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Worksheetsसमयसार गाथा १५
Total questions: 30
Worksheet time: 23mins
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार किसको जानने वाला सम्पूर्ण जिनशासन को जनता है ?
आत्माको
शुद्धनयको
ज्ञायकको
शुद्धनय के विषयभुत आत्मा को
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार जिनशासन का उद्देश्य क्या है ?
समयसार परमागम समझाना
सातिशय पुण्य का बंध कराना
भोग सामग्री की सहज प्राप्ति कराना
संसार दुखो से मुक्त कराना
अच्छी गति प्राप्त कराना
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार जिनशासन का केंद्र बिंदु क्या है ?
रत्नत्रय धर्म
दसलक्षण धर्म
सोलह कारण भावना
जिव
शुद्धनय के विषयभूत आत्मा
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार शुद्धनय के विषयभूत आत्मा कैसा है ? (एक जवाब से ज्यादा भी चुन सकते है )
अबद्धस्पृष्ट
अनन्य
नियत
अविशेष
असंयुक्त
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार सम्पूर्ण जिनशासन कैसा है ?
द्र॒व्यश्रुत और भावश्रुतरूप
द्वादशांग जिनवाणी (द्र॒व्यश्रुतरूप)
श्रुतज्ञानपर्याय (भावश्रुतरूप)
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार क्या सही नही है ?
द्रव्यश्रुत =वाचक, भावश्रुत=वाच्य
द्रव्यश्रुत = अपदेश = शब्द
द्रव्यश्रुत के द्वारा वाच्य और भावश्रुत के द्वारा परिच्छेद्य हो =अपदेशसुत्तमज्झ
द्रव्यश्रुत से वाच्य एवं भावश्रुत से ज्ञेय आत्मा को जनता है सम्पूर्ण जिनशासनको जानता है
कोई नही
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार शास्त्र अभ्यास कब करना चाहिए ?
अनुभूति के बाद
अनुभूति के पहले
विकल्प की भूमिका में
जब समय मिले तब
सभी
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार शास्त्र अभ्यास कब अनिवार्य है ?
आत्मानुभूति के बाद
आत्मानुभूति के पहले
आत्मानुभूति के समय
शुद्धोपयोगी मुनियों को
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार ज्ञानमात्र का अनुभव कब होता है ?
सामान्य ज्ञान के आविर्भाव और विशेष ज्ञेयाकार ज्ञान के तिरोभाव से
सामान्य ज्ञान के तिरोभाव और विशेष ज्ञेयाकार ज्ञान के तिरोभाव से
सामान्य ज्ञान के आविर्भाव और विशेष ज्ञेयाकार ज्ञान के आविर्भाव से
सामान्य ज्ञान के तिरोभाव और विशेष ज्ञेयाकार ज्ञान के आविर्भाव से
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार व्यंजन लोलुप मनुष्य किसका अनुभव करते है ?
व्यंजनों के संबंध से उत्पन्न सामान्य लवण का तिरोभाव और विशेष लवण के आविर्भाव से अनुभव में आनेवाला जो लवण है
अन्य के संबंध रहितता से उत्पन्न सामान्य के अविर्भाव और विशेष के तिरोभाव से अनुभव में आनेवाला जो एकाकार अभेदरूप लवण है
दोनों का
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार लवण के दृष्टांत में इन में से क्या सही नही है
सामान्य नमक = अमिश्रित नमक
विशेष नमक = खाद्यपदार्थ में मिश्रित नमक
अकेला नमक कोई नहीं खाता
स्वाद लोलुपी को असली नमक का स्वाद पता नहीं
पूर्व पुरुषो से या पुस्तकों से भी सुनकर खारेपन का अनुभव होता है
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार अज्ञानी- ज्ञेयलुब्ध जीवों के स्वाद में क्या नही आता है ?
विशेष भावरूप ज्ञान
भेदरूप ज्ञान
अनेकाकाररूप ज्ञान
एकाकार अभेदरूप ज्ञान
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार परमार्थ से देखें तो जो ज्ञान विशेष के आविर्भाव से अनुभव में आता है, वही ______________________ से अनुभव में आता है
ज्ञान सामान्य के आविर्भाव
ज्ञान सामान्य के तिरोभाव
ज्ञान विशेष के आविर्भाव
ज्ञान विशेष के तिरोभाव
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार अन्यद्रव्य के संयोग से रहित केवल सैंधव (नमक) का अनुभव किए जाने पर क्या होता है ?
सैंधव की डली सभी ओर से एक क्षाररसत्व के कारण क्षार रूप से ही स्वाद में आती है
सैंधव की डली सभी ओर से एक क्षाररसत्व के कारण व्यंजन रूप से ही स्वाद में आती है
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार परद्रव्य के संयोग का व्यवच्छेद करके केवल एक आत्मा का ही अनुभव किये जाने पर क्या होता है ?
चारो ओर से एक विज्ञान घनता के कारण यह आत्मा भी ज्ञान रूप से ही स्वाद में आता है
चारो ओर से एक विज्ञान घनता के कारण यह आत्मा भी ज्ञेय रूप से ही स्वाद में आता है
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार इन में से क्या सही नही है
सामान्य ज्ञान = शुद्ध ज्ञान, ज्ञानाकार ज्ञान, एकाकार
विशेष ज्ञान = ज्ञेयाकार ज्ञान, इन्द्रियज्ञान के विषय, अनेकाकार
ज्ञेयाकार ज्ञानाकार नही है
अज्ञानी जगत ने अकेले आत्मा को कभी नहीं जाना, हमेशा संयोगो में बद्धस्पृष्ट आदि भावो में ही देखा जाना है
शास्त्रों में पढ़कर या गुरु मुख से सुनकर भले वो अबद्धस्पृष्ट कहे परन्तु अनुभव में नहीं आता
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार क्या सही नही है ?
आत्मा की अनुभूति ही ज्ञान की अनुभूति है
अज्ञानी ज्ञेयो में, इन्द्रियज्ञान के विषयों में लुब्ध हो रहे है, अनेकाकार हुए ज्ञान को ही ज्ञेयमात्र आस्वादन करते है
ज्ञानी एकाकार ज्ञान का ही आस्वाद लेते है
आत्मा है सो ज्ञान है और ज्ञान है सो आत्मा है
अज्ञानी ज्ञेयो से भिन्न ज्ञानमात्र का आस्वादन करते है
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार सामान्य ज्ञान का अविर्भाव अर्थात क्या ?
ज्ञान की पर्याय में केवल ज्ञान, ज्ञान, ज्ञान का वेदन होना
शुभाशुभ ज्ञेयाकारज्ञान का ढक जाना
ज्ञानमात्र का अनुभव करते हुए ज्ञान आनंदसहित पर्याय में अनुभव में आना
ज्ञेय आकार रहित अकेला प्रगटज्ञान
सभी
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार सामान्य ज्ञान का अविर्भाव कब नही रहता है ?
अनुभूति के काल में प्रत्यक्ष रूप में
अनुभूति के पश्चात् परज्ञेय को जानते हुए भी
अनुभूति के पश्चात् धारणा ज्ञान में निरंतर
अनुभूति के पश्चात् स्मृति-प्रत्यभिज्ञान मे कभी रहता है कभी नहीं रहता
अज्ञानी मे कभी रहता है कभी नहीं रहता
समयसार परमागम गाथा १५ के अनुसार सामान्य ज्ञान का तिरोभाव अर्थात क्या नही होता ?
ज्ञानरूप होते हुए भी अज्ञानी
परज्ञेयो में आसक्त होना
निज परमात्मा की रूचि नहीं होना
व्रत, तप, दया, दान, पूजा, भक्ति आदि व्यवहार रत्नत्रय के परिणामो में आसक्त होना, शुभ-अशुभ विकल्पों के जानने में रुक जाना
अतीन्द्रिय ज्ञान और आनंद का स्वाद आना
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार ज्ञान का घनपिण्ड और आनंद का रसकंद एक भगवान आत्मा की उपासना कैसे करे ?
साध्यभाव से
साधकभाव से
निरन्तर
सभी
समयसार परमागम कलश १५ के प. बनारसीदासजी का भावार्थ के अनुसार साध्य और साधक कौन है?
अरहंतदशा साध्य है
सिद्धदशा साध्य है
शुद्धोपयोग दशा साधक है
साध्यभाव प्रत्यक्ष है और साधक भाव परोक्ष है
सभी
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार आत्मा की उपासना का भाव क्या है ?
पूजा-भक्ति
स्तुति-वंदना
नमस्कारादि
जानना, पहिचानना, अनुभव करना, ध्यान करना, ध्यान रखना, सर्वस्व मानना, पूर्णत: समर्पित होना
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार आत्मा की उपासना का भाव क्या नही है ?
पूजा-भक्ति,स्तुति-वंदना, नमस्कारादि करना
साधना
आराधना
जानना, पहिचानना, अनुभव करना
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार साधक और साध्य के इनमे से कौनसे गुणस्थान नही होते है ?
चौथे गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक साधक दशा
सिद्ध-अवस्था साध्य दशा
चौथे गुणस्थान से बाहरवें गुणस्थान तक साधक दशा
अरहंत और सिद्ध दशा साध्य दशा
पहले गुणस्थान से बाहरवें गुणस्थान तक साधक दशा
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार साधक और साध्य क्या है
पर्याय में पूर्णता की प्राप्ति हो जाना साध्य दशा
आत्मोपलब्धि होकर पूर्णता की ओर अग्रसर होना साधक दशा
आत्मा में उपयोग का केन्द्रित होना और फिर बाहर आ जाना, इसप्रकार बार-बार अन्दर जाना और बाहर आना साधक दशा है
शुद्धोपयोग में अनन्तकाल तक के लिए समा जाना साध्य दशा है
सभी
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार आत्मा की उपासना का भाव क्या है ?
उपयोग का आत्मसन्मुख होना
आत्मज्ञान होना
अपने में अपनापन स्थापित होना
निश्चय रत्नत्रय
सभी
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार कौनसा उपास्य-उपासकभाव सही नही है ?
जिव उपासक, जिनेन्द देव उपास्य
द्रव्य स्वभाव स्वयं के लिए उपास्य है और स्वयं की पर्याय उपासक
त्रिकालीध्रुव स्वभाव उपास्य है और उनके श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र गुण की निर्मलपर्यायें उपासक
सम्यक दर्शन-ज्ञान-चारित्र की पर्यायें ही उपासना हैं
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार विराधना का गुणस्थान कौनसा है ?
चौथा
चौथा से छठवा
पहले से बारहवा
पहले से तीसरा
समयसार परमागम कलश १५ के अनुसार व्यवहार से उपासना योग्य कौन है ?
जिनेन्द्र देव
देव
देवी
यक्ष, यक्षिणी
कुल देवी
