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Worksheets32. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.17–7.23
Total questions: 52
Worksheet time: 2hrs 30mins
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भगवान् श्रीकृष्ण को आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी में से कौन अत्यंत प्रिय है ?
इन सभी में जो परमज्ञानी होता है और भगवान् की शुद्धभक्ति में लगा रहता है ।
इन सभी में जो आर्त है और भगवान् की शुद्धभक्ति में लगा रहता है ।
इन सभी में जो ज्ञानी है और भगवान् की शुद्धभक्ति में लगा रहता है ।
यह सभी भगवान् श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं क्योंकि यह सभी उनकी शरण ग्रहण करते हैं ।
"मेरा यह भौतिक शरीर मुझ आत्मा से भिन्न है ।" मनुष्य को ऐसी अनुभूति कब होती है ? आध्यात्मिक पथ पर यह अवस्था क्या कहलाती है ?
ज्ञान की खोज करते हुए मनुष्य को ऐसी अनुभूति होती है । आध्यात्मिक पथ पर यह अवस्था प्रारंभिक होती है ।
ब्रह्मा की खोज करते हुए मनुष्य को ऐसी अनुभूति होती है । आध्यात्मिक पथ पर यह उन्नत अवस्था होती है ।
अर्थ प्राप्ति हेतु प्रयासरत मनुष्य को ऐसी अनुभूति होती है । आध्यात्मिक पथ पर यह उन्नत अवस्था होती है ।
जीवन के रहस्य की जिज्ञासा को शान्त करने में प्रयासरत मनुष्य को ऐसी अनुभूति होती है । आध्यात्मिक पथ पर यह अति उन्नत अवस्था कहलाती है ।
जीवात्मा को ईश्वर के साथ नित्य दास के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति की अनुभूति कब होती है ?
जब जीवात्मा भौतिक इच्छाओं के समस्त कल्मष मुक्त होकर शुद्धभक्त बन जाता है ।
जब जीवात्मा एक भौतिक देह से देहान्तरण कर दूसरी भौतिक देह को प्राप्त करता है ।
जब जीवात्मा भौतिक जगत् से मुक्त होकर आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करता है ।
जब जीवात्मा अपने समस्त भौतिक कर्तव्यों से विमुक्त होकर जीवन के अंतिम पड़ाव अर्थात् मरणावस्था में होता है ।
आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी व्यक्तियों का शुद्धिकरण कैसे होता है ?
शुद्धभक्त की संगति के द्वारा ।
परस्पर मधुर संबंध के द्वारा ।
उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के द्वारा ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भौतिक कल्मषों से शुद्धभक्त की रक्षा कौन करता है ?
भक्ति
शक्ति
आसक्ति
ज्ञान
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.18 में निम्न में से किसे उदारचेता कहा है ?
आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी को ।
मूढ़ाः, नराधम, माययापहृतज्ञानाः तथा आसुरं भावमाश्रिताः को ।
आर्त, जिज्ञासु, मनोधर्मी तथा नास्तिक को ।
मूढ़ाः, नराधम, अर्थार्थी तथा ज्ञानी को ।
भगवान् श्रीकृष्ण निम्न में से किसे अपने समान मानते हैं ?
जिसे भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान होता है ।
उदार चित्त वाला व्यक्ति जिसे अन्यों की पीड़ा का बोध होता है ।
जिसे आत्मा विषयक संपूर्ण ज्ञान होता है ।
जिसे भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान होता है । और जो सदैव भगवान् की दिव्यसेवा में लगा रहता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के कथनानुसार निम्न में से कौन सा व्यक्ति निश्चित रूप से सर्वोच्च उद्देश्य भगवान् श्रीकृष्ण को प्राप्त करता है ?
जिसे भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान होता है ।
उदार चित्त वाला व्यक्ति जिसे अन्यों की पीड़ा का बोध होता है ।
जिसे आत्मा विषयक संपूर्ण ज्ञान होता है ।
जिसे भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान होता है । और जो सदैव भगवान् की दिव्यसेवा में लगा रहता है ।
क्या कम ज्ञानी भक्त भी भगवान् श्रीकृष्ण को प्रिय हैं ?
हाँ, क्योंकि ऐसे व्यक्ति भी उदार चित्त वाले होते हैं ।
नहीं, क्योंकि ऐसे व्यक्तियों का ज्ञान केवल ब्रह्म अथवा अंतर्यामी परमात्मा अवस्था तक ही होता है ।
हाँ, क्योंकि भगवान् का आंशिक ज्ञान भी मनुष्य को उदारचेता बना देता है । और किसी भी उद्देश्य से भगवान् की शरण में आए हुए व्यक्ति महात्मा कहलाते हैं ।
नहीं, क्योंकि भगवान् को केवल उदारचित्त वाले व्यक्ति नहीं अपितु शुद्धचित्त वाले मनुष्य प्रिय है ।
भगवान् श्रीकृष्ण को ज्ञानी भक्त ही क्यों अत्यंत प्रिय होते हैं ?
क्योंकि ऐसे व्यक्ति का उद्देश्य केवल प्रेम तथा भक्ति से परमेश्वर की दिव्यसेवा करना होता है ।
क्योंकि ऐसा व्यक्ति भगवान् की सेवा किए बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता है ।
क्योंकि ऐसा व्यक्ति भगवान् के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
"भक्तगण सदैव मेरे हृदय में वास करते हैं और मैं भक्तों के हृदय में वास करता हूँ ।" भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन की पुष्टि निम्न में से किस ग्रंथ में हुई है ?
श्रीमद्भागवतम्
छांदोग्य उपनिषद्
श्वेताश्वतर उपनिषद्
पद्म पुराण
"अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है ।" इस कथन से आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थात् पूर्ण कृष्णभावनाभावित होता है ।
अर्थात् संपूर्ण वैदिक शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त होता है ।
अर्थात् आध्यात्मिक जगत् और भौतिक जगत् की भिन्नता का ज्ञान प्राप्त होना ।
अर्थात् जीवन की वास्तविक गुणवत्ता का ज्ञान प्राप्त होना ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने किसे अत्यंत दुर्लभ महात्मा कहा है ?
जो भगवान् श्रीकृष्ण को समस्त कारणों का कारण जानकर उनकी शरण ग्रहण करता है ।
उदार चित्त वाला वह व्यक्ति जो किसी उद्देश्य से भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में आता है ।
ऐसा महात्मा जो समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करने में पारंगत हो ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
वास्तविक दिव्यज्ञान क्या है ?
यह बोध होना कि आत्म-साक्षात्कार का चरम लक्ष्य भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।
यह बोध होना कि हमारी स्वाभाविक स्थिति पूर्ण दासत्व है ।
यह बोध होना कि हम यह शरीर नहीं अपितु आध्यात्मिक स्फुलिंग अर्थात् आत्मा हैं ।
यह बोध होना कि भगवान् श्रीकृष्ण भी हमारी तरह ही एक साधारण मनुष्य हैं ।
आत्म साक्षात्कार की प्रारंभिक अवस्था में जीवात्मा को क्या करना होता है ?
जीवात्मा को भौतिक इच्छाओं का परित्याग करना होता है ।
जीवात्मा को भौतिक आसक्तियों का परित्याग करना होता है ।
जीवात्मा को सकाम कर्मों का परित्याग करना होता है ।
जीवात्मा को इन सभी भौतिकताओं का परित्याग करना होता है ।
भक्ति का विधान किससे होता है ?
आध्यात्मिक जीवन में निष्क्रिय रहने से ।
आध्यात्मिक जीवन में निष्काम भाव से कर्म करने से ।
आध्यात्मिक जीवन में भी सकाम कर्म करने से ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
आत्म-साक्षात्कार की चरमावस्था पर जीवात्मा को निम्न में से किसका बोध होता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा ही सर्वस्व है ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं ।
यह कि यह भौतिक जगत् भगवान् श्रीकृष्ण से स्वतंत्र नहीं है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जीवात्मा को यह अनुभूति कब होती है कि भौतिक जगत् आध्यात्मिक विविधताओं का विकृत प्रतिबिंब है और प्रत्येक वस्तु का परमेश्वर कृष्ण से संबंध है ?
आत्म-साक्षात्कार की चरमावस्था में ।
आत्म-साक्षात्कार के मध्यावस्था में ।
आत्म-साक्षात्कार की प्रारंभिक अवस्था में ।
आत्म-साक्षात्कार नहीं अपितु भक्ति की चरमावस्था में ।
"जीवात्मा की वासुदेवमयी व्यापक दृष्टि होने पर भगवान् श्रीकृष्ण को परम लक्ष्य मानकर शरणागति प्राप्त होती है, ऐसा शरणागत महात्मा दुर्लभ होता है ।" इस कथन में वासुदेवमयी व्यापक दृष्टि से आपका क्या अभिप्राय है ?
पूर्ण कृष्णभावनामृत ।
भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य दृष्टि प्राप्त होना ।
भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य दृष्टि ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
इस भौतिक देह में बोलने, देखने, सुनने तथा सोचने आदि की शक्तियों को किस परिस्थिति में व्यर्थ कहा गया है ?
यदि यह शक्तियाँ भगवान् की सेवार्थ न हो ।
यदि यह शक्तियाँ का क्रियाशील न हो ।
यदि यह शक्तियाँ इंद्रियभोग में सहायक न होती हो ।
क्या सभी कथन सत्य हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 7.19 के तात्पर्य में श्रीमद भगवत गीता के श्लोक संख्या 7.17 तथा 11.40 की तुलना के लिए क्यों कहा है ?
ताकि हम अर्जुन के आचरण से अत्यंत दुर्लभ महात्मा के विषय में जान सकें ।
ताकि हम यह समझ सकें कि भगवान् श्रीकृष्ण को अर्जुन क्यों अत्यंत प्रिय है ।
ताकि हम यह समझ सकें कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ही श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान के लिए क्यों चुना है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
देवताओं की शरण में इनमें से कौन जाते हैं ?
जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं द्वारा मारी गई होती है ।
जो समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके होते हैं ।
जो परमसत्य के ज्ञान को जानने के जिज्ञासु होते हैं ।
जो भगवान् को समस्त कारणों का कारण मानते हैं ।
जो मनुष्य भौतिक इच्छाओं के होते हुए भी भगवान् की ओर उन्मुख होते हैं उन्हें बहिरंगा प्रकृति आकृष्ट क्यों नहीं करती है ?
क्योंकि वे मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं ।
क्योंकि ऐसे मनुष्य अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति बहिरंगा प्रकृति से नहीं अपितु भगवान् से चाहते हैं ।
क्योंकि ऐसे मनुष्य बहिरंगा प्रकृति की शक्ति सीमा को पार कर चुके होते हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
मनुष्य को भौतिक कामेच्छाओं से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए ?
मनुष्य को भौतिक इच्छाएँ होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित होना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए ।
मनुष्य को भौतिक इच्छाएँ होते हुए भी बहिरंगा प्रकृति की ओर उन्मुख होना चाहिए ।
मनुष्य को भौतिक इच्छाएँ होते हुए भी देवताओं की शरण में जाना चाहिए और उनकी विशेष विधि-विधान द्वारा पूजा करनी चाहिए ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन से मनुष्य भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में नहीं जाते हैं ?
रजो तथा तमोगुणी
सतो तथा तमोगुणी
केवल तमोगुणी
रजो तथा सतोगुणी
देवताओं की शरण में जाने वाले मनुष्य क्या कहलाते हैं ?
अल्पज्ञ
विशेषज्ञ
ज्ञानी
ब्रह्मज्ञ
क्या शुद्धभक्त भी अविलम्ब इच्छा पूर्ति हेतु देवताओं की शरण में जाते हैं ?
नहीं, वे अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भगवान् पर ही निर्भर रहते हैं ।
हाँ, जब कभी भगवान् उनकी इच्छा की पूर्ति नहीं करते, तब वे देवताओं की शरण में जाते हैं ।
नहीं, क्योंकि देवता उनकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं करते ।
हाँ, क्योंकि देवताओं की शरण में जाने से इस भौतिक जगत् से मुक्ति अविलम्ब प्राप्त होती है ।
"एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य" चैतन्यचरितामृत के इस श्लोक का क्या तात्पर्य है ?
केवल भगवान् श्रीकृष्ण ही स्वामी हैं और अन्य सब दास हैं ।
केवल श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं और अन्य सब देवता हैं ।
केवल श्रीकृष्ण ही भगवान् है बाकी सब मनुष्य ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है तो तो उसकी श्रद्धा को स्थिरता कौन प्रदान करता है ?
उस जीव के हृदय में उपस्थित अंतर्यामी परमात्मा के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण ।
उस जीव की विशिष्ट मानसिकता ।
उस जीव की उस विशेष देवता के प्रति समर्पण ।
उस जीव का उस विशेष देवता के प्रति आकर्षण ।
हमें हमारी इच्छाओं के अनुरूप समस्त सुख सुविधाएँ कौन प्रदान करता है ?
हमारे हृदय में उपस्थित अंतर्यामी परमात्मा के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण ।
इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित 33 करोड़ देवी देवता ।
हमारे स्वयँ के समर्पित प्रयास ।
हमारे माता-पिता का हमारे प्रति धर्म ।
सर्वशक्तिमान् ईश्वर जीवों को ऐसी सुविधाएँ प्रदान करके उन्हें माया के पाश में गिरने ही क्यों देते हैं ?
जीवों की स्वतंत्रता को बनाए रखने हेतु ।
जीवों की माया के पाश में रहने की इच्छा पूर्ति हेतु ।
जीवों की अज्ञानता को बनाए रखने हेतु ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण का अंतिम उपदेश क्या है ?
मनुष्य को चाहिए कि अन्य सारे कार्यों को त्याग कर उनकी शरण में आए । इससे मनुष्य सुखी रहेगा ।
मनुष्य और देवताओं की संततियाँ इसीलिए रचि गई हैं ताकि मनुष्य देवताओं की शरण में जाकर सुखी रहें।
मनुष्य को देवताओं के अधीन इसलिए रखा गया है ताकि देवता मनुष्यों की इच्छाओं की पूर्ति कर सकें ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
"न तो जीवात्मा स्वेच्छा से किसी देवता की पूजा कर सकता है और न ही कोई देवता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई वर दे सकता है ।" ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि जीवात्मा तथा देवता दोनों ही परमेश्वर की इच्छा के अधीन हैं ।
क्योंकि भगवान् श्री कृष्ण की इच्छा सर्वोच्च है ।
क्योंकि यह व्यवस्था जीवात्माओं तथा देवताओं के हितों को सुरक्षित रखने के लिए भगवान् द्वारा नियोजित की गई है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
देवताओं के पूजन के विधि-विधानों का उल्लेख कहाँ मिलता है ?
वैदिक साहित्य में ।
सामाजिक परंपराओं में ।
दंत कथाओं में ।
रूढ़िवादी रीति-रिवाज़ों में ।
हमारी एक छोटी सी इच्छा को कामेच्छा या प्रबल इच्छा में कौन परिवर्तित करता है ?
अंतर्यामी परमात्मा ।
निर्विशेष ब्रह्म ।
बहिरंगा प्रकृति या माया ।
हमारा मानसिक चिंतन ।
जीवात्मा व देवता दोनों में से कौन स्वतंत्र होता है ?
निस्संदेह देवता ।
निस्संदेह जीवात्मा ।
दोनों ही ।
दोनों में से कोई भी नहीं ।
क्या जीव की भौतिक इच्छा पूर्ति का लाभ देवताओं द्वारा प्रदान किया जाता है ?
नहीं, वास्तव में यह लाभ देवता विशेष के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण अंतर्यामी परमात्मा के रूप में प्रदान करते हैं ।
हाँ, ऐसे सामान्य लाभ देवता स्वयँ ही प्रदान करते हैं ।
नहीं, ऐसे सामान्य लाभ देवता माया के माध्यम से प्रदान करते हैं ।
हाँ, ऐसे सामान्य लाभ को प्रदान करने में देवता स्वयँ ही शक्तिसमर्थ होते हैं ।
शुद्धभक्त वर क्यों नहीं माँगते हैं ?
क्योंकि वर माँगना शुद्ध भक्तों का लक्षण नहीं है ।
क्योंकि शुद्ध भक्तों स्वयँ के लिए इच्छाएँ नहीं करते अपितु भगवान् की सेवार्थ इच्छाएँ करते हैं ।
क्योंकि वर माँगने से भौतिक कल्मष उत्पन्न होता है, जिससे शुद्धता समाप्त होने का भय व्याप्त रहता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
ऐसे किसी शुद्धभक्त का नाम बताइए जिसने भक्ति तो वर माँगने की इच्छा से प्रारंभ तो की हो, परंतु वर नहीं माँगा हो ।
ध्रुव महाराज ।
प्रहलाद महाराज ।
परीक्षित महाराज ।
अम्बरीश महाराज ।
चैतन्यचरितामृत में किसे परस्पर विरोधी इच्छाओं वाला कहा गया है ?
जो व्यक्ति भगवान् की पूजा के साथ-साथ भौतिकभोग की कामना भी करता हो ।
जो व्यक्ति भगवान् की पूजा के साथ-साथ देवताओं की उपासना करता हो ।
जो व्यक्ति भगवान् की भक्ति और देवता की उपासना को समान स्तर पर मानता हो ।
ऐसे सभी व्यक्ति परस्पर विरोधी इच्छाओं वाले होते हैं ।
भगवद्धाम जाने के इच्छुक जीव के मार्ग में इनमें से प्रमुख कौन बाधक है ?
भौतिक इच्छाएँ ।
भौतिकता का परित्याग ।
आध्यात्मिक स्वरूप को जानने की उत्सुकता ।
आत्म साक्षात्कार के लिए प्रयत्न ।
देवताओं से प्राप्त होने वाले फलों की क्या प्रकृति होती है ?
ऐसे फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं ।
ऐसे फल असीमित तथा स्थाई होते हैं ।
ऐसे फल सीमित तथा अक्षुण्ण होते हैं ।
ऐसे फल अप्रतिम तथा दिव्य होते हैं ।
देवताओं की पूजा करने वाले किन लोकों को जाते हैं ?
देवलोक
पाताल लोक
मृत्युलोक
अनन्त लोक
भगवान् की भक्ति करने वाले किन लोकों को जाते हैं ?
देवलोक
पाताल लोक
मृत्युलोक
भगवद्धाम
यह किसका कथन है कि देवताओं की पूजा के माध्यम से परमेश्वर के पास पहुँचा जा सकता है ?
भगवद्गीता के अल्पज्ञ भाष्यकारों का ।
भगवद्गीता के बुद्धिमान् भाष्यकारों का ।
भगवद्गीता के आध्यात्मिक प्रवंचकों का ।
आध्यात्मिक जगत् के बुद्धिजीवी वर्ग का ।
निम्न में से किसका ज्ञान पूर्ण है ?
जो देवताओं तथा स्वयँ को परमेश्वर का अंश मानता है ।
जो देवताओं तथा जीवात्माओं को परमेश्वर के अनाश्रित मानता है ।
जो प्रत्येक देवता को भिन्न भगवान् मानता है ।
जो देवताओं के प्रति समर्पण को वास्तविक शरणागति मानता है ।
देवताओं की उपासना करने से प्राप्त होने वाले फल नाशवान् क्यों होते हैं ?
क्योंकि फल प्रदान करने वाले देवता स्वयँ भी नाशवान् होते हैं ।
देवताओं का अस्तित्व तो शाश्वत होता है परंतु उनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले फल भौतिक पदार्थ से निर्मित होते हैं ।
देवता भगवान् द्वारा शक्ति प्रदत्त होते हैं । परंतु उन के माध्यम से प्राप्त होने वाले फल भौतिक शक्ति द्वारा प्रदान किए जाते हैं ।
देवताओं के द्वारा प्रदान किए जाने वाले फल वास्तव में शाश्वत होते हैं परंतु देवताओं की लाभांश की इच्छा के कारण फलों की प्रकृति नाशवान् हो जाती है ।
निम्न में से कौन सा कथन मिथ्या है ?
भगवान् सच्चिदानन्द विग्रह स्वरूप हैं ।
भगवान् असीम हैं, उनका अनुग्रह अनंत है उनकी दया भी अनंत है ।
भगवान् की अपने शुद्धभक्तों पर कृपा भी असीम होती है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
