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10. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_2.60–2.72

Total questions: 51

Worksheet time: 1hrs 27mins

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1.

कृपया यहाँ अपना नाम लिखें ।

4 lines
2.

कृपया यहाँ अपना मोबाइल न० लिखें ।

4 lines
3.

कृपया यहाँ अपनी आयु लिखें ।

4 lines
4.

कृपया यहाँ अपना पता लिखें ।

4 lines
5.

हम सभी प्रतिक्षण इन्द्रियों की प्रबलता व वेग (Force) के माध्यम से इस संसार में अपने भोगी अस्तित्व के लिए जूझते हैं । कभी हमें मान, तो कभी अपमान मिलता है कृपया बताएँ कि इन्द्रियों की प्रबलता व वेग का स्रोत क्या है ?

a)

मन की चंचलता (Versatility)

b)

बुद्धि का एकाग्रता (Concentration)

c)

अहंकार की सूक्ष्मता (subtlety)

d)

प्रकृति के तीनों गुण

6.

भौतिक इन्द्रियों के संयमन का मापदण्ड क्या है ?

a)

कृष्णभावनामृत

b)

मन की स्थिरता

c)

बुद्धि की एकाग्रता

d)

अहंकार की शून्यता

7.

भौतिक इन्द्रियों द्वारा विवेकी पुरुष के मन को बलपूर्वक हरने का क्या कारण है ?

a)

भौतिक इन्द्रियों के संयमन की कृत्रिम विधि

b)

भक्तों के संग में रहते हुए भी भक्तों से ईर्ष्या

c)

सूक्ष्म स्तर पर इन्द्रियभोग की इच्छाएँ

d)

कृष्णभावनामृत पथ का उचित अनुपालन

8.

भौतिक इन्द्रियों का संचालक मन भौतिक भोगों से पूर्ण विरक्ति (detachment) कैसे प्राप्त करता है ?

a)

जब मन पूर्णत: श्रीकृष्ण में अभिनिविष्ट (Invest) होता है ।

b)

जब मन भौतिक भोगों की चरम सीमा प्राप्त कर लेता है ।

c)

जब मन कृष्णभावनामृत के पथ को अंगीकार करता है ।

d)

जब मन भौतिक इन्द्रियों के संचालन में प्रवीण हो जाता है ।

9.

अष्टांग योग तथा कृष्णभावनामृत में इनमें से मूल अंतर क्या है ?

a)

अष्टांग योग में समाधि में प्रवेश के बाद विष्णु या कृष्ण में मन, बुद्धि को स्थिर किया जाता है जबकि कृष्णभावनामृत की प्रारम्भिक अवस्था से ही मन, बुद्धि तथा इन्द्रियाँ ऐसी स्थिरता प्राप्त करने लगती हैं ।

b)

अष्टांग योग की अव्ययता मनुष्य द्वारा समाधि में अभिनिवेश पर निर्भर करती है जबकि कृष्णभावनामृत की प्रत्येक अवस्था अव्यय है ।

c)

अष्टांग योग सांसारिक विषयों से दूर रहकर अभ्यासित किया जाता है जबकि कृष्णभावनामृत को सांसारिक विषयों में रहकर नियत कर्मों को निष्पादित कर पूर्ण किया जाता है ।

d)

अष्टांग योग में इन्द्रियों को बलपूर्वक संयमित किया जाता है जबकि कृष्णभावनामृत की दिव्यता से इन्द्रियसंयमन स्वत: ही हो जाता है ।

10.

महाराज अम्बरीष अपनी किस विशेषता के कारण दुर्वासा मुनि से विजयी हुए ?

a)

क्योंकि महाराज अम्बरीष ने मुनि के सारे अन्याय सहन किये ।

b)

क्योंकि महाराज अम्बरीष के पास विशाल सेना थी ।

c)

क्योंकि महाराज अम्बरीष कृष्ण भक्त थे ।

d)

क्योंकि महाराज अम्बरीष बहुत सी सिद्धियों के स्वामी थे ।

11.

महाराज अम्बरीष की इन्द्रियों के संयमन (Control) का क्या रहस्य था ?

a)

महाराज अम्बरीष ने धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा अपनी इन्द्रियों को संयमित किया था ।

b)

महाराज अम्बरीष द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों को भगवान् श्रीकृष्ण की भक्तिमय सेवा में अभिनिविष्ट करना ।

c)

महाराज अम्बरीष ने अष्टांग योग द्वारा अपनी इन्द्रियों को संयमित किया था ।

d)

महाराज अम्बरीष ने इन्द्रियभोग की चरम सीमा को प्राप्त कर अपनी इन्द्रियों को संयमित किया था ।

12.

महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योग-सूत्र में समाधिस्थ जीव के लिए किसके ध्यान की अपरिहार्यता (Inevitability) बताई गई है ?

a)

शिव

b)

अचिन्त्य शक्ति

c)

विष्णु

d)

ब्रह्म शक्ति

13.

वास्तविक योग का उद्देश्य क्या है ?

a)

कृष्णभावनाभावित होना

b)

शिवभावनाभावित होना

c)

समाधि में स्थापित होना

d)

दिव्यता को प्राप्त होना

14.

भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.62-63 में इस भौतिक जगत् में पुनःपुनः पतन के जिस मूल कारण को उद्घाटित किया है, वह क्या है ?

a)

आसक्ति से उत्पन्न काम

b)

क्रोध से उत्पन्न पूर्ण मोह

c)

बुद्धि का नष्ट हो जाना

d)

भौतिक विषयों का चिंतन

15.

श्रीमद्भगवद्गीता का 2.62 श्लोक इनमें से किसका द्योत्तक है ?

a)

काम, क्रोधादि विकारों का

b)

प्रकृति जनित सत्वगुण का

c)

प्रकृति जनित रजोगुण का

d)

प्रकृति जनित तमोगुण का

16.

श्रीमद्भगवद्गीता का 2.63 श्लोक इनमें से किसका द्योत्तक है ?

a)

प्रकृति जनित रजोगुण का

b)

प्रकृति जनित तमोगुण का

c)

प्रकृति जनित सत्वगुण का

d)

मोह, विभ्रमादि विकारों का

17.

भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय दो “गीता का सार” में रजोगुण का सूत्र उद्घाटित किया है, निम्न में से इस सूत्र को पहचानें?

a)

पूर्ण मोह (क्रोध से उत्पन्न) ----- स्मरणशक्ति विभ्रमित ----- बुद्धि नष्ट ----- जीवात्मा का पतन

b)

चिन्तन (श्री कृष्ण का) ----- आसक्ति ----- भाव ----- भगवद्प्रेम

c)

कृष्णभावनाहीन ----- विभक्त बुद्धि ----- अस्थिर मन ----- अशान्ति

d)

चिन्तन (इन्द्रिय विषयों का) ----- आसक्ति ----- काम ----- क्रोध

18.

जीवात्मा का रजोगुण से तमोगुण में अधोगति का पतन बिंदु क्या है ?

a)

क्रोध की चरम सीमा

b)

पूर्ण मोह को प्राप्त होना

c)

इन्द्रिय विषयों का चिन्तन

d)

स्मरणशक्ति का भ्रमित होना

19.

भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय दो “गीता का सार” में तमोगुण का सूत्र उद्घाटित किया है, निम्न में से इस सूत्र को पहचानें?

a)

चिन्तन (इन्द्रिय विषयों का) ----- आसक्ति ----- काम ----- क्रोध

b)

चिन्तन (श्री कृष्ण का) ----- आसक्ति ----- भाव ----- भगवद्प्रेम

c)

पूर्ण मोह (क्रोध से उत्पन्न) ----- स्मरणशक्ति विभ्रमित ----- बुद्धि नष्ट ----- जीवात्मा का पतन

d)

कृष्णभावनाहीन ----- अनेक शाखाओं में विभक्त बुद्धि ----- अस्थिर मन ----- अशान्ति

20.

इस भौतिक जगत् में इन्द्रिय विषयों के चिन्तन के कारण सर्वव्याप्त अपराधों यथा चोरी, गबन, धोखा, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, बलात्कार, हत्या इत्यादि का क्या परिणाम होता है ?

a)

जीवात्मा की भौतिक बंधन की अवधि बढ़ती है ।

b)

जीवात्मा की भौतिक बंधन की अवधि घटती है ।

c)

जीवात्मा को एक और मनुष्य योनि प्राप्त होती है ।

d)

जीवात्मा के भौतिक आनन्द में वृद्धि होती है ।

21.

समस्त प्रकार के पाप व पुण्य कर्मों का मूलाधार इन्द्रिय विषयों का चिन्तन है, यदि हमें ऐसे कर्मों को रोकना हो तो इन्हें किस अवस्था में रोका जा सकता है ?

a)

आसक्ति की अवस्था में

b)

क्रोध की अवस्था में

c)

काम की अवस्था में

d)

चिन्तन की अवस्था में

22.

हम सभी जीव इस भौतिक संसार के कष्टदायक बंधनों से मुक्त होने के लिए अपने-अपने मनोवान्छित उपायों से प्रयासरत हैं, किन्तु पूर्ण सफलता किसी को भी प्राप्त नहीं हो रही है । ऐसा क्यों ?

a)

क्योंकि हम मुक्ति में भी निष्क्रियता एवं स्वतन्त्रता चाहते हैं ।

b)

क्योंकि हम कृष्णभावनामृत से पूर्णत: अनभिज्ञ हैं ।

c)

क्योंकि हम भौतिक भोगों में ही मुक्ति का मार्ग ढूंढते हैं ।

d)

क्योंकि हम अपने स्वामित्व की भावना को त्यागना नहीं चाहते हैं ।

23.

भौतिक इन्द्रियों को संयमन द्वारा वश में करने की एकमात्र विधि क्या है ?

a)

भौतिक इन्द्रियों को केवल मात्र अष्टांग योग द्वारा ही संयमित किया जा सकता है अन्य कोई भी विधि कारगर नहीं है ।

b)

भौतिक इन्द्रियों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों व पुण्य कर्मों के फलस्वरूप देव कृपा वश ही संयमित किया जा सकता है ।

c)

भौतिक इन्द्रियों को भगवान् की दिव्य भक्तिमय सेवा में लगाने से इन्द्रियाँ बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के स्वत: ही संयमित हो जाती हैं ।

d)

भौतिक इन्द्रियों को केवल मात्र मन द्वारा ही नियन्त्रित किया जा सकता है अन्य कोई भी बाह्य विधि कारगर नहीं है ।

24.

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति राग तथा द्वेष से कैसे मुक्त हो जाता है ?

a)

क्योंकि वह भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नामों का प्रतिदिन सोलह माला जप करता है ।

b)

क्योंकि वह केवल भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही कर्म करता है ।

c)

क्योंकि वह भगवान् श्रीकृष्ण के भक्तों के संग की महता को भली भान्ति समझता है ।

d)

क्योंकि भक्तों के श्रीमुख से वह भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेशों का नित्य श्रवण करता है ।

25.

“यही चेतना भगवान् की अहैतुकी कृपा (Causeless mercy) है” में श्रील प्रभुपाद जी किस चेतना के विषय में समझा रहे हैं ?

a)

केवल भगवान् श्रीकृष्ण के सदृश कर्म करने के भाव से भावित चेतना

b)

केवल भगवान् श्रीकृष्ण की अवहेलना करने के भाव से भावित चेतना

c)

केवल भगवान् श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार कर्म करने के भाव से भावित चेतना

d)

केवल भगवान् श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों से प्रभावित चेतना

26.

क्या किसी भक्त को भगवान् की अहैतुकी कृपा इन्द्रियों में आसक्त होते हुए भी प्राप्त हो सकती है ? यदि हाँ, तो कैसे ?

a)

भगवान् श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा के लिए किसी विशेष पात्रता या योग्यता की आवश्यकता नहीं होती है ।

b)

भगवान् श्रीकृष्ण और उनके भक्तों के निर्देशों का अक्षरशः पालन अहैतुकी कृपा के लिए विशेष पात्रता है ।

c)

भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नामों का जप ही अहैतुकी कृपा प्राप्ति का एकमात्र साधन है ।

d)

श्रुति-स्मृति शास्त्र आदि का स्वाध्ययन ही अहैतुकी कृपा प्राप्ति का केवल मात्र साधन है ।

27.

कृष्णभावनाभावित चेतना से आपका क्या अभिप्राय है ?

a)

जो जीव प्रतिक्षण केवल भगवान् के ही अनुसन्धान में लगा रहे, उसकी चेतना कृष्णभावनाभावित होती है ।

b)

जो जीव प्रतिक्षण केवल भगवान् श्रीकृष्ण के ही दुष्प्रचार में लगा रहे, उसकी चेतना कृष्णभावनाभावित होती है ।

c)

जो जीव प्रतिक्षण केवल भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही कार्यशील रहे, उसकी चेतना कृष्णभावनाभावित होती है ।

d)

जो जीव प्रतिक्षण केवल भगवान् श्रीकृष्ण से ईर्ष्या में ही लगा रहे, उसकी चेतना कृष्णभावनाभावित होती है ।

28.

इनमें से किस व्यक्ति के लिए आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक ताप नष्ट हो जाते हैं ?

a)

जिस व्यक्ति की चेतना कृष्णभावनाहीन होती है ।

b)

जिस व्यक्ति की चेतना कृष्णभावनाभावित होती है ।

c)

जिस व्यक्ति की चेतना कृष्णभावना विरुद्ध होती है ।

d)

जिस व्यक्ति की चेतना शिवभावनाभावित होती है ।

29.

हम समस्त जीव का इस संसार में हर समय दु:खी, अशान्त, विचलित, भ्रमित, संघर्षशील, एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी क्यों बने रहते हैं ?

a)

क्योंकि हमारी बुद्धि कभी भी एकाग्र नहीं रहती है ।

b)

क्योंकि हमारा मन कभी भी स्थिर नहीं रहता है ।

c)

क्योंकि हम कृष्ण के स्वामित्व को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं ।

d)

क्योंकि इस भौतिक जगत् का वास्तविक स्वरूप यही है ।

30.

मन की चंचलता का एक मात्र कारण क्या है ?

a)

अन्तिम लक्ष्य का अभाव

b)

इन्द्रियभोग का अभाव

c)

प्रकृति के गुणों का दबाव

d)

तीनों तापों का संघात

31.

हमारे मोहल्ले में एक लड़का बहुत ही सभ्य, व्यवहार कुशल, श्रेष्ठ विद्यार्थी था । अचानक, एक दिन उसके द्वारा अपनी ही सहपाठी से बलात्कार के समाचार ने सभी को चौंका दिया । आखिर ऐसे होनहार लड़के ने ऐसा घिनौना अपराध क्यों किया ?

a)

यह केवल उसकी आपराधिक मानसिकता के वशीभूत किया गया एक कुकर्म था ।

b)

माता-पिता के उचित पालन-पोषण एवं संस्कारों की कमी के कारण ही उसने ऐसा घिनौना अपराध किया ।

c)

अपराधी मानसिकता वाले लड़कों की संगति ने ही उसे ऐसा घिनौना अपराध करने के लिए उकसाया होगा ।

d)

क्योंकि वह हर क्षण काम वासना व इससे सम्बंधित विषयों के बारे में ही चिन्तन करता रहता था जिसने उसकी बुद्धि को हर लिया ।

32.

मन को वश में करने की सही एवं सरल विधि क्या है ?

a)

प्राणायाम व ध्यान योग जैसी विधियों द्वारा मन को सरलता से वश में किया जा सकता है ।

b)

अपनी समस्त इन्द्रियों को कृष्णभावनामृत में लगाकर मन को सरलता से वश में किया जा सकता है ।

c)

मन को इन्द्रियभोग में चरम सीमा तक संलिप्त करके सरलता से वश में किया जा सकता है ।

d)

मन को आत्मा, बुद्धि व इन्द्रियों की चापलूसी में लगाकर सरलता से वश में किया जा सकता है ।

33.

बुद्धि को स्थिर करने की प्रामाणिक, दिव्य एवं सरल विधि क्या होती है ?

a)

प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में कृष्णभावनामृत का अनुशीलन

b)

प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में अष्टांग योग का अनुशीलन

c)

प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में हठयोग का अनुशीलन

d)

प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में ज्ञान योग का अनुशीलन

34.

किसी व्यक्ति की मन की स्थिरता की क्या कसौटी होती है ?

a)

इन्द्रियों के संयमन

b)

इन्द्रियों की चंचलता

c)

बुद्धि की एकाग्रता

d)

आत्मा की शुद्धता

35.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.69 में “निशा अर्थात् रात्रि” शब्द से आप क्या समझते हैं ?

a)

यह कि भौतिकतावादी व्यक्ति की आध्यात्मिक कार्यकलापों के प्रति अनभिज्ञता और आध्यात्मवादी व्यक्ति का भौतिक आकर्षणों के प्रति अनभिज्ञ बने रहना ।

b)

यह कि भौतिकतावादी के लिए जो रात्रि है उसमें आध्यात्मवादी क्रियाशील होता है जबकि आध्यात्मवादी के लिए भौतिकतावादी की क्रियाशीलता का समय अर्थात् दिन रात्रि के सामान सोने के लिए होता है ।

c)

यह कि भौतिकतावादी और आध्यात्मवादी दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों की अपने – 2 निर्धारित कर्मों के प्रति निष्क्रियता रात्रि के समान है ।

d)

यह कि वास्तविक ज्ञानाभाव के कारण भौतिकतावादी और आध्यात्मवादी दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों की आपस में प्रतिस्पर्धा रात्रि के समान है ।

36.

इनमें से कौन आत्मनिरीक्षक मुनि कहलाता है ?

a)

वह व्यक्ति जो दूसरों के कार्यकलापों का अपनी देहात्मबुद्धि के द्वारा विश्लेषण कर उन पर दोषारोपण करता है ।

b)

वह व्यक्ति जो शुष्क चिन्तन द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान का विश्लेषण करके मनमाने रूप में उसे ग्रहण करने का प्रयत्न करता है ।

c)

वह व्यक्ति जो भौतिकवादियों के मनों को विचलित कर अपने तथाकथित आध्यात्मिक ज्ञान को प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करता है ।

d)

वह व्यक्ति जो अपनी आत्मविश्लेषक बुद्धि द्वारा इन्द्रिय विषयों के प्रति आकर्षण से अपनी इन्द्रियों को संयमित करके अपने वश में करता है ।

37.

बुद्धिमान मनुष्यों की कितनी श्रेणियाँ होती हैं ?

a)

5

b)

4

c)

2

d)

3

38.

बुद्धिमान मनुष्यों की एक श्रेणी के मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए भौतिक कार्यों में निपुण होते हैं, तो दूसरी श्रेणी के मनुष्य ....................... होते हैं

a)

आत्मनिरीक्षक

b)

आत्माधीक्षक

c)

आत्मपरीक्षक

d)

आत्मशिक्षक

39.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.70 में वास्तविक शान्ति प्राप्त करने की विधि का वर्णन हुआ है कृपया बताएँ इनमें से वह कौन सी विधि है ?

a)

मन द्वारा प्रतिक्षण प्रस्तावित इन्द्रियभोग के लिए नए-नए प्रस्तावों को स्वीकार कर इन्द्रियों के वेग को मंद करना ।

b)

मन द्वारा प्रतिक्षण प्रस्तावित इन्द्रियभोग के लिए नए-नए प्रस्तावों के प्रति उदासीन रहकर इन्द्रियों के वेग को सहन करना ।

c)

मन द्वारा प्रतिक्षण प्रस्तावित इन्द्रियभोग के लिए नए-नए प्रस्तावों को स्वीकार कर इन्द्रियों को विचलित करना ।

d)

मन द्वारा प्रतिक्षण प्रस्तावित इन्द्रियभोग के लिए नए-नए प्रस्तावों को स्वीकार कर अपनी सांसारिक प्रतिष्ठा बढ़ाना ।

40.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.70 में कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की तुलना सागर से की गई है और ऐसा व्यक्ति सदैव पूर्ण रहता है । इससे आप क्या समझते हैं ?

a)

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तो जड़ अवस्था में रहता है अत: उसे किसी भी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं होती है ।

b)

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के वेग को रोकता तो है किन्तु उसकी इन्द्रियाँ सदैव इन्द्रिय तृप्ति के लिए लालायित रहती हैं ।

c)

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि भगवान् उसकी सारी आवश्यकताएँ पूरी करते रहते हैं ।

d)

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की इन्द्रियाँ नदियों के समान होती हैं और मन सागर के समान, जो समस्त इन्द्रियों के वेग को समन्वित कर असहनीय बना देता है ।

41.

भौतिकतावादी व्यक्ति की इच्छा शून्यता की क्या पराकाष्ठा होती है ?

a)

भवबंधन से मुमुक्षुत्व की भावना

b)

इन्द्रियभोग की चरम सीमा

c)

कृष्णभावनाभावित होने की इच्छा

d)

सकाम कर्मयोग की भावना

42.

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की इच्छा शून्यता की क्या पराकाष्ठा होती है ?

a)

इन्द्रियभोग विहीन होकर केवल कृष्ण की तुष्टि की इच्छा

b)

विक्षुब्धता विहीन होकर केवल कृष्ण की तुष्टि की इच्छा

c)

कर्मयोग विहीन होकर केवल कृष्ण की तुष्टि की इच्छा

d)

मुमुक्षुत्व विहीन होकर केवल कृष्ण की तुष्टि की इच्छा

43.

कृष्णभावनामृत की सिद्ध अवस्था क्या है ?

a)

समस्त स्वामित्व की भावना को त्यागकर श्रीकृष्ण के निर्विशेष या शून्य रूप में तदाकार हो जाना अर्थात् सायुज्य मुक्ति प्राप्त करना ।

b)

समस्त स्वामित्व की भावना को त्यागकर श्रीकृष्ण के नित्य दास के रूप में अपनी यथार्थ स्थिति को जान लेना ।

c)

समस्त स्वामित्व की भावना को त्यागकर श्रीकृष्ण के विशेष स्वरूप को प्राप्त कर लेना अर्थात् सारुप्य मुक्ति प्राप्त करना ।

d)

समस्त स्वामित्व की भावना को त्यागकर श्रीकृष्ण के विशेष लोक को प्राप्त कर लेना अर्थात् सालोक्य मुक्ति प्राप्त करना ।

44.

“जीव कभी भी इच्छाशून्य या इन्द्रियशून्य नहीं हो सकता है, किन्तु उसे अपनी इच्छाओं की गुणवत्ता बदलनी होती है ।” कृपया इस कथन का स्पष्टीकरण करें ।

a)

जीवात्मा प्रतिक्षण विषय-वासनाओं का जाल बुनता रहता है और अंततः उसी जाल में बंधकर इस भवसागर के कष्टों को झेलता रहता है ।

b)

इच्छाशून्यता या इन्द्रियशून्यता अर्थात् निष्क्रियता है जबकि सदैव गतिशील एवं सक्रिय रहना जीवात्मा का स्वभाव है अर्थात् जीव कभी भी इच्छाशून्य या इन्द्रियशून्य नहीं हो सकता है ।

c)

इच्छा करना जीवात्मा का स्वभाव है, उसकी आंशिक स्वतन्त्रता है यद्यपि श्रीकृष्ण की तुष्टि की उसकी इच्छा ही इच्छा शून्यता कहलाती है ।

d)

मुझे यह इच्छाशून्यता या इन्द्रियशून्यता का विषय ही समझ में नहीं आया है ।

45.

जीवात्मा में मिथ्या स्वामित्व की भावना किसके कारण उत्पन्न होती है ?

a)

देहात्मबुद्धि के कारण

b)

अव्यवसायात्मिका बुद्धि के कारण

c)

सूक्ष्म शरीर के कारण

d)

व्यवसायात्मिका बुद्धि के कारण

46.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.71 में श्रील प्रभुपाद जी के अनुसार कौन सा दिव्य ज्ञान आत्म-साक्षात्कार पर निर्भर करता है ?

a)

यह कि कृष्ण ही सर्वस्व के स्वामी, भोक्ता और नियन्ता हैं ।

b)

यह कि प्रत्येक जीवात्मा ही सर्वस्व का स्वामी, भोक्ता और नियन्ता है ।

c)

यह कि प्रत्येक जीवात्मा कृष्ण का अंश स्वरूप है, वह न तो कभी कृष्ण के तुल्य होता है और न ही उनसे बढ़कर । वह शाश्वत स्थिति के अनुरूप कृष्ण का नित्य दास है ।

d)

यह कि कृष्णभावनामृत का ज्ञान ही वास्तविक शान्ति का मूल सिद्धान्त है ।

47.

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति क्या कहलाता है ?

a)

एकनिष्ठ योगी

b)

पूर्ण कृष्णभावनाभावित

c)

कृष्णभावनामृत व्यक्ति

d)

एक जटिल भोगी

48.

वह कौन सा पथ है जो आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता है ?

a)

आत्म-साक्षात्कार का पथ

b)

ज्ञानयोग का पथ

c)

अष्टांग योग या ध्यानयोग का पथ

d)

कृष्णभावनामृत का पथ

49.

किसी मनुष्य को कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को प्राप्त करने में कितना समय लगता है ?

a)

जैसे ही मनुष्य परमसत्य को समझ जाता है और उसे स्वीकार कर लेता है तत्क्षण कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को प्राप्त कर लेता है ।

b)

किसी भी मनुष्य के लिए कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को प्राप्त करना मुश्किल ही नहीं अपितु असम्भव है ।

c)

मनुष्य को कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को प्राप्त करने के लिए लाखों वर्षों तक साधना करनी पड़ती है ।

d)

मनुष्य को कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को प्राप्त करने के लिए बहुत सी भौतिक योग्यताएँ अर्जित करनी पड़ती हैं ।

50.

ब्रह्म-निर्वाण अवस्था से आप क्या समझते हैं ?

a)

ब्रह्म-निर्वाण अवस्था का अर्थ है भगवद्धाम अथवा भगवद्पद अथवा भगवद्प्रेम अथवा भगवद्भक्ति की प्राप्ति ।

b)

ब्रह्म-निर्वाण अवस्था का अर्थ है ब्रह्मभूत अवस्था का अन्त और भौतिकतावादी जीवन का प्रारम्भ ।

c)

ब्रह्म-निर्वाण अवस्था का अर्थ है भौतिकतावादी जीवन का अन्त और आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ ।

d)

ब्रह्म-निर्वाण अवस्था का अर्थ है आत्म-साक्षात्कार की उन्नत अवस्था ।

51.

भगवद्धाम तथा भगवद्भक्ति में मध्य कोई अंतर नहीं है ऐसा क्यों ?

a)

क्योंकि दोनों ही सच्चिदानन्द के पूर्ण स्रोत हैं अत: दोनों एक-दूसरे से अभिन्न हैं ।

b)

क्योंकि दोनों का सम्बन्ध आध्यात्मिक जगत् से है अत: दोनों एक-दूसरे से अभिन्न हैं ।

c)

क्योंकि दोनों का सम्बन्ध पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से है अत: दोनों एक-दूसरे से अभिन्न हैं ।

d)

क्योंकि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहने का अर्थ है – भगवद्धाम को प्राप्त करना ।