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Worksheetsसमयसार गाथा १७-१८
Total questions: 30
Worksheet time: 23mins
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार धन का अर्थी जन के क्रम क्या नही है ?
राजा को जानना
राजा की श्रद्धा करना
राजा की लगन से सेवा करना
धन की कांक्षा करना
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार मोक्ष का अर्थी जन के क्रम क्या नही है ?
जीवराजा को जानना
जीवराजा की श्रद्धा करना
जीवराजा की लगन से सेवा करना
जीवराजा मे तन्मय होना
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार मोक्ष का अर्थी जन क्रम क्या है?
जीवराजा को जानना, श्रद्धा करना, जीवराजा मे तन्मय होना
जीवराजा मे तन्मय होना, जीवराजा को जानना, श्रद्धा करना
जीवराजा को श्रद्धा करना, जानना, जीवराजा मे तन्मय होना
जीवराजा मे तन्मय होना, श्रद्धा करना, जानना
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार _______ बिना किसका _________ करेगा?
ज्ञान, श्रद्धान
श्रद्धान, ज्ञान
अनुभव, ज्ञान
प्रतीति, श्रद्धान
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार पहले तो आत्मा को जाने कि यह जो जाननेवाला अनुभव में आता है_______________
सो मैं ही हूँ
सो ही आत्मा है
सो ही ज्ञान है
सो ही ज्ञायक है
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार धनार्थी छत्रचमरादि राज्यचिन्हों से राजा को जानकर श्रद्धा करता है और सेवा करता है ___________
उसीप्रकार जीवराजा को स्वसंवेदन ज्ञान से जानना चाहिए
उसीप्रकार जीवराजा को वीतराग विज्ञान से जानना चाहिए
उसीप्रकार जीवराजा को प्रत्यक्ष ज्ञान से जानना चाहिए
उसीप्रकार जीवराजा को प्रमाण ज्ञान से जानना चाहिए
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार अनेक पर्यायरूप भेदभावों के साथ मिश्रितता होने पर भी सम्यक्त्व कैसे हो सकता है ?
भेद विज्ञान में प्रवीणता से 'जो यह अनुभूति है, सो ही मैं हूँ' ऐसे आत्मज्ञान से
अभेद ज्ञान में प्रवीणता से 'जो यह अनुभूति है, सो ही मैं हूँ' ऐसे आत्मज्ञान से
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार 'जो यह अनुभूति है, सो ही मैं हूँ'- ऐसे आत्मज्ञान से प्राप्त होता हुआ इसप्रकार की _______ जिसका लक्षण है ऐसा _____________ उदित होता है
प्रतीति, श्रद्धान
स्वसंवेदन, ज्ञान
स्थीरता, चारित्र
सभी
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार समस्त अन्यभावों का भेद होने से निशंक ______________होने में समर्थ होने से आत्मा का ___________उदय होता हुआ आत्मा को साधता है।
प्रतीति, श्रद्धान
स्वसंवेदन, ज्ञान
स्थीरता, चारित्र
सभी
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार साध्य आत्मा की सिद्धि की अन्यथा अनुपपत्ति है का आशय क्या है?
आत्मा किसी से उत्पन्न नही होता
आत्मा के सिद्धि का दूसरा उपाय नही है
आत्मा के सिद्धि यही उपाय है
कोई नही
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार साध्य आत्मा की सिद्धि की अन्यथा अनुपपत्ति का कारण क्या है?
'जो यह अनुभूति है, वही मै हूँ’ ऐसा आत्मज्ञान उदित नहीं होता
आत्मज्ञान के अभाव से, अज्ञात का श्रद्धान गधे के सींग के समान है, इसलिए श्रद्धान भी उदित नहीं होता
समस्त अन्यभावों के भेद से आत्मा में निशंक स्थिर होने की असमर्थता के कारण आत्मा का आचरण उदित न होने से आत्मा को साध नहीं सकता
अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा आबाल-गोपाल सबके अनुभव में सदा स्वयं ही आने पर भी
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार आत्मा के स्वपरप्रकाशक स्वभाव से क्या सही नही है ?
अपनी पर्यायगत योग्यतानुसार स्वपरपदार्थ प्रतिभासित होते रहते हैं
अपनी आत्मा में उत्पन्न होनेवाले पुण्य-पापरूप शुभाशुभ भाव भी ज्ञात होते रहते हैं
जानने-देखने वाला अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा भी ज्ञात होता रहता है
स्व-पर सभी भाव मिश्रितरूप से ही ज्ञात होते हैं, अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा भी पर्यायरूप अनेक भेदभावों के साथ मिश्रित ही दिखाई देता है
जानने-देखने वाला अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा ज्ञात नही होता है
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार साध्य आत्मा की सिद्धि की उपपत्ति का कारण क्या है?
आत्मा भेदज्ञान की प्रवीणता से इन सबमें जो 'जो यह अनुभूति है, वही मै हूँ’ ऐसा आत्मज्ञान उदित होता है
आत्मज्ञान से, ज्ञात का श्रद्धान गधे के सींग के समान नही है, इसलिए श्रद्धान भी उदित होता है
भगवान आत्मा को अन्यभावों से भिन्न जान लिए जान से, उसमें निशंक स्थिर हो जानेरूप आचरण का उदय होता है
अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा आबाल-गोपाल सबके अनुभव में सदा स्वयं
आता है
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार परपदार्थों के साथ-साथ अपना आत्मा भी अपनी विकारी-अविकारी पर्यायों सहित प्रतिसमय हमारे ज्ञान का ज्ञेय बनता रहता है
सत्य है
ज्ञानी की अपेक्षा सत्य है
अज्ञानी की अपेक्षा सत्य है
असत्य है
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार आत्मा आबाल-गोपाल सबके अनुभव में सदा स्वयं ही आने पर भी सभी को सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र क्यों नही ?
भेदज्ञान के अभाव में अज्ञानीजन उसे पहिचान नहीं पाते
अज्ञानीजन आत्मा को जान नहीं पाते
अज्ञानीजन आत्मा में जम नहीं पाते
अज्ञानी जनों को 'जो यह अनुभूति है, वही मैं हूँ' ऐसा आत्मज्ञान उदित नहीं होता।
सभी
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार आत्मा कब अनुपलब्ध है ?
अज्ञानियों को सदा
कभी नही
भेदज्ञानियों को सदा
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार आत्मा कब उपलब्ध है ?
अज्ञानियों को सदा
कभी नही
भेदज्ञानियों को सदा
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार आबाल-गोपाल आत्मा किसके जानने मे आ रहा है?
अबोध बालक-समझदार वृद्ध
ज्ञानी-अज्ञानी
सामान्यजन-भगवान
सभी के
किसीके नही
समयसार परमागम गाथा १७-१८ और आचार्य माणक्य नन्दीजी के परीक्षामुख सूत्र के अनुसार "जब कोई व्यक्ति किसी पदार्थ को जानता है, तो वो इनमे से क्या सही नही है ?
मैं जान रहा हूँ
अपने ज्ञान से जान रहा हूँ
मात्र जान रहा हूँ
बना नहीं रहा हूँ
पर को नही जान रहा हु
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार जहाँ जानने का कार्य होगा वहा ज्ञेय के साथ और क्या होगा ?
ज्ञाता
ज्ञान
जानना क्रिया
सभी
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार प्रतिसमय ज्ञान के साथ क्या नही जानने मे आता है ?
आत्मा
आत्मा में उत्पन्न होने वाले विकारी-अविकारी भाव
पुण्य-पाप
परपदार्थ
कोई नही
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार सिद्धि कब होती है ?
अपनेरूप में अकेला अनुभूति स्वरूप आत्मा ही दिखाई देता है
अपनेरूप में अकेला सत्ता स्वरूप आत्मा ही दिखाई देता है
अपनेरूप में अकेला ध्रुव स्वरूप आत्मा ही दिखाई देता है
अपनेरूप में अकेला अमुर्तिक स्वरूप आत्मा ही दिखाई देता है
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार मिथ्यात्व कब होता है ?
स्व-पर को जानने से
शुभ-अशुभ भावो को जानने से
राग को जानने से
शुभ-अशुभ क्रिया को जानने से
कोई नही
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार मिथ्यात्व कब होता है ?
स्व-पर को जानने से
शुभ-अशुभ भावो को जानने से
राग को जानने से
शुभ-अशुभ क्रिया को जानने से
इनमे से किसी मे भी एकत्व-ममत्व करने से
समयसार परमागम गाथा १७-१८ के अनुसार हमारी सिद्धि कीसलिए रुकी हुई है ?
अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा निरन्तर जानने में आते हुए भी तू उसे निज नहीं जानता
अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा निरन्तर जानने में आते हुए भी उसमे अपनापन स्थापित नहीं करता
उसीकाल में जानने में आते हुए रागादि में अपनापन करता है
राग के वश होकर वह राग ही मैं हूँ इसप्रकार मानता है
सभी
समयसार परमागम कलश २० के अनुसार आचार्य अमृतचन्द्र कैसी आत्मज्योति का निरंतर अनुभव करते है ?
तीनपने को अंगीकार किया है, तथापि जो एकत्व से च्युत नहीं हुई है
निर्मलता से उदय को प्राप्त है
अनन्तचैतन्य है चिन्ह जिसका
सभी
समयसार परमागम कलश २० के अनुसार आचार्य अमृतचन्द्र ज्ञान का सेवन का उपाय क्या बताते है ?
आत्मा ज्ञान के साथ तादात्म्यरूप से है इस कारण ज्ञान का सेवन निरंतर है
पर्याय को अन्तर्मुखी करके 'ज्ञान ही आत्मा है' - ऐसा उसके स्वरूप में एकाग्र होकर उसे जाने
पर्याय के शुद्धि के प्रयत्न होना
नित्य जिनवाणी का अभ्यास करना
समयसार परमागम कलश २० के अनुसार जहा ज्ञान का सेवन नही होता वहा किसका सेवन होता है ?
अज्ञान का
राग का
पुद्गल का
विषयो का
समयसार परमागम कलश २० के अनुसार ज्ञान की उत्पत्ति किस से होती है ?
स्वयंबुद्धत्व
बोधितबुद्धत्व
दोनों से
दोनों मे से किसी एक से
सभी
समयसार परमागम कलश २० के अनुसार जबतक यह अनुभूति स्वरूप भगवान आत्मा को __________, उसमें अपनत्व स्थापित नहीं करता; तबतक अज्ञानी ही रहता है
जानकर
मानकर
पहिचान कर
स्वीकार कर
