
पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)|Kids Academy.
by kids academy
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
भारतीय समाज रिश्तों की बुनियाद पर खड़ा है| माँ-पिता, भाई-बहन, दोस्त, दादी- नानी, बाबा-नाना, मामा, मौसी-मौसा, बुआ-फूफा, दादा, चाचा, दोस्ती-अनगिनत संबंध हैं जो लोगों के अनुभव-संसार में जीवंत हैं और इन्हीं से लोगों का अनुभव-संसार बना है| इसीलिए हमारे देश की विभिन्न भाषाओं मे लिखी गई कहानियों, उपन्यासों आदि में ये रिश्ते बार-बार प्रकट होते हैं| प्रस्तुत कहानी वृद्ध लोग या बुढ़ापे पर केंद्रित है|
परंतु बूढ़ा किसे कहा जाएगा? क्या वे लाचार जिंदगियाँ जो बैसाखियों पर चल रही हैं, क्या वे बेसहारा लोग, जिन्हें अपने बेटे-बेटियों के घर गुज़ारा करने की मजबूरी है
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
कोई भी बूढ़ी व्यक्ति तन से लाचार हो सकती है, उसकी सामाजिक भूमिका सीमित होती जा सकती है, लेकिन मन के स्तर पर शायद उसके भीतर कई रंग होते हैं| बूढ़े लोगों में माँ भी होती है, पिता भी और भी बहुत सारे ऐसे लोग भी जो रिश्तों की अलग-अलग डोर से हमसे बँधे होते हैं|
अक्सर देखा गया है कि हम इनकी पहले से कम परवाह करते हैं, हम पर उनका पहले से कम वश चलता है, जबकि दूसरी तरफ़ उनके अनुभवों की, उनक स्मृतियों की पोटली बड़ी होती जाती है और इसी के साथ दुख भी |
प्रेमचंद जी की इस कहानी में जहाँ उम्र, आस्वाद और अमानवीयता जैसे एक-दूसरे से हमेशा झगड़ते रहते हैं|
विस्मृति का धुँधलका दूर कर पाठक को मनुष्यता की नई सुबह के लिए जागृत करना - यह कहानी साहित्य की इसी विशेषता को उजागर करती है|
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा–स्वाद के सिवा और कोईचेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का रोने के अतिरिक्त दूसरा कोई सहारा ही। समस्त इन्द्रियाँ, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहतीं और जब घरवाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते या भोजन का समय टल जाता, उसका परिमाण पूर्ण न होता अथवा बाज़ार से कोई वस्तु आती और उन्हें न मिलती तो रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण न था, वह गला फाड़-फाड़ कर रोती थीं।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
उनके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे बहुत वक्त हो चुका था। बेटे तरुण हो-होकर चल बसे थे। अब एक भतीजे के सिवाय और कोई न था। उसी भतीजे के नाम उन्होंने अपनी सारी संपत्ति लिख दी थी। बुद्धिराम ने संपत्ति लिखाते समय तो खूब लम्बे-चौड़े वादे किए, परंतु वे सब वादे केवल कुली डिपो के दलालों के दिखाए हुए सब्ज़बाग़ थे। यद्यपि उस सम्पत्ति की वार्षिक आय डेढ़-दो सौ रुपये से कम न थी तथापि बूढ़ी काकी को पेट भर भोजन भी कठिनाई से मिलता था।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
लड़कों को बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है और फिर जब माता–पिता का यह रंग देखते तो बूढ़ी काकी को और भी सताया करते। कोई चुटकी काटकर भागता कोई उन पर पानी की कुल्ली कर देता। काकी चीख मार कर रोतीं; परन्तु यह बात प्रसिद्ध थी कि वह केवल खाने के लिए रोती हैं; अतएव उनके संताप और आर्तनाद पर कोई ध्यान नहीं देता था।
सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था, तो वह बुद्धिराम की छोटी लड़की लाड़ली थी। लाड़ली अपने दोनों भाइयों के भय से से अपने हिस्से की मिठाई-चबेना बूढ़ी काकी के पास बैठकरखाया करती थी। यही उसका रक्षागार था और यद्यपि काकी की शरण उनकी लोलुपता के कारण बहुतमहँगी पड़ती थी, तथापिभाइयों के अन्याय से कहीं सुलभ थी। इसी स्वार्थानुकूलता ने उन दोनों में प्रेम और सहानुभूति का आरोपण कर दिया था।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
रात का समय था। बुद्धिराम के द्वार पर शहनाई बज रही थी और गाँव के बच्चों का झुण्ड विस्मयपूर्ण नेत्रों से गाने का रसास्वादन कर रहा था।
आज बुद्धिराम के बड़े लड़के सुखराम का तिलक आया है। यह उसी का उत्सव है। घर के भीतर स्त्रियाँ गा रही थीं और रूपा मेहमानों के लिए भोजन के प्रबंध में व्यस्त थी। भट्टियों पर कढ़ाह चढ़े थे। एक में पूरियाँ–कचौरियाँ निकल रही थीं। दूसरे में अन्य पकवान बन रहे थे। एक बड़े हंडे में मसालेदारतरकारी पक रही थी। घी और मसाले की क्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में शोकमय विचार की भाँति बैठी हुई थीं। वह स्वाद–मिश्रित सुगन्धि उन्हें बेचैन कर रही थी। वे मन ही मन विचार कर रही थीं, संभवत: मुझे पूड़ियाँ न मिलेंगी। इतनी देर हो गई, कोई भोजन लेकर नहीं आया, मालूम होता है, सब लोग भोजन कर चुके। मेरे लिए कुछ न बचा। यह सोच कर उन्हें रोना आया, परन्तु अपशकुन के भय से वे रो न सकीं।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
बूढ़ी काकी की कल्पना में पूड़ियों की तस्वीर नाचने लगी। खूब लाल-लाल, फूली–फूली, नरम–नरम होंगी। रूपा ने भलीभाँति मोयन दिया होगा। कचौरियों में अजवाइन और इलायची की महक आ रही होगी। एक पूरी मिलती तो ज़रा हाथ में लेकर देखती। क्यों न चलकर कढ़ाह से सामने ही बैठूँ। पूड़ियाँ छन–छन कर तैरती होंगी। कढ़ाह से गरम-गरम निकल कर थाल में रखी जाती होंगी। फूल हम घर में भी सूँघ सकते हैं; परन्तु वाटिका में कुछ और बात होती है। इस प्रकार निर्णय करके बूढ़ी काकी उकड़ू बैठकर हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई से चौखट उतरीं और धीरे- धीरे रेंगती हुई कढ़ाह के पास जा बैठीं। यहाँ आने पर उन्हें उतना ही धैर्य हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले के सम्मुख बैठने पर होता है।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
बुद्धिराम की पत्नी रूपा उस समय कार्यभार से परेशान हो रही थी। कभी इस कमरे में जाती, कभी उस कमरे में; कभी कढ़ाह के पास आती कभी भण्डार में जाती। बेचारी अकेली दौड़ते–दौड़ते व्याकुल हो रही थी, झुँझलाती थी, कुढ़ती थी, परन्तु रोष प्रकट करने का अवसर न पाती थी। इस अवस्था में बूढ़ी काकी को कढ़ाह के पास बैठा देखा तो जल गई। क्रोध न रुक सका। जिस प्रकार मेंढक केंचुए पर झपटता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काकी पर झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झिंझोड़ कर बोली, "ऐसे पेट में आग लगे, पेट है या भाड़? कोठरी में बैठते क्या दम घुटता था? अभी मेहमानों ने नहीं खाया, भगवान को भोग नहीं लगा; तब तक धैर्य न हो सका? "
बूढ़ी काकी ने सिर न उठाया; न रोईं, न बोलीं। चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरी में चली गयीं।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
भोजन तैयार हो गया। आँगन में पत्तल पड़ गए। मेहमान खाने लगे। बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में जाकर पश्चाताप कर रही थीं कि मैं कहाँ से कहाँ आ गई। उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था। अपनी जल्दबाज़ी पर दु:ख था। सच ही तो है जब तक मेहमान लोग भोजन न कर चुकेंगे घरवाले कैसे खाएँगे। मुझसे इतनी देर भी नहीं रहा गया। सबके सामने पानी उतर गया। अब जब तक कोई बुलाने न आएगा न जाऊँगी।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
मन ही मन इसी प्रकार विचार कर वह बुलावे की प्रतीक्षा करने लगीं। वह मन को बहलाने के लिए लेट गईं और धीरे-धीरे एक गीत गुनगुनाने लगीं। उन्हें लगा मुझे गाते देर हो गई। क्या इतनी देर तक लोग भोजन ही कर रहे होंगे? किसी की आवाज़ सुनाई नहीं देती। अवश्य ही लोग खा–पीकर चले गए। मुझे कोई बुलाने नहीं आया। रूपा चिढ़ गयी है, क्या जाने न बुलाए| बूढ़ी काकी चलने को तैयार हुई। यह विश्वास कि एक मिनट में पूड़ियाँ और मसालेदार तरकारियाँ सामने आएँगी, उनकी स्वादेन्द्रियों को गुदगुदाने लगा।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
उन्होंने मन में तरह–तरह के मनसूबे बाँधे — पहले तरकारी से पूड़ियाँ खाऊँगी, फिर दही शक्कर से; कचौरियाँ रायते के साथ मज़ेदार मालूम होंगी। चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मैं तो माँग–माँग कर खाऊँगी। यही न लोग कहेंगे कि इन्हें विचार नहीं? कहा करें, इतने दिनों के बाद पूड़ियाँ मिल रही हैं तो मुँह झूठा करके थोड़े ही उठ जाऊँगी।
वह उकड़ूँ बैठ कर हाथों के बल खिसकती आँगन में आईं। परन्तु हाय रे दुर्भाग्य! मेहमान मण्डली अभी बैठी थी। कोई खाकर उंगलियाँ चाटता था, कोई तिरछे नत्रों से देखता था कि लोग अभी खा रहे हैं या नहीं? पं. बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला गए। लपककर उन्होंने बूढ़ी काकी के दोनों हाथ पकड़े और घसीटते हुए लाकर उन्हें अंधेरी कोठरी में धम्म से पटक दिया।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
कर देती है उसी भाँति इन थोड़ी- सी पूड़ियों' ने काकी की क्षुधा और इच्छा को उत्तेजित कर दिया था। बोलीं, "नहीं बेटी, जाकर अम्माँ से और माँग लाओ।"
लाड़ली ने कहा, "अम्माँ सोती हैं, जगाऊँगी तो मारेंगी।"
काकी ने पिटारी को फिर टटोला। उसमें कुछ खुर्चन गिरे थे। उन्हें निकाल कर वे खा गईं। बार–बार होंठ चाटती थीं, चटखारें भरती थीं।
हृदय मसोस रहा था कि और पूड़ियाँ कैसे पाऊँ। काकी का अधीर मन इच्छा के प्रबल बहाव में बह गया। उचित और अनुचित का विचार जाता रहा। वे कुछ देर तक उस इच्छा को रोकतीं रहीं। सहसा लाड़ली से बोलीं, "मेरा हाथ पकड़कर वहाँ ले चलो जहाँ मेहमानों ने बैठकर भोजन किया है।"
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
लाड़ली उनका अभिप्राय समझ न सकी। उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकर
जूठे पत्तलों के पास बिठला दिया। काकी पत्तलों से पूड़ियों के टुकड़े चुन–चुन कर खाने लगी। ओह! दही कितना स्वादिष्ट था, कचौरियाँ कितनी सलोनी, खस्ता कितनी सुकोमल। काकी बुद्धिहीन होते हुए भी इतना जानती थी कि मैं जो काम कर रही हूँ वो मुझे कदापि नहीं करना चाहिए। मैं दूसरों के जूठे पत्तल चाट रही हूँ, परन्तु बुढ़ापा तृष्णा–रोग का अन्तिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छाएँ एक ही केन्द्र पर आ जाती हैं। बूढ़ी काकी का यह केन्द्र उनकी स्वादेन्द्रियाँ थीं|
ठीक उसी समय रूपा की आँख खुली। उसे मालूम हुआ कि लाड़ली मेरे पास नहीं है। वह चौंकी, चारपाई के इधर–उधर ताकने लगी कि कहीं नीचे तो नहीं गिर पड़ी। उसे वहाँ न पाकर वह उठ बैठी तो क्या देखती है कि लाड़ली जूठे पत्तलों के पास चुपचाप खड़ी है और बूढ़ी काकी पत्तलों पर पूड़ियों के टुकड़े उठा–उठा कर खा रही है। रूपा का हृदय सन्न हो गया।
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
यह वह दृश्य था जिसे देखकर देखने वालों के हृदय काँप उठते हैं। ऐसा प्रतीत होता मानो ज़मीन रुक गई, आसमान चक्कर खा रहा है। संसार पर कोई नई विपत्ति आनेवाली है। रूपा को क्रोध न आया। शोक के सम्मुख क्रोध कहाँ? करुणा और भय से उसकी आंखें भर आईं। इस अधर्म के पाप का भागीकौन है? उसने सच्चे हृदय से गगन–मण्डल की ओर हाथ उठाकर कहा, "परमात्मा, मेरे बच्चों पर दया करो, इस अधर्म का दण्ड मुझे मत दो नहीं तो हमारा सत्यानाश हो जाएगा।"
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
रूपा को'' अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न दिखाई पड़ा था। वहसोचने लगी — "हाय! कितनी निर्दय हूँ मैं। जिसकी सम्पत्ति से मुझे दो सौ रूपया वार्षिक आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति! और मेरे कारण। हे दयामय भगवन! मुझसे भारी चूक हुई, मुझे क्षमा करो।"
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पाठ – बूढ़ी काकी (कहानी)
रूपा ने दीया जलाया, अपने भंडार का द्वार खोला और एक थाली में सम्पूर्ण सामग्रियाँ सजाकर, लिए हुए बूढ़ी काकी की ओर चली। रूपा ने कंठावरुद्ध स्वर में कहा, "काकी उठो, भोजन कर लो। मुझसेआज बड़ी भूल हुई, उसका बुरा न मानना। परमात्मा से प्रार्थना कर दो कि वह मेरा अपराध क्षमा कर दे।"
भोले–भाले बच्चों की भाँति, जो मिठाइयाँ पाकर मार और तिरस्कार सब भूल जाते हैं, बूढ़ी काकी बैठी हुई खाना खा रही थीं। उनके एक–एक रोए से सच्ची सदिच्छऐँ निकल रही थीं और रूपा बैठी इस स्वर्गीय दृश्य का आनन्द लूटने में निमग्न थी।
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For visual story please refer"https://www.youtube.com/watch?v=u1o2NUYPVEM" Video credits
Jadui Kahaniya
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