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Worksheets41. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_9.13–9.18
Total questions: 45
Worksheet time: 1hrs 16mins
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श्लोक संख्या 9.13 में निम्न में से किसका वर्णन हुआ है ?
महात्मा का
भगवद्महिमा का
दुरात्मा का
महापुरुष का
श्लोक संख्या 9.13 में वर्णित भक्त द्वारा दिव्यता प्राप्त करने का मूलभूत सूत्र क्या है ?
भक्त का भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्ण शरणागत् होना ।
भक्त का निर्विशेष ब्रह्म में पूर्ण शरणागत् होना ।
भक्त का ब्रह्मज्योति में पूर्ण विलीन हो जाना ।
भक्त का भगवान् के विषय में शुष्क मानसिक चिंतन करना ।
महात्मा का पहला लक्षण क्या है ?
वह दैवी प्रकृति में स्थित रहता है ।
वह भौतिक प्रकृति में स्थित रहता है ।
वह अपरा प्रकृति में स्थित रहता है ।
वह तटस्था प्रकृति का होता है ।
महात्मा कौन कहलाता है ?
आध्यात्मिक प्रकृति के निर्देशन में स्थित भगवान् के शरणागत् व्यक्ति महात्मा कहलाता है ।
सामाजिक एवं जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए अपना जीवन, अपनी धन-सम्पति आदि को समर्पित करने वाला व्यक्ति महात्मा कहलाता है ।
महात्मा गाँधी जैसा व्यक्ति जो अपना सारा जीवन देशहित के कार्यों के लिए न्यौछावर कर देता है वह महात्मा कहलाता है ।
भौतिक प्रकृति के निर्देशन में स्थित भगवान् के शरणागत् व्यक्ति महात्मा कहलाता है ।
निम्न में से कौन महात्मा है ?
अनन्य भक्त
अनन्य ज्ञानी
अनन्य योगी
अनन्य कर्मी
निम्न में से कौन सा लक्षण महात्मा का नहीं है ?
महात्मा सदैव भगवान् की महिमा के गुणगान में व्यस्त रहता है ।
महात्मा पाँच रसों में से किसी एक में भगवान् की संगति प्राप्त करने के लिए दृढ़ता से प्रयास करता है ।
महात्मा नवधा भक्ति के माध्यम से निरन्तर भगवान् की सेवा में संलग्न रहता है ।
महात्मा भगवान् को मनोधर्म द्वारा समझने के लिए प्रतिक्षण शुष्क मानसिक चिंतन में अवशोषित रहता है ।
एक साधारण भौतिकतावादी व्यक्ति महात्मा कैसे बनता है ?
अन्य महात्माओं या शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त करके ।
देश भक्तों या अन्य स्वतंत्रता सैनानियों की संगति प्राप्त करके ।
जन-कल्याण के लिएअपना समस्त धन-सम्पत्ति, वैभव त्याग कर ।
समस्त मानव जाति के भौतिक लाभ के उद्यम करके ।
निम्न में से कौन सा लक्षण शुद्ध भक्त का नहीं होता है ?
शुद्ध भक्त कृष्ण के श्याम सुन्दर रूप के अतिरिक्त किसी भी रूप के प्रति आकृष्ट नहीं होते हैं ।
शुद्ध भक्त कृष्णभावनामृत में केवल कृष्ण का ही ध्यान करते हैं, विष्णु, शिव, ब्रह्मा या किसी देवता का नहीं ।
शुद्ध भक्त कृष्णभावनामृत में निरंतर भगवान् की अविचल सेवा में ही लगे रहते हैं ।
यह सभी एक शुद्ध भक्त के लक्षण हैं ।
क्या किसी भी व्यक्ति को हम महात्मा कह सकते हैं ?
नहीं, केवल पूर्ण कृष्णभावनाभवित व्यक्ति को ही महात्मा कहा जा सकता है ।
हाँ, वह प्रत्येक व्यक्ति महात्मा कहलाता है जो अपने नियत कर्मों को अपने कर्त्तव्य समझकर निभाता है ।
नहीं, केवल उसी व्यक्ति को महात्मा कहा जा सकता है जिसने अपने देश, मानव समाज आदि के लिए कोई अद्वितीय कार्य किया हो ।
हाँ, भगवाँ वस्त्र धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति महात्मा कहलाता है ।
महात्मा का मुख्य लक्ष्ण क्या होता है ?
पूर्ण कृष्णभावनाभावित होना - महात्मा सदैव भगवान् श्रीकृष्ण के गुण-गान में व्यस्त रहता है ।
अनुयायी बनाने में क्षमता - किसी भी महात्मा की पहचान उसके अनुयायियों की संख्या बल से होती है ।
वैभव प्रदर्शन में कुशलता - किसी भी महात्मा की पहचान उसके वैभव से होती है ।
भाष्य में दक्षता - किसी महात्मा की मुख्य पहचान उसकी ज्ञान तथा वाणी से होती है ।
भगवान् का गुण-गान करने की प्रामाणिक विधि क्या है ?
प्रामाणिक गुरु-परम्परा से भगवान् तथा भगवान् की महिमा का ज्ञान प्राप्त करना ।
प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भक्तियोग का अनुशीलन करना ।
भगवान् के पवित्र नाम, रूप, गुणों तथा लीलाओं की प्रशंसा करते हुए उनका महिमा मण्डन करना।
यह सभी भगवान् का गुण-गान करने की प्रामाणिक विधि के महत्त्वपूर्ण अंग हैं ।
जो व्यक्ति ब्रह्मज्योति, निराकार रूप की ओर आकर्षित होते हैं क्या वो महात्मा कहलाते हैं ?
नहीं, भगवद्गीता में इन्हें महात्मा नहीं कहा गया है ।
हाँ, निर्विशेषवादियों को भी महात्मा कहा जाता है ।
नहीं, क्योंकि निर्विशेषवादी भगवाँ वस्त्र नहीं पहनते हैं ।
हाँ, क्योंकि निर्विशेषवादी भी ज्ञान का अनुशीलन करते हैं ।
पूर्ण कृष्णभावनामृत क्या होता है ?
मन, वाणी, कर्म से अपने सारे कार्यकलापों को भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में लगाना पूर्ण कृष्णभावनामृत कहलाता है ।
मन, बुद्धि, कर्म से अपने सारे कार्यकलापों को भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में लगाना पूर्ण कृष्णभावनामृत कहलाता है ।
मन तथा धन से भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करना पूर्ण कृष्णभावनामृत कहलाता है ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं
निम्न में से कौन से कार्य हैं जिन्हें भक्ति में दृढ़व्रत कहा गया है ?
प्रत्येक एकादशी तथा जन्माष्टमी का उपवास करना ।
वैष्णव आचार्यों का अनुकरण करना ।
प्रसिद्ध आध्यात्मिक प्रवंचक बनने के लिए वैदिक शास्त्रों का अहर्निश अध्ययन करना ।
यह सभी कार्य भक्ति में दृढ़व्रत कहलाते हैं ।
क्या हम भी कभी महात्मा बन सकते हैं ?
हाँ, यदि हम प्रामाणिक निर्देशन के अधीन श्रील प्रभुपाद जी की शिक्षाओं, निर्देशों तथा विधि-विधानों का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं, तो निश्चय ही हम महात्मा बन सकते हैं ।
नहीं, हम जैसे सामान्य एवं योग्यताविहीन जीव कभी महात्मा नहीं बन सकते हैं ।
हाँ, यदि हम श्रील प्रभुपाद जी की शिक्षाओं, निर्देशों तथा विधि-विधानों का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं, तो हम निश्चय ही महात्मा बन सकते हैं ।
नहीं, हम सभी जीवात्माएँ पहले से ही महात्मा हैं, हमें महात्मा बनने के लिए किसी भी प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है ।
निम्न में से कौन सा ज्ञानी ज्ञानार्जन द्वारा भगवान् की उपासना में नहीं लगता है ?
एकत्वेन
पृथक्त्वेन
विश्वतःमुखम
अर्थार्थी
श्लोक संख्या 9.15 में निम्न में से किसे एकत्वेन ज्ञानी कहा गया है ?
परमेश्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के विश्व रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के ब्रह्मज्योति स्वरूप की पूजा करने वाले ।
श्लोक संख्या 9.15 में निम्न में से किसे पृथक्त्वेन ज्ञानी कहा गया है ?
परमेश्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के विश्व रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के ब्रह्मज्योति स्वरूप की पूजा करने वाले ।
श्लोक संख्या 9.15 में निम्न में से किसे विश्वतःमुखम ज्ञानी कहा गया है ?
परमेश्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के विश्व रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के ब्रह्मज्योति स्वरूप की पूजा करने वाले ।
श्लोक संख्या 9.15 में वर्णित ज्ञानियों में से कौन सा ज्ञानी अधम होता है ?
परमेश्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के विश्व रूप की पूजा करने वाले ।
परमेश्वर के ब्रह्मज्योति स्वरूप की पूजा करने वाले ।
अद्वैतवादियों को ज्ञानियों की श्रेणी में सबसे अधम माने जाने पर भी उनका एक भाव प्रशंसनीय है। वह कौन सा भाव है ?
स्वयँ को शरीर न मानकर आत्मा मानने का भाव ।
स्वयँ को भगवान् के तुल्य मानने का भाव ।
परमेश्वर के रूप में अपनी पूजा करने का भाव ।
परमपिता परमात्मा में विलीन हो जाने का भाव ।
निम्न में से कौन से ज्ञानी हैं जो ब्रह्माण्ड को ही परम जीव या सत्ता मानकर उसकी उपासना करते हैं ?
एकत्वेन
पृथक्त्वेन
विश्वतःमुखम
अर्थार्थी
महात्माओं, सुकृतिनः, ज्ञानियों के विषय में चर्चा के उपरांत श्लोक संख्या 9.16 में भगवान् श्री कृष्ण अब किसके विषय में बताते हैं ?
दुष्कृतिनः के ।
चाण्डालों के ।
कर्मकाण्डियों के ।
भक्तों के ।
श्लोक संख्या 9.16 का क्यों महत्वपूर्ण है ?
ताकि हम जैसे कर्मकांडी व्यक्ति यह जान सकें कि देवताओं को प्रसन्न करके मनवांछित फल प्राप्त करने हेतु जो यज्ञ, यज्ञ-विधि, यज्ञ-सामग्री, प्रयुक्त होती है वह भी कृष्ण ही हैं ।
ताकि हम जैसे कर्मकांडी व्यक्ति यह जान सकें कि देवताओं की प्रसन्नता तथा देवताओं की कृपा दोनों के परम स्रोत कृष्ण हैं ।
ताकि हम जैसे कर्मकांडी व्यक्ति यह जान सकें कि सभी वस्तुएँ कृष्ण हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
क्या श्लोक संख्या 9.16 में भगवान् श्रीकृष्ण ने यज्ञ, यज्ञ-विधि, यज्ञ-सामग्री को स्वयँ का रूप इसलिए बताया क्योंकि वह यज्ञपति हैं ?
नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ यह भी स्थापित किया कि वह केवल यज्ञ के अंतिम लक्ष्य ही नहीं हैं अपितु यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक वस्तु के स्रष्टा भी हैं ।
हाँ, केवल अपनी भगवत्ता स्थापित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने ऐसा कहा ।
नहीं, यहाँ यह भी स्थापित हुआ है कि कृष्ण ने केवल अपनी प्रसन्नता के लिए ही प्रत्येक वस्तु की संरचना की है ।
हाँ, ताकि हम यज्ञ के रहस्य को यज्ञ पति की दृष्टिकोण से समझ सकें ।
निम्न वस्तुओं में से श्लोक संख्या 9.16 में किस वस्तु का वर्णन नहीं हुआ है ?
यज्ञ ।
पितरों को दिया जाने वाला तर्पण ।
अग्नि ।
पृथ्वी ।
श्लोक संख्या 9.16 में भगवान् श्रीकृष्ण का मुख्य संदेश क्या है ?
यह कि कृष्ण भक्त वेदविहित समस्त यज्ञ संपन्न किए हुए रहते हैं ।
यह कि कृष्ण भक्ति में रत भक्तों को भी वेदसम्मत कर्मकाण्ड को करने की आवश्यकता होती है ।
यह कि कृष्ण भक्ति आरंभ करने से पूर्व वैदिक अनुष्ठान करने अति आवश्यक हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
यह सारा चराचर विराट जगत् क्या है ?
यह कृष्ण की शक्ति के विभिन्न कार्यकलापों की अभिव्यक्ति है ।
यह एक अदृश्य शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र है ।
यह ब्रह्मा-विष्णु-महेश की संयुक्त शक्ति की पूर्ण अभिव्यक्ति है ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
क्या हम सभी जीव भी कृष्ण हैं ।
हाँ, कृष्ण के अंश होने के नाते हम सभी जीव भी कृष्ण हैं । परंतु कृष्ण स्वामी हैं और हम सब उनके सेवक हैं ।
नहीं, हम सभी जीव कृष्ण से भिन्न हैं ।
हाँ, हम सभी जीव कृष्ण के समान हैं ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
वेदों का अंतिम लक्ष्य क्या है ?
कृष्ण ।
निराकार ब्रह्म ।
अदृश्य शक्ति ।
आध्यात्मिक ज्ञान ।
हमारी स्वाभाविक स्थिति की शुद्धि करता कौन है ?
कृष्ण ।
निराकार ब्रह्म ।
अदृश्य शक्ति ।
शिव ।
प्रणव किसे कहते हैं ?
ओंकार को ।
शब्द ध्वनि को ।
ब्रह्मांड की गर्जना को ।
वेणु ध्वनि को ।
श्लोक संख्या 9.16 में भगवान् श्रीकृष्ण का मुख्य संदेश क्या है ?
यह कि कृष्ण ही वेद तथा वेदों का अंतिम लक्ष्य हैं ।
यह कि कृष्ण ही वेदों के माध्यम से शुद्धिकर्ता हैं ।
यह कि कृष्ण ही सर्वस्व के स्रष्टा तथा आश्रय हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.18 के अनुसार गति का क्या अर्थ है ।
गंतव्य ।
वेग ।
परिणाम ।
स्थिति ।
श्लोक संख्या 9.18 के अनुसार गति कौन है ।
भगवान् श्रीकृष्ण
भगवान् शिव
भगवान् ब्रह्मा
भगवान् इंद्र
क्या कारण है कि हम लोग देवताओं की उपासना करते हैं ?
अंतिम लक्ष्य के ज्ञान का अभाव ।
देवताओं द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार ।
देवताओं का वैभव ।
देवताओं की अद्भुत लोक ।
कृष्ण की शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ वास्तव में क्या है ?
कृष्ण की अनुभूति की दिशा में सोपान मात्र ।
हम जीवों के इंद्रियभोग का साधन मात्र ।
अनंत कोटि ब्रम्हांडों की उत्पत्ति का कारण ।
देवताओं के मनोरंजन का साधन मात्र ।
श्लोक संख्या 9.18 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद जी द्वारा उद्धृत उदाहरण में सीढ़ियाँ क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ तथा देवता ।
इस ब्रह्मांड के विभिन्न लोक ।
जीव द्वारा भौतिक देहावसान तथा देहांतरण ।
भौतिक देह में छः प्रकार के परिवर्तन ।
श्लोक संख्या 9.18 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद जी द्वारा उद्धृत उदाहरण में एलिवेटर क्या है ?
कृष्णभावनामृत
मनोधर्म
अष्टांग योग
वैदिक ज्ञान
श्लोक संख्या 9.18 में सुहृत शब्द का क्या अर्थ है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ही हमारे परम मित्र एवं हितैषी हैं ।
यह कि प्रत्येक जीव स्वच्छ हृदय वाला होता है ।
यह कि यह विराट दृश्य जगत् सर्वोत्तम शरण स्थली है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.18 में बीजमव्ययम् शब्द का क्या अर्थ है ?
यह कि कृष्ण सभी कारणों के शाश्वत कारण है ।
यह कि कृष्ण सबसे बड़े बीज हैं ।
यह कि कृष्ण के पास असंख्य बीज उपलब्ध हैं ।
यह कि कृष्ण के बीज आत्मघाती हैं ।
