WorksheetsArogya Ayurved Jodhpur
Total questions: 40
Worksheet time: 20mins
आचार्य चरक अनुसार किस ऋतु में श्रेष्ठ बल रहता है।
शिशिर
बसन्त
ग्रीष्म
उपरोक्त सभी मे
प्रदोष काल है।
दिन का अंतिम काल
रात्रि का अंतिम काल
रात्रि का प्रारंभिक काल
रात्रि मध्य काल
किस आचार्य ने ऋतुसन्धि का वर्णन किया है।
चरक
सुश्रुत
वाग्भट्ट
भावप्रकाश
आचार्य चरक ने वर्जयेदन्नपानानि वातलानि लघुनि च।
प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं.....किस ऋतु के संदर्भ में बताया है।
शिशिर
बसन्त
हेमंत
शरद
आचार्य चरक ने हंसोदक का प्रयोग बताया है।
स्नान
पान
अवगाहन
उपरोक्त सभी मे
पानभोजनसंस्कारान प्रायः क्षोद्रान्वितान भजेत....किस ऋतु में खाने पीने की सभी चीजें बनाते समय उसमे मधु अवश्य मिलाकर देना चाहिए।
शिशिर
बसन्त
वर्षा
हेमन्त
आचार्य चरक ने मूर्ध्नि तेल किस ऋतु में बताया है।
शिशिर
बसन्त
शरद
हेमन्त
कायाग्नि बाधते रोगांस्तत: प्रकुरुते बहुन।
आचार्य चरक अनुसार जठराग्नि मन्द होकर अनेक रोगों को उत्पन्न करती है।
हेमन्त
बसन्त
ग्रीष्म
उपरोक्त किसी मे नही
सुखाम्बुना शौचविधि शीलयेत.......किस ऋतु के लिए आया है।
ग्रीष्म
बसन्त
वर्षा
हेमन्त
किस ऋतु में सभी दोषो का प्रकोप होता है।
शिशिर
वर्षा
हेमन्त
शरद
तिक्तस्य सर्पिष: पानं विरेको रक्तमोक्षणम......किस ऋतु के लिए आया है।
बसन्त
ग्रीष्म
हेमन्त
शरद
आचार्य चरक ने अधारणीय कोनसा अधारणीय वेग नही बताया है।
कास
वाष्प
वात
परिश्रम जन्य श्वास
किस वेगावरोध की चिकित्सा में त्रिविध बस्तिकर्म एवं अवपिडक घृतपान दिया जाता है।
वाष्प
उद्गार
शुक्र
मूत्र
अंगमर्द किस वेगावरोध जन्य उपद्रव है।
क्षुधा
निद्रा
शुक्र
उपरोक्त सभी
भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धुमो लंघनं रक्तमोक्षणम......किस वेगावरोध की चिकित्सा है।
क्षवथु
क्षुत
छर्दी
वाष्प
घृतं चौत्तरभक्तिकम/ भोजन के बाद घृतपान किस वेगावरोध चिकित्सा में करवाया जाता है।
पिपासा
निद्रा
वाष्प
क्षवथु
निम्नलिखित वेगावरोध जन्य चिकित्सा में सही नही है।
जृम्भा- वातघ्न औषध
उद्गार - हिक्का तुल्य औषध
वाष्प - स्वप्नों मद्यं प्रिया: कथा:
शुक्र-वातानुलोमन
बाधिर्य किस वेगावरोध जन्य रोग है।
क्षुत
पिपासा
वाष्प
श्रम जन्य श्वास
विदग्धमविदग्धम वा निर्दोषम परिपच्यते...... किसके लिए कहा गया है।
निद्रा
व्यायाम
आरोग्य
उपरोक्त कोई भी नही
सम्यक व्यायाम लक्षण है।
स्वेदागम
श्वास वृद्धि
ह्रदय उपरोध
All of above
आचार्य चरक अनुसार दोस्ती के योग्य व्यक्ति है।
कलहप्रिय
रिपुसेविन
सूचक
प्रशान्ता
दधि खाने के नियम के विपरीत नियम से दधि खाने पर होने वाला रोग नही है।
ज्वर
रक्तपित
कुष्ठ
अम्लपित्त
मन का विषय नही है।
चिन्त्य
विचार्य
संकल्प
एकत्व
आरोग्य एवं इन्द्रिय विजय अर्थात अर्थद्वय प्राप्ति होती है।
स्वस्थवृत
सदव्रत
व्यायाम
None of these
वैद्य गुण है।
पर्यवदात्वम
बहुशो दृष्टकर्मता
दाक्ष्यं
All of above
"अनुराग" गुण हैं ।
रोगी
उपस्थाता
औषध
वैद्य
हेतौ लिंगे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे.....निम्न लक्षण किस वैद्य के है।
प्राणाभिसर
राजा के भीषक
छद्मचर वैद्य
उपरोक्त किसी के नही
पात्र के अनुसार गुण एवं दोष वृद्धि होती है।
शास्त्र
शस्त्र
सलिल
All of abobe
उत्तम वैद्य के गुण हैं।
2
4
6
8
वैद्य वृति है।
2
4
8
6
अगर रोग के दोष एवं दुष्य एक समान गुण वाले नही हो तो रोग होगा।
साध्य
कृच्छसाध्य
याप्य
असाध्य
द्विपथम नातिकालम वा ......द्विदोषजम ?
साध्य
याप्य
कृच्छ साध्य
असाध्य
गम्भीरं बहुधातुस्थम मर्मसन्धिसमाश्रिते....?
याप्य
साध्य
असाध्य
None
एक व्यक्ति में बार बार उत्सुकता, बेचैनी, मोह, इन्द्रिय शक्ति नाश हो जाता हो, तो रोग होगा।
साध्य
याप्य
असाध्य
All of above
ज्ञापकत्व गुण है।
रोगी
वैद्य
उपचारक
औषध
अध्यात्म द्रव्य गुण संग्रह है।
मन
मन का अर्थ
बुद्धि, आत्मा
सभी
अणुत्व एवं एकत्व है।
मन के गुण
मन के विषय
मन के लक्षण
उपरोक्त सभी
प्रमाथि अन्नपान का सेवन किस वेगावरोध में बताया गया है।
मूत्र
शुक्र
पुरीष
All of above
चरक अनुसार सत्य है।
वमन -चैत्र
विरेचन- अगहन
बस्ति- श्रावण
All of above
किस वेगावरोध से अक्षि रोग उत्पन्न होते हैं।
मूत्र
शुक्र
वाष्प
क्षवथु
