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WorksheetsCharak chikitsha jwar to gulma
Total questions: 35
Worksheet time: 18mins
विरेक वमन क्षोभे , कूजनम यह लक्षण किस धातु गत ज्वर का लक्षण है।
मांस
मेद
अस्थि
मज्ज़ा
कृच्छ मुत्रता यह लक्षण किस ज्वर से संबंधित है।
शुक्र धातु गत
अंतर वेग ज्वर
आम ज्वर
पुनर्वार्तक ज्वर
पित्त दोष से दूषित रक्त पित्त के वर्ण में वर्णित नहीं है।
गोमूत्र वर्ण
कषाय वर्ण
नील वर्ण
मेचक आभा
सहते न अति सौहित्यम लक्षण संबंधित है।
गुल्म
अर्श
उदर रोग
ग्रहणी
लशुन घृत का रोगाधिकार है।
पित्तज गुल्म
कफज गुल्म
उन्माद
अपस्मार
ऊर्ध्वग रक्तपित्त के चिकित्सा में वर्णित नहीं है।
तर्पण
मांस रस
युष शाक
विरेचन
रक्त व्यमलता को प्राप्त रहता है अतः रक्त को मूल से छिन्न करना वेदना शांति हेतु आवश्यक है किस गुल्म की चिकित्सा में कहा गया है।
वात
पित्त
कफ
रक्त
निचय
तृतीयक ज्वर के लिए निर्देशित क्वाथ है।
पटोलादी क्वाथ
निंबादी क्वाथ
किरातिक्त आदि क्वाथ
गुडुची आदि क्वाथ
कुलिंग आदि क्वाथ
मूत्र मार्ग प्रवित्त रक्त पित्त की चिकित्सा में प्रयुक्त द्रव्य नहीं है।
गोक्षुर
शतावरी
कुश
शालपर्नी
क्षीर षटपल घृत का रोगाधिकार है।
वात गुल्म
पित्त गुल्म
कफ गुल्म
रक्त गुल्म
आचार्य सुश्रुत अनुसार ज्वर में घृत कितने दिन में प्रयोग करना है।
10 वे दिन
12 वे दिन
11वे दिन
8वे दिन
प्रहलाद क तैल का रोगाधिकार है।
कफज़ ज्वर
अधोग रक्त पित्त
कफ गुल्म
दाह ज्वर
सन्निपात की अवस्था में ज्वर में चिकित्सा निर्देश है।
त्रिदोष चिकित्सा एक साथ
प्रथम वात चिकित्सा
प्रथम कफ चिकित्सा
प्रथम कफ स्थान चिकित्सा
प्रथम पित्त चिकित्सा
खर्जूर आदि मंथ का रोगाधिकार है।
ऊर्ध्व मार्ग रक्तपित्त
अधोग रक्तपित्त
मदात्यय
सभी
दंती हरितकी हेतु असत्य कथन हैं।
कफ गुल्म में निर्देश है
2हरितकी प्रीतिदिन सेवन निर्देश है।
25 हरितकी का योग है
यह लेह कल्पना है
ऐशाण ज्वर वर्णन किया है।
सुश्रुत
चरक
भाव प्रकाश
कश्यप
आचार्य सुश्रुत अनुसार किस ज्वर के लक्षण में अंग प्रत्यंग शिथिल होना बताया गया है।
हतोजस
सन्यास
अभिन्यास
प्रलेपक
मंथर ज्वर का वर्णन किया है।
योग रत्नाकर
भाव प्रकाश
हारित
क्षार पाणी
स्व मार्ग हरण चिकित्सा निर्देश है।
उदावर्त
अतिसार
अम्ल पित्त
रक्त पित्त
आचार्य चरक अनुसार सन्निपात अतिसार में सर्व प्रथम किस दोष की चिकित्सा निर्देश है।
वात
पित्त
कफ
रक्त
अनुषंगी रोग में अग्र है।
ज्वर
गुल्म
राज यक्ष्मा
प्रमेह
कुष्ठ
तैल पंचक का रोगाधिकार है।
शीत ज्वर
दाह ज्वर
वात गुल्म
पित्त गुल्म
कफ गुल्म
गुल्म हेतु सत्य कथन है।
आदि मध्य एवम अंत में मारूत की रक्षा करना है।
अग्नि की रक्षा करना है।
अति सौहित्य भोजन नहीं करना है।
अति लंघन नहीं करना है
विकल्प के समस्त कथन सत्य हैं
कौन कौन से रोग परस्पर हेतु कहे गए हैं
अर्श उदर ग्रहणी
अर्श उदर अतिसार
अर्श अतिसार ग्रहणी
अर्श अतिसार गुल्म
अर्श गुल्म ग्रहणी
रक्त पित्त में कौन सा पित्त दूषित होता है।
सभी पित्त
हृदय स्थित पित्त
त्वचा पित्त
यकृत प्लीहा पित्त
आमाशय पित्त
आचार्य भाव प्रकाश अनुसार ज्वर में विरेचन प्रयोग का समय है।
आदि में
मध्य में
अंत में
ज्वर मुक्त होने पर
यदि ज्वर त्वचा मात्र अवशेष हो तो चिकित्सा निर्देश है।
सेक प्रलेप प्रदेह
धूमपान अंजन
रक्त मोक्षण
ऊष्ण जल सेवन
केशसीमंत ज्वर है।
अस्थि धातु गत ज्वर
शुक्र धातु गत ज्वर
असाध्य ज्वर
जनपदो ध्वंस ज्वर
अधोगत रक्तपित्त चिकित्सा की दृष्टि से है।
साध्य
कृच्छसाध्य
याप्य
असाध्य
आश्वाशन चिकित्सा किस गुल्म में निर्देशित है।
वात
पित्त
कफ
रक्त
निचय
आधमात वस्ति ईव वातता लक्षण है।
A पच्यमान ब्रण शोफ
B आंत्र वृद्धि
C.A and B दोनो
D पक्व गुल्म
हारित ने शूल के संबंध में नहीं कहा है।
शूल के भेद 10 हैं
परिणाम शूल को कफज शूल कहा है।
कुबेराक्ष को शूल नाशक कहा है
सभी कथन सत्य है।
सर्व अवस्थासु न शर्म लाभम यह कथन है।
अग्नि विसर्प हेतु
कांड भग्न हेतु
पच्यमान ब्रण शोफ हेतु
अस्थि विद्ध हेतु
ग्रथित रक्तपित्त की चिकित्सा में है।
A पारावत शकृत क्षौद्र से
Bकमल नाल क्षार मधु से
C विलियन क्रिया
Dअग्नि कर्म
A and b
सन्निपात अतिसार में सुश्रुत अनुसार सर्व प्रथम चिकित्सा करनी है।
त्रिदोष की
वात की
पित्त की
कफ की
