Worksheets42. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_9.19–9.26
Total questions: 56
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श्लोक संख्या 9.19 से भगवान् के कौन से स्वरूप का बोध होता है ?
अव्यक्त मूर्तिना
निराकार ब्रह्म
विराट विश्व रूप
यह सभी विकल्प सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण श्लोक संख्या 9.19 के माध्यम से अपने विषय में क्या प्रदर्शित करते हैं ?
यह कि मैं सर्वव्यापक हूँ ।
यह कि मैं अंतर्यामी परमात्मा हूँ ।
यह कि मैं केवल निर्विशेष हूँ ।
यह कि मैं केवल निर्गुण हूँ ।
श्लोक संख्या 9.19 का विश्वरूप के उपासकों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
ऐसे वास्तविक ज्ञान से वे कृष्ण की ओर मुड़ते हैं ।
ऐसे ज्ञान से वे दिग्भ्रमित हो जाते हैं ।
ऐसे ज्ञान के द्वारा विश्वरुप में उनकी श्रद्धा और प्रगाढ़ हो जाती है ।
वे इस ज्ञान को वास्तविक ज्ञान नहीं मानते हैं ।
जो व्यक्ति कृष्ण में विश्वास नहीं रखते, क्या उन्हें भी कभी उनके जीवन में कृष्ण मिलते हैं ?
हाँ, उन्हें कृष्ण मृत्यु के रूप में मिलते हैं ।
नहीं, उन्हें कभी भी कृष्ण नहीं मिलते हैं ।
हाँ, कृष्ण तो उन्हें प्रत्येक वस्तु के रूप में मिल रहे होते हैं, परन्तु उन्हें इस सब का अनुभव नहीं होता है ।
नहीं, क्योंकि कृष्ण को ऐसे व्यक्तियों के जीवन से कोई सरोकार नहीं होता है ।
आत्मा (सत्) तथा पदार्थ (असत्) क्या हैं ?
दोनों कृष्ण ही हैं । - आत्मा भगवान् की परा शक्ति है तथा पदार्थ भगवान् की अपरा शक्ति है ।
आत्मा कृष्ण हैं तथा पदार्थ अंतर्यामी परमात्मा हैं ।
आत्मा विनाशी है तथा पदार्थ अविनाशी है ।
दोनों एक ही हैं केवल दृष्टिकोण का अंतर है ।
निम्न में से आत्मा की शाश्वतता (अमृतं) किससे है ?
निर्विशेष ब्रह्म से ।
अंतर्यामी परमात्मा से ।
भगवान् श्री कृष्ण से ।
यह सभी आत्मा की शाश्वतता के कारण हैं ।
त्रैविद्याः शब्द का क्या अर्थ है ?
सामवेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का ज्ञान ।
सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान ।
सामवेद, ऋग्वेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान ।
यजुर्वेद, ऋग्वेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान ।
निम्न में से त्रिवेदी कौन कहलाता है ?
सामवेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेद का ज्ञाता ।
सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्वेद का ज्ञाता ।
सामवेद, ऋग्वेद तथा अथर्वेद का ज्ञाता ।
यजुर्वेद, ऋग्वेद तथा अथर्वेद का ज्ञाता ।
श्लोक संख्या 9.20 की मुख्य विशेषता क्या है ?
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण स्वयँ को समस्त वेदों का परमलक्ष्य घोषित करते हैं ।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण त्रिवेदियों के लक्ष्य के विषय में बताते हैं ।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण स्वर्गिक आनंद प्राप्त करने की इच्छुक जीवों के लिए इसका रहस्योद्घाटन करते हैं ।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण वेदाध्ययन तथा सोमरस के पान का महत्व प्रस्तुत करते हैं ।
वास्तविक त्रिवेदी क्या करते हैं ?
भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए उनकी शुद्धभक्ति करते हैं ।
वेदों के परमलक्ष्य से भली-भान्ति परिचित होते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
"हरे कृष्ण महामंत्र" के जप तथा साथ में कृष्ण को वास्तव में समझने के प्रयास से क्या होता है ?
भक्तियोग का सूत्रपात होता है ।
कर्मयोग का सूत्रपात होता है ।
ध्यानयोग का सूत्रपात होता है ।
ज्ञानयोग का सूत्रपात होता है ।
वेदाध्ययन करने वाले अधिकांशतः व्यक्तियों का क्या लक्ष्य होता है ?
किसी देवता विशेष को प्रसन्नकर उसकी कृपा प्राप्त करना ।
विभिन्न देवताओं की उपासना के द्वारा प्रकृति के निम्न गुणों के कल्मष से शुद्ध होना ।
उच्चतर लोकों यथा महर्लोक, जनलोक, तपलोक आदि में मृत्युलोक से लाखों गुना अधिक इन्द्रियभोग प्राप्त करना ।
यह सभी कथन सकते हैं ।
देवताओं के उपासक स्वर्गलोक में जाकर कब तक स्वर्गिक आनंद का उपभोग कर सकते हैं ?
जब तक उनके पुण्य क्षीण नहीं हो जाते हैं ।
जब तक उनके इन्द्रियभोग की चरम सीमा नहीं हो जाती है ।
जब तक स्वर्गलोक के अतींद्रिय सुख समाप्त नहीं हो जाते हैं ।
जब तक उन्हें स्वर्ग लोक से धक्के मार कर निकाल नहीं दिया जाता है ।
स्वर्गिक आनन्द के लोभी व्यक्तियों की क्या गति होती है ?
ऐसे व्यक्ति वैकुण्ठ लोक न जाकर स्वर्ग तथा मृत्युलोक के मध्य जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमते रहते हैं ।
ऐसे व्यक्ति स्वर्गिक आनन्द भोगने के उपरान्त मुक्ति प्राप्त करके वैकुण्ठ लोक जाते हैं ।
ऐसे व्यक्ति स्वर्गिक आनन्द भोगने के उपरान्त सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन-सा मुख्य कारण है कि वेदों का ज्ञाता होने पर भी व्यक्ति मुक्ति का अधिकारी नहीं हो पाता है, अपितु जन्म-मृत्यु के ही चक्कर में ही फंसा रहता है ?
वेदों के परमलक्ष्य के ज्ञान के अभाव के कारण ।
इन्द्रियभोग की इच्छाओं के कारण ।
स्वर्गलोक प्राप्त करने की इच्छाओं के कारण ।
केवलमात्र वेदों को जानने के लक्ष्य के कारण ।
निम्न में से श्लोक संख्या 9.21 की विषय वस्तु क्या है ?
वेदों को जानने वाले व्यक्तियों की गति ।
देवताओं के उपासकों की गति ।
समस्त योगों में भक्ति का प्रभुत्व ।
स्वर्गलोक का परिचय ।
निम्न में से श्लोक संख्या 9.22 की विषय वस्तु क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया आश्वासन ।
देवताओं की तुलना में भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति ।
भगवान् श्रीकृष्ण के साम्राज्य का महिमामंडन ।
यह सभी कथन इस श्लोक की विषय वस्तु हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.22 में निम्न में से किसे आश्वासन देते हैं ?
अनन्य भक्त
योगी
ज्ञानी
कर्मी
निम्न में से श्लोक संख्या 9.22 में भगवान् श्रीकृष्ण अपने अनन्य भक्तों को क्या आश्वासन देते हैं ?
अपने अनन्य भक्तों की आवश्यकताओं को मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है उसकी रक्षा करता हूँ ।
वर्तमान भौतिक शरीर को त्यागने के उपरान्त वह दूसरा भौतिक शरीर धारण नहीं करते हैं ।
वर्तमान जीवन में मृत्योपरान्त वह मेरे परमधाम को प्राप्त होते हैं ।
ऐसे दुष्ट व्यक्ति तुरंत प्रभाव से निम्न योनियों अथवा निम्न लोकों को प्राप्त होते हैं ।
अनन्य भक्त किसे कहते हैं ?
वह व्यक्ति जो प्रतिक्षण भगवान् श्रीकृष्ण के चिंतन में ही रत रहता है, वह अनन्य भक्त कहलाता है ।
वह व्यक्ति जो प्रतिक्षण अपनी इन्द्रियों की तुष्टि में ही केंद्रित रहता है, वह अनन्य भक्त कहलाता है ।
वह व्यक्ति जो प्रतिक्षण देवताओं की उपासना में लीन रहता है, वह अनन्य भक्त कहलाता है ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
निम्न में से किसकी एकमात्र कामना भगवान् का सानिध्य प्राप्त करने की होती है ?
अनन्य भक्त
योगी
ज्ञानी
कर्मी
निम्न में से कौन से कार्य सदैव आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण रहते हैं ?
भगवान् की भक्तिमय सेवा में किए जाने वाले समस्त कार्य ।
वेदाध्ययन के लिए किए जाने वाले प्रयास ।
देवताओं की उपासना के लिए किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान ।
भौतिक इन्द्रियभोग के लिए किए जाने वाले समस्त कार्य ।
श्लोक संख्या 9.22 के अनुसार निम्न में से कौन सा कथन योग की सार्थकता को स्पष्ट करता है ?
भक्तिमय सेवा के कार्यों द्वारा भगवान् का सानिध्य प्राप्त करना ही योग कहलाता है ।
आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना ही योग कहलाता है ।
स्वर्गलोक को प्राप्त होना ही योग कहलाता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
क्षेम का क्या अर्थ है ?
भगवान् द्वारा कृपामय संरक्षण ।
भगवान् द्वारा क्षमापूर्वक संरक्षण ।
भक्तों का भगवान् के समक्ष क्षमा याचना करना ।
क्षमणीय अपराध का दंड ।
भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा श्लोक संख्या 9.22 के माध्यम से अपने अनन्य भक्तों को आश्वासन देने की क्या सार्थकता है ? स्पष्ट करें ।
ताकि वह पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर इस दुखमय बद्धजीवन से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो सकें ।
ताकि वह निश्चिंत होकर भक्तिमय सेवा के कार्य करके अपना उद्धार कर सकें ।
ताकि भक्ति मार्ग की उसकी यात्रा बिना किसी अवरोध अथवा विघ्न के सुगम हो सके ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
देवताओं के भक्तों द्वारा उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा किसका सूचक है ?
उनकी अल्पज्ञता का ।
उनकी अज्ञानता का ।
उनकी बुद्धिमत्ता का ।
उनकी स्वाधीनता का ।
देवताओं की पूजा वास्तव में किसकी तथा कैसी पूजा है ?
वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण की त्रुटिपूर्ण ढंग से की जाने वाली पूजा है ।
वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण की भौतिक विधि से की जाने वाली पूजा है ।
वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण की वैदिक अनुष्ठानों द्वारा ही जाने वाली पूजा है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
देवताओं की पूजा को भगवान् की त्रुटिपूर्ण पूजा क्यों कहा गया है ?
क्योंकि यह भगवान् की अप्रत्यक्ष पूजा है ।
क्योंकि इस प्रकार की पूजा से प्राप्त होने वाले फल वास्तव में भगवान् से ही प्राप्त होते हैं, परंतु देवताओं से प्राप्त हुए प्रतीत होते हैं ।
क्योंकि इस प्रकार की पूजा के कारण उपासक अपने परमलक्ष्य से सदैव अनभिज्ञ रहते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.23 में श्रील प्रभुपाद जी ने निम्न में से कौन सा उदाहरण नहीं दिया है ?
वृक्ष और उसकी पत्तियों तथा टहनियों का ।
शरीर के विभिन्न अंग तथा आमाशय का ।
सरकार तथा उसके अधिकारियों या निर्देशकों का ।
समुद्र तथा उसके ज्वार-भाटे का ।
श्लोक संख्या 9.23 में श्रील प्रभुपाद जी द्वारा दिए गए तीन उदाहरण क्या स्पष्ट करते हैं ?
यह कि देवताओं की पूजा भगवान् की अविधिपूर्वकम् पूजा है । जोकि उपासकों की अल्पज्ञता का सूचक है ।
यह कि हमें वृक्ष की जड़ में पानी देना चाहिए, उसकी पत्तियों तथा टहनियों पर नहीं ।
यह कि हमें अपने शरीर के विभिन्न अंगों की सेवा के लिए अपने आमाशय में सात्विक भोजन से पूर्ति करनी चाहिए ।
यह कि हमें सरकार के नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए न कि अधिकारियों को रिश्वत देनी चाहिए ।
श्लोक संख्या 9.23 से क्या स्पष्ट होता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण अन्य देवताओं की व्यर्थ पूजा का समर्थन नहीं करते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण कोरे ज्ञान के लिए वेदाध्ययन का समर्थन नहीं करते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण अनन्य भाव से अपनी प्रत्यक्ष सेवा का समर्थन करते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी कौन हैं ?
भगवान् श्रीकृष्ण
निर्विशेष ब्रह्म
अंतर्यामी परमात्मा
ब्रह्मा तथा इन्द्र
हम जीवों का भौतिक बंधन से मुक्त न होने का का प्रमुख कारण क्या है ?
भगवान् के दिव्य स्वभाव के ज्ञान का अभाव ।
इन्द्रियभोग की निरन्तर बढ़ती कामना ।
भौतिक जगत् के प्रति बढ़ती आसक्ति ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
मानवीय सभ्यता का समग्ररूप क्या है और किसकी प्रसन्नता के लिए है ?
वर्णाश्रम धर्म है जोकि विशेष रूप से विष्णु को प्रसन्न करने के लिए है ।
यज्ञ अनुष्ठान हैं जो कि विशेष रूप से विष्णु को प्रसन्न करने के लिए हैं ।
वेद तथा ऋचाएँ हैं जो कि विशेष रूप से विष्णु को प्रसन्न करने के लिए हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.25 निम्न में से किस सिद्धांत का खंडन करता है ?
चाहे किसी भी रूप-स्वरूप की पूजा करो अथवा किसी भी मार्ग का अनुशीलन करो - सबका लक्ष्य एक ही है ।
यह श्लोक वर्णाश्रम धर्म के सिद्धांतों का खंडन करता है ।
यह श्लोक वेदों के कर्मकांड अनुभाग के सिद्धांतों का खंडन करता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन भगवान् श्रीकृष्ण के साथ उनके लोक में निवास करता है ?
देवताओं का उपासक
पितरों का पुजारी
भूत-प्रेतों का उपासक
कृष्ण का शुद्धभक्त
वेदों के कर्मकाण्ड अंश दर्शपौर्णमासी में किसका विशद वर्णन हुआ है ?
विभिन्न लोकों में स्थित देवताओं के लिए विशिष्ट पूजा के विधान का वर्णन हुआ है ।
दर्शपौर्णमासी में भक्ति की विशेष विधियों का वर्णन हुआ है ।
दर्शपौर्णमासी में भगवान् की विशेष स्तुतियों की संहिताओं का विशेष वर्णन हुआ है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
क्या देवताओं, पितरों तथा भूत-प्रेतों की पूजा आध्यात्मिक कार्य है ?
नहीं, यह नितान्त भौतिकतावादी कार्यकलाप हैं ।
हाँ, इस प्रकार की पूजा भी आध्यात्मिक श्रेणी में ही आती है ।
नहीं, ऐसी पूजा की विधियाँ पूर्णतः आध्यात्मिक नहीं होती हैं ।
हाँ, क्योंकि ऐसी पूजा का अंतिम लक्ष्य भी भगवान् ही होते हैं ।
कृष्णभावनामृत आंदोलन कौन सी दिव्य सूचना समूचे मानव समाज में वितरित करता है ?
यह कि केवल "हरे कृष्ण महामंत्र" के जप से ही मनुष्य सिद्ध हो सकता है और भगवद्धाम को वापस जा सकता है ।
यह कि देवताओं, पितरों तथा भूत-प्रेतों की पूजा भी भगवान् श्रीकृष्ण की ही उपासना है ।
यह कि भौतिक लाभ के लिए देवी-देवताओं की पूजा करें और आध्यात्मिक लाभ के लिए कृष्ण की पूजा करें ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सिद्धि क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बनना ।
भगवान् श्रीकृष्ण के समतुल्य बनना ।
भगवान् श्रीकृष्ण के साम्राज्य में सेंध लगाना ।
भगवान् श्रीकृष्ण का प्रतिस्पर्धी बनना ।
भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के लिए एकमात्र योग्यता क्या है ?
भगवान् का शुद्धभक्त होना ।
व्यक्तिगत बुद्धिमत्ता ।
व्यक्तिगत सार्थकता ।
व्यक्तिगत समर्पण ।
भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति के लिए मनुष्य का सामाजिक स्तर क्या होना चाहिए ?
भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेमाभक्ति इतनी सरल है कि समाज के किसी भी धर्म, वर्ग, जाति, लिंग या स्तर का व्यक्ति इसे सरलता से प्राप्त कर सकता है ।
केवल समाज के अमीर वर्ग के लोग ही भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि भगवान् को उनका ऐश्वर्य आकर्षित करता है ।
केवल समाज के निर्धन वर्ग के लोग ही भगवान श्री कृष्ण के दिव्य प्रेमाभक्ति को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि भगवान् को उनकी निर्धनता, सरलता एवं विनम्रता आकर्षित करती है ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
श्लोक संख्या 9.26 क्या स्थापित करता है ?
भक्ति की सरलता एवं व्यापकता ।
भक्ति की जटिलता एवं संकीर्णता ।
भक्ति की सहजता एवं दिव्यता ।
भक्ति की सहजता एवं जटिलता ।
क्योंकि भगवान् आत्मतुष्ट हैं वे अभक्त से कोई भेंट नहीं चाहते, किंतु अपने शुद्धभक्त से वे एक छोटा सा फूल भी ग्रहण कर लेते हैं । ऐसा क्यों ?
क्योंकि शुद्धभक्त उन्हें कोई भी वस्तु प्रेम तथा भक्ति के साथ भेंट करता है ।
क्योंकि शुद्धभक्त उन्हें कोई भी वस्तु निष्काम भाव से भेंट करता है ।
क्योंकि शुद्धभक्त उन्हें कोई भी वस्तु उनकी प्रसन्नता के लिए भेंट करता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.26 में भक्ति शब्द का उल्लेख दो बार क्यों हुआ है ?
यह स्थापित करने के लिए कि भक्ति ही कृष्ण के पास पहुँचने का एकमात्र साधन है ।
यह स्थापित करने के लिए कि भक्ति योग की जटिलतम विधि है ।
यह स्थापित करने के लिए कि भक्ति योग की सरलतम विधि है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् को भेंट अर्पित करने के लिए मूलसिद्धांत क्या है ?
भक्ति
योग्यता
सामाजिक स्तर
उच्च वर्ण
निम्न में से भक्ति की विशेषता क्या है ?
भक्ति कभी भी हैतुकी नहीं होती है ।
भक्ति शाश्वत विधि है ।
भक्ति परब्रह्म की सेवा में प्रत्यक्ष कर्म है ।
यह सभी भक्ति की विशेषताएँ हैं ।
श्लोक संख्या 9.26 के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्पितोपरान्त हम मनुष्यों के लिए किन खाद्य पदार्थों की संस्तुति की है ?
केवल शाक्, अन्न, फल, दूध, तथा जल ।
केवल मांस, मछली तथा अण्डे ।
मनुष्य तो सर्वभक्षी है - शाकाहार या मांसाहार में से कुछ भी खा सकता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
यदि हम माँस, मछली, अंडे इत्यादि खाते हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित नहीं किया जा सकता तो इसका क्या परिणाम होगा ?
हम प्रेमाभक्ति नहीं कर सकेंगे ।
हमारी चेतना दूषित हो जाएगी ।
ऐसे में कृष्ण हमें भी स्वीकार नहीं करेंगे ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित यज्ञ का उच्छिष्ट खाने से क्या होता है ?
उसका शरीर शुद्ध होता है ।
मस्तिष्क के श्रेष्ठ तंतु उत्पन्न होते हैं ।
शुद्ध चिंतन हो पाता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् श्री कृष्ण के लिए भोजन बनाने, सेवा करने तथा भेंट करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है ?
प्रेमवश कर्म करना ।
शुचिता का ध्यान रखना ।
अति संवेदनशील होकर कार्य करना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
मायावादी चिंतक भगवद्गीता के श्लोक संख्या 9.26 का अर्थ क्यों नहीं समझ सकेंगे ?
क्योंकि वे परब्रह्म को इंद्रियरहित मानते हैं ।
क्योंकि वे परब्रह्म को भौतिक इंद्रियों वाला मानते हैं ।
क्योंकि वे परब्रह्म को सुषुप्त इंद्रियों वाला मानते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
