Worksheets11. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.01–3.10
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श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.01 व 3.02 में अर्जुन द्वारा पूछे गये प्रश्न का क्या औचित्य है ? स्पष्ट करें ।
यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो हमें केवल “गीता का सार” मात्र ही प्राप्त होता, गीता के विस्तृत उपदेश नहीं ।
यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो सांख्ययोग, बुद्धियोग, बुद्धि द्वारा इन्द्रियनिग्रह, निष्काम कर्मयोग आदि विषयों के ज्ञान से उत्पन्न भ्रामक स्थिति से नहीं उभर पाता ।
यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो हम भी अर्जुन की तरह भ्रामक स्थिति में ही रह जाते, भगवान् कृष्ण के वास्तविक सन्देश को नहीं समझ पाते ।
यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो श्रीमद्भगवद्गीता का स्वरुप केवल कुछ छंदों का गीत मात्र होता, वर्तमान दिव्य ग्रन्थ नहीं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.03 के अनुसार आत्म-साक्षात्कार के लिए कितने प्रकार के आध्यात्मवादी प्रयत्नशील रहते हैं ?
दो प्रकार के - ज्ञानयोगी, हठयोगी
दो प्रकार के - हठयोगी, भक्त
दो प्रकार के - ज्ञानयोगी, भक्त
दो प्रकार के - ध्यानयोगी, भक्त
ज्ञानयोगियों की भगवद् तत्त्व को जानने व समझने क्या पद्धति होती है ?
ज्ञानयोगी आध्यात्मिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।
ज्ञानयोगी व्यवहारिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।
ज्ञानयोगी स्वभाविक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।
ज्ञानयोगी दार्शनिक ज्ञान तथा आध्यात्मिक दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की भगवद् तत्त्व को जानने व समझने क्या पद्धति होती है ?
कृष्णभावनाभावित सकाम कर्म अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए कर्म के करने के दिव्य ज्ञान द्वारा ।
कृष्णभावनाभावित विकर्म अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए कर्म के करने के दिव्य ज्ञान द्वारा ।
कृष्णभावनाभावित अकर्म अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए कर्म के करने के दिव्य ज्ञान द्वारा ।
कृष्णभावनाभावित कर्म अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण की तुष्टि के लिए कर्म करने के दिव्य ज्ञान द्वारा ।
यदि ज्ञानयोग तथा भक्तियोग धर्म व दर्शन के रूप में अन्योन्याश्रित हैं, तो फिर इनमें से धर्म कौन है और दर्शन कौन है ?
भक्तियोग दर्शन है और ज्ञानयोग धर्म है ।
न तो इनमें से कोई धर्म है और न ही दर्शन ।
भक्तियोग धर्म है और ज्ञानयोग दर्शन है ।
भक्तियोग धर्म तो है किन्तु ज्ञानयोग दर्शन नहीं है ।
क्या भक्तियोग तथा ज्ञानयोग अन्योन्याश्रित हैं ?, यदि हाँ तो सिद्ध करें ।
आध्यात्म के लिए प्रयासरत मनुष्य के लिए ज्ञानयोग ही भक्तियोग का जनक है, क्योंकि ज्ञानयोग की सम्पूर्णता ही मनुष्य को भक्तियोग में अवस्थित करती है ।
भक्तियोग का मापदण्ड इससे स्वत: प्रकाशित होने वाला ज्ञान है, ऐसे में यदि ज्ञान का प्रकाश व वृद्धि न हो तो वह भक्ति नहीं अपितु केवल मात्र शुष्क मानसिक चिन्तन माना जाता है ।
केवल भक्तियोग ही ज्ञानयोग का संपूरक होता है क्योंकि वास्तव में ज्ञानयोग ही भक्तियोग का अन्तिम लक्ष्य होता है ।
नहीं, भक्तियोग तथा ज्ञानयोग एक दूसरे से पूर्णत: स्वतन्त्र पद्धतियाँ हैं ।
“दर्शनविहीन धर्म मात्र भावुकता या कभी-कभी धर्मान्धता है और धर्मविहीन दर्शन मानसिक उहापोह है” इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट करें ।
दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए घात्तक होती हैं ।
दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए सहायक होती हैं ।
दोनों ही परिस्थितियाँ अन्योन्याश्रित होती हैं क्योंकि ये एक दूसरे की संपूरक होती हैं ।
दोनों ही परिस्थितियाँ सनातन धर्म का मूलभूत आधार हैं इनके ज्ञान के बिना सनातन धर्म का बोध असंभव है ।
इस भौतिक संसार में एक धर्म दूसरे धर्म के लोगों को मारकर उस धर्म का सम्मूल नाश करने के लिए अपने लोगों को जेहाद के नाम पर उकसाता है, धर्म के नाम पर भावनाओं को भड़काने के लिए उनके धर्मगुरु किस प्रणाली का सहारा लेते हैं ।
धर्मविहीन दर्शन – जिसमें मनोधर्मी कल्पनाओं के आधार पर एक कपोलकल्पित धर्म का निर्माण कर तथाकथित धर्मगुरु अल्पज्ञों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं ।
गुरु-परम्परा विहीन स्वयंभू धर्मगुरु मानव समाज में अबोध लोगों की भावनाओं को कृष्णभावनामृत द्वारा भड़काकर केवल उत्पात मचाते हैं ।
दर्शनविहीन धर्म – जिसमें एक विशेष उद्देश्य हेतु धर्म के “अहिंसा परमो धर्म” जैसे सिद्धांतों को चातुर्यपूर्वक छिपाकर, धर्मगुरु धर्म का स्वरूप बदलकर अल्पज्ञों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं ।
ऐसे कट्टरपंथियों की भावनाओं को भड़काने के लिए किसी धर्म, दर्शन या धर्मगुरु की आवश्यकता नहीं होती है ।
इनमें से भक्ति की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष पद्धतियों को पहचानें ?
प्रत्यक्ष पद्धति – दर्शनविहीन धर्म, अप्रत्यक्ष पद्धति – धर्मविहीन दर्शन
प्रत्यक्ष पद्धति – दार्शनिक चिन्तन, अप्रत्यक्ष पद्धति – दर्शनविहीन धर्म
प्रत्यक्ष पद्धति – कृष्णभावनामृत, अप्रत्यक्ष पद्धति – धर्मविहीन दर्शन
प्रत्यक्ष पद्धति – कृष्णभावनामृत, अप्रत्यक्ष पद्धति – दार्शनिक चिन्तन
भक्ति की प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष पद्धतियों में से कृष्णभावनामृत को ही श्रेष्ठ क्यों माना जाता है ?
क्योंकि कृष्णभावनामृत के समतुल्य भक्ति की कोई और पद्धति वैदिक शास्त्रों में उपलब्ध नहीं है ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत स्वत: शुद्ध करने वाली भक्ति की प्रत्यक्ष, सरल तथा दिव्य प्रक्रिया है ।
क्योंकि अन्य देवी – देवता भी केवल मात्र कृष्ण की ही भक्तिमय सेवा की संस्तुति करते हैं ।
क्योंकि यथा अष्टांगयोग, हठयोग, दार्शनिक पद्धति आदि तुलनात्मक कठिन और जटिल पद्धतियाँ हैं ।
इनमें से कौन सा व्यक्ति वैदिक शास्त्रानुसार सन्यास ग्रहण करने के योग्य है ?
जो वर्णाश्रम धर्म के अंतर्गत अपने कर्मों के द्वारा शुद्ध हो चुका हो ।
जो अष्टांगयोग द्वारा अपनी इन्द्रियों के विमलीकरण में लगा हो ।
जो दार्शनिक पद्धित द्वारा अपनी इन्द्रियों के शुद्धिकरण में लगा हो ।
जिसे अपने जीवन के कर्म व कर्त्तव्य झंझट अथवा बंधन लगते हों ।
ज्ञानयोगियों को ऐसा क्यों लगता है कि सन्यास ग्रहण करने अथवा सकाम कर्म से विरत होने से ही मनुष्य नारायण के समान हो जाता है ?
सामान्यत: ज्ञानयोगी अपनी अहंकारी प्रवृत्ति के कारण स्वयं को किसी भी परिस्थिति में नारायण से कम नहीं आंकते हैं ।
प्राय: ज्ञानयोगी हठी होते हैं और सदैव अपने शुष्क मानसिक चिन्तन के निष्कर्षों पर ही विश्वास करते हैं अन्यत्र नहीं ।
ज्ञानयोगी अन्य समस्त योगियों, भक्तों से प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठ होने के कारण ही नारायण के समान होते हैं ।
ज्ञानयोगियों की सायुज्य मुक्ति की अभिलाषा के कारण, ऐसा विचार केवल मात्र उनके शुष्क मानसिक चिन्तन का ही प्रतिफल होता है ।
क्या कृष्णभावनामृत को अंगीकार करने से पूर्व मुझे किसी संस्था या किसी विशेष पद्धति द्वारा अपनी इन्द्रियों, मन, बुद्धि और हृदय का शुद्धिकरण करना होगा ?
हाँ, केवल वही व्यक्ति कृष्णभावनामृत को अंगीकार कर सकता है जिसकी इन्द्रियों, मन, बुद्धि और हृदय पहले से ही शुद्ध हों अर्थात् पूर्ववत् शुद्धिकरण आवश्यक है ।
नहीं, आपको केवलमात्र प्रामाणिक गुरु-परम्परा के अनुगत होकर कृष्णभावनाभावित कर्म प्रारम्भ करने होंगे क्योंकि कृष्णभावनामृत स्वत: शुद्धिकरण की प्रक्रिया है ।
हाँ, कृष्णभावनामृत को अंगीकार करने से पूर्व यथा कर्मकाण्ड, कर्मयोग, ज्ञानयोग, तथा ध्यानयोग इत्यादि पद्धतियों द्वारा अपनी इन्द्रियों, मन, बुद्धि और हृदय का शुद्धिकरण करना आवश्यक होता है ।
अन्य पद्धतियों द्वारा शुद्धिकरण के उपरान्त कोई व्यक्ति यदि कृष्णभावनामृत को अंगीकार नहीं करता है तो उसका शुद्धिकरण अस्थाई होता है ।
इनमें से कौन सा कर्म नियत कर्म नहीं है ?
नियत कर्म अर्थात् वर्णाश्रम धर्म द्वारा निर्धारित कर्म
पूर्व कर्म-फलों के फलस्वरूप निर्धारित कर्म
जीवन निर्वहन के लिए किये जाने वाले कर्म
नवीन इच्छाओं अथवा आकाँक्षाओं की पूर्ति हेतु किये जाने वाले कर्म
“प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है” इस कथन का क्या आशय है ?
यह कि प्रत्येक जीवात्मा का स्वभाव प्रकृति के तीनों गुणों से ही निर्मित होता है जिसके द्वारा वह अकर्म करता है ।
प्रत्येक जीवात्मा को अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रकृति के तीनों गुणों की एक निश्चित मात्रा प्राप्त करनी होती है ।
यह कि इस भौतिक जगत् में प्रत्येक जीवात्मा माया (प्रकृति) के निर्देशन में कार्य करता है अर्थात् वह माया का दास होता है ।
यह कि स्वतन्त्र इन्द्रियतृप्ति के लिए प्रत्येक जीवात्मा को प्रकृति के तीनों गुणों से एक निश्चित दूरी बनाए रखनी चाहिए ।
यदि कोई व्यक्ति कृष्णभावनाहीन है तो स्वयं को माया के संसर्ग से बचाने के लिए क्या करे ?
जड़ अर्थात् निष्क्रिय अवस्था में रहें
सदैव माया से एक निश्चित दूरी बनाए रखें ।
सदैव शास्त्रानुमोदित कर्मों में संलग्न रहें ।
तन्त्र-मन्त्र द्वारा माया का पराभव करें ।
यदि कोई कृष्णभावनामृत को अंगीकार कर लेता है फिर भले ही वह शास्त्रानुमोदित कर्म न करे या ठीक से भक्ति भी न करे और पतित ही क्यों न हो जाए, तो भी इसमें उसकी कोई हानि या बुराई नहीं होती है ऐसा क्यों ?
क्योंकि कृष्णभावनामृत के क्रियान्वन में जितना धन खर्च होता है उससे कहीं अधिक बचता है अर्थात् हानि का कोई भय नहीं होता है ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत के क्रियान्वन में इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है कि पतन या बुराई की कोई गुन्ज़ाईश ही नहीं रहती है ।
क्योंकि जो एक बार कृष्णभावनामृत को अंगीकार कर लेता है वह फिर कोई और पद्धति अपनाने के लायक नहीं रहता है ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत ही परम भगवान् से योग की एक मात्र परम विधि है अत: इसमें की गई प्रगति सदैव अक्षुण्ण होती है ।
कर्मेन्द्रियों को वश में करने से आपका क्या आशय है ?
कर्मेन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है मानसिक स्तर पर मात्र कुछ गतिविधियों को नियन्त्रित करना ।
कर्मेन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है आध्यात्मिक स्तर पर मात्र कुछ गतिविधियों को नियन्त्रित करना ।
कर्मेन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है दैहिक स्तर पर मात्र कुछ गतिविधियों को नियन्त्रित करना ।
कर्मेन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है स्वभाविक स्तर पर मात्र कुछ गतिविधियों को नियन्त्रित करना ।
किसी योगी के मिथ्याचारी होने का मुख्य कारण क्या होता है ?
वह शुष्क चिन्तन से अर्जित ज्ञान द्वारा केवलमात्र अपनी कर्मेन्द्रियों को ही वश में करने को आध्यत्मिक स्थिति जानता है ।
वह अबोध जनता में सस्ती प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए योगी होने का ढोंग मात्र ही करता है ।
वह केवलमात्र अपनी कर्मेन्द्रियों को वश में करता है अपने मन व ज्ञानेन्द्रियों को नहीं ।
वह यह आडम्बर इसलिए करता है ताकि वह इस आवरण के पीछे आसानी से इन्द्रियतृप्ति कर सके ।
एक प्रामाणिक गुरु और एक धूर्त गुरु में मूल अंतर क्या होता है ?
प्रामाणिक गुरु की मन सहित समस्त इन्द्रियाँ उसके नियंत्रण में होती हैं जबकि धूर्त गुरु केवल मात्र अपनी कर्मेन्द्रियों को ही पूर्णत: नियन्त्रित करता है ।
प्रामाणिक गुरु का सम्बन्ध प्रामाणिक गुरु-परम्परा से होता है जबकि धूर्त गुरु का सम्बन्ध भी प्रामाणिक गुरु-परम्परा से हो सकता है परन्तु वह सस्ती प्रतिष्ठा के लिए ढोंग ही करता है ।
प्रामाणिक गुरु सदैव कृष्ण का चिन्तन करता है जबकि धूर्त गुरु इन्द्रियतृप्ति के लिए इन्द्रिय विषयों का चिन्तन करता रहता है ।
प्रामाणिक गुरु कृष्णभावनाभावित होता है जबकि धूर्त गुरु के लिए उसके शुष्क चिन्तन की प्राथमिकता के कारण कृष्ण की स्थिति उसके लिए गौण होती है ।
अंततोगत्वा ऐसे धूर्त गुरु द्वारा अर्जित समस्त वैभव व मान-प्रतिष्ठा का क्या होता है ?
अंततोगत्वा उसका समस्त वैभव व मान-प्रतिष्ठा माया द्वारा संरक्षित कर लिया जाता है ।
अंततोगत्वा उसकी समस्त वैभव व मान-प्रतिष्ठा उसके कुछ विशेष शिष्यों द्वारा अधिग्रहित कर ली जाती है ।
अंततोगत्वा उसका समस्त वैभव व मान-प्रतिष्ठा राज्य सरकार अधिग्रहित कर लेती है ।
अंततोगत्वा उसका समस्त वैभव व मान-प्रतिष्ठा माया द्वारा हर लिया जाता है ।
मिथ्याचारी व्यक्ति और निष्ठावान व्यक्ति में मूल अंतर क्या होता है ?
मिथ्याचारी व्यक्ति कृत्रिम विधि द्वारा कर्मेन्द्रियों को वश में करता है जबकि निष्ठावान व्यक्ति अपने मन द्वारा कर्मेन्द्रियों को वश में करता है ।
मिथ्याचारी व्यक्ति का छद्म उद्देश्य इन्द्रिय तृप्ति के लिए कर्म करना होता है जबकि निष्ठावान व्यक्ति का स्पष्ट उद्देश्य कर्मयोग (कृष्णभावनाभावित कर्म) करना होता है ।
मिथ्याचारी व्यक्ति शुष्क मानसिक चिन्तन द्वारा ज्ञानार्जन हेतु प्रयत्नशील होता है जबकि निष्ठावान व्यक्ति कृष्णभावनामृत द्वारा दिव्य ज्ञान हेतु प्रयत्नशील होता है ।
मेरे मतानुसार दोनों ही योगी हैं और अपनी - 2 योग पद्धतियों के द्वारा इस भौतिक जगत् के मूल विष्णु को ही जानने का प्रयत्न कर रहे हैं अर्थात् दोनों में कोई अंतर नहीं है ।
जीवन का क्या लक्ष्य है ?
इस भवबन्धन से मुक्त होकर भगवद्धाम को वापिस जाना ।
इस भौतिक संसार में इन्द्रिय तृप्ति के लिए लम्पट जीवन जीना ।
इस भौतिक जगत् में परोपकारी जीवन जीकर प्रतिष्ठा प्राप्त करना ।
भक्ति द्वारा भौतिक भोगों को प्राप्त कर एक संतुलित जीवन जीना ।
क्या एक गृहस्थ भी जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ?
नहीं, क्योंकि उसके पास अपने गृहस्थ धर्म के निष्पादन के अतिरिक्त कृष्णभावनाभावित कर्म करने हेतु पर्याप्त समय नहीं होता है ।
नहीं, क्योंकि इन्द्रिय विषयों से घिरा एक गृहस्थ जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के योग्य नहीं होता है ।
हाँ, एक गृहस्थ अपने स्वजनों के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाकर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।
हाँ, यदि वह कृष्णभावनाभावित कर्म करता है अर्थात् अपने सारे कर्म कृष्ण को समर्पित करते हुए करता है ।
इनमें से आत्म-साक्षात्कार के लिए आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति का मूल मन्त्र क्या है ?
शुष्क मानसिक चिन्तन द्वारा अर्जित ज्ञान के माध्यम से आध्यात्मिक जीवन के लिए उद्यम करना ।
शास्त्रानुमोदित संयमित जीवन बिताकर अनासक्त भाव से अपने कर्म करना ।
धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा आध्यात्मिक उत्थान के लिए उद्यम करना ।
तान्त्रिक विधियों द्वारा आध्यात्मिक उत्थान के लिए उद्यम करना ।
क्या मुझे जीवन-निर्वाह के समस्त उद्यम बन्द करके, आजीविका के लिए ध्यान धरने वाले प्रवंचक ध्यानी का मार्ग अपना लेना चाहिए ?
हाँ, क्योंकि जीवन-निर्वाह के समस्त उद्यमों में पापपूर्ण कृत्यों का भय बना रहता है ।
नहीं, यह वास्तविक भक्ति पथ से विपथ होने का मार्ग है ।
नहीं, इससे केवल मिथ्या प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जिसके फलस्वरूप मिथ्या अहंकार बढ़ता है ।
हाँ, क्योंकि यह सांसारिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का सरल एवं सुगम मार्ग है ।
अपने नियत कर्म करने का क्या लाभ है ?
नियत कर्म करने से मनुष्य कर्म करने की प्रवृत्ति से मुक्त हो जाता है ।
नियत कर्म करने से मनुष्य को सुख-सुविधाजनक इन्द्रियभोग का अवसर प्राप्त होता है ।
नियत कर्म करने से मनुष्य का हृदय क्रमशः विमल हो जाता है और वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है ।
नियत कर्म करने से मनुष्य आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त होती है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.08 में भगवान् श्रीकृष्ण ने जीवात्मा की जिस संदूषित प्रवृत्ति के विषय में बताया है वह क्या है, स्पष्ट करें ?
जीवात्मा की शास्त्रों के निर्देशों के विरुद्ध कार्य करने की प्रवृत्ति, अर्थात् मनोधर्मी व हठधर्मी प्रवृत्ति ।
जीवात्मा की इस भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की प्रवृत्ति अर्थात् इन्द्रिय तृप्ति के लिए मलिन प्रवृत्ति ।
जीवात्मा की स्वहित के लिए अपने समस्त नियत कर्मों को त्याग कर अन्यों पर आश्रित रहने की प्रवृत्ति ।
जीवात्मा की आध्यत्मिक दिखावा करके सस्ती प्रशंसा व प्रतिष्ठा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.08 में भगवान् श्रीकृष्ण ने इनमें से किस की भर्त्सना की है, स्पष्ट करें ?
जीवात्मा की इस भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की प्रवृत्ति अर्थात् इन्द्रिय तृप्ति के लिए मलिन प्रवृत्ति ।
जीवात्मा की शास्त्रों के निर्देशों के विरुद्ध कार्य करने की प्रवृत्ति, अर्थात् मनोधर्मी व हठधर्मी प्रवृत्ति ।
जीवात्मा की आध्यत्मिक दिखावा करके सस्ती प्रशंसा व प्रतिष्ठा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ।
नियत कर्मों द्वारा शुद्ध हुए बिना मनुष्य का तथाकथित आध्यात्मवादी (योगी) बनकर अन्यों पर आश्रित रहना ।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्लोक संख्या 3.03 से 3.08 तक भगवान् श्रीकृष्ण ने किस विषय का ज्ञान दिया है ?
सकाम कर्मयोग
निष्काम कर्मयोग
कर्मकाण्ड
कर्मयोग
वर्णाश्रम धर्म और उनके अंतर्गत नियत कर्मों के विधान का क्या उद्देश्य है ?
सकाम कर्मी जीवात्माओं के लिए इन्द्रियभोग की सुव्यवस्था सुनिश्चित कर इन्द्रियतृप्ति के लिए समान अवसर प्रदान करना ।
कुछ जीवात्माओं का ब्राहमण व क्षत्रिय वर्णों में व्यवस्थित होकर अन्यों पर प्रभुत्व या स्वामित्व जताने के लिए अवसर प्रदान करना ।
जीवात्माओं का भौतिक कल्मष व इन्द्रियतृप्ति की आकांक्षाओं से शुद्धिकरण और तदोपरांत विष्णु (कृष्ण) की प्रसन्नता के लिए निष्काम भाव से कर्म करना ।
वर्णाश्रम धर्म और नियत कर्मों का आपस में कोई तदातम्य नहीं है ।
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञों का क्या उद्देश्य है ?
भगवान् विष्णु की प्रसन्नता
भगवान् यम की प्रसन्नता
भगवान् इन्द्र की प्रसन्नता
भगवान् गणेश की प्रसन्नता
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञों और कृष्णभावनामृत दोनों विधियों का उद्देश्य तो एक ही है, अर्थात् भगवान् विष्णु (कृष्ण) को प्रसन्न करना, परन्तु दोनों विधियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं यह भिन्नता क्या है ?
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञ प्रत्यक्ष विधि है जबकि कृष्णभावनामृत अप्रत्यक्ष विधि है ।
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञ स्वछन्द विधि है जबकि कृष्णभावनामृत पराश्रित विधि है ।
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञ अप्रत्यक्ष विधि है जबकि कृष्णभावनामृत प्रत्यक्ष विधि है ।
वेदों द्वारा निर्दिष्ट समस्त यज्ञ सरल विधि है जबकि कृष्णभावनामृत जटिल विधि है ।
यह सर्वविदित है कि इस जगत् में किये जाने वाले पापपूर्ण कर्म इस भवसागर में बंधन का कारण होते हैं परन्तु ठीक वैसे ही पुण्य कर्म भी बन्धन का कारण होते हैं ऐसा क्यों ?
भगवान् विष्णु (कृष्ण) की प्रसन्नता के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त इन्द्रियतृप्ति हेतु समस्त कर्म इस भवसागर में बंधन के ही कारण होते हैं ।
ऐसा कोई मापदण्ड नहीं है, कर्मफलों की गुणवत्ता ही कर्म बंधन के निर्धारण का कारण होती है ।
कर्म करने की विधि भी कर्मबन्धन के कारण का मुख्य घटक होती है क्योंकि कर्मविधि ही पाप और पुण्य कर्मों को वर्गीकृत करती है ।
भगवान् विष्णु (कृष्ण) की प्रसन्नता के लिए किये जाने वाले समस्त कर्म भी बंधन का ही कारण होते हैं ।
मुक्ति की कसौटी क्या होती है ?
भौतिक कल्मष से शुद्धि
जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि से मुक्ति
भौतिक संदूषण से शुद्धि
भगवान् विष्णु (कृष्ण) की प्रसन्नता
कृष्णभावनामृत में दक्षता प्राप्त करने के लिए क्या करना होता है ?
जड़ अथवा एकांत स्थान पर ध्यानयोग द्वारा कृष्णभावनामृत का अभ्यास करना होता है ।
वैदिक शास्त्रों का स्वाध्ययन ही कृष्णभावनामृत में दक्षता प्राप्त करने की एकमात्र विधि है ।
किसी अन्य पर आश्रित हुए बिना शुष्क मानसिक चिन्तन द्वारा भी कृष्णभावनामृत में दक्षता प्राप्त की जा सकती है ।
भगवद्भक्त अर्थात् प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनामृत का अभ्यास करना होता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्लोक संख्या 3.03 से 3.08 में उपदेशित निष्काम कर्मयोग के सन्दर्भ में श्लोक संख्या 3.09 का क्या महत्त्व है ?
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के द्वारा निष्काम कर्मयोग में भगवान् विष्णु (स्वयं) के ज्ञान को सम्मिलित करके इसे बुद्धियोग या भक्तियोग के स्तर पर स्थापित किया है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में भगवान् विष्णु अर्थात् स्वयं की विवेचना की है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस श्लोक द्वारा भक्ति की दिव्य एवं सरल विधि अर्थात् कृष्णभावनामृत की स्थापना की है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस श्लोक के द्वारा अर्जुन के कर्म न करने की प्रवृत्ति का खण्डन किया है ।
कृष्णभावनामृत के अनुशीलन से जीव को क्या प्राप्त होता है ?
भगवद्धाम ले जाने वाली आध्यात्मिक शान्ति
भगवद्धाम ले जाने वाली व्यवसायात्मिका बुद्धि
भगवद्धाम ले जाने वाली भगवान् की प्रेमाभक्ति
भगवद्धाम ले जाने वाली शुष्क दार्शनिकता
इनमें से कृष्णभावनामृत की योग सीढ़ी को पहचानें ?
पाश्विक जीवन – कर्मकाण्ड – सकाम कर्मयोग – निष्काम कर्मयोग (साधना भक्ति) – भाव भक्ति – प्रेमाभक्ति
पाश्विक जीवन – शुद्ध भक्त के अनुगत व संग – साधना भक्ति – भाव भक्ति – प्रेमाभक्ति
पाश्विक जीवन – कर्मकाण्ड – सकाम कर्मयोग – निष्काम कर्मयोग – ज्ञान योग – अष्टांग योग – भक्तियोग
पाश्विक जीवन – कर्मकाण्ड – कर्मयोग – ज्ञान योग – अष्टांग योग – भक्तियोग
वेदों द्वारा निर्दिष्ट यज्ञ वेदों के किस विभाग से सम्बंधित होते हैं ?
कर्मकाण्ड
ज्ञानकाण्ड
उपासनाकाण्ड
सुन्दरकाण्ड
यज्ञों की रचना क्यों की गई है ?
ताकि जीव देवताओं की पूजा-अर्चना कर सुखपूर्वक जीवन बिता सकें ।
ताकि इस भौतिक जगत् में शान्ति हेतु जीवों और देवताओं के मध्य समन्वय बना रहे ।
ताकि जीव इस भौतिक जगत् में सुखपूर्वक जीवन बिताकर क्रमशः मुक्ति प्राप्त कर सकें ।
ताकि इस भौतिक जगत् में जीवों और देवताओं के लिए इन्द्रियभोगों की वस्तुओं की व्यवस्था बनी रहे ।
भौतिक सृष्टि की रचना क्यों की गई है ?
बद्धजीवों को सुखी जीवन यापन हेतु आश्रय प्रदान करने के लिए ।
भौतिक सृष्टि की रचना बद्धजीवों के मनोरंजन के लिए की गई है ।
भौतिक सृष्टि की रचना बद्धजीवों को वास्तविकता के दर्शनार्थ की गई है ।
भौतिक सृष्टि के द्वारा बद्धजीवों को भगवद्धाम जाने का सुअवसर प्रदान करने हेतु ।
हम सभी प्रकृति के बंधन में क्यों हैं ?
क्योंकि भौतिक जगत् में हम प्रकृति के अधीन जीवन यापन करने के लिए बाध्य होते हैं ।
क्योंकि हमने भगवान् विष्णु या कृष्ण के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को भुला दिया है ।
क्योंकि भौतिक जगत् में इन्द्रियतृप्ति के लिए हमारे पास प्रकृति के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं है ।
क्योंकि भौतिक जगत् में आते ही हम हमारी इन्द्रियभोग के प्रवृत्ति हेतु स्वेच्छा से प्रकृति को समर्पण करते हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्लोक संख्या 3.10 में मूल प्रजापति किसे कहा गया है ?
भगवान् विष्णु को
भगवान् ब्रह्मा को
भगवान् शिव को
भगवान् इन्द्र को
कलियुग के लिए वैदिक शास्त्रों में इनमें से किस यज्ञ की संस्तुति हुई है ?
अश्वमेघ-यज्ञ
सर्वमेघ-यज्ञ
संकीर्तन-यज्ञ
विष्णु-यज्ञ
कलियुग के मनुष्यों के उद्धार के लिए संकीर्तन-यज्ञ का प्रवर्तन किसने किया ।
श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने
श्री नारद जी ने
श्री शंकराचार्य जी ने
श्रील प्रभुपाद जी ने
“संकीर्तन-यज्ञ तथा कृष्णभावनामृत में अच्छा तालमेल है” स्पष्ट करें ।
इस कलियुग में कृष्णभावनामृत की शक्ति ही साधक को संकीर्तन-यज्ञ के लिए प्रेरित करती है, क्योंकि संकीर्तन-यज्ञ स्वयं शक्तिहीन है ।
इस कलियुग में संकीर्तन-यज्ञ के बिना कृष्णभावनामृत सम्पूर्ण नहीं है क्योंकि संकीर्तन-यज्ञ ही इसकी रीढ़ है ।
इस कलियुग में संकीर्तन-यज्ञ ही कृष्णभावनामृत को स्वत: शुद्धिकरण की प्रक्रिया बनाता है क्योंकि संकीर्तन-यज्ञ से मन, बुद्धि व इन्द्रियों का शुद्धिकरण और क्रमशः इनका निग्रहीकरण होता है ।
इस कलियुग में केवल मात्र संकीर्तन-यज्ञ ही है जो कृष्णभावनामृत को इतनी जटिल व दुस्साध्य विधि बनाता है अन्यत्र कोई और उपाय उपलब्ध नहीं है ।
