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Worksheets30. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.08–7.14
Total questions: 42
Worksheet time: 1hrs 7mins
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ब्रह्मकुमारी, राधास्वामी, निरंकारी जैसी धार्मिक संस्थाएँ केवल परमेश्वर की प्रारंभिक अनुभूति अर्थात् निर्विशेष ब्रह्म का ही पूर्ण परब्रह्म के रूप में प्रचार करते हैं । ऐसा क्यों ?
क्योंकि ऐसी संस्थाएँ केवल पालनकर्ता, संचालनकर्ता एवं विनाशकर्ता परा व अपरा शक्तियों की निराकार अनुभूति को ही परब्रह्म स्वरूप मानती हैं ।
वह इन शक्तियों के स्रोत एवं धारक को ढूंढने का प्रयास नहीं करती हैं ।
ऐसी संस्थाएँ भगवान् के मनुष्य सदृश रूप को स्वीकार नहीं कर पाती हैं
क्योंकि वह भगवान् के किसी अकल्पनीय स्वरूप की अपेक्षा रखती हैं ।
ऐसी संस्थाएँ वैदिक शास्त्रों पर यथावत् विश्वास नहीं करती हैं वह वैदिक शास्त्रों को अपने मनमाने ढंग से ग्रहण करती हैं और ब्रह्मावस्था को ही पूर्ण परब्रह्म मानकर उसका प्रचार करती हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं।
श्लोक संख्या 7.8 के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण ने क्या स्पष्ट किया है ?
परा तथा अपरा शक्तियों के माध्यम से अपनी सर्वव्यापकता ।
परा तथा अपरा शक्तियों के माध्यम से अपनी सर्वज्ञता ।
परा तथा अपरा शक्तियों के माध्यम से अपना परिग्रहभाव ।
परा तथा अपरा शक्तियों के माध्यम से अपना सर्वस्व ।
श्लोक संख्या 7.8 के आधार पर निम्न में से सही कथन को चुनें ।
जल का स्वाद भगवान् की शक्ति है, परंतु जल नहीं ।
सूर्य चंद्रमा का प्रकाश भगवान् की शक्ति है, परंतु सूर्य चंद्रमा नहीं ।
वैदिक मंत्रों में ओंकार भगवान् की शक्ति है, परंतु वैदिक मंत्र नहीं ।
यह सभी कथन सही नहीं है क्योंकि श्लोक संख्या 7.4 के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि सभी भौतिक पदार्थ भगवान् की अपरा शक्ति हैं ।
इस संसार में धार्मिक संस्थाओं में अक्सर निर्गुणवाद दर्शन तथा सगुणवाद दर्शन के कारण आपसी विरोधाभास रहता है, इस विरोधाभास का वास्तविक कारण क्या है ?
इसका वास्तविक कारण है अचिंत्य भेदाभेद तत्व का ज्ञान न होना ।
इसका वास्तविक कारण है अलग-अलग धर्मों से संबंध होना ।
इसका वास्तविक कारण है धर्म विहीन दर्शन का होना ।
इसका वास्तविक कारण है दर्शन विहीन धर्म का होना ।
निर्गुणवाद दर्शन तथा सगुणवाद दर्शन में कोई विरोध या मतभेद क्यों नहीं होता है ?
क्योंकि यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।
क्योंकि सगुण कभी निर्गुण नहीं हो सकता है ।
क्योंकि निर्गुण कभी सगुण नहीं हो सकता है ।
क्योंकि यह दोनों ही दर्शन धर्म विहीन हैं ।
भगवान् की शक्तियों की अनुभूति को परब्रह्म समझना निम्न में से क्या है ?
निर्विशेषवाद
सविशेषवाद
शाक्त्यवेशवाद
परब्रह्मवाद
आद्य सुगंध से आपका क्या अभिप्राय है ?
मूल सुगंध
अग्रिम सुगंध
स्पष्ट सुगंध
अपूर्ण सुगंध
विभावसु का क्या अर्थ होता है ?
अग्नि
जल
वायु
पृथ्वी
वास्तव में अग्नि कौन है ?
भगवान् श्रीकृष्ण
अग्नि देव
विभावसु
वह्नि
सभी प्राणियों में भोजन पचाने वाली अग्नि का इनमें से क्या नाम है ?
वैश्वानर अग्नि
मंदाग्नि
तृष्णाग्नि
तृप्ताग्नि
"अतः कृष्ण की कृपा से ही मनुष्य अपने को दीर्घायु या अल्पजीवी बना सकता है ।" इस कथन के माध्यम से श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 7.9 में श्री भगवान् के किस कथन का स्पष्टीकरण किया है ?
मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध हूँ ।
मैं अग्नि की उष्मा हूँ ।
मैं समस्त जीवों का जीवन हूँ ।
मैं तपस्वियों का तप हूँ ।
यदि ब्रह्म निर्विशेष है तो परब्रह्म क्या है ?
साकार है ।
निराकार है ।
विकार है ।
निर्विकार है ।
भगवान् श्रीकृष्ण सभी वस्तुओं के मूल हैं यह पुष्टि किस उपनिषद् में हुई है ?
कलिसंतरण उपनिषद्
श्वेताश्वेतर उपनिषद्
कठोपनिषद्
गोपाल तापनी उपनिषद्
वास्तव में निर्विशेष ब्रह्म या ब्रह्मावस्था या ब्रह्मज्योति या निराकार ब्रह्म का आधार क्या है ?
साकार रूप
परब्रह्म
सविशेष ब्रह्म
यह सभी भगवान् श्रीकृष्ण के ही सम्बोधन हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ही मूलाधार या एकमात्र आधार हैं ।
वास्तविक बुद्धिमान कौन है ?
जिसे भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान होता है ।
जिसने विज्ञान में पी0एच0डी0 की डिग्री हासिल की है ।
जो किसी राष्ट्र के लिए नीतियाँ बनाने में निपुण होता है ।
जो अपने मानसिक चिंतन द्वारा नवीन धार्मिक पद्धति की संरचना करने के योग्य होता है ।
"मैं समस्त जीवों का आदि बीज हूँ ।" भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट करें ।
सभी जीवात्माएँ भगवान् श्रीकृष्ण के अंश हैं । अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण ही सभी जीवों के मूल हैं ।
इस संसार में जीवों को मिलने वाली 84,00,000 योनियों के मूल बीज भी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं ।
इस संसार में उपस्थित समस्त चर एवं अचर प्राणियों के मूल बीज भी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
गुरु द्रोणाचार्य तथा युधिष्ठिर में से भगवान् श्रीकृष्ण किसका बल थे और क्यों ?
युधिष्ठिर का - क्योंकि श्लोक संख्या 7.11 के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण कामनाओं तथा इच्छाओं से रहित बल हैं ।
दोनों का- क्योंकि श्लोक संख्या 7.11 के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण कामनाओं तथा इच्छाओं से रहित बल हैं ।
गुरु द्रोणाचार्य का - क्योंकि श्लोक संख्या 7.11 के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण कामनाओं तथा इच्छाओं से रहित बल हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
अपनी संतानों का भरण-पोषण करने के लिए मैथुन का व्यवसाय करने वाली वेश्या का काम धर्म-सम्मत है या नहीं - कारण सहित स्पष्ट करें ।
नहीं, वैदिक शास्त्रों के अनुसार केवल संतानोत्पत्ति हेतु किया जाने वाला काम ही धर्म-सम्मत माना जाता है ।
हाँ, क्योंकि जीवन निर्वाह हेतु किया जाने वाला कोई भी कार्य धर्म-सम्मत होता है ।
नहीं, ऐसे घृणित व्यवसाय के अतिरिक्त भी जीवन निर्वाह हेतु बहुत से और विकल्प उपलब्ध हैं ।
हाँ, यह भी एक वैधानिक कार्य है जो समाज के एक प्रतिष्ठित वर्ग द्वारा अपने मनोरंजन हेतु किया जाता है ।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार माता-पिता का परम उत्तरदायित्व क्या है ?
अपनी संतान को कृष्णभावनाभावित बनाना ।
अपनी संतान को शिक्षित करना ।
अपनी संतान को जीवन निर्वाह हेतु कार्यों में निपुण बनाना ।
अपनी संतान के जीवन निर्वाह हेतु धन-संपत्ति का अर्जन एवं संग्रह करना ।
प्रकृति के तीनों गुणों का मूल उद्गम कौन है ?
अपरा प्रकृति
भगवान् श्रीकृष्ण
माया
बहिरंगा शक्ति
निम्न में से भौतिक प्रकृति के समस्त कार्यकलापों के लिए कौन उत्तरदायी होता है ?
प्रकृति के तीनों गुण
केवल सतोगुण
केवल तमोगुण
केवल तमोगुण और रजोगुण
भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन क्यों नहीं होते हैं ?
क्योंकि वह तीनों गुणों के उद्गम हैं ।
क्योंकि वह तीनों गुणों को प्रत्यक्षतः क्रियान्वित करते हैं ।
क्योंकि वह तीनों गुणों के अन्वेषक हैं ।
क्योंकि वह तीनों गुणों के मित्र हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण निर्गुण क्यों कहलाते हैं ?
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण तीनों गुणों के उद्गम होने पर भी इन गुणों के अधीन नहीं आते हैं ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण में सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण नहीं होते हैं ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त गुणों से रहित होते हैं ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण गुणों का सृजन केवल भौतिक सृष्टि के संचालन हेतु करते हैं ।
इस भौतिक संसार के प्रकृति के तीनों गुणों के द्वारा मोहित होने का मुख्य कारण क्या है ?
इस भौतिक संसार की अपने समस्त कार्यकलापों के लिए प्रकृति के तीनों गुणों पर निर्भरता ।
इस भौतिक संसार का प्रकृति के तीनों गुणों से प्रकट होना ।
इस भौतिक संसार की प्रकृति के तीनों गुणों से घनिष्ठता ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
निम्न में से कौन सी श्रेणी प्रकृति के तीन गुणों के अंतर्गत कार्य करने वाले मनुष्यों की श्रेणियों में नहीं आती है ?
नितांत सतोगुणी – ब्राह्मण
रजोगुणी – क्षत्रिय
सतोगुणी एवं रजोगुण – वैश्य
तमोगुणी – शूद्र
हमारा स्वयँ को अमेरिकी, भारतीय, रूसी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, हिंदू, मुसलमान, ईसाई इत्यादि-इत्यादि के रूप में पहचान करने का मूल कारण क्या है ?
माया के वशीभूत होकर देहात्मबुद्धि प्राप्त करना ।
प्रकृति के तीनों गुण ।
धर्म, स्थान, शारीरिक संरचना, जीवन शैली, भाषा इत्यादि।
यह सभी तर्क मिथ्या हैं ।
भगवद् विस्मृति का मूल कारण क्या है ?
प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विमोहित होना ।
भोग की इच्छाओं द्वारा विमोहित होना ।
भौतिक प्रलोभनों द्वारा विमोहित होना ।
यह सभी तर्क सत्य है ।
निम्न में से कौन केवल निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप को ही जान पाता है ?
तमोगुणी मनुष्य
रजोगुणी मनुष्य
सतोगुणी मनुष्य
यह सभी मनुष्य
सतोगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी प्रकृति के व्यक्ति भगवान् के साक्षात् स्वरूप को क्यों नहीं समझ पाते हैं
प्रकृति के गुणों के अधीन रहकर भगवान् के साक्षात् स्वरूप को समझ पाना असंभव है ।
क्योंकि वह भगवान् के षड् ऐश्वर्यों से अनभिज्ञ होते हैं ।
क्योंकि वह भगवान् के साकार स्वरूप से अनभिज्ञ होते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् गुणातीत हैं । तो हम उन्हें कैसे समझ सकते हैं ?
भगवान् के साक्षात् स्वरूप को समझने के लिए हमें भी गुणातीत होना होता है ।
प्रकृति के गुणों की शुद्धावस्था में रहकर भगवान् के साक्षात् स्वरूप को समझा जा सकता है ।
प्रकृति के गुणों में रहकर अष्टाँगयोग के माध्यम से भगवान् के साक्षात् स्वरूप को समझा जा सकता है ।
प्रकृति के गुणों में रहकर भक्तियोग के माध्यम से भगवान् के साक्षात् स्वरूप को समझा जा सकता है ।
निम्न में से किस विधि के द्वारा हम गुणातीत हो सकते हैं ?
कृष्णभावनामृत
अष्टाँगयोग
हठयोग
कर्मयोग
इस भौतिक संसार में पराशक्ति होने के बावजूद भी जीवों के नित्य बद्धावस्था में रहने का मूल कारण क्या है ?
अपरा शक्ति अर्थात् पदार्थ का संदूषण ।
भौतिक संसार में उपस्थित भोग की इच्छाएँ ।
भौतिक संसार के इंद्रिय भोग के प्रलोभन ।
नित्य बद्धावस्था में रहने की मानसिकता ।
अपरा भौतिक प्रकृति को दैवी प्रकृति क्यों कहा गया है ?
क्योंकि इसका संबंध दैवी है और इसका संचालन भी दैवी इच्छा से होता है ।
क्योंकि इसका संबंध देवी से है और इसका संचालन भी देवी की इच्छा से होता है ।
क्योंकि अपना भौतिक प्रकृति स्त्री स्वरूपा है इसलिए इसे देवी प्रकृति कहा जाता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
गुण का दूसरा अर्थ क्या होता है ?
रस्सी
रज्जू
दाम
यह सभी विकल्प सत्य हैं ।
निम्न में से कौन हमें भौतिक जगत् के बंधन से मुक्त करने में सक्षम है ?
भगवान् श्रीकृष्ण
प्रामाणिक गुरु
शुद्ध भक्त
यह सभी सक्षम हैं ।
निष्ठुर माया के बंधन से मुक्त होने का एकमात्र साधन क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण के चरण कमलों की शरण ग्रहण करना ।
माया के चरण कमलों की शरण ग्रहण करना ।
दुरत्यया माया की चापलूसी करना ।
दुरत्यया माया की अहैतुकी कृपा प्राप्त करना ।
ब्रह्मा तथा शिव अत्यंत महान् होने के बावजूद भी जीवों को माया के चंगुल से छुड़ाने में क्यों असमर्थ हैं ?
क्योंकि वह दोनों भी माया के वश में होते हैं ।
क्योंकि वह दोनों रजोगुण तथा तमोगुण के अवतार है ।
क्योंकि वह दोनों भी मुक्त नहीं है अपितु बद्धावस्था में हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
"मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः" यह श्लोक किसने कहा है ?
शिवजी ने
ब्रह्माजी ने
विष्णुजी ने
व्यासदेव जी ने
