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Worksheetsसमयसार गाथा ३४-३५
Total questions: 21
Worksheet time: 11mins
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार प्रत्याख्यान (त्याग ) कब होता है ?
भेद्ज्ञान के पश्चात्
भेद्ज्ञान के पहले भी
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार प्रत्याख्यान (त्याग ) किसलिए करता है ?
सम्यक्त्व के लिए
सम्यक ज्ञान के लिए
आचरण के लिए
तीनो
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार "प्रत्याख्यान ___________ ही है। ऐसा नियम से जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि अपने ______________ में त्यागरूप अवस्था होना ही प्रत्याख्यान है, त्याग है; अन्य कुछ नहीं।"
ज्ञान
त्याग
श्रद्धान
चारित्र्य
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार " यह आत्मा अपने आत्मा से भिन्न समस्त परपदार्थों का_____________ ऐसा जानकर प्रत्याख्यान करता है, त्याग करता है"
'वे पर हैं
वे ज्ञेय है
वे हेय है
वे दुखदायी है
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार "जिसप्रकार लोक में कोई पुरुष परवस्तु को 'यह परवस्तु है' ऐसा जानकर परवस्तु का त्याग करता है;
उसीप्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परद्रव्यों के भावों को ये परभाव हैं' ऐसा जानकर छोड़ देते हैं
उसीप्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त राग-द्वेष भावों को ये परभाव हैं' ऐसा जानकर छोड़ देते हैं
उसीप्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त भव्य-भावक भावों को ये परभाव हैं' ऐसा जानकर छोड़ देते हैं
उसीप्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त ज्ञेय भावों को ये परभाव हैं' ऐसा जानकर छोड़ देते हैं
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार " वास्तविक त्याग तो परपदार्थों को _______जानना ही है जब हमने यह जान लिया कि ये पदार्थ मुझसे भिन्न हैं तो उनका त्याग हो ही गया"
'वे पर हैं
वे ज्ञेय है
वे हेय है
वे दुखदायी है
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार त्याग करने के लिए यह 'पर' जानने के अतिरिक्त और क्या करना है?
आचरण
नियम
प्रतिज्ञा
दृढ़ निश्चय
कुछ नही
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार परपदार्थों का प्रत्याख्यान ,त्याग करने लिए क्या उन्हें छोड़ना नही है?
हा
नही
सहज छूटेगा
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार आत्मा को परपदार्थों का प्रत्याख्यान ,त्याग क्यों नही करना है?
उनका ग्रहण ही नहीं हुआ है
मात्र अपना जाना गया था
त्यागोपादानशून्यत्व ' नाम की शक्ति के कारण यह भगवान आत्मा पर के ग्रहण-त्याग से शून्य है
उन्हें अपना जानना मानना ही छोड़ना है
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार आत्मा को परपदार्थों को अपना मानने का प्रत्याख्यान ,त्याग करना है ना?
हा, क्योकि सिर्फ अपना जाना है
नही, क्योकि ज्ञानस्वभाव से च्युत नहीं हुआ
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार "धोबी के घर से भ्रमवश दूसरे का वस्त्र वाले" दृष्टान्त के अनुसार क्या सत्य है ?
आत्मा भी भ्रमवश परद्रव्य के भावों को ग्रहण कर रहा है
परद्रव्य के भावों को अपना जानकर, अपना मानकर, अपने में एकरूप करके सो रहा है
श्रीगुरु परभाव का विवेक करके, भेदज्ञान करके उसे एक आत्मभावरूप कहते हैं "यह तेरा आत्मा एक ज्ञानमात्र ही है, अन्य सब परद्रव्य के भाव हैं"
समस्त स्व-पर के चिन्हों से भली-भांति परीक्षा करके, 'अवश्य ये भाव परभाव ही हैं, मैं तो एक ज्ञानमात्र ही हूँ'- यह जानकर, ज्ञानी होता हुआ सर्व परभावों को तत्काल ही छोड़ देता है।”
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार "जानने, पहिचानने और त्यागभाव आने में समय भेद है क्या, अर्थात तीनो एकसाथ आरंभ नही होते है क्या ?
हा, एकसाथ आरंभ नही होते है
नही, एकसाथ आरंभ होते है
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार "जानने, पहिचानने और त्यागभाव की पूर्णतामे समय भेद है क्या?
हा, एकसाथ पूर्णता नही होती है
नही, एकसाथ पूर्णता होती है
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार जानने, पहिचानने और त्यागभाव की पूर्णतामे समयभेद क्यों है?
रागादि भावों को पर जान लेने पर भी कुछ कालतक रागादिभावों का संयोग देखा जा सकता है
रागादि भावों को पर जान लेने पर उनसे अपनापन पूरी तरह तत्काल टूट जाता है, त्यागभाव आ जाता है
जब अपनापन छूट गया तो एक दिन वे भी अवश्य छूट जावेंगे
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३४-३५ के अनुसार त्याग के सन्दर्भ मे क्या सही नही है ?
परद्रव्य को पररूप से जाना तो परभाव का ग्रहण नहीं हुआ, वही उसका त्याग है
राग की ओर उपयोग के जुड़ान से जो अस्थिरता थी, ज्ञानस्वभावी भगवान आत्मा में स्थिर होने पर अस्थिरता उत्पन्न ही नहीं हुई
ज्ञायक चैतन्यसूर्य में ज्ञान का स्थिर हो जाना ही प्रत्याख्यान है
आत्मा को जानना ज्ञान है और आत्मा को ही लगातार जानते रहना प्रत्याख्यान है, त्याग है, ध्यान है
कोई नही
समयसार परमागम के कलश २९ के अनुसार गाथा ३४-३५ मे दिए गये दृष्टांत से पाठकों की समझ में भी बात आ गई है, उनके हृदय में आत्मानुभूति की भावना भी जग गई है; पर यदि ऐसे में उग्र पुरुषार्थ नहीं हुआ तो क्या होगा?
थोड़े ही समय में वृत्ति में मलिनता हो सकती है
समझ भी फीकी पड़ सकती है
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्षण, महान अवसर चूक जायेगा
सभी
ज्ञानोपयोग भी अन्यत्र भटकने लग जायेगा
समयसार परमागम के कलश २९ के अनुसार गाथा ३४-३५ मे दिए गये दृष्टांत से प्राप्त हुई भावना को कैसे सार्थक करे ?
निरन्तर भेद ज्ञान की भावना को भाना चाहिए, नचाना चाहिए
चिन्तन की निरन्तरता आवश्यक है
रुचि की तीव्रता अनिवार्य होगी
भावना का प्रबल वेग स्फुरायमान होना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३६ के अनुसार "________________के जानकार आचार्य देव ऐसा कहते हैं कि मोह मेरा कुछ भी नहीं है, मैं तो एक उपयोगमय ही हूँ' - ऐसा जो जानता है, वह मोह से निर्मम है"
स्व-पर
सिद्धान्त
दोनों
समयसार परमागम के गाथा ३२ और ३६ मे क्या अंतर है ?
३२वीं गाथा भाव्य-भावक संकर दोष के परिहार की है
३६वीं गाथा में भावक-भाव से भेद विज्ञान कराते हैं
दोनों
समयसार परमागम गाथा ३६ के पंडित जयचंदजी छाबड़ा के भावार्थ अनुसार क्या सत्य नही है ?
मोह कर्म जड़ पुद्गल द्रव्य है
उसका उदय कलुषभावरूप है
वह भाव भी मोह कर्म का भाव होने से पुद्गल का ही विकार है
यह भावक का भाव जब चैतन्य के उपयोग के अनुभव में आता है; तब उपयोग भी विकारी होकर रागादिरूप मलिन दिखाई देता है
यह भावक का भाव जब चैतन्य के उपयोग के अनुभव में आता है; तब उपयोग भी विकारी होकर रागादिरूप मलिन हो जाता है
समयसार परमागम गाथा ३६ के पंडित जयचंदजी छाबड़ा के भावार्थ अनुसार भेद्ज्ञान कैसे होता है ?
चैतन्य की शक्ति की व्यक्ति तो ज्ञानदर्शनोपयोग मात्र है
यह कलुषता राग-द्वेष-मोह रूप है; वह द्रव्यकर्मरूप जड़ पुद्गल द्रव्य की है'
जब भावकभाव जो द्रव्यकर्मरूप मोह का भाव है, उससे अवश्य भेदभाव होता है और आत्मा अवश्य अपने चैतन्य के अनुभवरूप स्थित होता है
सभी
ज्ञान की और राग की भिन्नता जान ली जावे तो आत्मा अपने अनुभव में अवश्य स्थित होता है
