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Worksheets39. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_9.03–9.08
Total questions: 47
Worksheet time: 1hrs 17mins
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कृष्णभावनामृत के विकास में श्रद्धा की क्या भूमिका होती है ?
कृष्णभावनामृत तथा श्रद्धा एक दूसरे के अनुपूरक होते हैं ।
कृष्णभावनामृत तथा श्रद्धा में केवल मात्र सैद्धान्तिक सम्बन्ध ही होता है ।
कृष्णभावनामृत का केवल क्रमिक विकास ही श्रद्धा पर निर्भर होता है, त्वरित विकास नहीं ।
कृष्णभावनामृत के विकास में श्रद्धा का कोई स्थान नहीं होता है ।
मनुष्य के हृदय में श्रद्धा की उत्पत्ति कैसे होती है ?
भक्तों की संगति से
वैदिक शास्त्रों अध्ययन से
शुष्क मानसिक चिंतन से
धार्मिक अनुष्ठानों से
कृष्णभावनामृत की प्रगति में मुख्य अवयव क्या है ?
श्रद्धा
भावना
ज्ञान
कर्म
चैतन्यचरितामृत में वास्तविक श्रद्धा को कैसे परिभाषित किया गया है ?
यह पूर्ण विश्वास कि कृष्ण की सेवा द्वारा ही सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की जा सकती है । वास्तविक श्रद्धा कहलाती है ।
यह पूर्ण विश्वास कि मनुष्य इन्द्रियभोग की चरम प्राप्ति के उपरान्त ही मुक्ति के लिए प्रयास करता है । वास्तविक श्रद्धा कहलाती है ।
यह पूर्ण विश्वास कि "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" ही आध्यात्मिक ज्ञान की पराकाष्ठा है । वास्तविक श्रद्धा कहलाती है ।
यह पूर्ण विश्वास कि जीवात्मा का निर्विशेष ब्रह्म या निराकार ब्रह्म में विलयीकरण ही सर्वोच्च सिद्धि है । वास्तविक श्रद्धा कहलाती है ।
वृक्ष की जड़ को सींचने का उदाहरण भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में क्या उद्धृत करता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्यसेवा करने से सारे देवता तथा अन्य समस्त जीव स्वतः प्रसन्न हो जाते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण भी हमारी भान्ति एक सामान्य जीव हैं जिनके परम उद्गम निराकार ब्रह्म हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ही जल के अधिष्ठाता देव हैं जिनसे हम सभी जीवों को पोषण हेतु जल प्राप्त होता है ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ही हम सभी जीवों में निराकार ब्रह्म के प्रधान सेवक हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता का क्या निष्कर्ष है ?
यह कि मनुष्य को अन्य समस्त कार्यों को छोड़कर केवल भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए ।
यह कि कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग में से कर्मयोग सर्वश्रेष्ठ है, अतः मनुष्य को कर्मयोग का अनुशीलन करना चाहिए ।
यह कि कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग में से ज्ञानयोग सर्वश्रेष्ठ है, अतः मनुष्य को ज्ञानयोग का अनुशीलन करना चाहिए ।
यह कि कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग में से ध्यानयोग सर्वश्रेष्ठ है, अतः मनुष्य को ध्यानयोग का अनुशीलन करना चाहिए ।
कृष्णभावनामृत की विधि क्या है ?
श्रद्धा का विकास
ज्ञान का प्रकाश
सत्य की सिद्धता
भावना का अमृत
कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की तीन कोटियाँ हैं जो भक्ति का अनुशीलन करते हैं । निम्न में से प्रथम कोटि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को पहचानें ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में निपुणता ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं ।
कृष्ण भक्ति में श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में श्रद्धा का अभाव ।
इनमें से कोई नहीं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की तीन कोटियाँ हैं जो भक्ति का अनुशीलन करते हैं । निम्न में से द्वितीय कोटि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को पहचानें ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में निपुणता ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं ।
कृष्ण भक्ति में श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में श्रद्धा का अभाव ।
इनमें से कोई नहीं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की तीन कोटियाँ हैं जो भक्ति का अनुशीलन करते हैं । निम्न में से तृतीय कोटि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को पहचानें ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में निपुणता ।
कृष्ण भक्ति में दृढ़ श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं ।
कृष्ण भक्ति में श्रद्धा + भक्ति शास्त्रों में श्रद्धा का अभाव ।
इनमें से कोई नहीं ।
निम्न में से वह कौन सा व्यक्ति है जिसे कृष्णभावनामृत का मार्ग कठिन प्रतीत होता है और जिसे सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होने की संभावना बहुत कम है ?
जिनमें कृष्ण तथा भक्ति की श्रेष्ठता के विषय में सुनने के उपरान्त भी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो पाती है ।
जो कृष्ण के महिमामण्डन को उनकी प्रशंसा मात्र समझते हैं ।
जो कृष्ण को सर्वस्व का मूल नहीं अपितु उन्हें भी निरकार परब्रह्म का अवतार मानते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं । ऐसे सभी व्यक्तियों को कृष्णभावनामृत का मार्ग कठिन प्रतीत होता है ।
भक्ति में स्थिरता और प्रगति का मूल आधार क्या होता है ?
श्रद्धा की दृढ़ता
ज्ञान की पराकाष्ठा
समस्त ऊर्जा का संकेन्द्रिकरण
अनर्थ निवृत्ति
यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् के किस रूप द्वारा व्याप्त है ?
अव्यक्त
व्यक्त
बृहद
अन्यून
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.4 में सम्पूर्ण जगत् को धारण करने वाले अपने रूप को अव्यक्त क्यों कहा है ?
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण भौतिक इन्द्रियों के द्वारा अनुभवगम्य नहीं हैं ।
क्योंकि भगवान् का शरीर अत्यन्त विशाल है और हम इसमें व्याप्त छोटे से कण के समान हैं ।
क्योंकि भगवान् असीमित एवं निराकार हैं, अतः उन्हें अनुभव कर पाना असंभव है ।
क्योंकि भगवान् अपने इस रूप को कभी भी व्यक्त नहीं करते हैं ।
श्लोक संख्या 9.4 में भगवान् श्रीकृष्ण के कथन "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: - समस्त जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।" से आप क्या समझते हो ? स्पष्ट करें ।
यह कि समस्त जीवों सहित समस्त सृष्टि में भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्वांश रूप में व्याप्त है और भगवान् स्वयँ भी अपने स्वांश रूप में ही उनमें उपस्थित होते हैं, पूर्ण साकार रूप में नहीं ।
यह कि समस्त जीवों सहित समस्त सृष्टि में भगवान् अपनी ब्रह्मज्योति के रूप में व्याप्त है और भगवान् स्वयँ भी अपनी ज्योति के रूप में ही उनमें उपस्थित होते हैं, पूर्ण साकार रूप में नहीं ।
यह कि समस्त जीवों सहित समस्त सृष्टि में भगवान् अपनी अचिंत्य शक्ति के रूप में व्याप्त है और भगवान् स्वयँ भी अपनी अचिंत्य शक्ति के रूप में ही उनमें उपस्थित होते हैं, पूर्ण साकार रूप में नहीं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवद्साक्षात्कार के लिए एकमात्र प्रामाणिक विधि क्या है ?
गुरु, साधू (वरिष्ठ भक्त) एवं शास्त्र के समुचित निर्देशन में भक्ति करना ।
गुरु, साधू (वरिष्ठ भक्त) एवं शास्त्र के समुचित निर्देशन में ध्यानयोग द्वारा भक्ति करना ।
गुरु, साधू (वरिष्ठ भक्त) एवं शास्त्र के समुचित निर्देशन में ज्ञानयोग द्वारा भक्ति करना ।
गुरु, साधू (वरिष्ठ भक्त) एवं शास्त्र के समुचित निर्देशन में कर्मयोग द्वारा भक्ति करना ।
ब्रह्मसंहिता के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण को सर्वत्र देखने की योग्यता क्या है ?
भगवान् के प्रति दिव्य प्रेमाभिरुचि ।
भगवान् के प्रति ईर्ष्या-द्वेष का भाव ।
भगवान् से तुल्यता की प्रतिस्पर्धा ।
भगवान् के प्रति उपहासात्मक दृष्टिकोण ।
वास्तव में सम्पूर्ण दृश्य जगत् क्या है ?
परा तथा अपरा शक्ति का संयोग मात्र ।
परा तथा तटस्थ शक्ति का संयोग मात्र ।
अपरा तथा तटस्थ शक्ति का संयोग मात्र ।
अपरा तथा अचिंत्य शक्ति का संयोग मात्र ।
"सर्वत्र फैले रहने पर भी भगवान् अपनी व्यक्तिगत् सत्ता नहीं खोते हैं ।" यह कैसे संभव है ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि भगवान् प्रत्येक परिस्थिति में पूर्ण रहते हैं । अपने असंख्य विस्तारों, अवतारों तथा प्रकाट्यों के बावज़ूद भी सदैव पूर्ण रहते हैं ।
क्योंकि सम्पूर्ण जगत की समस्त गतिविधियाँ भगवान् की शक्तियों द्वारा व्यवस्थित की जाती हैं, अतः उनकी सत्ता खोने का प्रश्न ही नहीं उठता है ।
क्योंकि भगवान् अपनी सत्ता को किसी साथ बांटते ही नहीं हैं, तो उनकी सत्ता खो जाने का कैसा भय ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.4 में कहा कि "सभी जीव मुझमें हैं ।" और श्लोक संख्या 9.5 में कहा कि "सारी वस्तुएँ मुझमें स्थित नहीं रहतीं ।" भगवान् श्रीकृष्ण के ऐसे विरोधाभासी वक्तव्य का क्या आशय है ? स्पष्ट करें ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस कथन में माध्यम से इस विराट अभिव्यक्ति से अपनी पृथकता को स्थापित किया है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने यह कथन अपने भक्तों को विचलित कर उनके समभाव की परीक्षार्थ कहा है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने यह कथन हम सामान्यजनों को भ्रमित करने के लिए कहा है ताकि उनकी स्थिति हमारे लिए सदैव गोपनीय बनी रहे ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने यह विरोधाभासी वक्तव्य इसलिए दिया है, ताकि उनके द्वारा अपनाई जाने वाली सृष्टि की प्रक्रिया गोपनीय बनी रहे ।
यदि भगवान् इस भौतिक जगत् के पालन तथा निर्वाह के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं हैं तो फिर कौन है ?
भगवान् प्रत्यक्ष नहीं अपितु अप्रत्यक्ष रूप से अपनी विभिन्न शक्तियों तथा विभिन्न विस्तारों के माध्यम से इस भौतिक जगत् की सृष्टि, धारण, पालन, एवं संहार के लिए उत्तरदायी होते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण नहीं अपितु भगवान् विष्णु तथा ब्रह्मा इस भौतिक जगत् के पालन तथा निर्वाह के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण नहीं अपितु एक अदृश्य शक्ति इस भौतिक जगत् के पालन तथा निर्वाह के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होती है ।
भगवान् श्रीकृष्ण नहीं अपितु दुर्गा देवी इस भौतिक जगत् के पालन तथा निर्वाह के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होती है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.5 के माध्यम से निम्न में से क्या उद्घाटित किया है ?
यह कि इस भौतिक जगत् की सृष्टि भगवान् की परम इच्छा पर निर्भर करती है । भगवान् इस भौतिक जगत् पर निर्भर नहीं करते हैं ।
यह कि भगवान् अपनी शक्तियों तथा विस्तारों के माध्यम से इस भौतिक जगत् एवं इसकी विविधताओं की सृष्टि करने पर भी स्वयँ इससे अनासक्त रहते हैं ।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् अपने ऐश्वर्य - शक्ति एवं वैराग्य को व्यक्त करते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
यदि भगवान् इस जगत् के क्रियाकलापों से पृथक रहते हैं तो फिर वो कहाँ रहते हैं ? और क्या करते हैं ?
भगवान् अपने नित्य धाम गोलोक वृन्दावन में रहते हैं । जहाँ वे नित्य लीलाएँ करते हैं ।
भगवान् तो निर्विशेष ब्रह्म हैं वो तो अदृश्य जगत् में रहते हैं । वहीं से इस भौतिक जगत् को नियंत्रित करते हैं ।
भगवान् तो अनन्त लोक में रहते हैं । जहाँ से वे इस भौतिक जगत् की सृष्टि तथा प्रलय का सञ्चालन करते हैं ।
भगवान् तो वैकुंठ जगत् के विभिन्न लोकों में अपने विभिन्न विस्तारों के रूप में रहते हैं और आध्यात्मिक जगत् का आनन्द लेते हैं ।
"भगवान् का संकल्प स्वयं एक तथ्य है ।" श्रील प्रभुपाद जी के इस कथन से आप क्या समझते हो ?
यह कि भगवान् के संकल्प मात्र से ही प्रत्येक वस्तु का सृजन, धारण, पालन एवं संहार स्वयमेव उनकी शक्तियों द्वारा हो जाता है ।
यह कि भगवान् का संकल्प ही भगवान् की मुख्य शक्ति है । जो अन्य समस्त शक्तियों का मुख्य स्त्रोत भी है ।
यह कि भगवान् का संकल्प ही हम जीवों की उत्पत्ति का मुख्य कारण एवं विघटन प्रक्रिया का प्रारंभिक बिंदु है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.5 में किस तथ्य को समझाते हैं ?
यद्यपि भगवान् समस्त सृष्टि के पालन तथा धारणकर्ता हैं । किन्तु वे इस सृष्टि का स्पर्श नहीं करते ।
केवल भगवान् की परम इच्छा से प्रत्येक वस्तु का सृजन, धारण, पालन तथा संहार होता है ।
प्रत्येक वस्तु में भगवान् अपने परमात्मा स्वरूप मे उपस्थित हैं परन्तु प्रत्येक वस्तु उनके मूल स्वरूप भगवान् में उपस्थित नहीं है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.6 में उद्धृत उदाहरण में आकाश तथा वायु को किसके तुलनात्मक प्रस्तुत किया है ?
आकाश - भगवान् की परम इच्छा तथा वायु – यह समस्त दृश्य जगत् अर्थात् भौतिक जगत् ।
आकाश - समस्त दृश्य जगत् तथा वायु - इस ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुएँ ।
आकाश - भगवान् स्वयँ तथा वायु - उनकी अचिन्य शक्ति ।
यह सभी तुलनाएँ सही हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.6 में आकाश तथा वायु के उदहारण से क्या रहस्य उद्घाटित किया है ?
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस उदहारण के माध्यम से समस्त भौतिक जगत् पर अपने सम्पूर्ण नियन्त्रण एवं उससे अपनी पृथकता को उद्घाटित किया है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस उदहारण के माध्यम से अपनी समस्त शक्तियों के रहस्यों को उद्घाटित किया है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस उदहारण के माध्यम से अपने समस्त विस्तारों की सार्थकता को प्रकट करने का प्रयास किया है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से क्या-क्या भगवान् की परम इच्छा के अधीन है ?
भौतिक जगत् की उत्पत्ति ।
जीवों का भौतिक जगत् में प्राकट्य एवं उनका पालन ।
भौतिक जगत् का संहार ।
यह सभी सत्य हैं ।
"वायु भगवान् के भय से प्रवाहित होती है।" यह किस उपनिषद में कहा गया है ?
तैत्तिरीय उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्
श्वेताश्वतर उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्
"भगवान् की अध्यक्षता में भगवान् के परमादेश से चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य लोक घूम रहे हैं।" यह किस उपनिषद में कहा गया है ?
तैत्तिरीय उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्
श्वेताश्वतर उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.6 के माध्यम से परमगुह्य ज्ञान से सम्बंधित कौन सा रहस्योद्घाटन किया है ?
यह कि इस भौतिक जगत् की समस्त अभिव्यक्तियाँ भगवान् की परम इच्छा पर निर्भर करती हैं ।
यह कि इस भौतिक जगत् की समस्त अभिव्यक्तियाँ परम शक्ति की परम इच्छा पर निर्भर करती हैं ।
यह कि इस भौतिक जगत् की समस्त अभिव्यक्तियाँ अव्यक्त निराकार ब्रह्म की परम इच्छा पर निर्भर करती हैं ।
यह कि इस भौतिक जगत् की समस्त अभिव्यक्तियाँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की परम इच्छा पर निर्भर करती हैं ।
कल्पक्षेय का क्या अर्थ है ?
ब्रह्मा की मृत्यु होने पर कल्पान्त ।
ब्रह्मा के दिन के उपरांत रात का आना ।
हम जीवों का अव्यक्त अवस्था में जाना ।
नवीन कल्प का प्रारम्भ ।
निम्न में से ब्रह्मा जी की आयु का सूत्र पहचानें ।
ब्रह्मा जी की आयु = 432,00,00,000 X 2 X30 X12 X 100 वर्ष ।
ब्रह्मा जी की आयु = (432,00,00,000 + 432,00,00,000) X360 X 100 वर्ष ।
ब्रह्मा जी की आयु = (17,28,000+12,96,000+8,64,000+4,32,000) X 1000 X 2 X30 X12 X 100 वर्ष ।
यह सभी सूत्र सही हैं ।
"एकोऽहं बहु स्याम - यद्यपि मैं अकेला हूँ, किन्तु मैं अनेक हो जाऊँगा ।" यह वैदिक सूक्ति किस उपनिषद् की है ?
तैत्तिरीय उपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद्
श्वेताश्वतर उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्
भगवान् श्रीकृष्ण की अपरा शक्ति किसके अधीन कार्य करती है ?
भगवान् की परम इच्छा के अधीन कार्य करती है ।
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की अध्यक्षता में कार्य करती है ।
समस्त जीवों की इच्छाओं के अधीन कार्य करती है ।
निर्विशेष ब्रह्म की अध्यक्षता में कार्य करती है ।
श्लोक संख्या 9.8 में निम्न में से वर्तमान युग की किस महान वैज्ञानिक उपलब्धि का खण्डन हुआ है ?
डार्विन की "थ्योरी ऑफ़ एवोल्यूशन" अर्थात् क्रमिक विकास के सिद्धान्त का ।
आर्किमिडीज़ के सिद्धान्तों का ।
न्यूटन के नियमों का ।
इन सभी वैज्ञानिक उपलब्धियों का खण्डन हुआ है ।
सृष्टि के समय अपरा शक्ति स्वयँ को किस रूप में प्रकट करती है ?
महत्तत्त्व के रूप में ।
अग्नि के एक अनन्त स्तम्भ के रूप में ।
एक अनन्त सागर के रूप में ।
एक अनन्त पर्वत शृंखला के रूप में ।
महाविष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु भगवान् श्रीकृष्ण के कौन से अवतार हैं ?
पुरुषावतार
लीलावतार
नामावतार
शक्त्यावेश अवतार
श्लोक संख्या 9.8 के अनुसार भौतिक सृष्टि की प्रक्रिया को पहचानें ।
परम इच्छा - अपरा शक्ति का महत्तत्त्व के रूप में प्राकट्य - भगवान् का महाविष्णु के रूप में महत्तत्त्व में प्रवेश - महाविष्णु के शरीर से असंख्य ब्रह्माण्डों का उत्सर्जन - प्रत्येक ब्रह्माण्ड में गर्भोदक विष्णु के रूप में प्रवेश - ब्रह्माण्ड की सृष्टि - प्रत्येक वस्तु, जीव, अणु आदि में क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रविष्टय ।
परम इच्छा - भगवान् का महाविष्णु के रूप में महत्तत्त्व में प्रवेश - अपरा शक्ति का महत्तत्त्व के रूप में प्राकट्य - महाविष्णु के शरीर से असंख्य ब्रह्माण्डों का उत्सर्जन - ब्रह्माण्ड की सृष्टि - प्रत्येक ब्रह्माण्ड में गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश - प्रत्येक वस्तु, जीव, अणु आदि में क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रविष्टय ।
परम इच्छा - अपरा शक्ति का महत्तत्त्व के रूप में प्राकट्य - भगवान् का महाविष्णु के रूप में महत्तत्त्व में प्रवेश - गर्भोदकशायी विष्णु के शरीर से असंख्य ब्रह्माण्डों का उत्सर्जन - प्रत्येक ब्रह्माण्ड में महाविष्णु के रूप में प्रवेश - ब्रह्माण्ड की सृष्टि - प्रत्येक वस्तु, जीव, अणु आदि में क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रविष्टय ।
इनमें से कोई नहीं है ।
यदि भगवान् सदैव भौतिक जगत् से पृथक रहते हैं तो इस भौतिक जगत् की व्यवस्था को कौन गतिशील रखता है ?
भगवान् की परम इच्छा ।
भगवान् के पुरुषावतार महाविष्णु ।
भगवान् की अपरा शक्ति ।
भगवान् के शाक्त्यावेशावतार ब्रह्मा जी ।
क्या ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के उपरांत इसमें जीव-योनियों का क्रमिक विकास होता है ?
नहीं, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही समस्त जीव-योनियाँ यथावत् प्रकट होकर अपनी-अपनी गतिविधियों में संलग्न हो जाती हैं ।
हाँ, महान् जीव वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के उपरांत जीव-योनियाँ का क्रमिक विकास हुआ है ।
नहीं, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति तथा प्रलय का जीवों की गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ता है उनकी गतिविधियाँ सुचारू बनी रहती हैं ।
हाँ, वर्तमान् भौतिक घटनाक्रम के अनुसार तो यही प्रतीत होता है कि जीव-योनियाँ का केवल मात्र क्रमिक विकास ही सम्भव है ।
श्लोक संख्या 9.8 में अवशम् शब्द क्या संकेत करता है ?
यह कि जीवों को ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति तथा प्रलय से कोई सरोकार नहीं होता है ।
यह कि प्रलय पूर्व जीवों की जो-जो इच्छाएँ होती हैं ब्रह्माण्ड की पुनरुत्पत्ति के साथ ही जीव पुनः पूर्ववत् इच्छाओं सहित प्रकट हो जाते हैं ।
यह कि जीव सृष्टि से पूर्व जिस-जिस अवस्था में होते हैं, सृष्टि के साथ ही उस-उस अवस्था में पुनः प्रकट हो जाते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
हम जीवों के लिए भगवान् की सभी शक्तियाँ अचिन्त्य हैं । परन्तु श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 9.8 में निम्न में से किसे भगवान् की अचिन्त्य शक्ति कहा है ?
परम इच्छा
परा शक्ति
अपरा शक्ति
तटस्थ शक्ति
