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Worksheets9. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_2.47 – 2.59
Total questions: 51
Worksheet time: 1hrs 18mins
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जीव केवलमात्र कर्म करने का अधिकारी है, कर्मफल का नहीं । ऐसा क्यों ?
क्योंकि प्रत्येक जीव भगवान् श्रीकृष्ण का सेवक है अत: वह कर्मफल का अधिकारी नहीं होता है ।
क्योंकि जीव यदि कर्मफल के अधिकार की इच्छा करता है वह उसके भौतिक बंधन का कारण बनता है ।
क्योंकि सेवक को केवल कर्म करने का अधिकार होता है, कर्मफल का अधिकार केवल उसके स्वामी का होता है ।
क्योंकि जीव में कर्मफल भोगने का सामर्थ्य नहीं होता है, अत: भगवान् कर्मफलों को अपने नियन्त्रण में रखते हैं ।
जीव को स्वयँ को अपने कर्मों के फलों का कारण नहीं मानना चाहिए । ऐसा क्यों ?
क्योंकि सेवक अपने स्वामी के सामर्थ्य के कारण ही कर्म करने में सक्षम होता है ।
क्योंकि जीव को कर्म करने के लिए आवश्यक संसाधन एवं सुविधाएँ भगवान् द्वारा प्रदान की जाती हैं ।
क्योंकि इस भौतिक जगत् में प्रत्येक घटना भगवान् की इच्छा से ही घटित होती है ।
क्योंकि भौतिक जगत् के सारे कर्मफलों का मूल आधार आध्यात्मिक जगत् के कार्यकलाप ही होते हैं ।
कर्म कितने प्रकार के होते है ?
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कर्म क्या होता है ?
जो कार्य जीव अपनी प्रकृति के अनुसार करता है वह कर्म कहलाते हैं ।
जो कार्य जीव अपने स्वजनों के निर्देशन में करता है वह कर्म कहलाते हैं ।
जो कार्य जीव प्रकृति के गुणों से निर्मित अपनी प्रकृति के अनुसार करता है वह कर्म कहलाते हैं ।
जो कार्य जीव अपने गुरु के निर्देशन में करता है वह कर्म कहलाते हैं ।
विकर्म क्या होता है ?
गुरु, साधू व शास्त्रसम्मत कर्म विकर्म कहलाते हैं ।
गुरु, साधू व शास्त्र तर्कसंगत कर्म विकर्म कहलाते हैं ।
गुरु, साधू व शास्त्र संगत कर्म विकर्म कहलाते हैं ।
गुरु, साधू व शास्त्र असम्मत कर्म विकर्म कहलाते हैं ।
अकर्म क्या होता है ?
अपने कर्मों को न करना, अकर्म कहलाता है ।
दूसरों के कर्मों को करना, अकर्म कहलाता है ।
दूसरों के कर्मों को न करना, अकर्म कहलाता है ।
कर्मों के प्रति तमोगुण जन्य आलस्य, अकर्म कहलाता है ।
इनमें से धर्म के चार सतम्भ कौन से हैं ?
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास
सत्यता, दया, तप, पवित्रता
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र
तमोगुण, रजोगुण, सत्वगुण, विशुद्ध सत्वगुण
इनमें से कौन सा कर्म विकर्म नहीं कहलाता है ?
मदिरापान करना ।
शेयर बाज़ार से धनार्जन करना ।
हरिनाम संकीर्तन करना ।
विवाहेतर सम्बन्ध ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.48 में जय तथा पराजय में समभाव रहने की क्या विधि बताई गई है ?
जय तथा पराजय की समस्त आसक्ति का त्याग ।
जय तथा पराजय सम्बन्धी रणनीति में सुधार ।
जय तथा पराजय के कर्मफलों को भोगना ।
जय तथा पराजय के लिए कोई कर्म न करना ।
इन्द्रियों को वश में करने की क्या कसौटी है ?
मन में इन्द्रियों को एकनिष्ठ करना ।
जीव से स्वजनों की प्रसन्नता ।
इन्द्रियों और मन का समन्वय ।
परमतत्व में मन को एकाग्र करना ।
इनमें से कौन सा कथन वास्तविक योग को परिभाषित नहीं करता है ?
सदैव चंचल रहने वाली इन्द्रियों को वश में रखते हुए परमतत्व में मन को एकाग्र करना ।
श्वसन क्रियांओं के अभ्यास द्वारा मन को शून्य में एकाग्र करना ।
कृष्ण के निर्देशों का पालन करना ही वास्तविक योग कहलाता है ।
कृष्णभावनामृत में स्वामित्व का भाव त्यागते हुए कर्म करना ।
वास्तविक योग में स्थित होकर कृष्णभावनाभावित कर्म करने विधि क्या है ?
कृष्ण की सेवा के लिए एक नवीन गुरु-परम्परा स्थापित कर कर्म करना ।
कृष्ण की सेवा के लिए शुष्क मानसिक चिंतन आधारित कर्म करना ।
कृष्ण के दास या उनके दासों के दास बनकर, उनके निर्देशन में कार्य करना ।
स्वयंभू गुरु के निर्देशन में योग विधि सीख कर, उसके अनुरूप कर्म करना ।
इनमें से कौन सा गर्हित कर्म नहीं है ?
देवी-देवताओं की उपासना के लिए किये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान
सामाजिक स्तर पर किये जाने वाले अनेकानेक परोपकारी कार्य
मायावादी सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार हेतु किये जाने वाले कार्य
भगवान् के दासों के दासों के निर्देशनों का अनुपालन करना
इनमें से किस व्यक्ति को कृपण (Miser) कहा जा सकता है ?
ऐसा व्यक्ति जो सदैव कृष्ण का चिंतन करता रहता है ।
ऐसा व्यक्ति जो सदैव कृष्ण या कृष्ण के दासों की सेवा में संलिप्त रहता है ।
ऐसा व्यक्ति जिसे दैववश या कठोर श्रम से अर्जित सम्पति का सदुपयोग ज्ञात नहीं है ।
ऐसा व्यक्ति जो केवल कृष्ण या कृष्ण के दासों की भक्तिमय सेवा में सोचता रहता है ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति कृष्णभावनामृत में स्थित रहने के लिए कार्य करता है ?
जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में विद्यमान आनंद का उपभोग करना चाहता है ।
जो व्यक्ति भगवान् के दास के रूप में अपने स्वरुप को समझ लेता है
जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में विद्यमान ज्ञान से अलंकृत होना चाहता है ।
जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत के फलस्वरूप शाश्वत अस्तित्व को प्राप्त करना चाहता है ।
इनमें से कौन सा मनुष्य इसी जीवन में स्वयं को अच्छे तथा बुरे कार्यों से मुक्त करवा सकता है ?
जो व्यक्ति भगवान् के दास के रूप में अपने स्वरुप को जान लेता है
जो अपने स्वामित्व के भाव को त्याग कर प्रतिक्षण कृष्णभावनाभावित कर्मों में ही निमग्न रहे
जो भौतिक भोग व कृष्णभावनामृत में कुशल संतुलन बनाए रखने में निपुण हो जाये
जो व्यक्ति कृष्ण या कृष्ण के दासों के निर्देशनों को कूटनीतिपूर्वक टालना सीख जाता है
श्लोक संख्या 2.50 में जिस योग के विषय में कहा गया है वो इनमें से कौन सा योग है ?
कर्मयोग (सकाम) - कृष्णभावनामृत
बुद्धियोग - कृष्णभावनामृत
ज्ञानयोग - कृष्णभावनामृत
ध्यानयोग - कृष्णभावनामृत
श्रीमद्भगवद्गीता इनमें से हमें क्या उपदेश देती है ?
अन्य जीवों की हत्या करने में कोई दोष नहीं है अपितु इससे उन्हें उच्च योनि में देहान्तरित होने का अवसर प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें भौतिकभोग के लिए राजनीति एवं कूटनीति और अन्य पापकर्मों में प्रवीण बनती है।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें हमारे वास्तविक स्वरुप को जानने का मार्ग प्रशस्त करती है अर्थात कृष्णभावनामृत विषयक ज्ञान प्रदान करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता केवल सांसारिक क्रियाकलापों के प्रति हमारे देहात्म ज्ञान का उन्मूलन करती है।
यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि भगवद्धाम जाकर भी यदि मुझे दास ही बनना है तो मैं यहीं ठीक हूँ कम से कम यहाँ प्रचुर मात्रा में भोग तो है, आपके विचार से ऐसा व्यक्ति किस मानसिकता से ग्रस्त है ?
आध्यात्मिक मानसिकता
स्वाभाविक मानसिकता
प्रामाणिक मानसिकता
देहात्मिक मानसिकता
इस भौतिक जगत् में सर्वत्र व्याप्त जीवन के दुःख जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि के चक्र से मुक्ति का क्या उपाय है ?
हिरण्यकशिपु की भाँति घोर तपस्या करना।
इन दु:खों के निवारण हेतु कुशल वैज्ञानिक अनुसंधान करना।
अपने इस मनुष्य जीवन में कृष्णभावनामृत का दृढ़ता से पालन करना।
इन दु:खों की परवाह न करके भौतिक भोग में मग्न रहना।
पाप और पुण्य कर्मों से उत्पन्न कष्टों को सहन करते हुए भी हम इनसे मुक्ति की जिज्ञासा क्यों नहीं कर पाते ?
अनादि काल से इन कष्टों के साथ तदात्मय के कारण विकसित सहनशीलता
परमसत्य के तत्त्ववेता से सम्पर्क का अभाव
भौतिक कार्यकलापों में आवश्यकता से अधिक व्यस्तता
भौतिक जगत् के वास्तविक स्वरूप की अनभिज्ञता
जीव भगवान् की अलौकिक स्थिति को कैसे जान सकता है ?
वैदिक शास्त्रों में वर्णित भगवान् विषयक ज्ञान के मानसिक विश्लेषण द्वारा
वैदिक शास्त्रों में वर्णित सकाम कर्मों के द्वारा
अपने वास्तविक स्वरूप को समझ कर
भौतिक भोगों की चरम सीमा पर पहुँच कर
श्लोक संख्या 2.52 में श्रीभगवान् के कथन “जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी सघन वन को पार कर जाएगी” में मोह रूपी सघन वन क्या है ?
मनुष्य का सकाम कर्मों के फलों को भोग कर आनंदमय एवं वैभवशाली जीवन जीने का भ्रम
भौतिक शरीर, स्वजनों, धन-सम्पदा, मान-प्रतिष्ठा इत्यादि के प्रति गहन मोह ममता
शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा ज्ञानार्जन का अहंकारमय भ्रम
किसी तत्वज्ञानी की शरण ग्रहण न कर, स्वत: वेदाध्ययन द्वारा ज्ञानार्जन का भ्रम
श्लोक संख्या 2.52 में श्रीभगवान् के कथन “तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सब के प्रति अन्यमनस्क (Indifferent) हो जाओगे” में सुने हुए तथा सुनने योग्य से क्या अभिप्राय है ?
वेदों में निहित परम गुह्य (Confidential) तत्त्वज्ञान
वेदों में निहित कृष्णभावनामृत विषयक निर्देश
वेदों के कर्मकाण्ड विभाग में वर्णित सकाम कर्मों के अलंकरामयी विधि-विधान
वेदों में वर्णित कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग इत्यादि
इनमें से मनुष्य का सकाम कर्मों के लिए धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति अन्यमनस्कता का मुख्य कारण क्या है ?
मनुष्य का तथाकथित कलियुगी ब्राह्मण समाज से भरोसा उठ जाना ।
मनुष्य की आर्थिक कृपणता एवं आधुनिक समाज के रीति-रिवाज़ ।
मनुष्य का धार्मिक अनुष्ठानों को रूढ़िवादी विचारधारा समझना ।
मनुष्य को श्रीकृष्ण तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध का वास्तविक रूप में बोध होना ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति शब्द-ब्रह्म की सीमा या वेदों या उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाता है ?
ज्ञानी
योगी
भक्त
कर्मी
श्लोक संख्या 2.53 में उल्लेखित “आत्म-साक्षात्कार की समाधि” से आपका क्या अभिप्राय है ?
आत्म- साक्षात्कार की एकमात्र विधि अष्टांग योग में एकनिष्ठ भाव से प्रयासरत होना ।
आत्म- साक्षात्कार की एकमात्र विधि प्रत्यक्ष ध्यान साधना में ही अपनी चेतना को अभिनिविष्ट करना ।
आत्म- साक्षात्कार की एकमात्र विधि हठयोग में एकनिष्ठ भाव से प्रयासरत होना ।
आत्म- साक्षात्कार की एकमात्र विधि कृष्णभावनामृत में एकनिष्ठ भाव से प्रयासरत होना ।
श्लोक संख्या 2.54 के माध्यम से अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पाँच प्रश्न किये । निम्न में से कौन सा प्रश्न उनमें सम्मिलित नहीं है ?
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण हैं ?
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है ?
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे युद्ध करता है ?
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की भाषा क्या होती है ?
एक बने-ठने मूर्ख की क्या पहचान होती है ?
उसकी धन-सम्पदा
उसका रहन-सहन
उसका चाल-चलन
उसकी बोल-चाल
श्लोक संख्या 2.55 में मनोधर्म का वास्तविक अर्थ क्या है ?
मन द्वारा प्रतिक्षण इन्द्रियभोग के लिए नये-नये प्रस्ताव प्रस्तुत करना ।
वर्णाश्रम धर्म के ही समान मन का भी अपना धर्म होता है ।
मन द्वारा समस्त इन्द्रियों का भोग किया जाना ।
मन के धर्म को समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ।
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवद्भक्त में किसके समान गुण परिलक्षित होते हैं ?
असुरों के समान
पशुओं के समान
देवताओं के समान
सामान्य मनुष्य के समान
दिव्य चेतना किसे कहते हैं ?
जिस जीव में सतोगुण की प्रधानता होती है, उसकी चेतना दिव्य होती है।
जिस जीव में तमोगुण की प्रधानता होती है, उसकी चेतना दिव्य होती है।
जिस जीव में सतोगुण की प्रधानता होती है, उसकी चेतना दिव्य होती है।
भौतिक विषय वासनाओं से रहित जीव की चेतना दिव्य होती है।
इनमें से कौन सा स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का लक्षण नहीं है ?
उसका मन आत्मा में संतुष्ट रहता है ।
जो त्रय तापों से विचलित नहीं होता है ।
जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होता है ।
जो शुभ से हर्षित होता है और अशुभ से घृणा करता है ।
मुनियों का परम सत्य विषयक निष्कर्ष भिन्न क्यों होता है ?
व्यवसायात्मिका बुद्धि के कारण
स्थितप्रज्ञ होने के कारण
अव्यवसायात्मिका बुद्धि के कारण
मनोधर्मी होने के कारण
“स्थितधी: मुनि सदैव कृष्णभावनाभावित रहता है क्योंकि वह सारा सृजनात्मक चिन्तन पूरा कर चुका होता है ।” इस कथन में “सृजनात्मक चिन्तन” से क्या अभिप्राय है ?
शुष्क चिन्तन द्वारा स्वयं में कृष्णभावना को विकसित कर, पूर्ण मनोकल्पित ज्ञान में स्थापित होना ।
भक्तों की संगति में कृष्णभावना को विकसित कर, पूर्ण ज्ञान में स्थापित होना ।
भगवान् विषयक प्रामाणिक ज्ञान को स्वीकारने के विपरीत स्वयं शुष्क चिन्तन या मनोकल्पना (Mental Speculation) द्वारा भगवान् का चित्रण करने का प्रयत्न करना ।
कृष्णभावनामृत के विषय में पूर्ण अनुसंधान करके, पूर्ण ज्ञान में स्थापित होना ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तीनों तापों के संघात से क्यों विचलित नहीं होता है ?
क्योंकि वह तीनों तापों से उत्पन्न कष्टों को भगवत्कृपा के रूप में सहन करता है ।
क्योंकि अनादि काल से इन तापों के सम्पर्क में रह कर उसने इनके प्रति सहनशीलता विकसित कर ली है ।
क्योंकि आधुनिक समाज ने इस प्रकार के अनेक तापों के लिए औषधियाँ विकसित कर ली हैं ।
क्योंकि भक्तों के संग में इन तापों का प्रभाव सभी में वितरित होने के कारण सहन करना सुगम हो जाता है ।
भौतिक जगत् का स्वरूप कैसा है ?
भौतिक जगत् जीवों के इन्द्रियभोगों की पराकाष्ठा होने के कारण अद्वितीय है ।
भौतिक जगत् जीवों के स्वामित्व को प्रदर्शित करने का एकमात्र साधन है।
भौतिक जगत् समस्त जीवात्माओं के लिए अद्भुत संघर्ष क्षेत्र है ।
भौतिक जगत् में सभी जीवों के प्रत्येक जीवन में सुख तथा दुःख का आवागमन निरन्तर व्याप्त रहता है ।
वास्तविक साधू तथा ढोंगी साधू में क्या मूल अंतर होता है ?
वास्तविक साधू की इन्द्रियाँ उसके पूर्ण नियन्त्रण में होती हैं ।
ढोंगी साधू की इन्द्रियाँ उसके पूर्ण नियन्त्रण में होती हैं ।
वास्तविक साधू रहस्यमय ढंग से इन्द्रियतृप्ति करने में प्रवीण होता है ।
ढोंगी साधू की इन्द्रियाँ शुद्ध करने वाली होती हैं ।
कछुवे का अपने अंगों को संकुचित कर लेने का उदाहरण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के किस लक्षण को प्रदर्शित करता है ?
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की इन्द्रियाँ कछुवे के अंगों की भान्ति कार्य करती हैं, शिकारी के समक्ष संकुचित हो जाती हैं ।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को इन्द्रिय विषयों के सम्पर्क में आने से पूर्व ही संकुचित कर लेता है और भगवान् की विशिष्ट सेवा के लिए पुनः प्रकट कर देता है ।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की इन्द्रियाँ कछुवे के अंगों की भान्ति मन्दगति होती हैं अत: सहजता से नियन्त्रित हो जाती हैं ।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की इन्द्रियाँ कछुवे के अंगों की भान्ति अपने-अपने इन्द्रियविषय अतिसंवेदनशील होती हैं ।
वैदिक शास्त्रों में मनुष्य की भौतिक इन्द्रियों की तुलना इनमें से किससे की गई है ?
विषैले बिच्छुओं से
विषैले कछुओं से
विषैले सर्पों से
विषैले मेंढकों से
वैदिक शास्त्रों में मनुष्य की भौतिक इन्द्रियों की तुलना विषैले सर्पों से ही क्यों की गई है ?
क्योंकि मनुष्य की इन्द्रियाँ भी सर्पों की ही भान्ति विषैली होती हैं, और इन इन्द्रियों का कोई उपचार उपलब्ध नहीं है ।
जिस प्रकार विषैले सर्प के दंश से प्राणी मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी प्रकार इन्द्रियों के इन्द्रिय विषयों से संसर्ग से जीव भी एक और जन्म-मृत्यु के चक्र को प्राप्त होता है ।
क्योंकि मनुष्य की इन्द्रियाँ भी सर्पों की ही भान्ति तमोगुणी होती हैं, और इन इन्द्रियों का कोई उपचार उपलब्ध नहीं है ।
क्योंकि मनुष्य की इन्द्रियाँ भी सर्पों की ही भान्ति रजोगुणी होती हैं, और इन इन्द्रियों का कोई उपचार उपलब्ध नहीं है ।
भौतिक इन्द्रियों को नियन्त्रित करने की सरलतम एवं दिव्य विधि क्या है ?
भौतिक इन्द्रियों को भगवान् की दिव्य सेवा में न लगा कर आत्मतुष्टि में लगाना ।
भौतिक इन्द्रियों को आत्मतुष्टि में न लगा कर स्वजनों की सेवा में लगाना ।
भौतिक इन्द्रियों को धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा सकाम कर्मों में लगाना ।
भौतिक इन्द्रियों को आत्मतुष्टि में न लगा कर भगवान् की दिव्य सेवा में लगाना ।
जीवन की कौन सी ऐसी अवस्था है जिसमें देहधारी जीव भले ही इन्द्रियभोग से निवृत्त हो जाए पर उसमें इन्द्रियभोगों की इच्छा बनी रहती है ?
तरुणावस्था
वृद्धावस्था
रुग्णावस्था
युवावस्था
श्लोक संख्या 2.59 में विधि-विधानों द्वारा इन्द्रियभोग को संयमित करने की विधि की तुलना किससे की गई है ?
कुशल सपेरे द्वारा विषैले सर्पों को नियन्त्रित करने से
वाहन के पहियों को ब्रेक के द्वारा नियन्त्रित करने से
चिकित्सक द्वारा रोगी के किसी भोज्य पदार्थ पर प्रतिबन्ध लगाने से
बच्चों को डरा-धमका कर नियन्त्रित करने से
अल्पज्ञानी व्यक्तियों के लिए इन्द्रियसंयमन के लिए कौन सी विधि की संस्तुति की गई है ?
आधुनिक योग
अष्टांग योग
हठयोग
ज्ञानयोग
उन्नत भक्त इन्द्रियसंयमन के लिए विभिन्न प्रतिबंधों से मुक्त होते हैं परन्तु नवदीक्षित भक्त नहीं, ऐसा क्यों ?
क्योंकि उन्नत भक्त अपनी नवदीक्षित अवस्था को लांघ चुके होते हैं ।
क्योंकि यम-नियमों के अभ्यास से नवदीक्षित भक्तों को अपनी भौतिक इन्द्रियों को विकसित करना होता है ।
क्योंकि विधि-विधानों के पालन से नवदीक्षित भक्तों को अपनी भौतिक इन्द्रियों को शिथिल करना होता है ।
क्योंकि उन्नत भक्त प्रतिक्षण अपने मन, बुद्धि सहित समस्त इन्द्रियों को भगवान् की दिव्य सेवा में ही लगाये रखते हैं ।
उत्तम रस के रसास्वादन से क्या अभिप्राय है ?
अमृत तुल्य द्रव्य का रसास्वादन
कृष्णभावनामृत में रूचि उत्पन्न होना
कृष्ण के सौन्दर्य का रसास्वादन
जड़ भौतिक पदार्थों के प्रति अरुचि
