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Worksheets4. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_1.39 – 2.02
Total questions: 66
Worksheet time: 1hrs 9mins
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अर्जुन के विषाद योग का चतुर्थ कारण क्या था ?
गुरु-शिष्य परम्परा का नाश होना।
कुल परम्परा का नाश होना।
स्वामी-सेवक परम्परा का नाश होना।
पिता-पुत्र परम्परा का नाश होना।
निम्न में से कौन सा वर्णाश्रम व्यवस्था का वर्ण नहीं है ?
शूद्र
क्षत्रिय
वानप्रस्थ
वैश्य
निम्न में से कौन सा वर्णाश्रम व्यवस्था का आश्रम नहीं है ?
गृहस्थ
ब्रह्मचर्य
सन्यास
ब्राह्मण
वैदिक शास्त्रों में अनुसार, एक मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक कितने संस्कारों का प्रावधान है ?
16
18
20
32
इस भौतिक जगत् में वर्णाश्रम व्यवस्था क्यों आवश्यक है ?
मानव समाज में अच्छी सन्तान उत्पन्न करने के लिए
मनुष्य जीवन में जीव के शुद्धिकरण के लिए
आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करने के लिए
मानव समाज में वयोवृद्धों की महत्ता को बनाए रखने के लिए
यद्यपि इस कलियुग में वर्णाश्रम व्यवस्था का ह्रास हो चुका है, तो वर्तमान समाज में सफल व्यक्ति कहलाने की क्या योग्यता है ?
ब्राह्मण कुल में जन्म होना।
इन्द्रियतृप्ति हेतु पर्याप्त धन होना।
मायावादी होना।
भगवद्भक्त होना।
वर्तमान युग में परिवार में बच्चों क्या शिक्षा व संस्कार दिए जाते हैं ?
आत्म-साक्षात्कार सम्बन्धी
भगवद्भक्ति सम्बन्धी
इन्द्रियतृप्ति सम्बन्धी
धार्मिक अनुष्ठानों सम्बन्धी
एक परिवार या कुल में वयोवृद्धों की क्या आवश्यकता है ?
बच्चों एवं स्त्रियों के संरक्षण हेतु
धन-सम्पत्ति के संरक्षण हेतु
कुल परम्परा के संरक्षण हेतु
कुल के प्रतीक स्वरुप
श्लोक संख्या 1.39 में, कुल-परम्परा को सनातन् क्यों कहा गया है ?
क्योंकि कुल-परम्परा आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग को छिन्न-भिन्न कर देती है ।
क्योंकि कुल-परम्परा इन्द्रियतृप्ति के लिए प्रेरित करती है ।
क्योंकि कुल-परम्परा से जीव वैभवशाली जीवन यापन कर सकता है ।
क्योंकि कुल-परम्परा से आत्म-साक्षात्कार की विधि सुव्यवस्थित रहती है ।
इस भौतिक जगत् में बंधन का प्रमुख कारण क्या है ?
स्त्री-पुरुष के मध्य परस्पर आकर्षण
इन्द्रिय भोग की इच्छाएँ
भगवद् तुल्य बनने की आकांक्षाएँ
जीवों में परस्पर विरोधाभास
संसार में युद्ध और कोरोना जैसी महामारियों के संकट का क्या कारण है ?
वर्णाश्रम धर्मों का अनुपालन करने वाले बुद्धिमान् लोग
वर्णाश्रम धर्मों का अनुपालन न करने वाले शक्तिशाली लोग
वर्णाश्रम धर्मों का अनुपालन न करने वाले निठल्ले लोग
वर्णाश्रम धर्मों का अनुपालन न करने वाले प्रभावशाली लोग
महाभारत के युद्ध के कारण सनातन कुल-परम्परा नष्ट क्यों नहीं हो सकती थी ।
क्योंकि महाभारत का युद्ध पाण्डवों और कौरवों के मध्य हो रहा था।
क्योंकि महाभारत के युद्ध में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण उपस्थित थे।
क्योंकि महाभारत का युद्ध सनातन कुल-परम्परा को विनष्ट होने से बचाने के लिए भगवद् नियोजित था।
क्योंकि महाभारत के युद्ध में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया गया था।
मानव समाज में सनातन कुल-परम्परा के लुप्त होने का इनमें से कौन सा लक्ष्ण नहीं है ?
अधर्म प्रमुख हो जाना।
स्त्रियों का दूषित हो जाना।
वर्णसङ्करों का पैदा होना।
आध्यात्मिकता का प्रभावी अनुसरण होना।
स्त्रियों के सतीत्व और उनकी निष्ठा का क्या आधार है ?
उनका भौतिक परम्पराओं व इन्द्रियतृप्ति हेतु अनुष्ठानों में व्यस्त रहना।
उनका विविध कुल-परम्पराओं व धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त रहना।
उनका समाज में व्यभिचारी गतिविधियों में लिप्त रहकर उन्हें बढ़ावा देना।
उनका परिवार व समाज के लिए आर्थिक प्रगति में बढ़-चढ़ कर भाग लेना।
कुल में अधर्म प्रमुख होने का क्या कारण है ?
सनातन गुरु-शिष्य परम्परा का नष्ट होना।
सनातन धार्मिक परम्परा का नष्ट होना।
सनातन कुल-परम्परा का नष्ट होना।
सनातन भौतिक परम्परा का नष्ट होना।
स्थूल भौतिक शरीर से आपका क्या अभिप्राय है ?
पञ्चमहाप्रेतों से निर्मित क्षणभंगुर भौतिक शरीर
पञ्चमहाभूतों से निर्मित क्षणभंगुर भौतिक शरीर
पञ्चमहालक्ष्यों से निर्मित क्षणभंगुर भौतिक शरीर
पञ्चमहाब्रह्माण्डों से निर्मित क्षणभंगुर भौतिक शरीर
सूक्ष्म शरीर किन तत्त्वों से निर्मित होता है ?
मन, अग्नि, अहँकार
मन, वायु, अहँकार
मन, बुद्धि, अहँकार
मन, पृथ्वी, अहँकार
भौतिक जगत् में जीवात्मा को किसके आवरण में रखा जाता है ?
भौतिक शरीर के आवरण में
सूक्ष्म शरीर के आवरण में
प्रकृति के गुणों के आवरण में
त्रैतापों के आवरण में
जीवात्मा को प्रेतयोनि में क्यों जाना पड़ता है ?
स्थूल भौतिक शरीर उपलब्ध न होने के कारण
सूक्ष्म शरीर उपलब्ध न होने के कारण
असमय मृत्यु होने के कारण
अप्राकृतिक मृत्यु होने के कारण
सकाम कर्मियों द्वारा किये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान अन्ततोगत्वा किसे अर्पित होते हैं ?
दुर्गा
ब्रह्मा
शिव
विष्णु
सकाम कर्मियों द्वारा अपने पितरों को पिण्ड तर्पण करने की परम्परा का क्या प्रयोजन है ?
पितरों को नरक में भी स्वार्गिक आनंद उपलब्ध करवाना।
पितरों का प्रेतयोनियों या कष्टमय परिस्थितियों से उद्धार करना।
पितरों को जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि से मुक्ति दिलाना।
पितरों की भगवद् धाम वापसी सुनिश्चित करना।
अवांच्छित संतानों की वृद्धि से परिवार के लिए और पारिवारिक परम्परा को विनष्ट करने वालों का जीवन कैसा होता है?
स्वार्गिक
भौतिक
नित्य मुक्त
नारकीय
भक्त को पिण्ड तर्पण जैसे सकाम धार्मिक अनुष्ठान क्यों नहीं करने होते हैं ?
क्योंकि भगवद्भक्ति करने के कारण भक्त के ऐसे समस्त अनुष्ठान स्वतः ही पूर्ण हो जाते हैं।
क्योंकि भक्त भगवद्भक्ति करने के कारण ऐसे समस्त अनुष्ठानों के प्रति अन्यमनस्क हो जाता है।
क्योंकि भक्त भगवद्भक्ति करने के कारण समस्त भौतिक क्लेशों से मुक्त हो जाता है।
क्योंकि भगवद्भक्ति करने के कारण भक्त की ऐसी समस्त इच्छाओं से मुक्त हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण के जनार्दन नाम का क्या अर्थ है ?
गौपालक
पशुपालक
प्रजापालक
जनपालक
वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की विधि क्या है ?
कुल-परम्परा से श्रवण द्वारा
गुरु-परम्परा से श्रवण द्वारा
उत्तराधिकार-परम्परा द्वारा
पिता-पुत्र परम्परा द्वारा
निम्न में से जीव में कौन सा दोष विद्यमान नहीं होता है ?
जीव की इन्द्रियां अपूर्ण होती हैं ।
जीव आसानी से भ्रमित हो जाता है ।
जीव भगवान् की परा शक्ति है ।
जीव सदैव धोखा देने के लिए तत्पर रहता है ।
अर्जुन ने यह क्यों प्रस्तुत किया की उसके तर्क "गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त ज्ञान" पर आधारित होने के कारण न्यायसंगत हैं ?
क्योंकि गुरु-परम्परा द्वारा प्रदत्त ज्ञान तर्कसंगत होता है ।
क्योंकि गुरु-परम्परा द्वारा प्रदत्त ज्ञान संशोधित होता है ।
क्योंकि गुरु-परम्परा द्वारा प्रदत्त ज्ञान निर्दोष होता है ।
क्योंकि गुरु-परम्परा द्वारा प्रदत्त ज्ञान विज्ञान होता है ।
हम मनुष्य अपने अनुभवों या कपोलकल्पनाओं या बौद्धिक कल्पनाओं के द्वारा परम सत्य विषयक पूर्ण ज्ञान क्यों प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं ?
क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियों की संख्या कम है।
क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ अपूर्ण हैं।
क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ निर्दोष हैं।
क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ अच्छी संग्राहक नहीं हैं।
इनमें से जीव की पाँच भौतिक ज्ञानेन्द्रियाँ कौन सी हैं?
आँख, नाक, हस्त, जिह्वा, त्वचा
आँख, नाक, पाद, जिह्वा, त्वचा
आँख, नाक, कान, मुख, त्वचा
आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा
भगवान् का महान् भक्त होने के कारण अर्जुन के हृदय में विषादयोग से क्या उदित हुआ ?
दरिद्रता
आर्द्रता
दयाद्रता
निष्क्रियता
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के अन्तिम श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र को क्या सूचना दी ?
शोकसंतप्त अर्जुन अपना धनुष बाण लेकर युद्ध के लिए उद्यत हो गया।
शोकसंतप्त अर्जुन अपना धनुष बाण एक ओर रख कर रथ के आसन पर बैठ गया।
शोकसंतप्त अर्जुन अपना धनुष बाण उठाकर युद्धक्षेत्र से भाग गया।
शोकसंतप्त अर्जुन अपना धनुष बाण एक ओर रख कर सन्धि प्रस्ताव के लिए उद्यत हो गया।
भगवान् अपने धर्मावलम्बी भक्तों का संरक्षण क्यों करते हैं ?
ताकि भौतिकोन्मुखता के लिए आवश्यक वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था बनी रहे।
ताकि इन्द्रियतृप्ति के लिए आवश्यक वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था बनी रहे।
ताकि भगवदुन्मुखता के लिए आवश्यक वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था बनी रहे।
ताकि वर्णाश्रम धर्म जैसे निषेधात्मक कृत्य अवरुद्ध हो सकें।
भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान देने में कितना समय लगा था ?
40 मिनट
45 मिनट
50 मिनट
55 मिनट
श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को वस्तु विषय के अनुसार अध्यायों में किसने वर्गीकृत्त किया है ?
श्री गणेश जी ने
श्रील व्यासदेव जी ने
श्रील प्रभुपाद जी ने
श्री संजय जी ने
भगवान् श्रीकृष्ण को मधुसूदन क्यों कहते हैं ?
क्योंकि उनका एक नाम माधव भी है।
क्योंकि वे माधुर्य रस के प्रदाता हैं।
क्योंकि उन्होंने मधु नामक दैत्य का वध किया है।
क्योंकि वे अज्ञान रूपी राक्षस का वध करने में सक्षम हैं।
भौतिक पदार्थों के प्रति करुणा, शोक तथा अश्रु किसके लक्ष्ण हैं ?
आत्मा को न जानने के लक्ष्ण हैं।
स्वयं को न जानने के लक्ष्ण हैं।
भौतिक पदार्थों के प्रति अज्ञानता के लक्ष्ण हैं।
इन्द्रियभोग के प्रति अज्ञानता के लक्ष्ण हैं।
आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रथम कदम क्या है ?
शाश्वत आत्मा के प्रति अज्ञान
शाश्वत आत्मा का वास्तविक बोध
शाश्वत आत्मा के प्रति करुणा
शाश्वत आत्मा के प्रति विरह
आत्म-साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं ?
स्वयं को आत्मा न समझना।
अपनी आत्मा के स्वरूप को जानना।
सदैव आत्मा के पीछे पड़े रहना।
शेष समस्त जीवों में आत्मा को देखना।
शोक संतप्त रथासीन अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से क्या आकांक्षा करता है ?
कि भगवान् श्रीकृष्ण उसकी इन्द्रियतृप्ति के लिए उचित व्यवस्था करें ।
कि भगवान् श्रीकृष्ण किसी प्रकार इस युद्ध को टालने की उसकी मनोवृत्ति को समझें ।
कि भगवान् श्रीकृष्ण उसके हृदय में उदित अज्ञानता रूपी राक्षस का वध कर दें ।
कि भगवान् श्रीकृष्ण उसके पितामह और गुरु को इस युद्धक्षेत्र को त्यागने के लिए कहें ।
एक मनुष्य में श्रीमद्भगवद्गीता को समझने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए ?
उसमें अर्जुन के जैसे विषादयोग के गुण होने चाहिए ।
उसमें अर्जुन के सदृश सद्गुण होने चाहिएं ।
वह अर्जुन के जैसे भाग्यशाली होना चाहिए ।
वह अर्जुन के जैसे महारथी होना चाहिए ।
स्थूल भौतिक शरीर के लिए वृथा ही शोक करने वाला क्या कहलाता है ?
ब्राह्मण
क्षत्रिय
वैश्य
शूद्र
भगवान् श्रीकृष्ण ने अज्ञानता के सागर में डूबे हुए अर्जुन की रक्षा कैसे की ?
श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ग्रन्थ देकर
श्रीमद्भगवद्गीता रूपी दिव्य रस पिलाकर
श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेश देकर
श्रीमद्भगवद्गीता रूपी जहाज़ में बिठाकर
श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय "गीता का सार" क्यों महत्त्वपूर्ण है ?
क्योंकि यह भौतिक पदार्थों के विषयक विशद ज्ञान प्रस्तुत करता है ।
क्योंकि यह भौतिक शरीर तथा आत्मा के वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा आत्म-साक्षात्कार का उपदेश देता है ।
क्योंकि यह भौतिक जगत् में सुख सुविधा सम्पन्न जीवन जीने का ज्ञान देता है ।
क्योंकि यह भौतिक जगत् में जीने के लिए आवश्यक युद्ध हेतु प्रशिक्षित करता है ।
कलियुग में सभी जीवों की चेतना का स्तर क्या है ?
कलियुग में सभी जीव दिव्य हैं ।
कलियुग में सभी जीव मुक्त हैं ।
कलियुग में सभी जीव निठल्ले हैं ।
कलियुग में सभी जीव शूद्र हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा कहा गया प्रथम श्लोक कौन सा है ?
1.39
1.43
1.46
2.2
भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार भौतिक कल्मष किस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है ?
जो जीवन के वास्तविक मूल्य को जनता हो ।
जो आत्मा व शरीर के भेद को जनता हो ।
जो श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों को जनता हो ।
जो श्रीमद्भगवद्गीता के वक्ता को जनता हो ।
मनुष्य जीवन का वास्तविक मूल्य क्या है ?
आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्नरत रहना।
आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त करना।
भगवद्प्रेम प्राप्त कर भगवद् धाम वापिस लौटना।
दीक्षा गुरु की आज्ञा का पालन करना।
श्रील प्रभुपाद जी ने भगवान् श्रीकृष्ण को परम सत्य की पराकाष्ठा क्यों कहा है ?
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ही परम सत्य के उपदेशक हैं।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण परम सत्य की तीनों अवस्थाओं के स्वामी हैं।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण परम सत्य के द्योत्तक हैं।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ही परम सत्य का अवतार हैं।
परम सत्य का ज्ञाता परम सत्य का अनुभव ज्ञान की कितनी अवस्थाओं में करता है ?
6
5
4
3
इनमें से कौन सी परम सत्य अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण के ज्ञान बोध की अवस्था है ?
आत्म-साक्षात्कार
ब्रह्मावस्था
भगवान्
परमात्मा
श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 2.2 में, परम सत्य की तीनों अवस्थाओं को किसके दृष्टान्त द्वारा समझाया है ?
सूर्य
चन्द्रमा
प्रकाश
श्रीमद्भागवतम्
जो परम सत्य की प्रथमावस्था अर्थात् ब्रह्मावस्था या निर्विशेष सर्वव्यापी चेतना के ज्ञान से तुष्ट हो जाता है, उसे क्या कहा जाता है ?
नवदीक्षित
नौसिखिया
नौनिहाल
चञ्चलं
यदि परम सत्य की तीनों अवस्थाएँ एकरूप हैं अर्थात् इन्हें एक दूसरे विलग नहीं किया जा सकता है, तो इनके अध्येताओं का क्या होता है ?
वे भी एक ही श्रेणी के होते हैं ।
वे एक ही श्रेणी के नहीं होते हैं ।
उनकी गणना किसी श्रेणी में नहीं होती ।
वे समश्रेणी के होते हुए भी, अलग होते हैं ।
संस्कृत शब्द भगवान् की व्याख्या किसने की है ?
श्रील व्यासदेव
अगस्त्य मुनि
नारद मुनि
पराशर मुनि
भगवान् की क्या पहचान है ? अर्थात भगवान् किसे कहा जाता है ?
परम वैरागी पुरुष भगवान् कहलाते हैं ।
परम ज्ञानी पुरुष भगवान् कहलाते हैं ।
छः ऐश्वर्यों के स्वामी परम पुरुष को भगवान् कहते हैं ।
परम शक्तिशाली पुरुष भगवान् कहलाते हैं ।
भगवान् के अतिरिक्त इनमें से कौन हैं जो समस्त धन, शक्ति आदि का स्वामी होने का दावा कर सकते हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, काली
इनमें से कोई नहीं
बिल गेट्स, अम्बानी, अदानी, मोदी, ट्रम्प
भगवान् के अतिरिक्त के कोई नहीं
ब्रह्मा जी ने ब्रह्मसंहिता में भगवान् श्रीकृष्ण को सच्चिदानन्द विग्रह: कहा है। सच्चिदानन्द शब्द के वास्तविक विस्तार को पहचानिए।
सत (पूर्ण ज्ञान)+ चित (शाश्वत)+आनन्द (परमानन्द)
सत (शाश्वत)+ चित (पूर्ण ज्ञान)+आनन्द (परमानन्द)
सत (अशाश्वत)+ चित (पूर्ण ज्ञान)+आनन्द (परमानन्द)
सत (शाश्वत)+ चित (अल्प ज्ञान)+आनन्द (परमानन्द)
परमात्मा तथा निर्विशेष ब्रह्म दोनों उद्गम कौन हैं ?
निराकार ब्रह्म
भगवान् श्रीकृष्ण
योगमाया
परम गुह्य शक्ति
आर्य नामक संज्ञा किन व्यक्तियों के लिए उपयुक्त होती है ?
जो जीवन के मूल्यों को नकारते हैं ।
जो जीवन के मूल्यों को जानते हैं ।
जो शक्तिशाली क्षत्रिय होते हैं ।
जो धनवान वैश्य होते हैं ।
आत्म-साक्षात्कार पर निर्भर "सभ्यता" से क्या अभिप्राय है ?
सभ्य मनुष्यों द्वारा इन्द्रियतृप्ति के लिए वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था के अनुसार मनवान्छित कर्म करना ।
सभ्य मनुष्यों द्वारा वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था के अनुसार अपने नियत कर्मों को निभाना ।
सभ्य मनुष्यों द्वारा धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए व्यवस्था व कर्म करना ।
सभ्य मनुष्यों द्वारा परोपकारी कर्म करना ।
जिन पुरुषों को भौतिक बन्धन से मुक्ति का कोई ज्ञान नहीं होता है वे क्या कहलाते हैं ?
आचार्य
प्राचार्य
अनार्य
मूढ़ार्य
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त अर्जुन द्वारा उसके स्वजनों के प्रति प्रदर्शित करुणा भाव का खण्डन क्यों किया ?
क्योंकि यह भाव आध्यात्मिक बुद्धि जन्य है जोकि देहात्मिक प्रगति में प्रमुख अवरोध है ।
क्योंकि यह भाव देहात्मबुद्धि जन्य है जोकि आध्यात्मिक प्रगति में प्रमुख अवरोध है ।
क्योंकि यह भाव देहात्मबुद्धि जन्य है जोकि इस संसार में अपयश का प्रमुख कारण है ।
क्योंकि यह भाव देहात्मबुद्धि जन्य है जोकि स्वर्गलोक में अपयश का प्रमुख कारण है ।
