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Worksheetsचरक सिद्धि 7-12
Total questions: 25
Worksheet time: 13mins
एक मरीज आपके पास आता है जो बूंद बूंद रूप में मूत्र का त्याग करता है, वस्ति गर्भ की तरह प्रतीत हो रहा है।तो यह रोग होगा।
वस्ति कुंडल
वात कुंडल
वात वस्ति
अशम
कवल का भेद नहीं है।
स्नेहन
शमन
शोधन
रोपण
वात प्रधान दोष में नस्यार्थ सुश्रुत अनुसार किस स्नेह का प्रयोग करना श्रेष्ठ है।
तैल
वसा
मज्ज़ा
घृत
शिरोविरेचन के लिए स्नेह प्रयुक्त करना है तो श्रेष्ठ मात्रा होगी प्रति नासा
8 बूंद
32 बूंद
64 बूंद
6 बूंद
दीपन वस्ति एवम क्षार वस्ति का वर्णन सर्वप्रथम प्राप्त होता है।
चरक
सुश्रुत
चक्रपाणि
शारंग धर
सेवन हेतु कटु तैल की श्रेष्ठ मात्रा है।
8 से 10 पल
12पल
8पल
10पल
अंग बल अभिवर्धयेत शिशुवृद्धयो परम है।
बाल चतुर भद्र चूर्ण
अरविंद आसव
कुमार कल्याणक रस
निरूह वस्ति
अनुवासन वस्ति
आचार्य सुश्रुत अनुसार पुरुष में उत्तर वस्ति नेत्र का प्रमाण है।
10अंगुल
12अंगुल
14अंगुल
13अंगुल
आचार्य वागभट्ट ने प्रतिमर्श के कुल कितने काल बताए हैं।
12
14
15
13
आचार्य चरक ने अष्ट महादोष कर भाव का वर्णन किया है।
कल्पना सिद्धि अध्याय
फल मात्रा सिद्धि अध्याय
त्रिमर्म सिद्धि अध्याय
उत्तर वस्ति सिद्धि अध्याय
आचार्य चरक अनुसार तंत्र युक्ति की संख्या है।
44
40
36
32
संभव किसके अंतर्गत है।
तंत्र युक्ति
अर्थ आश्रय
वाद मार्ग
उपरोक्त सभी
आचार्य चरक अनुसार संसर्जन क्रम में रसों के प्रयोग में सर्वप्रथम प्रयोग है।
मधुर तिक्त रस
स्निग्ध् अम्ल मधुर रस
अम्ल लवण रस
कटु कषाय रस एवम स्निग्ध रुक्ष बदल बदल कर।
सुश्रुत अनुसार मुत्राघात के भेद हैं।
12
13
20
8
मर्म परिपालनार्थ श्रेष्ठ चिकित्सा है।
शस्त्र कर्म
संशोधन कर्म
शमन कर्म
वस्ति कर्म
आचार्य चरक अनुसार किस मर्म के आघात में चित्त नाश एवम उन्माद ,अपस्मार, प्रलाप आदि लक्षण प्राप्त होता है।
हृदय
शिर
वस्ति
उपरोक्त सभी
आचार्य चरक ने किस अतिसार की चिकित्सा में संग्राही तथा वातनश क द्रव्य का प्रयोग बताया है।
वातज अतिसार
आम अतिसार
पक्व अतिसार
मल अतिसार
आचार्य चरक अनुसार परीकर्तिका रोग के लक्षण में नहीं है।
त्रिक वेदना
विबंध एवम मल अल्प अल्प निकलना
वस्तितोद
नाभि अधोरूजा
अति मल प्रवित्ति
वस्ति के अयोग की चिकित्सा में नहीं है।
प्रमथ्या प्रयोग
वातनाशक तैल प्रयोग
स्वेदन एवम फल वर्ती
विरेचन योग
निरुह व्यापद नहीं है।
प्रतिश्याय
हिक्का
परि स्त्राव
प्रवाहिका
पित्त रोग से पीड़ित व्यक्ति को यदि ऊष्ण ,तीक्ष्ण एवम लवण युक्त निरूह प्रयोग करें तो उपद्रव हो सकता है।
परिकर्तिका
जीवादान
परिस्त्राव
विभ्रंस
आचार्य चरक ने मर्म हेतु नहीं कहा है।
107 है।
चेतना निबंध स्थान है।
शाखा के मर्म स्कंध से अधिक महत्वपूर्ण है।
स्कंध के मर्म शाखा से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
आचार्य चरक अनुसार स्रोत किस मर्म के संश्रित है।
हृदय
शिर
नाभि
वस्ति
आचार्य सुश्रुत अनुसार अपतंत्रक चिकित्सा में निषेध नही है।
वमन
विरेचन
वस्ति
लंघन
प्रतत म कंठ कुजनाम लक्षण प्राप्त होता है।
सन्निपात ज्वर
अपतंत्रक
अपतानक
क्षतज कास
