म करते जाओ और फल की चिन्ता न करो।
श्रीकृष्ण ने कहा था कि फल में आसक्ति की
अधिकता कर्म के प्रति उत्साह में बाधक होती है।
श्रीकृष्ण ने कहा था कि कर्म करते जाओ सिर्फ फल की चिन्ता न करो।
श्रीकृष्ण ने कहा था कि यदि तुम निष्ठापूर्वक कर्म करेगे तो फल अवश्य मिलेगा।
7.
MULTIPLE CHOICE QUESTION
45 sec • 1 pt
फल की विशेष आसक्ति से कर्मा के लाघव की वासना | उत्पत्र होती है; चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत कम या बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत सा मिल जाये। श्रीकृष्ण ने कर्म-मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया; पर उनके समझाने पर भी | भारतवासी इस वासना से ग्रस्त होकर कर्म से तो उदास हो बैठे और फल के इतने पीछे पड़े कि गली में ब्राह्मण को एक पेठा देकर पुत्र की आशा करने लगे, चार आने रोज का अनुष्ठान कराके व्यापार से लाभ, शत्रु पर विजय, रोग से मुक्ति, धन-धन्य की वृद्धि तथा और भी न जाने क्या-क्या चाहने लगे। आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक | कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है। इससे | आसक्ति उसी में चाहिए। फल दूर रहता है, इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक | बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है।"
Q3) "आसकित प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है।" क्योंकि:
जो प्रस्तुत नहीं है उसकी इच्छा संकट का कारण बन सकती है।
जो प्रस्तुत नहीं है उसमे रूचि पैदा नहीं हो सकती है।
कर्म प्रस्तुत होता है इसलिए उसके प्रति रूचि स्वाभाविक है
अप्रस्तुत की आकांक्षा मानसिक स्वास्थय की पहचान नहीं है
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