WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-69 (18.59-68)
Total questions: 38
Worksheet time: 3hrs 20mins
कर्म करने के लिए सर्वोत्तम मार्ग क्या है जिससे सभी परिस्थियों में सुरक्षित रहा जा सके? (18.59)
परमेश्वर से निर्देश प्राप्त करके कर्म किया जाय क्योंकि कोई भी अपने भाग्य का निर्णय नहीं कर सकता
भगवान् या भगवान् के प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के आदेश की वह कभी उपेक्षा न करे
भगवान् के आदेश को बिना किसी हिचक के पूरा करने के लिए वह कर्म करे
अर्जुन द्वारा युद्ध में प्रवृत्त नहीं होने के निर्णय में क्या गलत था? (18.59)
वह क्षत्रिय स्वभाव लेकर जन्मा था अतः उसे अपने स्वभाव वश युद्ध में लगना ही पड़ेगा
मिथ्या अहंकारवश वह डर रहा था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करके वह पाप का भागी होगा
वह अपने को अपने कर्मों का स्वामी जान रहा था, भूल गया कि साक्षात् भगवान् उसे युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं
भगवान् ने किन शब्दों में बताया कि अर्जुन को अपने क्षत्रिय स्वभाववश युद्ध में लगना ही पड़ेगा? (18.59)
यदहङ्कारमाश्रित्य
न योत्स्य इति मन्यसे
मिथ्यैष व्यवसायस्ते
प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति
भगवान् ने किन शब्दों में अर्जुन को कहा - "बाध्य होकर वही सब करोगे"? (18.60)
स्वभावजेन कौन्तेय
निबद्धः स्वेन कर्मणा
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्
करिष्यस्यवशोऽपि तत्
इनमें से क्या सही है? (18.60)
प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के विशेष संयोग के वशीभूत है और तदानुसार कर्म करता है
जो स्वेच्छा से परमेश्वर के निर्देशानुसार कार्यरत रहता है, तो वह प्रकृति के गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होता है
जो परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करने से मना करता है, वही गौरवान्वित होता है
शरीर-परिवर्तन होते ही जीव तो अपने विगत कर्मों को भूल जाता है, फिर अगले शरीर में वो संचित इच्छाओं के अनुसार भोग कैसे कर पाता है? (18.61)
शरीर समाप्त, इच्छाएं समाप्त, अब नए शरीर में फिर से नया जीवन बिलकुल खाली पन्ने से शुरू होता है
परमात्मा उसके समस्त कार्यों का साक्षी रहता है, अतएव जीवों के सभी कार्यों का संचालन उन्हीं के द्वारा होता है
परमात्मा के आदेश से प्रकृति विशेष शरीर प्रदान करती है, ताकि जीव अपनी पूर्व इच्छाओं के अनुसार कर्म कर सके
एक जीवात्मा के विषय में क्या सही है? (18.61)
जीवात्मा (व्यक्ति) ही सर्वेसर्वा नहीं है
व्यक्ति तो सदैव भगवान् के नियन्त्रण में रहता है
जीव का कर्तव्य है कि वह शरणागत हो
जीव जितना योग्य होता है उतना ही पाता है
जीव भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञाता है
यदि मैं मनुष्य शरीर त्यागकर कुत्ता बनता हूँ, तो वही जीवात्मा अपनी पुराणी इच्छाओं के साथ कुत्ते के शरीर में कैसे काम कर पायेगा? (18.61)
ज्योंही जीव को किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित कर दिया जाता है, वह शारीरिक अवस्था के अन्तर्गत कार्य करना प्रारम्भ कर देता है
अत्यधिक तेज मोटरकार में बैठा व्यक्ति कम तेज कार में बैठे व्यक्ति से अधिक तेज जाता है, भले ही जीव अर्थात् चालक एक ही क्यों न हो
इस श्लोक में किसकी यंत्र से तुलना की गयी है? (18.61)
जीवात्मा
ईश्वर
भौतिक शरीर
यहाँ - तमेव शरणं गच्छ - से भगवान् ने किसकी शरण में जाने को कहा है? (18.62)
प्रत्येक हृदय में स्थित भगवान् (परमात्मा) की - ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (18.61)
भगवान् कृष्ण की क्योंकि वही प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (15.15)
शायद उस अनदेखा, अनजाना सा का जिक्र कर रहे हैं, स्वयं कृष्ण की शरण में तो नहीं
भगवान् की शरण लेने का क्या परिणाम होगा? (18.62)
इस जीवन के सारे कष्टों से छुटकारा पा सकेगा - परां शान्तिं
अंत में परमेश्वर के धाम पहुँच जाएगा - स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्
सौभाग्य से भगवान् बनने का भी अवसर मिल सकता है - अहं परब्रह्म
अर्जुन ने कृष्ण को भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में क्यों स्वीकार किया है? (18.62)
उसके पास कोई विकल्प नहीं है, विवश है बेचारा
यह उसका निजी अनुभव है
नारद, असित, देवल, व्यास जैसे महापुरुष इसके प्रमाण हैं
क्या वैदिक साहित्य में भगवान् के शाश्वत धाम का वर्णन कहीं है? (18.62)
(ऋग्वेद 1.22.20) में दिव्य जगत् - तद्बिष्णोः परमं पदम् - के रूप में वर्णित है
(गीता 18.62) में भी - स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् - परम नित्यधाम का वर्णन हुआ है
ऐसा कुछ भी नहीं है, सब कुछ मिथ्या है - सर्वं खलु इदं ब्रह्म
भगवान् के आदेश के अनुसार उनके शरणागत होने की विधि के विषय में क्या सही है? (18.63)
सर्वश्रेष्ठ उपदेश यह है कि हृदय में आसीन परमात्मा के शरणागत हुआ जाए
भगवत् शरणागत होने में जीव का कोई हित नहीं है, यह तो परमेश्वर के सर्वाधिक हित में है
शरणागत होने के पूर्व जहाँ तक बुद्धि काम करे मनुष्य को इस विषय पर मनन करने की छूट मिली है
कुछ भी करने से पहले, भगवान् ने किन शब्दों में अर्जुन से कहा - पूरी तरह से मनन करो? (18.63)
इति ते ज्ञानमाख्यातं
गुह्याद्गुह्यतरं मया
विमृश्यैतदशेषेण
यथेच्छसि तथा कुरु
भगवान् का – यथेच्छसि तथा कुरु – कहने का क्या अभिप्राय है? (18.63)
जो मन में आये करो और कोई पाप-पुण्य नहीं भोगना पड़ेगा
भगवान् जीव की यत्किंचित स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते
भगवान् कृष्ण के द्वारा बताया गया गुह्य व गुह्यतर ज्ञान क्या है? (18.63)
गुह्य ज्ञान - ब्रह्मभूत ज्ञान
गुह्य ज्ञान - परमात्मा का ज्ञान
गुह्यतर ज्ञान - ब्रह्मभूत ज्ञान
गुह्यतर ज्ञान - परमात्मा का ज्ञान
भगवान् के आदेश को स्वीकार करने की सर्वोत्तम विधि क्या है? (18.63)
कृष्ण या कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधिस्वरूप गुरु के माध्यम से निर्देश प्राप्त करे
शरणागत होने के पूर्व जहाँ तक बुद्धि काम करे, इस विषय पर मनन करे
आँखें बंद करके, बुद्धि को ताला लगा कर, इसी प्रकार के अन्यों की भीड़ के पीछे चलते रहो
अनेक ज्ञान प्रदान करने के बाद भगवान् अब अर्जुन को क्या सर्वाधिक गुह्यज्ञान या गुह्यतमज्ञान प्रदान करने जा रहे हैं? (18.64)
ब्रह्मज्ञान
परमात्मा ज्ञान
भगवान् के शरणागत होने का ज्ञान
भगवान् अर्जुन को ही यह गुह्यतम ज्ञान क्यों सुना रहे हैं? (18.64)
क्योंकि यह सन्देश सामान्यजन की समझ में नहीं आता
क्योंकि जो कृष्ण को सचमुच अत्यन्त प्रिय है, कृष्ण का शुद्धभक्त है, वह इसे समझ लेता है
भगवान् के किस आदेश को भगवद्गीता के सार के रूप में जोर देने के लिए दुहराया जा रहा है? (18.64)
यथेच्छसि तथा कुरु – जैसे इच्छा हो वैसा करो
मन्मनाः – सदैव मेरा चिन्तन करो
वैदिक साहित्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आदेश, भगवान् के शरणागत होने का पालन किसके द्वारा होना चाहिए? (18.64)
केवल अर्जुन द्वारा
समस्त जीवों द्वारा
भगवान् के नाना रूप कौन से हैं? (18.65)
विष्णु
नारायण
राम
वराह
ब्रह्मा-शिव आदि देवता
ज्ञान के गुह्यतम अंश के रूप में परम भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को क्या करने के लिए कहा है? (18.65)
मन्मना - सदैव मेरा चिन्तन करो
भव मद्भक्तो - मेरे भक्त बनो
मद्याजी - मेरी पूजा करो
मां नमस्कुरु - मुझे नमस्कार करो
भगवान् के शब्द उनके किस रूप पर मन को एकाग्र करने पर बल देते हैं? (18.65)
भगवान् के नाना रूपों में से किसी पर भी
अन्यों को छोड़कर भगवान् के आदि रूप कृष्ण पर
वंशी-मोरपंख युक्त सुन्दर मुखवाले सांवले कृष्ण पर
अर्जुन के समक्ष उपस्थित कृष्ण पर
अर्जुन तो कृष्ण का परम प्रिय मित्र है, अतः वे उसे वचन देते हैं कि तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे, पर हमारा क्या? (18.65)
अब कुछ नहीं हो सकता, अब तो जी भर कर संसार का भोग करो और अंत में त्यागी-योगी बनकर ब्रह्मतेज तक जाने को ही गनीमत समझो
जो कोई भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है, वह कृष्ण का प्रिय सखा बनकर अर्जुन जैसी ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है
भगवान् ने क्या अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई हैं जिन सबका परित्याग करके अब केवल वे अपनी शरण में आने का आदेश दे रहे हैं? (18.66)
परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान
अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान
अनासक्ति, इन्द्रिय तथा मन का संयम
संन्यास का ज्ञान, ध्यान आदि का ज्ञान
नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन
कौन से शब्द भगवान् के वचन को सूचित करते हैं - मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा? (18.66)
सर्वधर्मान्परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि
मा शुचः
हरि भक्ति विलास (11.676) में वर्णित कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि के किस अंग के अनुसार शरणागत भक्त को इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन-निर्वाह कैसे होगा, क्योंकि कृष्ण इसको सँभालेंगे? (18.66)
आनुकूल्यस्य सङकल्पः
प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्
रक्षिष्यतीति विश्वासो
गोप्तृत्वे वरणं तथा
आत्मनिक्षेप, कार्पण्ये
कृष्ण की शरण में जाने मात्र से क्या होगा? (18.66)
बहुत अनुष्ठानों का पालन करना होगा
व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा
तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है
समस्त पापों से मुक्त हो सकता है
सभी आध्यात्मवादियों में से कौन सर्वश्रेष्ठ है जो बिना झिझक, डर या चिंता के सभी धर्मों को त्यागकर एकमात्र साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होकर उनकी शरण ग्रहण करता है? (18.66)
कर्मयोगी
दार्शनिक
योगी
शुद्धभक्त
भगवान् ने किनको यह गुह्यज्ञान न बताये जाने के लिए कहा है? (18.67)
अतपस्काय - जो संयमी नहीं है व कभी धार्मिक तपस्या नहीं की
अभक्ताय - जिन्होंने एकनिष्ठ भक्ति का कभी प्रयत्न नहीं किया
अशुश्रूषवे - जिसने भक्ति में रत रहकर किसी शुद्धभक्त की सेवा नहीं की
मां योऽभ्यसूयति - जो कृष्ण की महानता से द्वेष करते हैं
कौन भगवद्गीता के प्रयोजन को व कृष्ण को नहीं समझ सकता? (18.67)
केवल व्यवसाय चलाने के लिए भगवद्गीता का प्रवचन करने वाला कामी
कामी न हो पर वैदिक नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाला अभक्त
कृष्णभक्त है, लेकिन कृष्णभावनाभावित कार्यकलापों में रत नहीं रहता
कृष्ण की सर्वश्रेष्ठता सुनकर उनसे द्वेष रखने वाले श्रद्धाविहीन
इनमें से क्या सही नहीं है? (18.67)
कृष्ण से द्वेष रखने वाले आसुरी पुरुष के भगवद्गीता के व्यावसायिक भाष्यों से बचना चाहिए
शुद्धभक्त से कृष्ण को समझे बिना किसी को भगवद्गीता की टीका करने का साहस नहीं करना चाहिए
जैसे दूध सर्प के स्पर्श करने पर भी पौष्टिक रहता है वैसे ही द्वेषी के गीता भाष्य या प्रवचन को स्वीकार कर लेना चाहिए
भगवान् के आदेशानुसार भगवद्गीता की विवेचना व व्याख्या किन लोगों के बीच की जानी चाहिए? (18.68)
केवल भक्तों के बीच में
जो लोग भक्त नहीं हैं
जो लोग कृष्ण को स्वीकार नहीं करते
जो कृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार करते हैं
भगवान् के वचनों - मद्भकतेष्वभिधास्यति - से क्या सूचित होता है कि भगवद्गीता किसका विषय है? (18.68)
एकमात्र भक्तों का
दार्शनिक चिन्तकों का
सकाम कर्मियों का
नास्तिकों व द्वेषियों का
जो कोई भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत करने का सच्चे मन से प्रयास करता है, ________ (18.68)
वह भक्ति के कार्यकलापों में प्रगति करता है
वह मनमाने ढंग से व्याख्या करने का अपराधी है
शुद्ध भक्तिमय जीवन को प्राप्त होता है
उसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है
कल आपने कृष्ण की मित्रता प्रस्ताव को स्वीकार किया था और आज उन्होंने मित्र होने के कारण आपको परम गुह्य ज्ञान रूपी निर्देश दिए हैं | बताइये कि आप उन्हें स्वीकार करते हुए क्या-क्या करेंगे?
