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Worksheets34. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.29–8.04
Total questions: 52
Worksheet time: 1hrs 28mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना मोबईल नं0 लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।
कौन से बुद्धिमान् व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति की शरण ग्रहण करते हैं ?
जो जरा तथा मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए यत्नशील होते हैं ।
भौतिक जगत् के कष्टों से पीड़ित व्यक्ति ।
अर्थ प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति ।
यह सभी प्रकार के व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति की शरण ग्रहण करते हैं ।
दिव्य कर्मों अर्थात् कृष्णभावनाभावित कर्मों के विषय में पूर्ण ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को भगवान् श्रीकृष्ण ने "वास्तव में ब्रह्म" क्यों कहा है ?
क्योंकि ऐसे व्यक्ति को ज्ञान होता है कि कृष्णभावनाभावित कर्मों के द्वारा ही वास्तविक मुक्ति प्राप्त की जा सकती है ।
क्योंकि ऐसे व्यक्ति को ज्ञान होता है कि कृष्णभावनाभावित कर्मों के द्वारा वास्तविक शाँति प्राप्त की जा सकती है ।
क्योंकि ऐसे व्यक्ति को ज्ञान होता है कि कृष्णभावनाभावित कर्मों के द्वारा ही वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि आध्यात्मिक शरीर को क्यों नहीं सताते हैं ?
क्योंकि आध्यात्मिक शरीर आध्यात्म नामक पदार्थ का बना होता है ।
क्योंकि आध्यात्मिक शरीर में काल के अधीन नहीं होता है ।
क्योंकि आध्यात्मिक शरीर भगवान् की शक्तियों के अधीन कार्य नहीं करता है ।
क्योंकि आध्यात्मिक शरीर सप्ततत्व का बना होता है ।
भगवान् के नित्य पार्षद बनने की मूल योग्यता क्या है ?
अपने आध्यात्मिक शरीर को पुनः प्राप्त करना ।
शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त करना ।
वेद, पुराणादि दिव्य ग्रंथों से ज्ञान प्राप्त करना ।
भगवान् की ब्रह्मावस्था में विलीन हो जाना ।
मनुष्य के जीवन का कौन सा ब्रह्मबोध ही भक्ति है ?
मनुष्य द्वारा स्वयँ को ब्रह्मा समझना ।
मनुष्य द्वारा स्वयँ को भगवान् के तुल्य समझना ।
मनुष्य द्वारा स्वयँ को ब्रह्म या आत्मा समझना ।
मनुष्य द्वारा स्वयँ को परम भोक्ता समझना ।
इनमें से कौन ब्रह्म पद पर आसीन होता है ?
शुद्धभक्त
अशुद्ध भक्त
नवदीक्षित भक्त
निर्विशेष वादी भक्त
अशुद्ध भक्त कैसे कृष्णभावनाभावित होते हैं ?
भगवत्कृपा से
अपने भाग्य से
अपने कर्मों द्वारा
यह सभी कथन सत्य हैं ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति ब्रह्म कहलाने का अधिकारी होता है ?
जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित कर्म करते हैं ।
जिन्हें कृष्ण विषयक संपूर्ण ज्ञान होता है ।
जिन्हें कृष्ण के विषय में कोई भी भ्रांति नहीं होती है ।
यह सभी व्यक्ति ब्रह्म कहलाने के अधिकारी होते हैं ।
"माम आश्रित्य" का क्या अर्थ होता है ?
वह व्यक्ति जो पूर्णतः कृष्ण पर आश्रित रहता है ।
वह व्यक्ति जो पूर्णतः मुझ पर आश्रित रहता है ।
वह व्यक्ति जो पूर्णतः स्वयँ पर आश्रित रहता है ।
वह व्यक्ति जो पूर्णतः अपने मामा पर आश्रित रहता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के कथन "मेरी पूर्ण चेतना" के लिए निम्न में से सही शब्द चुनें ।
कृष्णभावना
कृष्णभावनाभावित
कृष्णभावनामृत
कृष्णत्व
अपने प्रयाणकाल के दौरान निम्न में से कौन सा व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण को जान और समझ सकता है ?
वह कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जो भगवान् श्रीकृष्ण को संपूर्ण जगत् का नियामक मानता हो ।
वह कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जो भगवान् श्रीकृष्ण को समस्त देवताओं का नियामक जानता हो ।
वह कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जो भगवान् श्रीकृष्ण को समस्त यज्ञविधियों का नियामक जानता हो ।
यह सभी व्यक्ति अपने प्रयाणकाल के दौरान भगवान् श्रीकृष्ण को जान और समझ सकते हैं ।
आपके आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार निम्न में से किस व्यक्ति की अपने प्रयाणकाल के दौरान भगवान् श्रीकृष्ण को उनकी पूर्ण चेतना में स्मरण करने की पूर्ण संभावना है ?
जिस व्यक्ति ने अपना संपूर्ण जीवन कृष्णभावना में व्यतीत किया हो ।
जिस व्यक्ति ने मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व ही कृष्णभावनामृत के विषय में ज्ञान प्राप्त किया हो ।
जो व्यक्ति अपने प्रयाणकाल से कुछ क्षण पूर्व ही कृष्णभावना से अवगत हुआ हो ।
मेरे अनुसार इन सभी व्यक्तियों की अपने-अपने प्रयाणकाल के दौरान भगवान् श्रीकृष्ण को स्मरण करने की पूर्ण संभावना है ।
किसकी दिव्य संगति से मनुष्य का भगवान् में विश्वास बढ़ता है ?
कृष्णभावनामृत की दिव्य संगति से ।
वैदिक ग्रंथों की दिव्य संगति से ।
ब्रह्मभूत व्यक्तियों की संगति से ।
इन सभी के दिव्य संगति से मनुष्य का भगवान् में विश्वास बढ़ता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में विशेष रूप से किसका वर्णन हुआ है ?
कृष्णभावनाभावित होने की विधि का ।
भगवान् श्रीकृष्ण की उपलब्धियों का ।
अष्टांग योग की विधियों का ।
मनोयोग या शुष्क मानसिक चिंतन की विधियों का ।
कृष्णभावनामृत का शुभारंभ कैसे होता है ?
कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की संगति से ।
वैदिक ग्रंथों की दिव्य संगति से ।
ब्रह्मभूत व्यक्तियों की संगति से ।
इन सभी के दिव्य संगति से मनुष्य का भगवान् में विश्वास बढ़ता है ।
श्रील प्रभुपाद जी ने अपने द्वारा लिखे गए दिव्य ग्रंथों के प्रचार के लिए व्यवसायिक मार्ग को न चुनकर व्यक्तिगत पुस्तक वितरण को क्यों प्रोत्साहित किया है ?
क्योंकि ऐसा करने से व्यक्ति के भीतर कृष्णभावनामृत का क्रमिक विकास होता है ।
क्योंकि ऐसा करने से पूर्ण लाभांश सीधे-सीधे संस्था को प्राप्त होता है ।
क्योंकि ऐसा करने से व्यवसायियों के एकाधिपत्य से संस्था का बचाव होता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
जीव को भगवान् की अहैतुकी कृपा निम्न में से किन योनियों में प्राप्त हो सकती है ?
मनुष्य योनि
पशु योनि
वृक्ष योनि
जीव को भगवान् की हेतु की कृपा 84,00,000 योनियों में से किसी भी योनि में प्राप्त हो सकती है ।
दृढ़व्रत श्रद्धा क्या होती है ?
यह श्रद्धा कि कृष्णभावनाभावित कार्य करने से सारे उद्देश्यों की पूर्ति होगी, दृढ़व्रत श्रद्धा कहलाती है ।
यह श्रद्धा कि कृष्णभावनाभावित कार्य न करने से भी सारे उद्देश्यों की पूर्ति होगी, दृढ़व्रत श्रद्धा कहलाती है ।
यह श्रद्धा कि भक्ति करने से ही समस्त भौतिक प्रयोजन सिद्ध होंगे, दृढ़व्रत श्रद्धा कहलाती है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 8.1 में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कितने प्रश्न किए हैं ?
2
3
4
5
निम्नलिखित प्रश्नों में से कौन सा प्रश्न श्लोक संख्या 8.1 में अर्जुन ने नहीं पूछा है ?
ब्रह्म क्या है ?
आत्मा क्या है ?
निष्काम कर्म क्या है ?
यह भौतिक जगत् क्या है ?
श्लोक संख्या 8.1 में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम कहकर क्यों संबोधित किया है ?
क्योंकि वह जानता है कि भगवान् श्रीकृष्ण परमपुरुष एवं परम प्रमाण हैं । और निश्चित रूप से उसके प्रश्नों के उत्तर देने में परम समर्थ हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम के रूप में संबोधित कर अर्जुन उनकी बड़ाई कर रहा था ताकि वे उसके प्रश्नों के उत्तर दे सकें ।
भगवान् श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम के रूप में संबोधित कर अर्जुन उन्हें स्मरण करवा रहा था कि वे उसके प्रश्नों के उत्तर देने में समर्थ है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 8.2 में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कितने प्रश्न किए हैं ?
2
3
4
5
निम्नलिखित प्रश्नों में से कौन सा प्रश्न श्लोक संख्या 8.2 में अर्जुन ने नहीं पूछा है ?
यज्ञ का स्वामी कौन है ?
वह शरीर में कैसे रहता है ?
मृत्यु के समय भक्ति में लगे रहने वाले आपको कैसे जान पाते हैं ?
कृष्णभावनामृत बिना किसी कर्म के सहज ही क्यों प्राप्त नहीं होता है ?
विष्णु तथा इन्द्र में कौन श्रेष्ठ हैं और क्यों ?
विष्णु श्रेष्ठ हैं क्योंकि विष्णु इन्द्र, शिव तथा ब्रह्मा सहित समस्त देवताओं के प्रधान देवता हैं ।
इन्द्र श्रेष्ठ हैं क्योंकि विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा सहित समस्त देवताओं के प्रधान देवता हैं ।
दोनों ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि दोनों ही समस्त प्रशासक देवताओं के प्रधान हैं ।
दोनों ही श्रेष्ठ है क्योंकि दोनों ही शिव तथा ब्रह्मा सहित समस्त प्रशासक देवताओं के प्रधान देवता हैं ।
अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण को मधुसूदन कहकर क्यों संबोधित किया है ?
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ने एक बार मधु नामक असुर का वध करके समस्त देवताओं का उद्धार किया था ।
अर्जुन चाहता था कि भगवान् श्रीकृष्ण उसके मन में असुर सदृश्य उत्पन्न हुईं समस्त शंकाओं का निराकरण करें ।
अर्जुन को मालूम था की भगवान श्री कृष्ण को मधु (शहद) अत्यधिक पसंद है इसीलिए उसने उन्हें मधुसूदन कहकर संबोधित किया है ।
यह सभी तर्क सत्य है ।
"नियतात्माभि" शब्द का क्या अर्थ है ?
कृष्णभावना
कृष्णभावनाभावित
कृष्णभावनामृत
यह सभी अर्थ सही हैं ।
अक्सर या देखने और सुनने को मिलता है कि अमुक-अमुक व्यक्ति अपनी मृत्यु के समय भगवान् का स्मरण करने में पूर्ण रूप से असमर्थ रहा, ऐसा क्यों होता है ?
जो व्यक्ति जीवन पर्यंत अपने भीतर कृष्णभावनामृत को पुनः जागृत करने का प्रयास नहीं करता है वह अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भगवान् का स्मरण नहीं कर सकता है ।
जो व्यक्ति जीवन पर्यंत अपने मन को भौतिक इंद्रिय विषयों में अभिनिविष्ट करके रखता है उसका मन मृत्यु के समय उन्हीं विषयों में आसक्त रहता है ।
ऐसा मानसिक विचलन के कारण होता है क्योंकि मृत्यु के समय मरणासन व्यक्ति का मन उसकी आसक्तियों के कारण अत्यंत विचलित होता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
"हे भगवान् ! इस समय मैं पूर्ण स्वस्थ हूं अच्छा हूं कि मेरी मृत्यु इसी समय हो जाए, जिससे मेरा मन रूपी हंस आपके चरण कमलों रूपी नाल के भीतर प्रविष्ट हो सके ।" यह प्रार्थना किसने की है ?
महाराज कुलशेखर
महाराज ध्रुव
महाराज प्रहलाद
महाराज परीक्षित
महाराज कुलशेखर स्वस्थ शरीर के साथ मृत्यु की कामना किस आशंका से कर रहे हैं ?
उन्हें संदेह है कि यदि वह मृत्यु के समय रुग्ण शरीर के साथ भगवन्नाम का जप नहीं कर पाए तो उनका मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जाएगा ।
ताकि वह अपनी सहज मृत्यु के समय विभिन्न व्याधियों से होने वाले कष्टों से बच सकें ।
उन्हें ज्ञात है कि भगवान् की कृपा से प्राप्त होने वाली मृत्यु में सहज मृत्यु की अपेक्षा कम कष्ट होते हैं ।
ऐसा करके वह भविष्य के लिए एक उदाहरण स्थापित करना चाहते थे ताकि उनके पद चिन्हों का अनुकरण कर भावी जीव भी अपना उद्धार कर सकें ।
भगवान् श्रीकृष्ण श्लोक संख्या 8.3 में अर्जुन के द्वारा श्लोक संख्या 8.1 में पूछे गए कितने प्रश्नों का उत्तर देते हैं ?
2
3
4
5
"ब्रह्म क्या है?" अर्जुन द्वारा पूछे गए इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण क्या कहते हैं ?
अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है ।
मेरी भक्ति करने वाला जीव ब्रह्म कहलाता है ।
देवताओं की भक्ति करने वाला जीव ब्रह्म कहलाता है ।
अपनी इंद्रियतृप्ति में निरंतर रत रहने वाला जीव ब्रह्म कहलाता है ।
"आत्मा क्या है ?" अर्जुन द्वारा पूछे गए इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण क्या कहते हैं ?
जीव का नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है ।
भौतिक जीव का नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है ।
आध्यात्मिक जीव का नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है ।
प्रकृति का नित्य स्वभाव आध्यात्मिक आत्म कहलाता है ।
"सकाम कर्म क्या है ?" अर्जुन द्वारा पूछे गए इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण क्या कहते हैं ?
जीवों के भौतिक शरीर से संबंधित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है ।
जीवात्माओं से संबंधित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है ।
भौतिक प्रकृति की समस्त गतिविधियाँ सकाम कर्म कहलाती हैं ।
आध्यात्मिक प्रकृति की समस्त गतिविधियाँ सकाम कर्म कहलाती हैं ।
जीव तो पराशक्ति का अंश है फिर भी तटस्था शक्ति क्यों कहलाता है ?
क्योंकि जीव कभी पराशक्ति में मिल जाता है तो कभी अपरा शक्ति में ।
क्योंकि जीव कभी स्वर्ग लोक में जाता है तो कभी पाताल लोक में ।
क्योंकि जीव कभी पुण्य कर्म करता है तो कभी पाप कर्मों में लिप्त होता है ।
यह सभी तर्क मिथ्या हैं ।
क्या भौतिक जगत् की भान्ति आध्यात्मिक जगत् में भी जीव को 84,00,000 योनियों के चक्र से गुजरते रहना पड़ता है ?
नहीं, आध्यात्मिक जगत् में जीव का एक ही आध्यात्मिक शरीर होता है ।
हाँ, आध्यात्मिक जगत में भी जीव को 84,00,000 योनियों से गुजरते रहना पड़ता है ।
नहीं, आध्यात्मिक जगत् और भौतिक जगत् में केवल कर्मों का अंतर होता है ।
हाँ, आध्यात्मिक जगत् में जीव की सेवा के अनुरूप उसका स्वरूप बदलता रहता है ।
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार यज्ञ-अनुष्ठानों में कितनी प्रकार की अग्नियों और कितनी प्रकार की आहुतियों का उल्लेख मिलता है ?
पाँच प्रकार की अग्नियों और पाँच प्रकार की आहुतियों
पाँच प्रकार की अग्नियों और चार प्रकार की आहुतियों
चार प्रकार की अग्नियों और पाँच प्रकार की आहुतियों
छः प्रकार की अग्नियों और छः प्रकार की आहुतियों
निम्न में से कौन सी आहुति का वर्णन छांदोग्य उपनिषद् में नहीं हुआ है ?
श्रद्धा
वर्षा
वीर्य
बुद्धि
जीवों की स्वर्ग लोक में आवागमन की क्या प्रक्रिया है ?
विशेष यज्ञ करना - अभीष्ट स्वर्गलोक प्राप्ति - स्वर्गलोक में भोग करना - पुण्य क्षीण होना - वर्षा में परिणत होना - पृथ्वी पर उतरना - अन्न में परिणत होना - मनुष्य द्वारा ग्रहण होना - वीर्य में परिणत होना - स्त्री के गर्भ में गर्भस्थ होना - मनुष्य रूप में पैदा होना - पुनः यज्ञ करना ।
विशेष यज्ञ करना - अभीष्ट स्वर्गलोक प्राप्ति - स्वर्गलोक में भोग करना - वर्षा में परिणत होना - पृथ्वी पर उतरना - पुण्य क्षीण होना - अन्न में परिणत होना - मनुष्य द्वारा ग्रहण होना - वीर्य में परिणत होना - स्त्री के गर्भ में गर्भस्थ होना - मनुष्य रूप में पैदा होना - पुनः यज्ञ करना ।
विशेष यज्ञ करना - अभीष्ट स्वर्गलोक प्राप्ति - वीर्य में परिणत होना - स्वर्गलोक में भोग करना - वर्षा में परिणत होना - पृथ्वी पर उतरना - अन्न में परिणत होना - मनुष्य द्वारा ग्रहण होना - पुण्य क्षीण होना - स्त्री के गर्भ में गर्भस्थ होना - मनुष्य रूप में पैदा होना - पुनः यज्ञ करना ।
विशेष यज्ञ करना - अभीष्ट स्वर्गलोक प्राप्ति - स्वर्गलोक में भोग करना - पुण्य क्षीण होना - वर्षा में परिणत होना - पृथ्वी पर उतरना - वीर्य में परिणत होना - मनुष्य द्वारा ग्रहण होना - अन्न में परिणत होना - स्त्री के गर्भ में गर्भस्थ होना - मनुष्य रूप में पैदा होना - पुनः यज्ञ करना ।
स्वर्गलोक में आवागमन की प्रक्रिया की क्या प्रकृति है ?
शाश्वत
अशाश्वत
अस्थाई
अच्युत
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किस प्रकार के यज्ञों से स्वयँ को दूर रखता है ?
भौतिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु किए जाने वाले यज्ञों से ।
अभीष्ट स्वर्गलोकों की प्राप्ति हेतु किए जाने वाले यज्ञों से ।
मान-प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य, धन-संपत्ति आदि की प्राप्ति हेतु किए जाने वाले यज्ञों से ।
इन सभी प्रकार के यज्ञ से कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदैव दूरी बनाए रखता है ।
वैदिक शास्त्रों में जीव तथा परमेश्वर को क्या कहा गया है ?
ब्रह्म तथा परब्रह्म
भ्रम तथा परभ्रम
जीव तथा जीवात्मा
पशु तथा पुरुष
भगवान् श्रीकृष्ण श्लोक संख्या 8.4 में अर्जुन के द्वारा श्लोक संख्या 8.2 में पूछे गए कितने प्रश्नों का उत्तर देते हैं ?
2
3
4
5
निम्न में से क्या अधिभूत कहलाता है ?
निरंतर परिवर्तनशील भौतिक प्रकृति ।
परमेश्वर का विराट रूप जिसमें सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित हैं ।
प्रत्येक शरीर में आत्मा के साथ वास करने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का अंश स्वरूप अंतर्यामी परमात्मा ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
निम्न में से क्या अधिदैवत कहलाता है ?
निरंतर परिवर्तनशील भौतिक प्रकृति ।
परमेश्वर का विराट रूप जिसमें सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित हैं ।
प्रत्येक शरीर में आत्मा के साथ वास करने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का अंश स्वरूप अंतर्यामी परमात्मा ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
निम्न में से क्या अधियज्ञ कहलाता है ?
निरंतर परिवर्तनशील भौतिक प्रकृति ।
परमेश्वर का विराट रूप जिसमें सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित हैं ।
प्रत्येक शरीर में आत्मा के साथ वास करने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का अंश स्वरूप अंतर्यामी परमात्मा ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
श्लोक संख्या 8.4 में भगवान् श्रीकृष्ण एव शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ?
भगवान् श्रीकृष्ण एव शब्द के माध्यम से बल देकर कहते हैं कि परमात्मा उनसे भिन्न नहीं है ।
भगवान् श्रीकृष्ण एव शब्द के माध्यम से बल देकर कहते हैं कि भौतिक प्रकृति उनसे भिन्न है ।
भगवान् श्रीकृष्ण एव शब्द के माध्यम से बल देकर कहते हैं कि जीवात्मा उनसे भिन्न नहीं है ।
भगवान् श्रीकृष्ण एव शब्द के माध्यम से बल देकर कहते हैं कि जीवात्मा उनका अभिन्न अंश है ।
जीवात्मा की विभिन्न चेतनाओं का उद्गम कौन है ?
निर्विशेष ब्रह्म
अंतर्यामी परमात्मा
ब्रह्मज्योति
इनमें से कोई नहीं है ।
जीवात्मा को आंशिक स्वतंत्रता कौन प्रदान करता है ?
निर्विशेष ब्रह्म
अंतर्यामी परमात्मा
ब्रह्मज्योति
इनमें से कोई नहीं है ।
