WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-70 (18.69-78)
Total questions: 44
Worksheet time: 4hrs 50mins
गीता के परम गुह्य ज्ञान को वितरित करने वाले भक्त के विषय में भगवान् ने क्या कहा है? (18.69)
इस संसार में न तो वह मुझे कभी प्रिय था, न है और न कभी होगा
इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा
जो भगवद्गीता के इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, उसके लिए भगवान् क्या घोषणा करते हैं? (18.70)
वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता है
वह अपना समय व्यर्थ करता है
भगवद्गीता के सन्देश का वितरण करने वाले को शुद्धभक्ति और भगवद्धाम, पढ़ने वाले द्वारा बुद्धि से भगवान् की पूजा करना माना जाता है, तो जो श्रद्धा समेत और द्वेषरहित होकर इसे सुनता है उसका क्या?(18.71)
वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है
शुभ लोकों को प्राप्त होता है
इनमें से क्या सही है? (18.71)
भगवद्गीता के श्रवण मात्र से उसे भी पुण्यकर्मों का फल प्राप्त होता है, जो शुद्ध भक्त बनने का प्रयत्न नहीं करता
भगवद्भक्त हर एक व्यक्ति के लिए अवसर प्रदान करता है कि वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान् का भक्त बने
कभी-कभी भगवद्भक्त आम कक्षा में प्रवचन करता है जिसमें सारे छात्र भक्त नहीं होते, यह बहुत बड़ा अपराध है
जो भक्ति का आचरण करने वाले पुण्यात्मा हैं, किन्तु शुद्ध नहीं होते, वे _________ को प्राप्त होते हैं | (18.71)
ध्रुवलोक
अधोलोक
नर्कलोक
यमलोक
गोलोक
भगवान् ने गुरु के रूप में अर्जुन को गीता का उपदेश देने के बाद क्या पूछा? (18.72)
क्या तुमने इस शास्त्र को एकाग्र चित्त होकर सुना
क्या अब तुम्हारा अज्ञान तथा मोह दूर हो गया है
क्या पूरी भगवद्गीता ढंग से समझ ली है या नहीं
दक्षिणा शुल्क कब दोगे
जो भी व्यक्ति कृष्ण जैसे प्रामाणिक गुरु या उनके प्रतिनिधि से भगवद्गीता सुनता है, तो क्या होता है? (18.72)
उसका सारा ज्ञान दूर हो जाता है
वह अवश्य ही मुक्त पुरुष बनकर अज्ञान के अंधकार को पार कर लेता है
भगवान् के अनुग्रह से - त्वत्प्रसादान्मयाच्युत - अर्जुन अपने अंदर क्या लक्षण महसूस करता है? (18.73)
नष्टो मोहः - मोह दूर हो गया
स्मृतिर्लब्धा - स्मरण शक्ति वापस मिल गई
स्थितोऽस्मि - दृढ़ हूँ
गतसन्देहः - संशयरहित
करिष्ये वचनं मम - अपनी इच्छानुसार कार्य करूंगा
अर्जुन ने अंतिम बार गीता में भगवान् को कैसे सम्बोधित किया? (18.73)
अच्युत
केशव
मधुसूदन
माधव
पार्थसारथी
जीव का वास्तविक स्वरुप या कर्तव्य क्या है? (18.73)
जीव परमेश्वर के आदेशानुसार कर्म करे
जीव आत्मानुशासन (संयम) के लिए बना है
जीव परमेश्वर के नित्य दास के रूप में रहे
जीव सेवक नहीं, अपितु इस जगत् का स्वामी है
ज्ञान के विरोधी मोह का जीव पर क्या प्रभाव पड़ता है? (18.73)
स्वेच्छा से भगवान् की इच्छानुसार कर्म करने के लिए परमेश्वर की शरण ग्रहण करता है
जीव सोचता है कि अब वह बद्ध नहीं ईश्वर है, पर यह नहीं सोचता कि यदि ऐसा होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता
वह काम तथा इच्छाओं से बँधा हुआ है, फिर भी वह अपने को जगत् का स्वामी मानता है
जीव को फाँसने का माया का अन्तिम पाश क्या है? (18.73)
भौतिक जगत् में जीव मोहवश काम तथा इच्छाओं से बँधा हुआ है
वह बाह्यशक्ति माया की सेवा करना पसन्द करता है और बन्धन में पड़ जाता है
जीव सोचता है कि अब वह बद्धजीव नहीं रहा, अब तो वह ईश्वर है
माया से मुक्त होना क्या होता है? (18.73)
माया से मुक्त होना भगवान् श्रीकृष्ण को समझना है
भगवान् के आदेशानुसार कर्म करने के लिए सहमत होना है
मुक्त होने पर पुरुष का मोह दूर हो जाता है
कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए राजी हो जाता है
सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस जगत् का स्वामी है
इनमें से क्या सही है? (18.73)
मोह भगवत्कृपा या शुद्ध भक्त की कृपा से जीता जा सकता है
कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करना कृष्णभावनामृत है
भगवान् भक्त को आत्मसमर्पण भी कर सकते हैं
भगवद्गीता पढ़ना = कृष्ण को वास्तविकता के साथ जानना
अर्जुन भगवद्गीता सुनकर समस्त मोह से घिर गया
अर्जुन ने क्या समझा कि पुनः अपना धनुष-बाण ग्रहण करके युद्ध करना स्वीकार कर लिया? (18.73)
कृष्ण के उपदेश से उसके हृदय में कौरवों के प्रति घृणा व प्रतिशोध की ज्वाला धधकने लगी
यह तो अनावश्यक जनसंख्या की वृद्धि को कम करने के लिए कृष्ण की योजना थी
उसने कृष्ण की इच्छानुसार उनके आदेश का पालन करते हुए युद्ध करना स्वीकार किया
संजय कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनकर कैसा अनुभव करता है? (18.74)
महात्मनः
अद्भुतं
रोमहर्षणम्
संजय के हृदय में सारी घटना कैसे स्फुरित हुई थी? (18.74)
गुरु व्यासदेव की कृपा से
धृतराष्ट्र की शक्ति से
उसके स्वयं के योगबल से
वो दस दिन तक युद्ध के मैदान में ही तो था
क्या करें कि हमारा जीवन सुखी तथा सफल हो जाए? (18.74)
कृष्ण को समझने के लिए अर्जुन का अनुसरण करें
कृष्ण को समझने का प्रयास छोड़कर दुर्योधन जैसे महत्त्वाकांक्षी बनें
गुरु-परम्परा का क्या रहस्य है? (18.75)
गुरु के माध्यम से ही कृष्ण को समझना चाहिए, प्रत्यक्ष रूप से नहीं जैसे व्यास की कृपा से ही संजय समझ सके
गुरु पारदर्शी माध्यम है, यद्यपि अनुभव फिर भी प्रत्यक्ष ही होता है, जैसे संजय ने साक्षात् योगेश्वर कृष्ण से सुना
जब गुरु प्रामाणिक हो तो भगवद्गीता का प्रत्यक्ष श्रवण किया जा सकता है, जैसा अर्जुन ने किया
नारद किसके प्रत्यक्ष शिष्य हैं? (18.75)
कृष्ण
व्यासदेव
संजय
अर्जुन
संजय द्वारा भगवद्गीता को समझने के योग्य बनने के सोपानों में क्या महत्त्वपूर्ण नहीं है? (18.75)
कृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य नारद व्यासदेव के गुरु हैं
संजय व्यासदेव के शारीरिक पुत्र धृतराष्ट्र का मंत्री है
व्यास की कृपा से संजय की इन्द्रियाँ विमल हो सकीं
शुद्ध इन्द्रियों से साक्षात् कृष्ण दर्शन-श्रवण हो सका
कृष्ण का प्रत्यक्ष श्रवणकर्ता गुह्यज्ञान समझता है
यदि कोई व्यक्ति गुरु-परम्परा में नहीं होता तो क्या होता है? (18.75)
वह स्वयं से गीता के गुह्यज्ञान को समझ और समझा भी सकता है
वह कृष्ण की प्रत्यक्ष वार्ता नहीं सुन सकता
भगवद्गीता समझने का उसका ज्ञान सदैव अधूरा रहता है
भगवान् श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहने का क्या अभिप्राय है? (18.75)
श्रीकृष्ण समस्त योगों के स्वामी हैं
श्रीकृष्ण समस्त योगों के ज्ञाता हैं
कैसे समझें कि हम आज भी कृष्ण से प्रत्यक्ष श्रवण का अर्जुन जैसा सौभाग्य और प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं? (18.75)
जिस तरह अर्जुन कृष्ण को प्रत्यक्षतः समझ सकने के लिए भाग्यशाली था, उसी प्रकार व्यासदेव की कृपा से संजय भी कृष्ण को साक्षात् सुनने में समर्थ हो सका
कृष्ण से प्रत्यक्षतः सुनने एवं व्यास जैसे गुरु के माध्यम से प्रत्यक्ष सुनने में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि गुरु भी व्यासदेव का प्रतिनिधि होता है
वैदिक पद्धति के अनुसार शिष्यगण व्यासदेव के प्रतिनिधिस्वरुप अपने गुरु का व्यास पूजा उत्सव कब रचाते हैं? (18.75)
अपने गुरु के जन्मदिन पर
व्यासदेव के जन्मदिन पर
भगवद्गीता के अनुसार सर्वोच्च योगी कौन है? (18.75)
जो भगवद्गीता के सन्देश को स्वीकारता है - कृष्ण की शरण में जाओ
जो कृष्ण का नाम लिए बिना योग पर बड़े-बड़े भाषण देने में निपुण हो
जब कोई गीता में अर्जुन तथा कृष्ण के संवाद को सही स्त्रोत से अर्थात् प्रत्यक्षतः कृष्ण से सुनता है, तो क्या प्रभाव होता है? (18.76)
उसे पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त होता है
वह इसे भूल नहीं सकता, बारम्बार स्मरण करता है
दिव्य स्थिति में अत्यधिक प्रबुद्ध हो उठता है
प्रति क्षण आह्लाद से गद्गद् हो उठता है
कुछ काल तक जीवन का रोमांचकारी भोग करता है
अर्जुन को दिखाये गये कृष्ण के अद्भुत विराट रूप को उस समय और किसने देखा था? (18.77)
परम भक्त और शक्त्यावेश अवतार व्यासदेव
व्यासदेव के शिष्य संजय
महान नीतिज्ञ शेष चारों पाण्डव
महाराज धृतराष्ट्र के सौ पुत्र
संजय किन शब्दों से अपना यह भाव प्रदर्शित कर रहे हैं - पुनःपुनः हर्षित होता हूँ? (18.77)
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य
रूपमत्यद्भुतं हरेः
विस्मयो मे महान्राजन्
हृष्यामि च पुनः पुनः
भगवद्गीता के अनुसार जहां योगेश्वर कृष्ण हैं और परम धनुर्धर अर्जुन हैं, वहां निश्चित रूप से क्या होता है? (18.78)
श्रीः - ऐश्वर्य
विजयः - विजय
भूतिः - अलौकिक विलक्षण शक्ति
नीतिः - नीति
श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के सारथी का पद स्वीकार करना उनके किस ऐश्वर्य का प्रदर्शन था? (18.78)
वीर्यस्य
यशसः
श्रियः
ज्ञान
वैराग्य
संजय ने युद्ध के उपरान्त की स्थिति के सम्बन्ध में क्या भविष्यवाणी की? (18.78)
अर्जुन और कृष्ण के युधिष्ठिर के पक्ष में होने पर भी दुर्योधन जीत जाएगा
संसार पर शासन की सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में चली जाएगी
इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर उत्तरोत्तर समृद्धि करेंगे
युधिष्ठिर के पक्ष में क्या सकारात्मक तथ्य बताये गए हैं? (18.78)
कृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर की ओर थे
पुण्यात्मा तथा पवित्रात्मा
कठोर नीतिवादी
जीवन भर असत्य भाषण किया
अल्पज्ञ व्यक्ति क्या मानते हैं? (18.78)
भगवद्गीता बस युद्धस्थल में दो मित्रों की वार्ता है
कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाया
भगवद्गीता नीति का परम आदेश है
मनुष्य को कृष्ण का भक्त बनना चाहिए
सारे धर्मों का सार है – कृष्ण की शरणागति
भगवद्गीता का क्या आदेश धर्म तथा नीति की परम विधि है? (18.78)
मन्मना भव मद्भक्तः (9.34)
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय (1.1)
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज (18.66)
अठारहवें अध्याय के सार के अनुसार ज्ञान का गुह्य मार्ग किसे कहा गया है? (18.78)
वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग
ध्यान तथा ज्ञान का अनुशीलन
पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति
अठारहवें अध्याय के सार के अनुसार ज्ञान का गुह्यतर मार्ग किसे कहा गया है? (18.78)
वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग
ध्यान तथा ज्ञान का अनुशीलन
पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति
अठारहवें अध्याय के सार के अनुसार ज्ञान का गुह्यतम उपदेश किसे कहा गया है? (18.78)
वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग
ध्यान तथा ज्ञान का अनुशीलन
पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति
किस का पूर्णज्ञान परम सत्य का पूर्ण ज्ञान माना जाता है? (18.78)
निर्गुण ब्रह्म
अन्तर्यामी परमात्मा
भगवान् श्रीकृष्ण
अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहने वाले कृष्ण की शक्ति से प्रकट जीव किस-किस श्रेणी के बताये गए हैं? (18.78)
नित्यबद्ध
नित्यकाम
नित्यधाम
नित्यमुक्त
भगवद्गीता में किन प्रमुख विषयों की व्याख्या की गई है? (18.78)
भगवान्
भौतिक प्रकृति
जीव
शाश्वतकाल
सभी प्रकार के कर्म
भगवान् की किस शक्ति में किंचित् स्वतन्त्रता रहती है? (18.78)
भौतिक शक्ति (अपरा)
आध्यात्मिक शक्ति (परा)
जीव के विषय में क्या सही है? (18.78)
परा और अपरा के बीच में तटस्था शक्ति के रूप में स्थित है और दोनों में से किसी का भी संसर्ग करने को बाध्य नहीं है
जीव भगवान् की पराशक्ति से सम्बंधित है, अतएव उसमें किंचित् स्वतन्त्रता रहती है
स्वतन्त्रता के सदुपयोग से ही वह कृष्ण के अन्तर्गत ह्लादिनी शक्ति की अपनी सामान्य दशा को प्राप्त होता है
इतने विश्लेषणात्मकता से भगवद्गीता पढ़ने के बाद अब आप अपनी किंचित अल्प स्वतंत्रता का किस प्रकार उपयोग करना चाहेंगे?
