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Worksheets13. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.22–3.31
Total questions: 51
Worksheet time: 1hrs 25mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें।
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भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन कि "न मुझे किसी वस्तु का अभाव है और न आवश्यकता ही है" से क्या सिद्ध होता है ?
यह कि श्रीकृष्ण परम पूर्ण हैं ।
यह कि श्रीकृष्ण परम अपूर्ण हैं ।
यह कि श्रीकृष्ण संचालक हैं ।
यह कि श्रीकृष्ण नियंता हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा इस ब्रह्माण्ड में भिन्न-भिन्न रूपों में अवतरित होकर पुन: पुन: धर्मसंस्थापना का कार्य करना, क्या उनका नियत कर्म है ?
हाँ, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा पुन: पुन: धर्मसंस्थापना का अर्थ है हम जीवों के लिए भगवद्धाम वापिस लौटने की व्यवस्था को सुनिश्चित करना ।
नहीं, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण का हम तुच्छ बद्धजीवों के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है वह परम स्वतन्त्र हैं ।
नहीं, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण के लिए कोई कर्म नियत नहीं है फिर भी वह प्रत्येक कर्म को अपने नियत कर्म की भान्ति क्रियान्वित करते हैं ।
हाँ, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण यदि अपने नियत कर्म न करें तो इस भौतिक जगत में हम जीवों के लिए जीवन असम्भव होगा ।
श्वेताश्वतर उपनिषद के श्लोक संख्या 6.7 - 6.8 में किसकी विशेषताओं की व्याख्या हुई है ?
ईश्वर
भगवान्
लोकपाल
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्
क्या समस्त (108) उपनिषद् भगवान् विषयक पूर्ण ज्ञान देते हैं ?
नहीं, उपनिषदों में भगवान् के विषय में कोई उल्लेख नहीं है ।
हाँ, प्रत्येक उपनिषद् भगवान् के विशेष अंग व कर्म के विषय में ज्ञान प्रदान करता है ।
नहीं, उपनिषद् भगवान् के विषय में केवल इंगित मात्र ही करते हैं ।
हाँ, क्योंकि प्रत्येक उपनिषद् स्वयं भगवान् की दिव्य वाणी है ।
निम्नलिखित में से भगवान् श्रीकृष्ण के छः ऐश्वर्यों को पहचानें ।
सम्पूर्ण सौन्दर्य, सम्पूर्ण ज्ञान, सम्पूर्ण दासत्व, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण धन तथा सम्पूर्ण त्याग
सम्पूर्ण सौन्दर्य, सम्पूर्ण ज्ञान, सम्पूर्ण शक्ति, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण धन तथा सम्पूर्ण त्याग
सम्पूर्ण सौन्दर्य, सम्पूर्ण ज्ञान, सम्पूर्ण शक्ति, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण धन तथा सम्पूर्ण वत्सलता
सम्पूर्ण सौन्दर्य, सम्पूर्ण ज्ञान, सम्पूर्ण शक्ति, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण धन तथा सम्पूर्ण पराधीनता
इनमें से कौन सी विशेषता परमेश्वर की नहीं है ?
परमेश्वर समस्त नियंताओं के नियंता हैं ।
परमेश्वर समस्त लोकपालकों के लोकपाल हैं ।
परमेश्वर समस्त कारणों के कारण हैं ।
परमेश्वर समस्त पराधीनों के पराधीन हैं ।
इनमें से कौन सी विशेषता भगवान् के शरीर की नहीं है ?
भगवान् के शरीर और आत्मा अभिन्न होते हैं ।
भगवान् की समस्त इन्द्रियाँ दिव्य होती हैं ।
भगवान् भी क्षणभंगुर शरीर के ही स्वामी हैं ।
भगवान् की समस्त शक्तियां बहुरूपिणी होती हैं ।
नियत कर्म का विधान किसके लिए महत्वपूर्ण हैं ?
जो कर्मफल में आसक्त होता है ।
जो कर्मफल से पूर्ण विरक्त होता है ।
जो भौतिक ऐश्वर्यों का दास होता है ।
जो आध्यात्मिक गुरु का आज्ञाकारी होता है ।
हम सभी मनुष्य किसी न किसी प्रकार से केवल भगवान् श्रीकृष्ण के ही पथ अनुगमन करते हैं चाहे वह भौतिक भोग के लिए हो या फिर आध्यात्मिक उन्नति के लिए, ऐसा क्यों ?
क्योंकि श्रीकृष्ण का प्रत्येक कर्म आनंद से परिपूर्ण होता है ।
क्योंकि एकमात्र श्रीकृष्ण ही हम सबों के लिए आदर्श हैं ।
क्योंकि श्रीकृष्ण हम सब के स्वामी हैं और हम उनके दास ।
क्योंकि हम सभी श्रीकृष्ण के समस्त ऐश्वर्यों का भोग करना चाहते हैं ।
श्लोक संख्या 3. 25 में भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णसंकर (Unwanted progeny) उत्पति का जो वास्तविक कारण बताकर अर्जुन के तर्क "कुल-परम्परा के विनाश से वर्णसंकर की उत्पति" का खंडन किया है वो मूल कारण क्या है ?
श्रीभगवान् के लिए कोई भी कर्म नियत न होना ।
श्रीभगवान् द्वारा नियत कर्मों को क्रियान्वित न करना ।
श्रीभगवान् द्वारा बार-बार अनावश्यक अवतार लेना ।
श्रीभगवान् का सम्पूर्ण प्राणियों की शांति का विनाशक होना ।
वर्णसंकर से आपका क्या अभिप्राय है ?
वर्णसंकर विशेष सामाजिक तत्त्व हैं जो समाज में नवीन आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं ।
वर्णसंकर अवांछित जनसमुदाय है जो सामान्य समाज में कृष्णभावना की परिपुष्टि (Confirmation) करते हैं ।
वर्णसंकर अवांछित जनसमुदाय है जो सामान्य समाज की शांति को भंग करता है ।
वर्णसंकर समाज में आध्यात्म की मुख्य धारा को सुनियोजित करने के लिए सदैव वांछित होते हैं ।
वर्णसंकर उत्पति के सन्दर्भ में वैदिक संस्कार - विवाह का क्या औचित्य है ?
यह कि विवाह संस्कार वैदिक अनुज्ञा-पत्र (License) है जो अवैध यौन संबंधों द्वारा वर्णसंकर उत्पति को प्रोत्साहित करता है ।
यह कि वैदिक शास्त्रों में विवाह संस्कार का विधान वर्णसंकर उत्पति को रोकने हेतु हुआ है ।
यह कि वैदिक शास्त्रों में विवाह संस्कार का विधान वर्णसंकर उत्पति को व्यवस्थित करने हेतु हुआ है ।
यह कि वर्णसंकर उत्पति और वैदिक संस्कार - विवाह का आपस में कोई तारतम्य (Synchronization) नहीं है ।
भगवान् अपने विभिन्न अवतारों के दौरान् आदर्श स्थापित करने तथा समाज को सुधारने हेतु बहुत से विशेष एवं महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं, हम जीवों के लिए उन समस्त कार्यों तथा आदर्शों के अनुगमन की निर्दिष्ट (Directed) विधि क्या है ?
हमें उनका अनुकरण करना चाहिए, अनुसरण नहीं ।
हमें अनुसरण तथा अनुकरण दोनों को यथायोग्य (Deservedly) अंगीकार करना ।
हमें उनका अनुसरण करना चाहिए, अनुकरण नहीं ।
हमें अनुसरणोचित (Follow-able) का अनुकरण करना और अनुकरणोचित (Imitable) का अनुसरण करना ।
वर्तमान समय में हमारा एक से अधिक स्त्री व पुरुषों के साथ स्कूल-कॉलेज के स्तर पर, पार्कों में, सार्वजनिक अथवा निजी स्थलों इत्यादि पर तथाकथित प्रेमलीला करना क्या उद्घाटित करता है ?
यह कि हमारे लिए श्रीभगवान् के उपदेशों की तुलना में भौतिक इन्द्रियभोग अति महत्त्वपूर्ण है ।
यह कि अन्य समस्त आदर्शों के अतिरिक्त, श्रीभगवान की रासलीला हमें अति लुभावनी एवं रुचिपूर्ण लगती है ।
यह कि हम श्रीभगवान् के उपदेशों का अनुसरण न करके, उनकी रासलीला का अनुकरण करने में प्रयत्नशील हैं ।
यह कि रासलीला के अनुकरण द्वारा ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य इन्द्रियभोग संम्पन्न होता है ।
अज्ञानी जनों की तुलना में विद्वानजनों को कैसे कार्य करने चाहियें ?
अन्यों को आध्यात्मिक पथ पर ले जाने के लिए कृष्णभावनाभवित कार्य ।
अन्यों को आध्यात्मिक पथ से च्युत करने के लिए उत्पाती कार्य ।
अन्यों को आध्यात्मिक पथ पर ले जाने के लिए कृष्णभावनाहीन कार्य ।
अन्यों को आध्यात्मिक पथ का उपहास करने हेतु प्रोत्साहितात्मक कार्य ।
कृष्णभावनाभावित तथा कृष्णभावनाहीन व्यक्ति में मूल भेद केवल इच्छाओं का ही होता है, कैसे ? - स्पष्ट करें ।
कृष्णभावनाहीन व्यक्ति केवल कृष्ण की तुष्टि के लिए इच्छाएँ करता है जबकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति स्वेन्द्रियतृप्ति हेतु ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति समस्त जीवों की तुष्टि के लिए इच्छाएँ करता है जबकि कृष्णभावनाहीन व्यक्ति केवल कृष्ण की तुष्टि हेतु ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति केवल कृष्ण की तुष्टि के लिए इच्छाएँ करता है जबकि कृष्णभावनाहीन व्यक्ति स्वेन्द्रियतृप्ति हेतु ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति केवल कृष्ण की तुष्टि के लिए इच्छाएँ करता है जबकि कृष्णभावनाहीन व्यक्ति समस्त जीवों की तुष्टि हेतु ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को समाज में कैसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए ?
कर्मफलों को स्वेन्द्रियतृप्ति के कार्यों में नियोजित करने का ।
कर्मफलों को कृष्णभावनामृत के कार्य में नियोजित करने का ।
कर्मफलों को समाज सेवार्थ कार्यों में नियोजित करने का ।
कर्मफलों को राष्ट्र रक्षार्थ कार्यों में नियोजित करने का ।
मेरे घर में मेरे पिताजी व मेरे भाई मदिरापान, मांसाहार, जुआ खेलने आदि के दुर्व्यसनी हैं । मैं चाहता हूँ कि वे भी कृष्णभावनामृत को अंगीकार करके अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाएँ । परन्तु उलझन यह है कि वह इस सन्दर्भ में मेरी एक नहीं सुनते । कृपया आप ही मुझे उन्हें प्रोत्साहित करने का कोई उचित मार्ग बताएँ ।
आप उनके इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न न करें, क्योंकि इन्द्रियतृप्ति के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे कृष्णभावनामृत को ही प्राप्त होता है ।
उपरोक्त दोनों उपायों से कृष्णभावनामृत का क्रमिक (Gradual) विकास होता है अत: त्वरित (Speedy) विकास के लिए उन्हें इन व्यसनों (Bad Habits) के दुष्प्रभावों के बारे में बार-बार बताएँ और उन्हें ऐसा करने से सदैव रोकें ।
आप उनके इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में व्यवधान (Impediment) उत्पन्न न करें, अपितु उनके सामने अपने कृष्णभावनामृत कर्मों द्वारा आदर्श प्रस्तुत करें ।
कृष्णभावनामृत इन्द्रियतृप्ति में मग्न ऐसे व्यक्तियों के लिए नहीं है यदि आप ऐसे व्यक्तियों के समक्ष कृष्णभावनामृत का प्रचार करते हैं तो आप पाप के भागी होंगे ।
समस्त वैदिक अनुष्ठानों एवं वैदिक विधि-विधानों के अनुसन्धान की क्या पराकाष्ठा होती है ?
अंततोगत्वा इन्द्रियतृप्ति के चरम आनन्द की अनुभूति करना ।
अंततोगत्वा (Ultimately) श्रीकृष्ण को जानना व समझना अर्थात् कृष्णभावनाभावित होना ।
अंततोगत्वा मनुष्य जीवन के महत्त्व को समझना ।
अंततोगत्वा भौतिक जगत् में अपने अस्थाई अस्तित्व को समझना ।
"वैदिक विधियों की परवाह न करते हुए सीधे भगवान् की सेवा में लग सकता है ।" श्लोक संख्या 3.26 के तात्पर्य में इस कथन के द्वारा श्रील प्रभुपाद जी क्या स्पष्ट कर रहे हैं ?
यह कि वेदों में वर्णित समस्त वैदिक विधि-विधानों का विधिपूर्वक अनुष्ठान अंततोगत्वा कृष्णभावनामृत को ही प्राप्त करना है ।
यह कि वेदों का समस्त उद्देश्य कृष्णभावनामृत के एक अंश मात्र से संपन्न ही हो जाता है अत: व्यक्ति को अविचलित भाव से कृष्णभावनामृत में प्रगति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए ।
यह कि वेदों में वर्णित समस्त आज्ञाओं व निषेधाज्ञाओं (Dos & Don’ts) का चरम लक्ष्य केवल सकाम कर्म ही है अतएव कृष्णभावनामृत में अभिरूचि रखने वाले व्यक्ति इनसे विचलित नहीं होने चाहिएँ ।
यह कि वेदों का कृष्णभावनामृत से कोई लेना देना नहीं है । अतएव वेदों को अतिरिक्त प्राथमिकता देने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
हम जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों के वास्तविक कर्त्ता कौन हैं ?
अहंकार की विशिष्टता
प्रकृति के तीनों गुण
कर्म-विधान का ज्ञान
जीव के स्वाभाविक गुण
इस संसार में समस्त कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं फिर भी अज्ञानतावश हम स्वयँ को अपने सभी कर्मों का कर्त्ता और कर्मफलों का अधिकारी मान बैठते हैं । इस अज्ञान का वास्तविक जनक क्या है ?
मोह (भ्रम)
क्रोध
अहँकार
आसक्ति
हमारे इस भौतिक स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर का संरचना किसके द्वारा किसकी अध्यक्षता में होती है? स्पष्ट करें ।
प्रकृति द्वारा, भगवान् श्रीकृष्ण की माया की अध्यक्षता में
प्रकृति द्वारा, भगवान् श्रीकृष्ण की महामाया की अध्यक्षता में
प्रकृति द्वारा, भगवान् श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में
प्रकृति द्वारा, भगवान् श्रीकृष्ण की बहिरंगा शक्ति की अध्यक्षता में
जीव के स्वभाव में अहंकार की वृद्धि का मूल कारण क्या है ?
इन्द्रियतृप्ति के लिए अज्ञानतावश भौतिक कृत्य
इन्द्रियतृप्ति के लिए मोहित होकर कर्म करना
इन्द्रियतृप्ति के लिए निरंतर मानसिक चिंतन
इन्द्रियतृप्ति के लिए इन्द्रियों का निरन्तर उपयोग
जीवात्मा का श्रीकृष्ण के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को भूलने का मूल कारण क्या है ?
इन्द्रियतृप्ति में निमग्नता
अहंकार जनित मोह (भ्रम)
मोह (भ्रम) जनित अज्ञान
आसक्ति जनित काम
निम्न में से कौन है जो कभी भी स्वयँ को इन्द्रियों में तथा इन्द्रियतृप्ति में नहीं लगता है ?
परमसत्य का तत्त्वज्ञ, जो भक्तिभावमय कर्म तथा निष्काम कर्म के भेद को भली-भान्ति जनता हो - अर्थात् भक्त
परमसत्य का तत्त्वज्ञ, जो भक्तिभावमय कर्म तथा भक्तिमय सेवा के भेद को भली-भान्ति जनता हो - अर्थात् भक्त
परमसत्य का तत्त्वज्ञ (Seers), जो भक्तिभावमय कर्म तथा सकाम कर्म के भेद को भली-भान्ति जनता हो - अर्थात् भक्त
परमसत्य का तत्त्वज्ञ, जो भक्तिभावमय कर्म तथा बुद्धियोग के भेद को भली-भान्ति जनता हो - अर्थात् भक्त
"मैं किसी कारण से देहात्मबुद्धि में फँस चुका हूँ ।" यह बोध अथवा अनुभूति किसे होती है?
जो भगवान् श्रीकृष्ण की वास्तविक स्थिति से सदैव अनभिज्ञ (Ignorant) रहता है ।
जो सदैव इन्द्रियतृप्ति के लिए शुष्क मानसिक चिंतन में लगा रहता है ।
जो भौतिक प्रकृति की गुह्यतम (Secret) कार्यप्रणाली से सदैव अनभिज्ञ रहता है ।
जो अपने वास्तविक स्वरूप को भगवान् के अंश के रूप में जनता है ।
श्लोक संख्या 3.28 के अनुसार एक तत्त्ववित् (Seers of the Truth) व्यक्ति को कैसे परिभाषित किया जा सकता है ?
जिसे परमसत्य के तीनों रूपों अर्थात ब्रह्म, परमात्मा, श्रीभगवान् के ज्ञान के साथ-साथ भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत का भी ज्ञान हो ।
जिसे परमसत्य के तीनों रूपों अर्थात ब्रह्म, परमात्मा, श्रीभगवान् के ज्ञान के साथ-साथ परमेश्वर के साथ अपने वास्तविक सम्बन्ध का भी बोध हो ।
जिसे परमसत्य के तीनों रूपों अर्थात ब्रह्म, परमात्मा, श्रीभगवान् के ज्ञान के साथ-साथ भौतिक प्रकृति की गुह्यतम कार्यप्रणाली का भी ज्ञान हो ।
जिसे परमसत्य के तीनों रूपों अर्थात ब्रह्म, परमात्मा, श्रीभगवान् के ज्ञान के साथ-साथ अपनी स्वभाविक प्रकृति का भी बोध हो ।
भौतिक इन्द्रियों के कार्यों की प्रकृति कैसी होती है ?
परिस्थितिजन्य तथा स्थाई
मानसिक चिंतन जन्य तथा अस्थाई
परिस्थितिजन्य तथा अस्थाई
भौतिक मोह जन्य तथा अस्थाई
हमारा भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें पूर्णत: आसक्त होने का मुख्य कारण क्या है ?
हमारा इंद्रिय तृप्ति के भौतिक विषयों में अत्यधिक मोह ग्रस्त होना ।
हमारा माया अर्थात् प्रकृति के गुणों से मोह ग्रस्त होना ।
हमारी भौतिक चेतना का रजोगुण द्वारा कलुषित होना ।
हमारा देहात्मबुद्धि के नियंत्रण में कार्य करना ।
मन्द अर्थात् आलसी किसे कहा जाता है ?
जो व्यक्ति शारीरिक चेतना में अत्यधिक आसक्त होता है ।
जो व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति के प्रति उदासीन होता है ।
जो व्यक्ति प्राकृतिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया के प्रति उदासीन होता है ।
जो व्यक्ति समय के सदुपयोग में नहीं अपितु दुरुपयोग में रुचि लेता है ।
इनमें से कौन सा अज्ञानी व्यक्तियों का लक्षण नहीं है ?
ऐसे व्यक्ति शरीर को ही आत्म स्वरूप मानते हैं ।
ऐसे व्यक्ति शारीरिक संबंध को बंधुत्व मानते हैं ।
ऐसे व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठानों को परमेश्वर की भक्ति मानते हैं ।
ऐसे व्यक्ति अध्यात्मिक उन्नति को ही अपने जीवन का लक्ष्य मानते हैं ।
इनमें से किस कार्य को "ज्ञानाभाव के कारण अधम कार्य" की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है ?
धार्मिक अनुष्ठान
सामाजिक सेवा
राष्ट्र सेवा
भगवद्भक्तों की सेवा
भगवान् श्री कृष्ण ने अज्ञानी व्यक्तियों को उनकी कार्यशैली में विचलित न करने का उपदेश क्यों दिया ?
क्योंकि उनकी चेतना भौतिक विषयों के प्रति आकर्षण से कलुषित होती है ।
क्योंकि वह कृष्णभावनामृत के उद्देश्य को समझ नहीं पाते हैं ।
क्योंकि प्रकृति के तीनों गुणों से मोह ग्रस्त होने के कारण उनके लिए देहात्मबुद्धि जन्य कार्य ही सर्वोपरि होते हैं ।
क्योंकि ऐसे व्यक्ति अहिंसा तथा परोपकार के घोर समर्थक होते हैं ।
जिन अज्ञानी व्यक्तियों को भगवान् श्री कृष्ण ने विचलित न करने का उपदेश दिया, उन्हीं व्यक्तियों के लिए श्रील प्रभुपाद जी ने कृष्णभावनामृत की शिक्षा का समर्थन क्यों किया है ?
क्योंकि भगवान् श्री कृष्ण जानते हैं कि अज्ञानी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकते, परंतु फिर भी भगवद्भक्त अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए ऐसा करता है ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण का दृष्टिकोण सभी जीवात्माओं के प्रति सम होता है, अतः भगवद्भक्त इस दृष्टिकोण को मध्यनज़र रखते हुए समस्त जीवों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए ऐसा करता है ।
क्योंकि भगवान् श्री कृष्ण जानते हैं कि अज्ञानी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकते, परंतु फिर भी भगवद्भक्त स्वयं को भगवान् से उच्च समझने के कारण ऐसा करता है ।
मैंने तो श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप में ऐसा कहीं नहीं पढ़ा ।
श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक 3.30 क्यों महत्वपूर्ण है ?
क्योंकि यह श्लोक भक्त की विशेषताओं को प्रदर्शित करता है ।
क्योंकि इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने का निर्देश दिया है ।
क्योंकि यह प्रथम श्लोक है जिसमें भगवान् श्री कृष्ण ने भक्ति का व्याख्यान किया है ।
क्योंकि इस श्लोक में स्वधर्म पालन के निर्णय की शिक्षा दी गई है ।
श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक 3.30 श्रीमद्भगवद्गीता के जिस प्रयोजन को स्पष्टतया इंगित करता है, वह प्रयोजन क्या है ?
पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होना ।
पूर्णतः कर्मयोगी बनना ।
पूर्णतः ज्ञानयोगी बनना ।
पूर्णतः स्वधर्मी बनना ।
इनमें से कौन सा लक्ष्ण भगवद्भक्त का नहीं होता है ?
भगवद्भक्त भगवान के पूर्ण ज्ञान से युक्त होता है ।
भगवद्भक्त लाभ की आकांक्षा से रहित होता है ।
भगवद्भक्त में स्वामित्व के दावे की भावना नहीं होती है ।
भगवद्भक्त मन्दान् होता है ।
हम सभी को अपने-अपने स्वधर्म का पालन किस प्रकार करना चाहिए ?
कृष्ण पर आश्रित होकर
अपनी-अपनी मनः स्थिति के अनुसार
वैदिक निर्देशों के अनुसार
कुल परंपरा के अनुसार
हमारे हृदय के भीतर जड़ हो चुकी स्वामित्व की भावना को त्याग करने के लिए हमें क्या करना होगा ?
हमें अपने सर्वस्व को भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में समर्पित कर देना चाहिए ।
भगवान् श्री कृष्ण की जो भी वस्तुएं हमारे पास हों उन्हें, हमें पास के किसी कृष्ण मंदिर में दान स्वरूप भेंट कर देना चाहिए ।
श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशानुसार हमें सदैव इस वास्तविकता का चिंतन करते रहना चाहिए कि कृष्ण ही सर्वस्व के सृष्टा एवं एकमात्र भोक्ता हैं ।
मैं तो भगवान को ही स्वामी मानता हूं मेरे अंदर तो ऐसी कोई स्वामित्व की भावना है ही नहीं ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति अध्यात्मचेतस कहलाता है ?
नवदीक्षित कृष्णभावनाभावित व्यक्ति
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति
कृष्णभावनामृत आकांक्षी
कृष्ण से ईर्ष्या करने वाला
निराशीः शब्द का क्या अर्थ है ?
पति की आज्ञानुसार कर्म करना ।
अधिकारी की आज्ञानुसार कर्म करना ।
स्वामी की आज्ञानुसार कर्म करना ।
माता-पिता की आज्ञा अनुसार कर्म करना ।
मयि अर्थात् मुझमें का वास्तविक तात्पर्य क्या है?
स्वामित्व की भावना से रहित होकर अपने समाज को समर्पित करते हुए कर्म करना ।
स्वामित्व की भावना से रहित होकर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित करते हुए कर्म करना ।
स्वामित्व की भावना से रहित होकर अपने राष्ट्र को समर्पित करते हुए कर्म करना ।
स्वामित्व की भावना से रहित होकर परोपकार हेतु निष्काम भाव से कर्म करना ।
कौन सा भावनामृत निर्ममः कहलाता है ?
स्वामित्व की भावना से रहित होकर कर्म करना ।
स्वामित्व की भावना सहित कर्म करना ।
स्वामित्व की भावना की तुष्टि के लिए कर्म करना ।
स्वामी की भावना की पुष्टि के लिए कर्म करना ।
कृष्णभावनामृत में आध्यात्मिक गुरु की कठिन से कठिन आज्ञा का पालन करने से साधक को क्या लाभ होता है ?
ऐसा साधक जीवन की समस्त कठिनाइयों के प्रति उदासीन हो जाता है ।
ऐसा साधक जीवन की समस्त कठिनाइयों के प्रति और सक्रिय हो जाता है ।
ऐसा साधक विगत ज्वर अर्थात् आलस्य से रहित हो जाता है ।
ऐसा साधक जीवन की समस्त कठिनाइयों को सहन करने में सक्ष्म हो जाता है ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति सकाम कर्मों के बंधन से मुक्त होकर आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है ?
जो अश्रद्धालु ईर्ष्या रहित होकर कृष्ण के आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करता है ।
जो ईर्ष्या रहित होकर श्रद्धापूर्वक कृष्ण के आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करता है ।
जो श्रद्धालु ईर्ष्या सहित कृष्ण के आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करता है ।
जो श्रद्धावान् ईर्ष्यालु कृष्ण की आदेशों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करता है ।
विशुद्ध कृष्णभावनामृत से आपका क्या अभिप्राय है ?
भगवत्पदाश्रय प्राप्त होना
कृष्णभावनामृत से एक स्तर ऊपर की अवस्था
कृष्णभावनामृत से एक स्तर नीचे की अवस्था
कृष्णभावनामृत की प्रारंभिक अवस्था
