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15. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.42–4.06

Total questions: 51

Worksheet time: 2hrs 42mins

Name
Class
Date
1.

कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।

4 lines
2.

कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।

4 lines
3.

कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल न0 लिखें ।

4 lines
4.

कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।

4 lines
5.

इनमें से श्रेष्ठता (Superiority) का सही अनुक्रम (Hierarchy) चुनें।

a)

आत्मा - बुद्धि - शरीर - इन्द्रिय विषय - इन्द्रियाँ - मन

b)

शरीर - इन्द्रिय विषय - इन्द्रियाँ - मन - बुद्धि - आत्मा

c)

शरीर - इन्द्रियाँ - इन्द्रिय विषय - मन - बुद्धि - आत्मा

d)

आत्मा - बुद्धि - शरीर - इन्द्रिय विषय - इन्द्रियाँ - मन

6.

काम की प्रबलता के कारण मनुष्य के भीतर मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ इत्यादि का अनुक्रम विकृत्त (Distorted) हो जाता है । ऐसी विकृत्त अवस्था में जीवात्मा की कार्यप्रणाली को कौन शासित (Govern) करता है और कैसे ?

a)

बुद्धि शासित करती है, क्योंकि बुद्धि काम की राजधानी होता है और समय के साथ-साथ क्रमशः (Gradually) यह काम के लिए नियन्त्रण कक्ष (Control Room) का कार्य करने लगती है।

b)

मन शासित करता है, क्योंकि मन काम की मुख्य शरणस्थली (Shelter) होता है और समय के साथ-साथ क्रमशः (Gradually) यह काम का नियन्त्रण कक्ष बन जाता है ।

c)

आत्मा शासित करता है, क्योंकि काम आत्मा का मुख्य शत्रु होता है अतएव समय के साथ-साथ क्रमशः यह काम का बंधक बन जाता है और काम के आदेशानुसार कार्य करने के लिए बाध्य हो जाता है।

d)

काम शासित करता है, क्योंकि मन, बुद्धि तथा इन्द्रियाँ काम के निवास स्थान हैं जिनके माध्यम से काम सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर दोनों को प्रभावित कर जीवात्मा को अपना बंधक बना लेता है।

7.

जीवात्मा को काम के चंगुल (Grip) से मुक्त होने के लिए क्या करना होता है ?

a)

जीवात्मा को परमात्मा के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित करना होता है।

b)

जीवात्मा को बुद्धि की संकल्प शक्ति के द्वारा काम चक्रव्यूह को तोड़ना होता है।

c)

जीवात्मा को मन द्वारा इन्द्रियों की समस्त कार्यप्रणाली को रोकना होता है।

d)

जीवात्मा को सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर के समस्त शारीरिक कार्यों को बन्द करना होता है।

8.

श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 3.42 में मन को सशक्त करने की क्या विधि बताई है ?

a)

बुद्धिपूर्वक अपने मन को भगवान् के शरणागत होकर कृष्णभावनामृत में लगाना।

b)

बुद्धिपूर्वक अपनी इन्द्रियों को मन के शरणागत होकर पूर्णत: काम में प्रवृत्त करना।

c)

बुद्धिपूर्वक अपने मन को सदैव इन्द्रियतृप्ति में अभिनिविष्ट करके रखना।

d)

बुद्धिपूर्वक अपने मन को आत्मा के शरणागत कर कृष्णभावनामृत में लगाना।

9.

जब इन्द्रियाँ सर्पों के समान बलिष्ट होती हैं, तो फिर इन्द्रियों की तुलना दन्त विहीन सर्पों से क्यों की गई है ?

a)

वास्तव में इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल होती हैं, क्योंकि भौतिक शरीर निरन्तर परिवर्तनशील होता है अत: वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ दन्त विहीन सर्पों की भान्ति निष्प्रभाव हो जाती हैं ।

b)

वास्तव में इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल होती हैं, परन्तु निरन्तर विषयभोग में रत रहने के कारण अन्तत: इन्द्रियाँ दन्त विहीन सर्पों की भान्ति निष्प्रभाव हो जाती हैं।

c)

वास्तव में इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल होती हैं, परन्तु फिर भी किसी को भी कोई हानि नहीं पहुँचाती हैं इसीलिए इनकी तुलना दन्त विहीन सर्पों से की गई है।

d)

वास्तव में इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल होती हैं, परन्तु जब जीवात्मा बुद्धिपूर्वक अपने मन को भगवान् के शरणागत होकर कृष्णभावनामृत में अभिनिविष्ट कर देता है, तो इन्द्रियाँ दन्त विहीन सर्पों की भान्ति निष्प्रभाव हो जाती हैं ।

10.

काम के अतिरिक्त मनुष्य के और कौन-कौन से शत्रु हैं ?

a)

मन तथा बुद्धि मनुष्य के परम शत्रु हैं।

b)

प्रभुत्व तथा इन्द्रियतृप्ति की इच्छाएँ मनुष्य के परम शत्रु हैं ।

c)

मन तथा इन्द्रियाँ मनुष्य के परम शत्रु हैं।

d)

मन तथा अहंकार मनुष्य के परम शत्रु हैं।

11.

मनुष्य मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को कैसे नियन्त्रित कर सकता है ?

a)

कृष्णभावनामृत की शक्ति के द्वारा

b)

बुद्धि की संकल्प शक्ति के द्वारा

c)

मन की शीतलता के द्वारा

d)

इन्द्रियों के संयमन के द्वारा

12.

मनुष्य की सांसारिक जीवन की अपरिपक्व (Immature) अवस्था से आपका क्या अभिप्राय है ?

a)

मनुष्य के मन, इन्द्रियों, बुद्धि इत्यादि महत्वपूर्ण अवयवों का सुव्यवस्थित (Well Organized) होते हुए भी निरंतर इन्द्रियतृप्ति में रत में होना।

b)

मनुष्य के मन, इन्द्रियों, बुद्धि इत्यादि महत्वपूर्ण अवयवों (Constituents) का निरंतर इन्द्रियतृप्ति में रत होने के कारण विकृत्त (Distorted)अवस्था में होना।

c)

मनुष्य के ज्ञान का प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा आच्छादित होना और फलत: (as a result of) उत्पन्न अज्ञानता की अवस्था में होना।

d)

मनुष्य का भौतिक विषय भोगों और भौतिक उपलब्धियों के लिए कठोर उद्यमों (Efforts) में निरंतर निमग्न (immersed) रहने की अवस्था।

13.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.41 से 3.43 तक भगवान् श्रीकृष्ण ने काम को जीतने के लिए जिस विधि का उपदेश दिया है उसका वर्णन करें ?

a)

आत्मा की स्वभाविक उत्कृष्टता (Sublimity) को जानकर मन को व्यवसायात्मिका बुद्धि के द्वारा स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा काम रूपी दुर्जेय शत्रु को जीता जा सकता है।

b)

आत्मा की वैधानिक (Constitutional) स्थिति अर्थ भगवान् के अंश स्वरुप जानकर मन को व्यवसायात्मिका बुद्धि के द्वारा स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा काम रूपी दुर्जेय (Formidable) शत्रु को जीता जा सकता है।

c)

आत्मा की आध्यात्मिक स्थिति अर्थात परम भगवान् के सेवक के रूप में जानकर मन को व्यवसायात्मिका बुद्धि के द्वारा स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा काम रूपी दुर्जेय शत्रु को जीता जा सकता है।

d)

आत्मा को मन और बुद्धि से उच्च जानकर मन को व्यवसायात्मिका बुद्धि के द्वारा स्थिर करके आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा काम रूपी दुर्जेय शत्रु को जीता जा सकता है।

14.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.41 से 3.43 में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की विधि को इंगित किया है, कृपया इस विधि का वर्णन करें।

a)

कृष्णभावनामृत को क्रमशः विकसित करके भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से प्रभावित हुए बिना अपने शुद्ध स्वरूप के प्रति लक्षित शुद्ध अहँकार के द्वारा आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ जा सकता है।

b)

कृष्णभावनामृत को क्रमशः विकसित करके मन तथा बुद्धि से प्रभावित हुए बिना अपने शुद्ध स्वरूप के प्रति लक्षित (Aimed) शुद्ध काम के द्वारा आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ जा सकता है।

c)

कृष्णभावनामृत को क्रमशः विकसित करके भौतिक इन्द्रियों तथा मन से प्रभावित हुए बिना अपने शुद्ध स्वरूप के प्रति लक्षित स्थिर बुद्धि से आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ जा सकता है।

d)

कृष्णभावनामृत को क्रमशः विकसित करके मन तथा बुद्धि से प्रभावित हुए बिना अपने शुद्ध स्वरूप के प्रति लक्षित शुद्ध भौतिक इन्द्रियों के द्वारा आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ जा सकता है।

15.

श्लोक संख्या 4.1 में भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के बारे में क्या बताते हैं ?

a)

श्रीमद्भगवद्गीता का इतिहास

b)

श्रीमद्भगवद्गीता की पूर्व गुरु-परम्परा

c)

श्रीमद्भगवद्गीता के अधिकृत्त प्रवक्ता

d)

श्रीमद्भगवद्गीता की अमर योगविद्या

16.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.1 में भगवान् श्रीकृष्ण ने गुरु-शिष्य परम्परा का जो क्रम बताया है उसे पहचानें।

a)

भगवान् श्रीकृष्ण - मनु - सूर्यदेव विवस्वान् - इक्ष्वाकु

b)

भगवान् श्रीकृष्ण - सूर्यदेव विवस्वान् - इक्ष्वाकु - मनु

c)

भगवान् श्रीकृष्ण - सूर्यदेव विवस्वान् - मनु - इक्ष्वाकु

d)

भगवान् श्रीकृष्ण - इक्ष्वाकु - सूर्यदेव विवस्वान् - मनु

17.

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता के इतिहास के बारे में बताकर क्या स्थापित किया ?

a)

यह कि अर्जुन श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम शिष्य नहीं है अपितु अनादि काल (Time immemorial) से गुरु-शिष्य परम्पराएँ स्थापित होती आ रही हैं।

b)

यह कि श्रीमद्भगवद्गीता तुच्छ सांसारिक विद्वानों के लिए लिखी गई कोई काल्पनिक पुस्तक नहीं, अपितु अनादि काल से ज्ञान का एक प्रामाणिक ग्रन्थ है ।

c)

यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान साधारण सांसारिक मनुष्यों को नहीं, अपितु अपने अनन्य भक्तों को दिया है।

d)

यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ने इसके माध्यम से अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता की पूर्ववर्ती सत्ता से अवगत् करवाया है ।

18.

यदि राजन्यवर्ग (The Royal Order) श्रीमद्भगवद्गीता की विद्या को सीखता है, तो आपके अनुसार सामान्य जनता इनमें से किस लाभ से अत्याधिक लाभान्वित (Benefited) होती है ?

a)

फलत: सामान्य जनता को भगवद् प्रणीत (Framed) विधि-विधानों के अनुसार इन्द्रियभोग के लिए अनुकूल, सुविधाजनक एवं सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था प्राप्त होती है।

b)

फलत: सामान्य जनता को भगवद विषयक ज्ञान प्राप्त करने के समुचित (Appropriate) अवसर प्राप्त होते हैं ताकि वे भगवद्भावनाभावित (God conscious) होने का प्रयास कर सकें।

c)

फलत: सामान्य जनता को उच्चकोटि की शिक्षा, संस्कृति तथा श्रेष्ठ जीवनशैली सीखने के सुअवसर सुलभ (Accessible) होते हैं।

d)

फलत: कृष्णभावनामृत विद्या का प्रचार होता है, जिससे सामान्य जनता मनुष्य जीवन के महत्त्व को समझकर, इस महाविद्या द्वारा इस सुअवसर का लाभ उठाकर जीवन की सर्वोच्च सिद्धि (Highest perfection of life) अर्थात भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकती है।

19.

भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता की विद्या के लिए अर्जुन से पूर्ववर्ती (Previously) गुरु-परम्परा के लिए सूर्यदेव विवस्वान को ही क्यों चुना ?

a)

क्योंकि सूर्यदेव उष्मा तथा प्रकाश प्रदान करके अन्य समस्त लोकों को अपने नियन्त्रण में रखते हैं।

b)

क्योंकि सूर्यदेव समस्त लोकों के राजा तथा उद्गम (Origin) होता है और राजन्यवर्ग के लिए श्रीमद्भगवद्गीता की विद्या को ग्रहण करना अनिवार्य होता है।

c)

क्योंकि सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने के लिए श्रीकृष्ण के आदेश पर घूमते हैं।

d)

क्योंकि वर्तमान समय में सूर्य ग्रह पर शासन करने वाले विवस्वान श्रीकृष्ण के अनन्य (Matchless) भक्त हैं।

20.

सूर्यदेव विवस्वान ने परमेश्वर संबंधी श्रीमद्भगवद्गीता के विज्ञान का उपदेश मनुष्यों के जनक मनु को कब दिया ?

a)

त्रेतायुग के प्रारंभ में

b)

द्वापर युग के प्रारंभ में

c)

सतयुग के प्रारंभ में

d)

कलियुग के प्रारंभ में

21.

कलियुग की पूर्ण आयु कितनी है? और उसमें से अब तक कितने वर्ष बीत चुके हैं?

a)

कलियुग की पूर्ण आयु 4,23,000 है और उसमें से अब तक 5000 वर्ष बीत चुके हैं।

b)

कलियुग की पूर्ण आयु 4,27,000 है और उसमें से अब तक 5000 वर्ष बीत चुके हैं।

c)

कलियुग की पूर्ण आयु 4,32,000 है और उसमें से अब तक 5000 वर्ष बीत चुके हैं।

d)

कलियुग की पूर्ण आयु 4,42,000 है और उसमें से अब तक 5000 वर्ष बीत चुके हैं।

22.

मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को श्रीमद्भगवद्गीता का यह विशुद्ध ज्ञान लगभग कितने वर्ष पूर्व दिया?

a)

12,04,00,000 वर्ष पूर्व

b)

30,43,00,000 वर्ष पूर्व

c)

12,00,000 वर्ष पूर्व

d)

20,00,000 वर्ष पूर्व

23.

श्रीमद्भगवद्गीता का यह ज्ञान अपौरुषेय क्यों कहलाता है ?

a)

क्योंकि यह भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्घाटित हुआ है।

b)

क्योंकि यह किसी पुरुष के द्वारा नहीं कहा गया है।

c)

क्योंकि यह निराकार परब्रह्म द्वारा कहा गया है।

d)

क्योंकि यह काल के गर्भ से प्रकट हुआ है।

24.

श्रीमद्भगवद्गीता के इस परम विज्ञान को ग्रहण करने की व्यवहारिक विधि क्या है ?

a)

श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को प्रामाणिक गुरु -परंपरा से यथारूप में ग्रहण करना चाहिए।

b)

श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को अप्रामाणिक गुरु -परंपरा से यथारूप में ग्रहण करना चाहिए।

c)

श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को प्रमाणिक गुरु -परंपरा से तार्किक क्षमता के द्वारा ग्रहण करना चाहिए।

d)

श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान का स्वाध्ययन कर शुष्क चिंतन के आधार पर ग्रहण करना चाहिए।

25.

श्रीमद्भगवद्गीता विशेष रूप से किसके लिए कही गई और क्यों?

a)

राजर्षियों के लिए, ताकि वह सुशासन कर अपनी प्रजा की इंद्रियतृप्ति के लिए सुविधाएँ उपलब्ध करवा पाते।

b)

राजर्षियों के लिए, ताकि वह स्वयँ इस ज्ञान का लाभ उठाकर इस भवबंधन से छूट कर भगवद्धाम लौट सकें।

c)

राजर्षियों के लिए, ताकि वह इसके द्वारा मान-प्रतिष्ठा अर्जित करके अपनी प्रजा में लोकप्रिय बनकर शासन

व्यवस्था कर सकें।

d)

राजर्षियों के लिए, ताकि वह भगवद् प्रणीत विधि-विधान तथा नीति संगत शासन कर प्रजा के लिए भक्त्यानुकूल परिस्थितियाँ सुलभ करवा पाते।

26.

कालक्रम में गुरु परम्परा के छिन्न होने का मूल कारण क्या है ?

a)

गुरु-परम्परा में आसुरी तत्वों के प्रविष्ट हो जाने से, मूल सिद्धांतों को हटाकर स्वार्थ पूर्ण सिद्धांतों को स्थापित कर देना ।

b)

आसुरी व असाधु पुरुषों द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता की स्वार्थपूर्ण विवेचना कर नवीन गुरु-परम्परा स्थापित कर देना ।

c)

गुरु-परम्परा का अपनी इंद्रियतृप्ति के लिए आसुरी तत्त्वों द्वारा अतिक्रमण कर लेना ।

d)

गुरु-परम्परा द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के परम विज्ञान का यथारूप में प्रचार न कर पाना ।

27.

गुरु-परम्परा का क्या महत्त्व है ? स्पष्ट करें ।

a)

गुरु-परम्परा ही एकमात्र प्रामाणिक साधन है जिसके माध्यम से भगवान् विषयक ज्ञान-विज्ञान यथारूप (As it is) में सामान्यजनों तक पहुँचता है।

b)

प्रामाणिक गुरु-परम्परा ही एकमात्र साधन है जिसके माध्यम से भगवान् विषयक ज्ञान-विज्ञान यथारूप में सामान्यजनों तक पहुँचता है।

c)

गुरु-परम्परा ही एकमात्र साधन है जो मनुष्य समाज में जीवन के अतुलनीय मूल्यों (Matchless values) की व्यवस्था को सुनिश्चित करती है।

d)

हम मनुष्यों को जीवन के प्रत्येक पहलु (Aspect) में सफलता प्राप्त करने के लिए किसी न किसी गुरु-परम्परा का अनुकरण (Imitation) करना होता है।

28.

जब बाज़ार में श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न भाषाओँ में इतने सारे संस्करण (Editions) उपलब्ध हैं तो श्रील प्रभुपाद जी द्वारा "श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप" के रूप में एक और टीका (Commentary) की क्या आवश्यकता थी ? स्पष्ट करें।

a)

बाज़ार में उपलब्ध श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न संस्करणों में दार्शिनकों (Philosophers) के निजी स्वार्थों के कारण केवल धर्मविहीन दर्शन (Philosophy) ही हैं, अतएव श्रील प्रभुपाद जी ने हिन्दू धर्म के व्यापक प्रचार (Wide publicity) के लिए ही "श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप" की रचना की है।

b)

बाज़ार में उपलब्ध श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न संस्करणों में दार्शिनकों के निजी स्वार्थों के कारण केवल दर्शनविहीन धर्म ही हैं, अतएव श्रील प्रभुपाद जी ने "श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप" के रूप में वास्तविक दर्शन देकर हिन्दू धर्म को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। उनका यह प्रयास अद्वितीय (Unprecedented) है, अतएव हम सभी सदैव उनके ऋणी रहेंगे।

c)

बाज़ार में उपलब्ध श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न संस्करणों में दार्शिनकों के स्वार्थपूर्ण दर्शन सामान्यजनों को वास्तविक ज्ञान द्वारा लाभान्वित करने वाले नहीं अपितु अपने दोषपूर्ण ज्ञान द्वारा दिग्भ्रमित (Deluded) करने वाले हैं । इसीलिए श्रील प्रभुपाद जी ने हम जैसे सामान्यजनों तक भगवान् के वास्तविक सन्देश, जो उन्हें प्रामाणिक गुरु-परम्परा से प्राप्त हुआ है, को पहुँचाने के लिए ही "श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप" की रचना की है।

d)

बाज़ार में उपलब्ध विभिन्न संस्करणों में आसुरी दार्शिनक अपने निजी स्वार्थों के कारण श्रीमद्भगवद्गीता के वक्ता श्रीकृष्ण को भगवान् नहीं मानते हैं, अपितु कृष्ण नाम पर व्यापार करते हैं। अतएव श्रील प्रभुपाद जी ने ऐसे दार्शनिकों के प्रतिकार एवं भगवान् की यथास्थिति को पुन: स्थापित करने हेतु "श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप" की रचना की है।

29.

भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से किस परम विद्या का ज्ञान दिया है ?

a)

जीवात्मा के भगवान् के साथ शाश्वत सम्बन्ध के विषय में

b)

जीवात्मा और परमात्मा के परस्पर संघर्ष के विषय में

c)

जीवात्मा और परब्रह्म के परस्पर दायित्वों के विषय में

d)

जीवात्मा के भौतिक जगत के साथ सम्बन्ध के विषय में

30.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.3 में श्रीभगवान् ने इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझने की क्या योग्यता बताई है ?

a)

श्रीमद्भगवद्गीता के विद्यार्थी का मित्र होना अनिवार्य है, अर्थात श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार कर, उन्हें शर्तरहित समर्पण कर देना।

b)

श्रीमद्भगवद्गीता के विद्यार्थी का आलोचक होना अनिवार्य है, अर्थात जो सदैव श्रीकृष्ण की ईर्ष्यावश आलोचना करता रहता हो।

c)

श्रीमद्भगवद्गीता के विद्यार्थी का संयोजक होना अनिवार्य है, अर्थात जो श्रीकृष्ण के इस विज्ञान को जन साधारण तक पहुँचाने की व्यवस्था करने का सामर्थ्य रखता हो।

d)

श्रीमद्भगवद्गीता के विद्यार्थी का भक्त होना अनिवार्य है, अर्थात श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार कर, उन्हें शर्तरहित (Unconditional) समर्पण कर देना।

31.

भक्तों की टीकाओं और असुरों की टीकाओं में भेद होने का मूल कारण क्या है ?

a)

असुरों द्वारा श्रीकृष्ण को परम भगवान् स्वीकार न करना।

b)

भक्तों द्वारा श्रीकृष्ण को परम भगवान् स्वीकार न करना।

c)

असुरों के द्वारा अपने निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देना।

d)

भक्तों के द्वारा भगवान् के स्वार्थों को प्राथमिकता देना।

32.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.4 में अर्जुन द्वारा प्रश्न किए जाने का मुख्य आशय (Intent) क्या था ?

a)

अर्जुन का यह प्रश्न करने का आशय स्वयं को इस संशय (Doubt) से उबारने के लिए है कि श्री कृष्ण ही परम भगवान् हैं ।

b)

अर्जुन का यह प्रश्न करने का आशय आसुरी प्रवृत्ति के लोगों के स्पष्टीकरण हेतु है कि श्री कृष्ण ही परम भगवान् हैं ।

c)

अर्जुन का यह प्रश्न करने का आशय यह सुनिश्चित (Ascertain) करना है कि जिन श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में वह यह युद्ध करने वाला है, वही परम भगवान् हैं।

d)

अर्जुन का यह प्रश्न करने का आशय यह है कि मैं जिनका भक्त हूँ क्या श्रीकृष्ण वही परम भगवान् हैं ।

33.

सामान्य व्यक्ति के लिए इनमें से कृष्ण के बारे में क्या समझ पाना अत्यंत कठिन होता है ?

a)

यह कि श्रीकृष्ण किस प्रकार अपनी भगवत्ता (Godliness) को व्यवस्थित कर पाते हैं।

b)

यह कि यदि कृष्ण भगवान् हैं तो उन्हें माँ के गर्भ से जन्म लेने की क्या आवश्यकता है।

c)

यह कि कृष्ण किस प्रकार उसी शाश्वत आदिपुरुष श्री भगवान् के रूप में बने रहते हैं।

d)

यह कि कृष्ण मनुष्य हैं या फिर मनुष्य रूप में निर्विशेष (Impersonal) ब्रह्म।

34.

मनुष्य के लिए इनमें से क्या जानना अत्यावश्यक है ?

a)

तांत्रिक विद्या

b)

संगीत विद्या

c)

कृष्ण विद्या

d)

शास्त्रीय विद्या

35.

श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप में निम्न में से किस को रंचमात्र भी भ्रम नहीं होता?

a)

जो अर्जुन की कोटि का भक्त हो ।

b)

जो दुर्योधन की कोटी का भक्त हो ।

c)

जो धृत्तराष्ट्र की कोटि का भक्त हो ।

d)

जो शकुनि की कोटि का भक्त हो ।

36.

जीवात्मा सब कुछ भूल जाता है और भगवान् को सब कुछ याद रहता है ऐसा कैसे संभव है ? स्पष्ट करें ।

a)

जीवात्मा सदैव इंद्रियभोग की नई-नई कल्पनाओं में मग्न रहता है जबकि भगवान् सदैव जीवों के इंद्रियभोग के लिए सुविधाओं की व्यवस्था में रत रहते हैं ।

b)

जीवात्मा का शरीर तथा बुद्धि परिवर्तनीय है जबकि भगवान् का शरीर तथा बुद्धि सच्चिदानंद होने के कारण अपरिवर्तनीय हैं ।

c)

जीवात्मा सदैव भविष्य की चिंताओं में लगा रहता है जबकि भगवान् वर्तमान, भूत और भविष्य काल के रिकॉर्ड की व्यवस्था में लगे रहते हैं ।

d)

जीवात्मा क्षणभंगुर होता है जबकि भगवान् परम प्रमाण होते हैं।

37.

इनमें से कौन सा भगवान् का गुण नहीं है ?

a)

अद्वैत

b)

अनादि

c)

पुरातन

d)

च्युत

38.

क्या भगवान् के अवतार तथा अंशावतार अपना-अपना प्रयोजन समाप्त होने के उपरान्त विलुप्त (Extinct) हो जाते हैं ?

a)

नहीं, क्योंकि भगवान् अपने अवतारों तथा अंशावतारों में नित्य उपस्थित रहते है ।

b)

नहीं, क्योंकि भगवान् के अवतारों तथा अंशावतारों का प्रयोजन कभी समाप्त नहीं होता है ।

c)

हाँ, जिस प्रकार दीपक का प्रकाश ईंधन समाप्त होने पर लुप्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् के अवतार तथा अंशावतार भी विलुप्त हो जाते हैं।

d)

हाँ, जिस प्रकार एक मनुष्य की विशिष्ट कर्मावधि के उपरांत मृत्यु हो जाती है ठीक उसी प्रकार भगवान् के अवतार तथा अंशावतार भी विलुप्त हो जाते हैं।

39.

भगवान् तथा भगवान् के विभिन्न अवतारों को इनमें से कौन यथावत समझ सकता है ?

a)

आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति

b)

वैदिक शास्त्रों का ज्ञाता

c)

विशुद्ध निष्काम भक्त

d)

धर्मावलंबी व्यक्ति

40.

अंशरूप जीवात्मा तथा परमेश्वर में क्या अंतर है ?

a)

अंशरूप जीवात्मा भुलक्कड़ है और परमेश्वर घुमक्कड़ है ।

b)

अंशरूप जीवात्मा भोक्ता है और परमेश्वर भोग्य वस्तुओं का प्रदाता है ।

c)

अंशरूप जीवात्मा नित्य भौतिक है और परमेश्वर नित्य आध्यात्मिक हैं ।

d)

अंशरूप जीवात्मा को स्मरण नहीं रहता, जबकि परमेश्वर को सब स्मरण रहता है ।

41.

भौतिक दृष्टि से जीव चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो वह कभी भी परमेश्वर की समता नहीं कर सकता । ऐसा क्यों ?, स्पष्ट करें ।

a)

क्योंकि भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि शरीर के साथ अपरिवर्तित होती है, जबकि परमेश्वर परिवर्तनीय हैं ।

b)

क्योंकि भौतिक वस्तुओं का अस्तित्व काल के अधीन होता है, जबकि परमेश्वर कालातीत (Beyond time) हैं ।

c)

क्योंकि भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि आनंदवर्धक होती है, जबकि परमेश्वर रसहीन हैं ।

d)

क्योंकि भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि इस जगत में मान-प्रतिष्ठा बढ़ाती है, जोकि परमेश्वर की कृपावश ही होता है।

42.

अच्युत (Infallible) से आपका क्या अभिप्राय है ?

a)

जिसका भौतिक पतन नहीं, अपितु आध्यात्मिक पतन होता है ।

b)

जिसका भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों परिस्थितियों में पतन संभव होता है ।

c)

जिसका भौतिक संपर्क में रहते हुए भी पतन नहीं होता है ।

d)

जो विचारों से तो आध्यात्मिक होता है परंतु शारीरिक रूप से भौतिक होता है।

43.

बद्ध जीव तथा मुक्त जीव में क्या मूल अन्तर होता है ?

a)

बद्ध जीव च्युत होता है, जबकि मुक्त जीव अच्युत होता है ।

b)

बद्ध जीव नित्य माया का संगी होता है, जबकि मुक्त जीव नित्य भगवान् का संगी होता है ।

c)

बद्ध जीव द्वैत होता है, जबकि मुक्त जीव अद्वैत होता है ।

d)

बद्ध जीव भौतिक प्रकृति के अधीन होता है, जबकि मुक्त जीव भौतिक प्रकृति से परे होता है ।

44.

अद्वैत से आपका क्या अभिप्राय है ?

a)

जिसके शरीर तथा आत्मा भिन्न होते हैं ।

b)

जिसके शरीर तथा आत्मा अभिन्न होते हैं ।

c)

जिसके शरीर तथा आत्मा दोनों दिव्य होते हैं ।

d)

जिसके शरीर तथा आत्मा दोनों क्षणभंगुर होते हैं ।

45.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.6 में भगवान् श्रीकृष्ण किसकी व्याख्या करते हैं ?

a)

भगवान् श्रीकृष्ण अपने जन्म की विलक्षणता तथा अपनी प्रकृति की व्याख्या करते हैं ।

b)

भगवान् श्रीकृष्ण अपने भगवान् बनने तथा भगवान् बने रहने के लिए संघर्ष की व्याख्या करते हैं।

c)

भगवान् श्रीकृष्ण अपने ऐश्वर्यों की व्याख्या करते हैं ।

d)

भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अपने स्वामित्व के भाव को प्रकट करते हैं।

46.

क्या भगवान् अपने हर अवतार के लिए एक नया शरीर धारण करते हैं ?

a)

नहीं, क्योंकि भगवान् के पास एक ही शरीर उपलब्ध है, हमारी जैसी विविध योनियों की सुविधा उनके पास उपलब्ध नहीं है।

b)

हाँ, क्योंकि जिस शरीर का जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्यम्भावी होती है ।

c)

नहीं, भगवान् अपने आदि, पुरातन, अजन्मा, अविनाशी, नित्य नवयौवन युक्त शरीर में ही प्रकट होते हैं ।

d)

हाँ, यदि ऐसा न होता तो उनके अलग-अलग रूपों में अवतार कैसे संभव होते ।

47.

भगवान् के चिर यौवन का क्या रहस्य है ?

a)

क्योंकि भगवान् का दिव्य शरीर अव्ययातीत है ।

b)

क्योंकि भगवान् का दिव्य शरीर त्रिगुणातीत है ।

c)

क्योंकि भगवान् का दिव्य शरीर कालातीत है ।

d)

क्योंकि भगवान् का दिव्य शरीर अध्यात्मातीत है ।

48.

यदि भगवान् का दिव्य शरीर कालातीत है तो बाल्यावस्था से युवावस्था तक कैसे बढ़ता है ?

a)

अपने भक्तों को लीला माधुर्य के विविध रस प्रदान करने हेतु भगवान् श्रीकृष्ण माता के गर्भ से शिशु रूप में प्रकट होकर युवावस्था तक बढ़ने के लिए काल की शरण ग्रहण करते हैं । तत्पश्चात काल का पराभव कर देते हैं ।

b)

अपने भक्तों को लीला माधुर्य के विविध रस प्रदान करने हेतु भगवान् श्रीकृष्ण माता के गर्भ से शिशु रूप में प्रकट होकर युवावस्था तक अपनी माया शक्ति के प्रभाव से बढ़ते हैं ।

c)

अपने भक्तों को लीला माधुर्य के विविध रस प्रदान करने हेतु भगवान् श्रीकृष्ण माता के गर्भ से शिशु रूप में प्रकट होकर युवावस्था तक बढ़ते हैं, ऐसा काल के प्रभाव से नहीं अपितु भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य भाव के कारण होता है ।

d)

अपने भक्तों को लीला माधुर्य के विविध रस प्रदान करने हेतु भगवान् श्रीकृष्ण माता के गर्भ से शिशु रूप में प्रकट होकर युवावस्था तक ही बढ़ते हैं । ताकि वे भौतिक जगत के संकटों का सामना करने की क्षमता सदैव उनके शरीर में बनी रहे ।

49.

इनमें से क्या भगवान् के आविर्भाव तथा तिरोभाव के वास्तविक अर्थ को समझाता है ?

a)

परिवर्तनीय तथा अपरिवर्तनीय ।

b)

जन्म होना तथा मृत्यु होना ।

c)

प्रकट होना तथा अप्रकट होना ।

d)

व्यय होना तथा अव्यय होना ।

50.

भगवान् का अपने भक्तों के समक्ष अपने आद्य रूप में प्रकट होने का क्या कारण है ?

a)

भगवान् का अपने ऐश्वर्यों को प्रकट करने का भाव ।

b)

भगवान् की अपने भक्तों के प्रति अहैतुकी कृपा ।

c)

भगवान् का अपने भक्तों के प्रति वत्सलता का भाव ।

d)

भगवान् का अपने भक्तों के प्रति अपनी शक्तियों को प्रदर्शित करने का भाव ।

51.

विश्वकोष के अनुसार आत्म-माया शब्द का क्या अर्थ है ?

a)

आत्म-माया शब्द भगवान् के दिव्य गुणों की सूची है ।

b)

आत्म-माया शब्द भगवान् के दिव्य नामों की सूची है ।

c)

आत्म-माया शब्द भगवान् के दिव्य धामों की सूची है ।

d)

आत्म-माया शब्द भगवान् की अहैतुकी कृपा का सूचक है ।