WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-56 (15.1-10)
Total questions: 40
Worksheet time: 4hrs 30mins
किस श्लोक में भगवान् के शाश्वत राज्य को प्राप्त करने वालों की योग्यताएं बताई गयी हैं?
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: ।द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् ॥ 15.5 ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ 15.6 ॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: ।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ 15.7 ॥
भौतिक जगत् के बन्धन की तुलना किस वृक्ष से की गई है? (15.1)
अश्वत्थ
नीम
तुलसी
अर्जुन
कदम्ब
भगवान् कृष्ण ने जिस वृक्ष को जानने वाले को वेदों का ज्ञाता कहा है, उसके विषय में क्या सही है? (15.1)
उसकी शाखाएँ ऊपर की ओर हैं
उसकी जड़े नीचे की ओर हैं
उसकी पत्तियाँ वैदिक स्तोत्र हैं
भवबन्धन से निकलने की कई विधियाँ हैं, पर सर्वोत्कृष्ट विधि क्या है? (15.1)
शुष्क दार्शनिक चिंतन
सकाम कर्म (कर्मकाण्ड)
भगवद्भक्ति
निराकार का ध्यान
भक्ति का मूल क्या सिद्धान्त है? (15.1)
भौतिक कार्यों से विरक्ति
भगवान् की दिव्य सेवा में अनुरक्ति
इस उलटे अश्वत्थ वृक्ष के फल किसके द्योतक हैं? (15.1)
जीवों के कर्मों के फल
धनी और निर्धन
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र
धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष
जिस प्रकार वृक्ष का प्रतिबिम्ब जल में रहता है उसी प्रकार यह आध्यात्मिक जगत् रूपी वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब रूपी भौतिक जगत किसमें स्थित है? (15.1)
हमारी इच्छाओं में
सम्पूर्ण समग्र भौतिक पदार्थ - महत्तत्व में
ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक ब्रह्लोक में
कारण सागर के जल में
चूँकि यह भौतिक जगत् उल्टा प्रतिबिम्ब है, तो इससे क्या समझ सकते हैं? (15.1)
आध्यात्मिक जगत् में भी विविधता होनी चाहिए, वास्तविक रूप में
यह अभिव्यक्ति भौतिक है, अतः क्षणिक है, वास्तविक वृक्ष के भौतिक प्रतिबिम्ब का विच्छेदन करना होता है
परन्तु वह स्त्रोत जहाँ से यह प्रतिबिम्ब प्रतिबिम्बित होता है, शाश्वत है
कौन वेदों के वास्तविक उद्देश्य को नहीं जानता? (15.1)
जो व्यक्ति वेदों के कर्मकाण्ड द्वारा आकृष्ट होता है
जो इस जगत् की आसक्ति से विच्छेद करना जानता है
जो इस प्रतिबिम्बित वृक्ष को काटना जानता है
जो प्रतिबिम्बित वृक्ष की सुन्दर हरी पत्तियों से आकृष्ट है
जो आध्यात्मिक जगत् के वास्तविक वृक्ष को चाहता है
कौन सा लोक सकाम कर्मों का नवीनीकरण करने वाला कर्मक्षेत्र माना जाता है? (15.2)
ब्रह्मलोक
मनुष्यलोक
स्वर्गलोक
नरकलोक
जिस प्रकार सामान्य वृक्ष का पोषण जल से होता है, उसी प्रकार यह प्रतिबिम्बित अश्वत्थ वृक्ष कैसे पोषित होता है? (15.2)
श्रवण-कीर्तन द्वारा
प्रकृति के तीन गुणों द्वारा
भौतिक इच्छाओं द्वारा
विषयों के भोग से आसक्त इन्द्रियों द्वारा
भौतिक जगत के प्रतिबिम्बित उलटे वृक्ष की सहायक जड़ें क्या हैं? (15.2)
धर्म-अधर्म की प्रवृत्तियाँ
जीवों की उच्चयोनियाँ-यथा देव, गन्धर्व तथा अन्य
मनुष्य, पशु, घोड़े, गाय, कुत्ते, बिल्लियाँ आदि
राग तथा द्वेष
शब्द, रूप, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषय
भगवान् कृष्ण ने किन शब्दों में बताया है कि किस शस्त्र के द्वारा इस दृढ़ मूल वाले वृक्ष को काट गिराए? (15.3-4)
अश्वत्थमेनं
सुविरूढमूलं
असङ्गशस्त्रेण
दृढेन छित्त्वा
इस वृक्ष के उद्गम को जानने का अनुसंधान कहाँ तक पहुँचने पर समाप्त हो जाता है? (15.3-4)
ब्रह्मा
गर्भोदकशायी विष्णु
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण
वास्तविकता के छद्म प्रतिबिम्ब से विलग होकर मूलवृक्ष में स्थित होने के लिए विरक्ति कैसे सीख सकते हैं? (15.3-4)
ऐसे ज्ञानी पुरुषों से श्रवण द्वारा जिन्हें परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त है
प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित आत्म-ज्ञान की विवेचना द्वारा
भक्तों की संगति में रहकर
श्रवण,कीर्तन आदि द्वारा केवल भगवान् कृष्ण की ही शरण क्यों ग्रहण करनी चाहिए? (15.3-4)
उनका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए
भौतिक जीवन रूपी प्रबल अश्वत्थ के वृक्ष के बन्धन से छूटने के लिए
वे ही भौतिक जगत् के विस्तार के कारण हैं - अहं सर्वस्य प्रभावः
शरणागति के लिए किस प्रथम योग्यता की आवश्यकता है? (15.5)
मिथ्या अहंकार से मोहित न होना
कुसंगति से मुक्त होना
सुख तथा दुख के द्वन्द्व से मुक्त होना
भ्रम से मुक्त होना
आध्यात्मिक जगत में भगवान् कृष्ण का धाम ________ वृन्दावन कहलाता है | (15.6)
भौम
कनक
नव
गोलोक
गुल्लक
इस ब्रह्माण्ड के स्वयं प्रकाशित लोक, सूर्य, जैसे आध्यात्मिक आकाश में कितने लोक हैं? (15.6)
1
2
24
सभी
वैकुण्ठ लोकों के चमचमाते तेज से चमकीला आकाश क्या कहलाता है? (15.6)
ब्रह्मज्योति
महत्-तत्त्व
जीव की बद्धावस्था और मुक्तावस्था में क्या स्थिति होती है? (15.6)
अंधकारमय जगत् में वह बद्ध अवस्था में होता है
आध्यात्मिक आकाश में वह मुक्त हो जाता है
बद्धता में अपने को जगत् का स्वामी मानता है
मुक्तावस्था में आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश करता है
वैकुण्ठ में हरिपार्षद का सच्चिदानंदमय जीवन जीता है
भौतिक बंधन से मुक्त होकर भगवद्धाम जाने के लिए क्या करना होगा? (15.6)
शाश्वत जगत् में जाने की इच्छा करनी चाहिए
सच्चाई के मिथ्या प्रतिबिम्ब से विलग हो जाना चाहिए
कृष्णभावनामृत के प्रति समर्पित समाज खोजना चाहिए
केसरिया वस्त्र पहनने से भौतिक आकर्षण से विच्छेद होगा
भगवद्भक्ति के बजाय संसार के प्रति आसक्त होना पड़ेगा
वास्तव में जगत का कोना-कोना भगवान् की सम्पत्ति है, परन्तु दिव्य जगत परमम् मम में क्या विशेष है? (15.6)
दिव्य जगत परम है और छह ऐश्वर्यों से पूर्ण है, भगवान् की आन्तरिक शक्ति से प्रकाशमान है
परम धाम तक केवल अन्य किसी साधन से ही पहुँचा जा सकता है, शरणागति से नहीं
कठोपनिषद् (2.2.15) - न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकम्
भगवान् कृष्ण किन शब्दों में कहते हैं कि जीव इस संसार में घोर संघर्ष कर रहे हैं? (15.7)
ममैवांशो जीवलोके
जीवभूतः सनातनः
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृतिस्थानि कर्षति
भगवान् के व्यक्तिगत विस्तार विष्णुतत्त्व कहलाते हैं पर गौण विस्तार जीव के विषय में क्या सही है? (15.7)
बद्ध जीवन में जीव एक व्यष्टित्व धारण करता है
मुक्त अवस्था में जीव परमेश्वर से एकाकार हो जाता है
जीव परमेश्वर का सनातन रूप से सूक्ष्म अंश है
भगवान् अपने स्वांश द्वारा वैकुण्ठलोक के प्रधान देवों के रूप में प्रकट होते हैं पर विभिन्नांश (पृथकीकृत अंश) जीवों का क्या? (15.7)
विभिन्नांश होने के कारण जीवों में भी उनके आंशिक गुण पाये जाते हैं, जिनमें से स्वतन्त्रता एक है
प्रत्येक जीव का आत्मा रूप में, अपना व्यष्टित्व और सूक्ष्म स्वातंत्र्य होता है
स्वातंत्र्य के दुरूपयोग से जीव बद्ध बनता है और उसके सही उपयोग से वह मुक्त बनता है
अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए जीव को इस संसार में अत्यधिक संघर्ष क्यों करना पड़ता है? (15.7)
वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति को भूल जाता है
बद्धजीवन में प्रकृति के गुणों द्वारा अभिभूत रहता है
वह भगवान् की दिव्य सेवा में लगा रहता है
वह सनातन सेवक है तो कष्ट व संघर्ष तो मिलेगा ही
क्या वैदिक प्रमाण है कि भौतिक शरीर त्यागकर आध्यात्मिक जगत में जीव को भगवत्साक्षात्कार के लिए भगवान् के समान आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है? (15.7)
माध्यान्दिनायन श्रुति – स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा शृणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति
स्मृति - वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठ-मूर्तयः वैकुण्ठ में सारे जीव भगवान् जैसे शरीरों में रहते हैं ।
मिथ्या अहंकार की लौह श्रृंखलाओं से बंधा मन कैसे बद्धजीव को भवसागर में धकेलता है? (15.7)
जब मन सतोगुण में रहता है, तो वह जीवन की निम्नयोनियों में चला जाता है
जब मन रजोगुण में रहता है, तो उसके कार्यकलाप कष्टकारक होते हैं
जब मन तमोगुण में होता है, तो उसके कार्यकलाप अच्छे होते हैं
पदार्थ के अंश और भगवान् के अंश में क्या अंतर है? (15.7)
भगवान् के अंश पदार्थ की भाँति नहीं है, जिसे चाहो तो कितने ही खण्ड कर दो और उन्हें पुनः जोड़ दो
विभिन्नांश सनातन हैं और प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में भगवान् का अंश विद्यमान है (देहिनोऽस्मिन्यथा देहे)
जीव भगवान् का अंश होने के कारण गुणात्मक दृष्टि से भगवान् के ही समान है, जैसे स्वर्ण के अंश भी स्वर्ण होते हैं
एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की प्रक्रिया तथा शरीर में रहते हुए संघर्ष करने को ______________ कहते हैं । (15.8)
कर्षति
घर्षति
जीवन संघर्ष
जीवन सहर्ष
जीव के अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में ले जाने के लिए क्या उदाहरण दिया गया है? (15.8)
जिस प्रकार वायु सुगन्धि को ले जाता है
जिस प्रकार शेर शिकार ले जाता है
जिस प्रकार चोर चुराए गए धन को ले जाता है
जिस प्रकार प्राधिकृत अधिकारी कर ले जाता है
इनमें से क्या सही नहीं है? (15.8)
इस शरीर के नाश होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है
वर्तमान शरीर तथा कार्यकलाप ही अगले शरीर का आधार हैं
शरीर में परिवर्तन जीव की चेतना पर निर्भर करता है
सूक्ष्म शरीर अगले जीवन में दूसरे शरीर का निर्माण करता है
चेतना मूलतः जल के समान विमल होती है, लेकिन यदि हम जल में रंग मिला देते हैं, तो उसका रंग बदल जाता है - यहां रंग किसका सूचक है? (15.9)
भौतिक गुण
आध्यात्मिक प्रवृत्ति
कृष्णभावनामृत
क्या यह आवश्यक है कि मनुष्य को यह स्थूल शरीर त्यागने के बाद पुनः मनुष्य शरीर प्राप्त हो? (15.9)
यदि उसकी चेतना किसी भौतिक प्रवृत्ति से मिश्रित हो जाती है, तो अगले जीवन में उसे वैसा ही शरीर मिलता है - वह कुत्ता, बिल्ली, सूकर, देवता या चौरासी लाख योनियों में से कोई भी रूप प्राप्त कर सकता है
मनुष्य की आत्मा को मनुष्य शरीर ही प्राप्त होता है, कभी आम के बीज से तरबूज उगता है क्या? नल-कूवर का यमलार्जुन वृक्ष, राजा भरत का हिरन व राजा नृग का बड़ी छिपकली बनना केवल काल्पनिक कथाएं हैं
नया स्थूल शरीर प्राप्त करके जीव मन के चारों ओर संपुंजित किन विशेष इन्द्रियों को प्राप्त करता है जिससे वह इन्द्रियविषयों के एक विशिष्ट समुच्चय का भोग करता है? (15.9)
कान
आँख
जीभ
नाक
स्पर्श इन्द्रिय (त्वचा)
भगवान् किन शब्दों में उस व्यक्ति की योग्यता का वर्णन करते हैं जो प्रकृति के गुणों के अधीन शरीर के भोग-त्याग को देख पाता है? (15.10)
उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि
भुञ्जानं वा गुणान्वितम्
विमूढा नानुपश्यन्ति
पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः
आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त व्यक्ति क्या समझता है और क्या करता है? (15.10)
आत्मा शरीर से भिन्न है और यह अपना शरीर बदल कर विभिन्न प्रकार से भोगता रहता है
इस संसार में बद्धजीव किस प्रकार और क्यों कष्ट भोग रहे हैं
इस ज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाने में प्रयत्नशील रहते हैं
जीव इस शरीर को किस प्रकार त्यागता है, वह अगले जीवन में कैसा शरीर धारण करने जा रहा है, अथवा वह विशेष प्रकार के शरीर में क्यों रह रहा है - विषयक पर्याप्त ज्ञान में प्रशिक्षित होकर भाग्यशाली बनने के लिए क्या करें? (15.10)
प्रमाणिक गुरु से भगवद्गीता तथा अन्य ऐसे ही ग्रंथों को सुनें
किसी भी कलियुगी बाबा से कपोल कल्पित कथाएं सुनें
प्रामाणिक शास्त्रों व भगवान् का अपमान करने वाले तथाकथित आधुनिक गुरु के कहकहों का आनंद लें
क्या आपके हृदय में भगवान् द्वारा उल्लिखित "तद धाम परमं मम" - भगवान् के परम धाम - गोलोक वृन्दावन जाने के प्रति कोई आकर्षण अनुभव हुआ? हाँ तो क्यों और नहीं तो क्यों?
