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WorksheetsSusrut uttar tantra till timir rog
Total questions: 30
Worksheet time: 15mins
शालाक्य तंत्र से संबंधित नहीं है?
भोज तंत्र
कृष्ण आत्रेय तंत्र
कराल तंत्र
निमी तंत्र
आचार्य वागभट्ट अनुसार क्षार बुदबुदकोपम लक्षण पाया जाता है।
अलजी
पर्वणी
उपनाह
पोथकी
श्यावा स्यु पिशित निभा बिंदु लक्षण है
शुक्तिका
अर्जुन
लगण
पिष्टक
कांस्य आभा सिते अंबु बिंदु तुल्य लक्षण है।
लगण
पिष्ट्क
बलास ग्रथित
सिरा पीडिका
निमेष रोग में कौन सा cranial nerve की विकृति होती है।
3rd
5th
7th
9th
नेत्र पके हुए गूलर की आकृति का मिलता है।
रक्त अधिमंथ
रक्तज अभिष्यंद
सशोफ अक्षिपाक
हताधी मंथ
नेत्र से ताम्र वर्ण का गाढ़ा स्त्राव निकलना और नेत्र का किसी भी वस्तु को देखने में असमर्थ हो जाना लक्षण है?
तीसरे पटल गत तिमिर
हताधि मंथ
सिरा पीडिका
सिरा हर्ष
नेत्र के कृष्ण भाग में मेघ से घिरे आकाश के तुल्य सफेदी का आना किस रोग में बताया गया है।
अक्षिका पात्यय
अब्रण शुक्र
अजकाजात
कफज अभिष्यंद
आचार्य वागभट्ट अनुसार दृष्टि गत रोगों की संख्या है।
23
12
27
11
अजकाजात दोषा अनुसार है।
सन्निपातज
रक्तज
पित्तज
कफज
नेत्र वर्त्म का ताम्र वर्ण का होना जो अकस्मात रंजन होकर रक्त वर्ण का हो जाए व्याधि है।
वर्त्म कर्दम
क्लिष्ट वर्त्म
परिक्लिन्न वर्त्म
अक्लिन्न वर्त्म
नेत्र में आचार्य सुश्रुत अनुसार कुल शिरा हैं।
22
28
38
18
चक्षु रक्षाय सर्व काल यत्नतः संदर्भ है।
सुश्रुत
चरक
वागभट्ट
शारंग धर
आचार्य वागभट्ट अनुसार अक्षिका पात्यय किस स्थान का रोग है।
दृष्टि
सर्व गत
कृष्ण गत
शुक्ल गत
वर्त्म प्रदेश पर दीर्घ अंकुर से युक्त , खर स्तब्ध पीडिका है?
अर्श वर्त्म
शुष्क अर्श
रक्त अर्श
कुंभिक पीडीका
वर्त्म प्रदेश पर मूंग के जैसे और ताम्र वर्ण की पीडिका को कहा गया है।
पर्वणी
अंजन नामिका
उत्संगिनी
वर्त्म शर्करा
उप पक्ष्म रोग का वर्णन किया है।
वागभट्ट
शारंग धर
डलहण
माधव निदान
वर्त्म यस्य न मिल्यते लक्षण है।
वात हत वर्त्म
वर्त्म बंध
निमेष
वात पर्याय
ताम्र अश्रुता , धुमायनम वाष्प लक्षण है।
पित्तज अभिष्यन्द
रक्तज अभिष्यन्द
सिरा पीडिका
सिरा हर्ष
दूर की वस्तु समीप दिखाई दे, मृग मरीचिका प्रतीत तथा प्रयास करने पर भी सूची में पाश न घुसा सके तो यह व्याधि है।
द्वितीय पटल तिमिर
तृतीय पटल तिमिर
लिंगनाश
कफज अभिस्यंद
ज्योतिष्मान वस्तु तथा अंगो को हीन अधिक रूपों में देखना लक्षण है।
तृतीय पटल तिमिर
संसर्गज तिमिर
सन्निपात तिमिर
लिंग नाश
चिकित्सा की दृष्टि से पक्ष्मकोप है।
साध्य
कृच्छ साध्य
याप्य
असाध्य
आचार्य सुश्रुत अनुसार कफज नेत्र रोग की संख्या है।
10
13
16
25
Limbus में होने वाला रोग है।
पर्वणी
अलजी
A and b both
अजकाजात
पटल के संबंध में सही कथन है।
6 होते हैं प्रमाण दृष्टि के पंचमांश
4होते हैं प्रमाण दृष्टि के पंचमाश
6होते हैं जिसमे आभ्यंतर 4 दृष्टि के पंचमांश
बाह्य पटल में तिमिर होता है।
सुश्रुत प्रभित आचार्य नहीं है।
भोज
औपधेनव
कंकायन
गालव
आचार्य सुश्रुत (आद्य) का काल है।
मनु स्मृति कालीन
मौर्य शुंग काल
सात वाहन साम्राज्य काल
गुप्त काल
सुश्रुत संहिता पर वृहत पंजिका टीका लिखी गई जिसके संबंध में असत्य कथन है।
गयदाश द्वारा लिखित है
सुश्रुत चंद्रिका भी कहते है।
बृहत पंजिका भी कहते हैं।
निदान स्थान पर लिखी है।
कोई नहीं।
सुश्रुत संहिता पर श्लोक वार्तिक या प्रश्न सहस्र विधान टीका लिखी है।
जेज्जट
माधव
चक्रपाणि
हाराण चंद्र
रूपम पश्यति दुखे न पांशुपूर्ण आविल नासा अधमन शिरो दुख युतम।लक्षण है।
कुंचन रोग
कफज अभिष्यनंद
कफज अधिमंथ
शिरा हर्ष
