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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-50 (13.3-12)
Total questions: 36
Worksheet time: 3hrs 6mins
भगवद्गीता यथारूप के 13वें अध्याय का क्या नाम है?
विराट रूप
भक्तियोग
प्रकृति, पुरुषोत्तम तथा चेतन
प्रकृति के तीन गुण
प्रत्येक शरीर (कर्मक्षेत्र) में कितनी आत्मा(एं) हैं जो उस शरीर की ज्ञाता हैं? (13.3)
1
2
असंख्य
भगवान् श्रीकृष्ण परमात्मा रूप में प्रत्येक शरीर के कैसे ज्ञाता हैं? (13.3)
व्यष्टि ज्ञाता
परम ज्ञाता
व्यष्टि ज्ञाता जीव और परम ज्ञाता परमात्मा में क्या अंतर है? (13.3)
कोई अंतर नहीं है - आत्मा सो परमात्मा
व्यक्ति भले ही अपने शरीर का ज्ञाता हो, किन्तु उसे अन्य शरीर का ज्ञान नहीं होता
समस्त शरीरों में परमात्मा रूप में विद्यमान भगवान् समस्त शरीरों के विषय में जानते हैं
अपने शरीर के स्वामी और समस्त शरीरों के स्वामी परमेश्वर के अंतर को बताने के लिए क्या-क्या उदाहरण/कारण दिया गया है? (13.3)
राजा मूल अधिपति है और नागरिक गौण अधिपति
राजा आदि नियामक और नागरिक गौण नियामक
तूलिका और चित्रकार
आत्मा च्युत व अधीन है, परमात्मा अच्युत व श्रेष्ठ
ज्ञान किसे कहा जाता है? (13.3)
शरीर, आत्मा तथा परमात्मा की सम्यक जानकारी
आत्मा तथा परमात्मा को एक मानना
चित्रकार, चित्र तथा तूलिका में भ्रम करना
प्रकृति, जीव व दोनों के नियामक को एक समझना
श्रील बलदेव विद्याभूषण के मतानुसार भगवान् किस शब्द से स्वयं को व्यष्टि आत्मा से भिन्न सर्वज्ञ परमात्मा के रूप में सभी शरीरों का ज्ञाता बताते हैं? (13.3)
क्षेत्रज्ञं
चापि
मां
विद्धि
इनमें से कौन ब्रह्म बाकी दोनों ब्रह्म का नियामक है? (13.3)
प्रकृति (कर्मक्षेत्र)
पुरुष (विशिष्ट भोक्ता जीव)
ईश्वर (परमात्मा)
परमात्मा को व्यष्टि जीव का स्वरूप मानना किसके समान है? (13.4)
सक्षम पुरुष तथा अक्षम पुरुष को एक समान बताने जैसा
एक तारे को दूसरे तारे के समान बताने जैसा
एक सैनिक को दूसरे के समान बताने जैसा
भगवान् कृष्ण सर्वोच्च प्रमाण होते हुए भी प्रमाणिकता के लिए आत्मा-परमात्मा के ज्ञान के बारे में क्या साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं? (13.5)
वेदान्त सूत्र में कार्य-कारण के समस्त तर्क
पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा विभिन्न वैदिक ग्रंथों में वर्णन
वेदों में आत्मा, परमात्मा तथा शरीर का अन्तर कहाँ बताया गया है? (13.5)
महर्षि पराशर के धर्मग्रंथों में
विशेषतया कठोपनिषद् में
यजुर्वेद की एक शाखा तैत्तरीय उपनिषद् (2.9) में
ब्रह्मसूत्र के नीतिवचन में
पराशर मुनि ने आत्मा-परमात्मा की किस प्रकार व्याख्या की है? (13.5)
न वियदश्रुतेः (2.3.2); नात्मा श्रुतेः (2.3.18) तथा परात्तु तच्छुतेः (2.3.40)
ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा - अन्न, प्राण, ज्ञान, विज्ञान, आनंदमय
जीव प्रकृति के गुणों से दूषित हैं किन्तु अच्युत परमात्मा तीनों गुणों से अदूषित है, और दिव्य है
इनमें से क्या सही नहीं है? (13.5)
क्षेत्रज्ञ दो कोटियाँ है – जीवात्मा तथा परम पुरुष
अन्नमय = अस्तित्व के लिए भोजन पर निर्भरता
प्राणमय = सजीव रूपों में परम सत्य की अनुभूति
ज्ञानमय = चिन्तन, अनुभव तथा आकांक्षा
विज्ञानमय = सर्व-आनन्दमय प्रकृति की अनुभूति
चौबीस तत्त्वों का समूह कार्यक्षेत्र में क्या-क्या आता है? (13.6-7)
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश
नेत्र, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा
वाणी, पाँव, हाथ, गुदा तथा लिंग
गंध, स्वाद, रूप, स्पर्श तथा ध्वनि
मन, अहंकार, बुद्धि तथा त्रिगुणों की अव्यक्तावस्था
स्थूल देह के पाँच महाभूतों की अभिव्यक्तियाँ कौन सी हैं? (13.6-7)
इच्छा
द्वेष
सुख
दुख
चेतना तथा धैर्य
प्रकृति के अव्यक्त गुणों को _______ कहा जाता है | (13.6-7)
प्रधान
मंत्री
सचिव
राजा
अस्थायी भौतिक क्षेत्र (शरीर) में कितने प्रकार के परिवर्तन होते हैं? (13.6-7)
2
3
4
5
6
भगवान् किनको ज्ञान घोषित करते हैं व उसके अतिरिक्त सबकुछ अज्ञान? (13.8-12)
विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, पवित्रता, स्थिरता
प्रामाणिक गुरु के पास जाना, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग
आत्मसंयम, अहंकार का अभाव, अच्छी-बुरी घटनाओं के प्रति समभाव
जन्म-मृत्यु-वृद्धावस्था-रोग के दोषों की अनुभूति, जन समूह से विलगाव
सन्तान-स्त्री-घर की ममता से मुक्ति, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति
भगवान् ने इन श्लोकों में ज्ञान की प्रक्रिया के कितने विषय या गुण बताये हैं? (13.8-12)
8
12
19
20
24
भगवान् के द्वारा बताये गए ये 20 ज्ञान के विषय वास्तव में क्या हैं? (13.8-12)
चौबीस तत्त्वों के कार्यक्षेत्र की अन्तः-क्रिया का विकार
चौबीस तत्त्वों से बने आवरण रूप शरीर में बन्द देहधारी आत्मा के बाहर निकलने का साधन
ज्ञान की प्रक्रिया के सम्पूर्ण वर्णन में से क्या सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है जिसके विकसित करने पर बाकी उन्नीस स्वयमेव विकसित हो जाते हैं और जिसके न होने पर तो शेष उन्नीस बातें व्यर्थ हैं? (13.8-12)
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम्
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह:
विनम्रता (अमानित्व) का क्या अर्थ है? (13.8-12)
अन्यों द्वारा सम्मान पाने के लिए इच्छुक नहीं रहना
अन्यों को विपत्ति में न डालना
अन्यों द्वारा किये गये अपमान तथा निरस्कार को सहना
आध्यात्मिक जीवन में उन्नति के लिए दृढ़संकल्प होना
आध्यात्मिक उन्नति के प्रतिकूल को स्वीकार न करना
इनमें से क्या कार्य आध्यात्मिक उन्नति के लिए सहायक हैं? (13.8-12)
धार्मिक गुरु के रूप में अपना प्रचार करना चाहिए
लोगों में वास्तविक ज्ञान वितरित करना चाहिए
असहिष्णु बन कर मार्ग के अवरोधों को काट-छांट दें
विनम्रतापूर्वक गुरु के पास जाए और सेवाएँ करे
इन्द्रियों की अनावश्यक माँगों की पूर्ति करनी चाहिए
बिना किसी स्वार्थ के अपने गुरु की सेवा करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से क्या होता है? (13.8-12)
शिष्य तुरन्त प्रगति करने लगता है
शिष्य के लिए यम-नियम सरल बन जाते हैं
माला करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है
किस पवित्रता (शौचं) की विधि से मन में से पूर्व कर्म की संचित धूलि हट जाती है? (13.8-12)
बाह्य पवित्रता जिसका अर्थ है स्नान करना
आन्तरिक पवित्रता अर्थात निरन्तर कृष्ण का चिन्तन तथा हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करना
वैदिक शास्त्रों में किस अहंकार की भर्त्सना की जाती है? (13.8-12)
मिथ्या अहंकार यानी कि इस शरीर को आत्मा मानना
वास्तविक अहंकार, मतलब यह जानना कि वह शरीर नहीं, अपितु आत्मा है
सदैव इन्द्रियतृप्ति के लिए उत्सुक प्रबल इन्द्रियों में सबसे मत्त्वपूर्ण कौन सी है जिस पर संयम कर लिया गया तो समझो अन्य सारी इन्द्रियाँ वशीभूत हो गई? (13.8-12)
जीभ
नेत्र
नाक
कान
आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए कोई प्रोत्साहन हेतु क्या आवश्यक है? (13.8-12)
जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि के दुखों को देखते हुए इस भौतिक जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण
जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि के होते हुए भी इस भौतिक जीवन में सुख-प्राप्ति हेतु घोर आशावादी दृष्टिकोण
कृष्णभावनामृत से पूर्ण रहते हुए अपने घर को अत्यन्त सुखमय बनाने के लिए क्या करना होता है? (13.8-12)
केवल हरे कृष्ण का कीर्तन करना होता है
कृष्णार्पित भोग का उच्छिष्ट ग्रहण करना होता है
भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत पर विचार-विमर्श
अर्चाविग्रह की पूजा करनी होती है
यदि संतान, पत्नी तथा घर आध्यात्मिक उन्नति में अनुकूल न हों , तो क्या करना चाहिए? (13.8-12)
इनके प्रति आसक्त बने रहना चाहिए आखिर आवश्यकता पड़ने पर यही काम आएंगे
पारिवारिक जीवन के सुख-दुख से विरक्त रहना चाहिए
कृष्ण के साक्षात्कार करने या उनकी सेवा करने के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दे, जिस प्रकार से अर्जुन ने किया था
सुख-दुःख के विषय में मनुष्य को क्या उपदेश दिया गया है? (13.8-12)
सुख-दुख के आने-जाने पर प्रतिबन्ध नहीं है
सुख-दुख भौतिक जीवन को दूषित करने वाले हैं
मनुष्य को चाहिए कि इन्हें सहना सीखे
भौतिकवादी जीवन-शैली से विलग हो जाए
दोनों ही दशाओं में समभाव बनाये रहे
आध्यात्मिक जीवन-शैली का अभ्यस्त हो जाने पर भक्त समय को व्यर्थ गवाँने से बचने के लिए किसमें रूचि नहीं लेता? (13.8-12)
भौतिकवादी लोगों से मिलना
व्यर्थ के खेलकूद
सिनेमा जाने
किसी सामाजिक उत्सव में सम्मिलित होने
अवांछित संगति
भगवद्गीता के अनुसार निरर्थक विषयों को छोड़कर कैसे शोध कार्य और दार्शनिक चिन्तन की संस्तुति की गयी है?(13.8-12)
कामवासनापूर्ण जीवन
अन्य किसी भौतिक विषय का अध्ययन
आत्मा की प्रकृति के विषय में शोध
परम सत्य के साक्षात्कार में पराकाष्ठा क्या है? (13.8-12)
ब्रह्म
परमात्मा
भगवान्
इनमें से क्या सही नहीं है? (13.8-12)
विनम्रता के बिना ज्ञान सम्भव नहीं है, ज्ञान का शुभारम्भ “अमानित्व” या विनम्रता से होता है
अपने को ईश्वर समझना सर्वश्रेष्ठ विनम्रता है यद्यपि जीव सदैव प्रकृति के कठोर नियमों द्वारा ठुकराया जाता है
परमेश्वर के प्रति विद्रोह के कारण ही मनुष्य प्रकृति के अधीन हो जाता है
भगवद्गीता को समझने का यह तुच्छ प्रयास किस प्रकार आपके लिए लाभदायक हो रहा है?
