wayground logo

Free Printable Worksheets

Font size

S
M
L
XL
Worksheets

समयसार गाथा १६ कलश १६-१९

Total questions: 30

Worksheet time: 23mins

Name
Class
Date
1.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार आत्मा क्या है ?

a)

सम्यक दर्शन

b)

सम्यक ज्ञान

c)

सम्यक चारित्र

d)

सम्यक रत्नत्रय

e)

सभी

2.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार आत्मा जिस भाव से ______________तथा ____________ हो, उस भाव से ही नित्य सेवन करने योग्य है, उपासना करने योग्य है

a)

साध्य, साधन

b)

उपासना, उपास्य

c)

आराधना, आराध्य

d)

साधना-साध्य

e)

सभी

3.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार दूसरों को व्यवहार से समझाते हैं कि साधु पुरुष को __________________ सदा सेवन करने योग्य है,

a)

दर्शन-ज्ञान-चारित्र

b)

आत्मा

c)

ज्ञान

d)

ज्ञायक

4.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार कौन उपासना करने योग्य है, सेवन करने योग्य है?

a)

आत्मा

b)

ज्ञान, श्रद्धान और आचरण

c)

दोनों

d)

कोई नही

5.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार दर्शन-ज्ञान-चारित्र का सदा सेवन करना चाहिए?

a)

हा क्योंकि ये तीनों एक आत्मा ही हैं

b)

नही एक आत्मा का ही सेवन करना चाहिए

c)

व्यवहार से

d)

निश्चय से नही

e)

सभी

6.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार जबतक भेद करके न समझाया जाय, तबतक _________ शिष्य की समझ में बात आती नहीं है

4 lines
7.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार उपयोग आत्मसन्मुख होकर आत्मा का अनुभव करता है, तब आत्मा को जाननेरूप जो निर्मल परिणमन होता है, उसे __________ कहते हैं;

a)

सम्यग्ज्ञान

b)

सम्यग्दर्शन

c)

सम्यक्चारित्र

d)

रत्नत्रय

8.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार पर में से एकत्व-ममत्व तोड़कर शुद्धनय के विषय भूत भगवान आत्मा में जो अपनापन स्थापित करता है, वह आत्मा आश्रित निर्मल परिणमन ____________कहलाता है

a)

सम्यग्ज्ञान

b)

सम्यग्दर्शन

c)

सम्यक्चारित्र

d)

रत्नत्रय

9.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार आत्मा में ही उपयोग केन्द्रित होता है, आत्मा ही ध्यान का ध्येय बनता है और चारित्रगुण में अनन्तानुबंधी कषाय के अभावरूप निर्मलता प्रगट होती है, वह ____________का अंश है

a)

सम्यग्ज्ञान

b)

सम्यग्दर्शन

c)

सम्यक्चारित्र

d)

रत्नत्रय

10.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार निश्चय- व्यवहार के सन्दर्भ क्या सही नही है

a)

अज्ञानी को यही कहते रहें कि आत्मा का सेवन करो, आत्मा की उपासना करो, तो उसकी समझ में कुछ भी न आये

b)

शिष्यों को व्यवहार से समझाते हैं कि दर्शन-ज्ञान-चारित्र की उपासना करो, समझाने के लिए व्यवहार का आश्रय लेना ही पड़ता है

c)

स्वयं तो यह निश्चय करे कि शुद्धनय का विषय भूत एक भगवान आत्मा ही उपास्य है;

d)

शिष्यों को निश्चय से यह समझावे कि दर्शन-ज्ञान-चरित्र का सेवन करो

11.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार शुद्धनय-अशुद्धनय के सन्दर्भ क्या सही नही है

a)

"एक सो निश्चय और अनेक सो व्यवहार"

b)

अभेद एक आत्मा के सेवन निश्चय है

c)

भेदरूप दर्शन-ज्ञान-चरित्र के सेवन व्यवहार है

d)

अभेद, अमेचक, एकाकार आत्मा की आराधना निश्चय आराधना है

e)

भेद, मेचक और अनेकाकार आत्मा की आराधना निश्चय आराधना है

12.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार अशुद्धि के सन्दर्भ क्या सही नही है

a)

भेद के लक्ष्य से विकल्पों की उत्पत्ति होती

b)

अभेद के लक्ष्य से विकल्पों का शमन होकर निर्विकल्प दशा उत्पन्न होती है

c)

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की उत्पत्ति निर्विकल्प दशा में ही होती है

d)

सम्यग्दर्शनकी सत्ता विकल्पात्मक दशा में भी रह सकती है

e)

सम्यक चारित्रकी सत्ता विकल्पात्मक दशा में भी रह सकती है

13.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार साधु शब्द का आशय क्या नही है ?

a)

साधुपुरुष

b)

सद्गृहस्थ

c)

मुनिराज

d)

अज्ञानि-ज्ञानी

e)

कोई नही

14.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार समयसारजी परमागम किसके पढने योग्य है ?

a)

साधुपुरुष

b)

सद्गृहस्थ

c)

मुनिराज

d)

अज्ञानि-ज्ञानी

e)

सभी

15.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार उपदेश के सन्दर्भ मे क्या अनुचित है ?

a)

पात्र सत्पुरुषों को दिया गया उपदेश ही कार्यकारी होता है

b)

दुर्जनों को दिया गया उपदेश निरर्थक हो जाता है, विपत्ति का कारण भी बन सकता है।

c)

अपने कल्याण की ही सोचें

d)

जो लोग सत्य समझना चाहते हों, विनयवंत हों, सरल हृदय हों; उनके अनुरोध पर जो कुछ सत्य जानते हों, अवश्य बताना, समझाना

e)

जो लोग सुनना ही न चाहें, समझना ही न चाहें उन्हें भी समझाने का प्रयत्न करना चाहिए

16.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार आत्मा एक ही साथ अनेक अवस्थारूप मेचक भी है और एक अवस्थारूप अमेचक भी है यह कथन

a)

प्रमाण का है

b)

नय का है

c)

निश्चय नय का है

d)

व्यवहार नय का है

17.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार आत्मा को दर्शन-ज्ञान-चारित्र से तीनपना - अनेकपना प्राप्त है और यह स्वयं से एक है यह कथन

a)

प्रमाण का है

b)

नय का है

c)

निश्चय नय का है

d)

व्यवहार नय का है

18.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार आत्मा दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीन भावोंरूप है यह कथन

a)

प्रमाण का है

b)

शुद्नधनय का है

c)

निश्चय नय का है

d)

व्यवहार नय का है

19.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार आत्मा प्रगट ज्ञायक ज्योतिमात्र से आत्मा एक ही है, एकस्वरूप ही है यह कथन

a)

प्रमाण का है

b)

अशुद्नधनय का है

c)

निश्चय नय का है

d)

व्यवहार नय का है

20.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार साध्य की सिद्धि कैसे होगी ?

a)

निश्चयनय (परमशुद्धनिश्चयनय) के विषयभूत भगवान आत्मा के आश्रय से ही

b)

आत्मा के आश्रय से उत्पन्न होनेवाले निश्चय सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र से ही

c)

दोनों से

d)

दोनों एकसाथ से

21.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार मलिनता क्या है ?

a)

दर्शन, ज्ञान और चारित्र के भेद

b)

मोह-राग-द्वेष

c)

व्यवहार नय

d)

निश्नचय नय

22.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार क्या सही नही है

a)

चैतन्यघन आत्मा को देखना निश्चय

b)

आत्मा को तीन रूप परिणमित होते हुए जानना व्यवहार

c)

दोनों को एक साथ जानना प्रमाण है

d)

दोनों को क्रम से जानना प्रमाण है

23.

समयसारजी परमागम कलश १६-१९ के अनुसार एकआत्मा के तीन भेद करके क्यों समझाया गया है

a)

एक आत्मा का ही आश्रय कराने के लिए

b)

जगतजन भेद के बिना समझ नहीं सकते है

c)

अन्य द्रव्य का निषेध के लिए (परद्रव्यरूप देव-शास्त्र-गुरु उनकी भक्ति के विकल्प का निषेध के लिए )

d)

देहादिक की क्रिया अथवा शुभरागरूप परिणमन से साध्य की सिद्धि तीन काल में भी होनेवाली नहीं है यह समझाने के लिए

e)

सभी

24.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार "विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति परेषां परिपीडनाय। खलस्य साधो विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ " का आशय क्या है ?

a)

दुर्जनों की विद्या विवाद के लिए होती है,

b)

दुर्जनों का धन मद के लिए होता है

c)

दुर्जनों की शक्ति दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के लिए होती है

d)

साधु पुरुषों की विद्या ज्ञान के लिए होती है, धन दान के लिए होता है और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है।"

e)

सभी

25.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार रत्नत्रय के सन्दर्भ मे क्या सही नही है ?

a)

मुख्यरूप से सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के धारी मुनिराज ही होते हैं

b)

गृहस्थ भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार रत्नत्रय के धारी हो सकते हैं, होते भी हैं

c)

रत्नत्रय का आरंभ चौथे गुणस्थान में होता है और पूर्णता सिद्धों में होती है

d)

कोई नही

26.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रत्नत्रय प्रेरणा की आवश्यकता किसे और क्यों है

a)

पहले से छठवें गुणस्थान तक ही दी जाना संभव है

b)

जो व्यक्ति अज्ञान दशा में है, उसे सर्वाधिक प्रेरणा की आवश्यकता है

c)

चौथे, पाँचवें एवं छठवें गुणस्थान वालों को उत्तरोत्तर कम प्रेरणा की आवश्यकता है

d)

रत्नत्रय धारण करने का उपदेश तो मुख्यत: गृहस्थों के लिए ही होता है क्योकि वो गृहस्थी के जंजाल में उलझे हैं

e)

सभी

27.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार 'सीख न दीजे बानरा, उल्टा देय मिटाय' - इसका क्या आशय है?

a)

दूसरों के सुधार के चक्कर में हम अपना ही अहित न कर बैठे

b)

भीगते हुए बन्दर को यह सीख नही दो

28.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार जब दर्शन-ज्ञान-चारित्र आत्मा ही हैं, तो फिर स्वयं के समझने में और दूसरों को समझाने में यह अन्तर क्यों हो?

a)

हाथी के दाँत खाने के और तथा दिखाने के और

b)

अज्ञानी को यही कहते रहें कि आत्मा का सेवन करो, आत्मा की उपासना करो, तो उसकी समझ में कुछ भी न आये; अतः उसे व्यवहार से समझाते हैं

c)

स्वयं तो यह निश्चय करे कि शुद्धनय का विषय भूत एक भगवान आत्मा ही उपास्य है

29.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनों का भिन्न-भिन्न स्वभाव कैसा नही है?

a)

दर्शन का प्रतीतिरूप स्वभाव

b)

ज्ञान का जाननेरूप स्वभाव

c)

चारित्र का शान्ति व वीतरागतारूप स्वभाव है

d)

चारित्र का व्रत-त्याग स्वभाव है

30.

समयसारजी परमागम गाथा १६ के अनुसार अधिक क्या कहें, एक त्रिकाली ध्रुव भगवान आत्मा को देखो, जानो और एक आत्मा में ही रम जावो: __________________ के विकल्पों में न उलझो; - सिद्धि का एक मात्र यही उपाय है ।

a)

समल-अमल

b)

शुभ-अशुभ

c)

एक-अनेक

d)

शुद्ध-अशुद्ध