Worksheetsसमयसार गाथा २६-३०
Total questions: 30
Worksheet time: 15mins
समयसार गाथा २६ के अनुसार अज्ञानी क्या सिद्ध करना चाहता है ?
देह और जिव एक है
देह की स्तुति ही तिर्थंकरो की स्तुति है
समयसार गाथा २६ के अज्ञानी अनुसार देह और जिव को एक ना माने तो क्या आपत्ति आएगी ?
तीर्थंकरों और आचार्यों की जिनागम में जो स्तुति की गई है वह सभी मिथ्या सिद्ध होगी
तीर्थंकरों और आचार्यों की स्तुति ही नही हो पायेगी
दोनों
समयसार गाथा २६ और कलश २४ के अनुसार, आचार्य अमृतचंद्रजी ने जो स्तुति कही है उसमे इस मे से क्या नही है ?
शरीर की कान्ति से दसों दिशाओं को धोते हैं
अपने तेज से उत्कृष्ट तेजवाले सूर्यादिक को भी ढक देते हैं
अपने रूप से जन-जन के मन को मोह लेते हैं, हर लेते हैं
दिव्यध्वनि से भव्य जीवों के कानों में साक्षात् सुखामृत की वर्षा करते हैं
शुद्धोपयोग मे स्थित होते है
समयसार गाथा २६ के अनुसार अज्ञानी देह और जिव एक है ये किस आधार पर कहता है ?
व्यवहार नय
निश्चय नय के आधार पर
दोनों
कोई नही
समयसार गाथा २६ के अनुसार अज्ञानी देह और जिव एक है ये किस आधार पर कहता है ?
व्यवहार भक्ति
जिनागम के आधार पर
समयसार गाथा २६ के अनुसार अज्ञानी व्यवहार स्तुति से ये सिद्ध करता है की देह और आत्मा एक है यह
गृहीत मिथ्यात्व है
अगृहीत मिथ्यात्व है
समयसार गाथा २६ के अनुसार नयविभाग से अपरिचित अज्ञानीजन जिनागम का अभ्यास करके भी इसीप्रकार ____________ का पोषण करते हैं
गृहीत मिथ्यात्व
अगृहीत मिथ्यात्व
समयसार गाथा २६ के अनुसार अज्ञानी देह और आत्मा को एक मानने का कारण क्या है ?
स्तुति मे देह और आत्मा को एक कहा जाना
जिनागम मे देह और आत्मा को एक कहा जाना
देह और आत्मा का एक क्षेत्रवागाह होना
नय विभाग का अज्ञान होना
समयसार गाथा २६ के अनुसार ____________ को समझे बिना देह में एकत्वबुद्धि एवं ममत्वबुद्धिरूप अज्ञान का, अगृहीत मिथ्यात्व का पोषण हो जाता है
नयविभाग
तत्व
आत्मा
भेदज्ञान
समयसार गाथा २६ के अनुसार जो व्यक्ति _______ से विहीन हैं, उन्हें वस्तुस्वरूप का सही ज्ञान नहीं हो सकता और वस्तु स्वरूप को नहीं जाननेवाले सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकते हैं?
नयदृष्टि
तत्वदृष्टी
ज्ञानदृष्टी
भेददृष्टी
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन एक है यह
सत्य है
असत्य है
दोनों
दोनों नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन भिन्न है यह
सत्य है
असत्य है
दोनों
दोनों नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन एक है यह
कथंचित सत्य है
कथंचित असत्य है
दोनों
दोनों नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन भिन्न है यह
त्रिकाल सत्य है
सत्य ही है
दोनों
दोनों नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन भिन्न है यह
व्यवहारसे सत्य है
निश्चय से असत्य है
निश्चय से सत्य है
कोई नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह और चेतन एक है यह
व्यवहार से सत्य है
निश्चय से सत्य है
व्यवहार से असत्य है
कोई नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह के गुणों के आधार पर की गई तीर्थंकर और आचार्यों की स्तुति
व्यवहारनय से सत्यार्थ है
निश्चयनय से असत्यार्थ है
दोनों
दोनों नही
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह के गुणों के आधार पर की गई तीर्थंकर और आचार्यों की स्तुति सत्यार्थ क्यों है?
क्योंकि व्यवहारनय से तो जीव और देह एक ही हैं
क्योंकि निश्नचयनय से तो जीव और देह एक नही हैं
दोनों
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह के गुणों के आधार पर की गई तीर्थंकर और आचार्यों की स्तुति असत्यार्थ क्यों है?
क्योंकि व्यवहारनय से तो जीव और देह एक ही हैं
क्योंकि निश्नचयनय से तो जीव और देह एक नही हैं
समयसार गाथा २७ के अनुसार देह के गुणों के आधार पर की गई तीर्थंकर और आचार्यों की स्तुति को असत्यार्थ क्यों कहा गया ?
कोई व्यक्ति निश्चय से भी उसे सत्य समझ ले तो वह मिथ्यादृष्टि ही रहेगा
उसके आधार पर देह और जीव को निश्चय से भी एक ही मान लेगा
दोनों
समयसार गाथा २८-२९ के अनुसार जब व्यवहारनय को तो असत्यार्थ कहा जाता है, और जब यह शरीर जद ही है तब व्यवहार-शरीर आधारित स्तुति क्यों कही जाती है ?
छद्मस्थ को अपना और पर का आत्मा साक्षात् दिखाई नहीं देता है
शरीर दिखाई देता है; उसकी शान्तरूप मुद्रा देखकर अपने को भी शान्त भाव होते हैं
शान्तमुद्रा को देखकर अन्तरंग में वीतरागभाव का निश्चय होता है यह भी उपकार है
ऐसा उपकार समझकर शरीर के आश्रय से भी स्तुति की जाती हैं
सभी
समयसार गाथा २८-२९ के अनुसार देहादि के आधार पर की गई स्तुति को सर्वथा नकारना संभव क्यों नहीं है ?
अरहंत अवस्था में भगवान आत्मा शरीर में ही विराजता है
एकप्रकार से वह शरीर का अधिष्ठाता ही है
देहादि संबंधी अतिशयों में भी आत्मा का पुण्योदय निमित्त होता है
सभी
समयसार गाथा २८-२९ के अनुसार आचार्यो और तीर्थंकर के देहदर्शन को देव दर्शन क्यों कहा
भव्यजनों को अमूर्तिक आत्मा तो दिखाई देता नहीं है
भव्यजनों को देह के ही दर्शन होते हैं, जिसमें वह भगवान आत्मा विराजमान है
अत: व्यवहार से उस देहदर्शन को ही देवदर्शन कहते हैं
सभी
दिव्यध्वनि श्रवण के लाभ को ध्यान में रखकर
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार इनमे से किस विशेषण से वो स्तुति करते है ?
अपूर्व और स्वाभाविक लावण्य है
समुद्र की भाँति क्षोभ रहित है
सभी अंग सदा सुस्थित और अविकारी है
सभी
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार नगर की स्तुति से राजा की स्तुति संभव है ?
हा, क्योकि नगर की सुन्दरता एवं सुव्यवस्था राजा का ही तो कार्य है
हा, क्योकि योग्य राजा के बिना नगर का सुव्यवस्थित होना संभव नहीं है
नही, क्योकि यद्यपि नगर सर्वांग सुन्दर है; तथापि उसमें राजा का कोई अंग नहीं है
सभी
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार तीर्थंकर की देह के गुणों की स्तुति से तीर्थंकर आत्मा की स्तुति संभव है ?
हा, क्योकि देह का सुन्दर होना, सुगठित होना, सुव्यवस्थित होना भी तो उसमें रहनेवाले आत्मा के पुण्योदय का सूचक है
नही, क्योकि देह से चिदानन्द भगवान आत्मा भिन्न ही है
सर्वथा अस्वीकार नही कर सकते अतः व्यवहार से उसे तीर्थंकर केवली की स्तुति माना है
परमार्थ से अस्वीकार किया है क्योंकि निश्चय से तो शरीर के गुण आत्मा के गुण हो ही नहीं सकते
सभी
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार भक्तामर स्तोत्र कौनसी स्तुति है ?
निश्चय स्तुति
व्यवहार स्तुति
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार जिनागाम का प्रत्येक वाक्य ________की भाषा में ही निबद्ध है
हिन्दी
संस्कृत
प्राकृत
नय
समयसार गाथा ३० और कलश २५ के अनुसार जितनी भी स्तुतियाँ उपलब्ध हो, उन्हें __________ मानकर निशंक रहना चाहिए
व्यवहारनयोपजनित
पापनाशक
पुण्यउत्पादक
मोक्षप्रदायक
सभी
जिनागम के आधार पर जिन स्तुति मे वांछा गर्भित हो वो कौनसी स्तुति होती है ?
निश्चय स्तुति
व्यवहार स्तुति
विषयों की स्तुति
