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20. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_4.41–5.06

Total questions: 46

Worksheet time: 1hrs 25mins

Name
Class
Date
1.

कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।

4 lines
2.

कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।

4 lines
3.

कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल न0 लिखें ।

4 lines
4.

कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।

4 lines
5.

आत्मपरायण व्यक्ति से आप क्या समझते हो ?

a)

जो अपने कर्मफलों का परित्याग करते हुए भक्ति करता है ।

b)

जिसके समस्त संशय दिव्यज्ञान द्वारा विनष्ट हो चुके होते हैं ।

c)

जो कर्मों के बंधनों से मुक्त होता है ।

d)

ये सभी विकल्प सही हैं ।

6.

सनातन योग पद्धति में कितने प्रकार के और कौन-कौन से यज्ञ कर्म किए जाते हैं ?

दो प्रकार के यज्ञकर्म - द्रव्ययज्ञ और आत्मज्ञान यज्ञ ।

दो प्रकार के यज्ञकर्म - तपोयज्ञ और स्वाध्याय यज्ञ ।

दो प्रकार के यज्ञकर्म - योगयज्ञ और तपोयज्ञ ।

दो प्रकार के यज्ञ कर्म - द्रव्य यज्ञ और योग यज्ञ ।

a)

दो प्रकार के यज्ञकर्म - द्रव्ययज्ञ और आत्मज्ञान यज्ञ ।

b)

दो प्रकार के यज्ञकर्म - तपोयज्ञ और स्वाध्याय यज्ञ ।

c)

दो प्रकार के यज्ञकर्म - योगयज्ञ और तपोयज्ञ ।

d)

दो प्रकार के यज्ञ कर्म - द्रव्य यज्ञ और योग यज्ञ ।

7.

यदि द्रव्ययज्ञ आत्म-साक्षात्कार के लिए नहीं किया जाता है तो ऐसा यज्ञ भौतिक बन जाता है । ऐसा क्यों ?

a)

क्योंकि ऐसा द्रव्ययज्ञ सकाम कर्मों हेतु किए जाने के कारण भौतिक स्तर पर ही रह जाता है ।

b)

क्योंकि द्रव्ययज्ञ इंद्रियतृप्ति हेतु किए जाने वाले कर्मों का अनुपूरक होता है ।

c)

क्योंकि ऐसा द्रव्ययज्ञ कृष्णभावनाभावित कर्म होता है ।

d)

क्योंकि द्रव्ययज्ञ का प्रावधान सांसारिक इच्छाओं की तुष्टि हेतु ही हुआ है ।

8.

आध्यात्मिक क्रियाएँ कितने प्रकार की होती हैं ?

a)

आत्मबोध (अर्थात् अपने स्वरूप को समझना) तथा श्रीभगवान् विषयक सत्य को जानना ।

b)

द्रव्ययज्ञ करना और आत्मज्ञान यज्ञ करना ।

c)

सकाम कर्म करना और निष्काम भाव से कर्म करना ।

d)

शुष्क मानसिक चिंतन करना तथा भगवत् सेवा करना ।

9.

आध्यात्मिक क्रियाओं को समझने की क्या योग्यता होती है ?

a)

आध्यात्मिक क्रियाओं को श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा दर्शाए गए मार्ग का यथारूप अनुसरण करके समझा जा सकता है ।

b)

आध्यात्मिक क्रियाओं को शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा सरलता से समझा जा सकता है ।

c)

आध्यात्मिक क्रियाओं को तपोयज्ञ द्वारा सहजता से समझा जा सकता है ।

d)

आध्यात्मिक क्रियाओं को स्वाध्याय यज्ञ द्वारा आसानी से समझा जा सकता है ।

10.

हम सभी बद्धजीवों को भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य कार्यकलापों को समझने के लिए निम्न में से किस प्रक्रिया को अपनाना होगा ?

a)

श्रीमद्भगवद्गीता के मार्ग का दृढ़ता से पालन + आध्यात्मिक क्रियाओं का ज्ञान + अंश स्वरूप का आत्मज्ञान (दिव्यज्ञान) = श्रीभगवान् के दिव्य कार्यकलापों का बोध ।

b)

आध्यात्मिक क्रियाओं का ज्ञान + अंश स्वरूप का आत्मज्ञान (दिव्यज्ञान) + श्रीमद्भगवद्गीता के मार्ग का दृढ़ता से पालन = श्रीभगवान् के दिव्य कार्यकलापों का बोध ।

c)

अंश स्वरूप का आत्मज्ञान (दिव्यज्ञान) + आध्यात्मिक क्रियाओं का ज्ञान + श्रीमद्भगवद्गीता के मार्ग का दृढ़ता से पालन = श्रीभगवान् के दिव्य कार्यकलापों का बोध ।

d)

अंश स्वरूप का आत्मज्ञान (दिव्यज्ञान) + श्रीमद्भगवद्गीता के मार्ग का दृढ़ता से पालन + आध्यात्मिक क्रियाओं का ज्ञान = श्रीभगवान् के दिव्य कार्यकलापों का बोध ।

11.

जो भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा उपदेश देने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण के सच्चिदानंद स्वरूप को नहीं समझ पाता तो उसे क्या समझना चाहिए ?

a)

अल्पज्ञ

b)

ज्ञानी

c)

निपट मूर्ख

d)

बुद्धिमान्

12.

क्या कृष्णभावनामृत को अंगीकार करते ही मनुष्य पूर्ण ज्ञानी बन जाता है ?

a)

नहीं, कृष्णभावनामृत के सिद्धांतों को स्वीकार करके अज्ञान क्रमशः दूर होता जाता है ।

b)

नहीं, मनुष्य कभी भी पूर्ण ज्ञानी नहीं बन सकता है ।

c)

हाँ, कृष्णभावनामृत को अंगीकार करते ही मनुष्य ज्ञानियों की श्रेणी में आ जाता है ।

d)

हाँ, क्योंकि कृष्णभावनामृत को अंगीकार करते ही मनुष्य स्वयँ को पूर्ण ज्ञानी समझने लग जाता है ।

13.

कृष्णभावनामृत निम्नलिखित में से कौन से यज्ञ से जागृत नहीं होता है ?

a)

ब्रह्म यज्ञ

b)

ब्रह्मचर्य यज्ञ

c)

गृहस्थी यज्ञ

d)

इंद्रियतृप्ति यज्ञ

14.

निम्न में से कौन सा श्रीमद्भगवद्गीता के वास्तविक पाठक का गुण होता है ?

a)

वह समस्त प्रकार के कर्मों में आत्म-साक्षात्कार के लिए उद्यत रहता है ।

b)

वह अन्य पाठकों की अपेक्षा व्यवहार कुशल नहीं होता है ।

c)

वह श्रीमद्भगवद्गीता के प्रचार-प्रसार के प्रति सदैव शिथिल रहता है ।

d)

वह श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों को अपने स्वार्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है ।

15.

श्रीमद्भगवद्गीता का वह पाठक जो कृष्ण को प्रमाण नहीं मानता है उसका क्या होता है ?

a)

उसका पतन हो जाता है और वह पुनः भवकूप में गिर जाता है ।

b)

वह संसार में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वैभवशाली जीवन व्यतीत करता है ।

c)

वह अपने शुष्क मानसिक चिंतन के माध्यम से सदैव वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेता है ।

d)

वह वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रामाणिकता को समझ लेता है ।

16.

श्रीमद्भगवद्गीता या अन्य प्रामाणिक शास्त्रों के अध्ययन की भगवद् सम्मत प्रक्रिया क्या है ?

a)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में अध्ययन करना ।

b)

स्वतंत्र रूप से स्वाध्ययन करना ।

c)

वैदिक ग्रंथों के सांसारिक प्रवंचक के निर्देशन में अध्ययन करना ।

d)

सभी विकल्प प्रामाणिक है ।

17.

श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 4.42 में हम बद्धजीवों को क्या चेतावनी दी है ?

a)

श्रील प्रभुपाद जी ने उन लोगों से सावधान रहने के लिए कहा है, जो आत्मा-श्लाघा वश अन्यों को वास्तविक पथ से विपथ करने में लगे रहते हैं ।

b)

श्रील प्रभुपाद जी ने उन लोगों से सावधान रहने के लिए कहा है, जो श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को केवल सांसारिक ज्ञान नहीं मानते हैं ।

c)

श्रील प्रभुपाद जी ने वैष्णव सन्यासियों से सावधान रहने के लिए कहा है ।

d)

श्रील प्रभुपाद जी ने समस्त सांसारिक कर्मों को सावधानीपूर्वक करने के लिए कहा है ।

18.

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को किन कर्मों को त्यागने का उपदेश देते हैं । कृपया इस विषय वस्तु को यथारूप समझने में मेरी सहायता करें ।

a)

सकाम कर्म

b)

निष्काम कर्म

c)

कृष्णभावनाभावित कर्म

d)

अकर्म

19.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 5.1 में अर्जुन अपने किस संशय को उद्घाटित करता है ?

a)

यह कि कर्म तथा ज्ञान असंगत हैं ।

b)

यह कि विकर्म तथा अकर्म में क्या अंतर है ।

c)

यह कि कर्मयोग का क्या औचित्य है ।

d)

यह कि जीवात्मा कर्म करने के लिए क्यों बाध्य है ।

20.

कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ है । ऐसा क्यों ?

a)

क्योंकि कर्म के परित्याग के कारण जीवात्मा शुद्धिकरण के अभाव में अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है । जबकि भक्ति युक्त कर्म जीवात्मा को उसके सनातन धर्म अर्थात् भगवद् सेवा में स्थापित करते हैं ।

b)

यह कथन प्रामाणिक नहीं है क्योंकि कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय कर्म दोनों ही जीवात्माओं के लिए मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं ।

c)

दोनों कथन उचित हैं ।

d)

दोनों कथन अनुचित है ।

21.

जीवात्मा का विभिन्न भौतिक शरीरों में देहांतरण का मुख्य कारण क्या है ?

a)

जीवात्मा का सदैव अपनी इंद्रियतृप्ति के कार्यों में ही संलिप्त रहना ।

b)

जीवात्मा द्वारा अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए जटिल उद्यमों का करना ।

c)

जीवात्मा का दुर्भाग्यवश बारंबार मृत्यु को प्राप्त होना ।

d)

जीवात्माओं का अपनी-अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए परस्पर संघर्ष ।

22.

जीवात्मा को माया द्वारा शिकार कर्म करने के लिए कब तक बाध्य किया जाता है ?

a)

जब तक जीवात्मा अपने स्वरूप को जान नहीं लेता है ।

b)

जब तक जीवात्मा माया के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं कर देता है ।

c)

जब तक जीवात्मा माया को चुनौती देता रहता है ।

d)

जब तक जीवात्मा माया के प्रतिकूल कार्य करता रहता है ।

23.

निम्नलिखित में से कौन सा विचार मनुष्य जीवन को सार्थक बनाता है ?

a)

अथातो ब्रह्म जिज्ञासा

b)

अहम् ब्रह्मास्मि

c)

धर्मं तु साक्षात्भगवत्प्रणीतम्

d)

इनमें से कोई नहीं ।

24.

निम्नलिखित में से कौन सा कर्म वास्तविक ज्ञान को बढ़ाने वाला होता है ?

a)

कृष्णभावनाभावित कर्म

b)

आत्मबोध तथा भगवान् विषयक ज्ञान युक्त कर्म

c)

दोनों विकल्प उचित हैं ।

d)

दोनों विकल्प अनुचित हैं

25.

श्रील प्रभुपाद के "जीवात्मा के स्तर पर मनुष्य को कर्म करना होगा अन्यथा भवबंधन से उबरने का कोई अन्य उपाय नहीं है ।" कथन से आप क्या समझते हो ?

a)

यह कि इस भवबंधन से उबरने के लिए मनुष्य को स्वयँ को जीवात्मा जानकर आत्म-साक्षात्कार एवं भगवान् श्रीकृष्ण के साथ अपने संबंध को पुनः जागृत करने हेतु कृष्णभावनाभावित कर्म करने होते हैं ।

b)

यह कि इस भवबंधन का कारण भी कर्म है और इससे उबरने का मार्ग भी कर्म ही है अतः कर्मों का परित्याग कर मुक्ति पाना अत्यंत जटिल एवं संघर्षपूर्ण होगा ।

c)

दोनों विकल्प उचित हैं ।

d)

दोनों विकल्प अनुचित हैं ।

26.

कृष्णभावनामृत सन्यास से सदा श्रेष्ठ होता है । ऐसा क्यों ?

a)

क्योंकि सन्यास में पुनः पतन की संभावना बनी रहती है । जबकि कृष्णभावनामृत बद्धजीवात्मा के हृदय का शुद्धिकरण करके उसे भवसागर से मुक्त कर देता है ।

b)

क्योंकि कृष्णभावनामृत में जीवात्मा भगवान् की भक्तिमय सेवा हेतु कर्मों में दिव्य आनंद प्राप्त करता है जबकि सन्यास में कर्मों का परित्याग करने के कारण वह इस दिव्य आनंद से वंचित रह जाता है ।

c)

कृष्णभावनामृत के बिना सन्यास सदैव अपूर्ण होता है ।

d)

यह सभी कथन प्रामाणिक हैं ।

27.

फल्गु वैराग्य क्या होता है ?

a)

श्रीभगवान् से संबंधित वस्तुओं को भौतिक समझकर परित्याग कर देना, फल्गु वैराग्य कहलाता है ।

b)

वास्तविक ज्ञान के अभाव में सन्यास ग्रहण कर लेना फल्गु वैराग्य कहलाता है ।

c)

बिना समुचित शुद्धिकरण के सन्यास ग्रहण कर लेना फल्गु वैराग्य कहलाता है ।

d)

यह सभी कथन सत्य हैं ।

28.

वास्तविक सन्यासी कौन है ?

a)

जो यह समझता है कि समस्त गोचरागोचर वस्तुएँ कृष्ण की संपत्ति हैं और प्रत्येक वस्तु का उपयोग कृष्ण की सेवा हेतु ही करता है ।

b)

जो दूसरों के कल्याण हेतु स्वयँ सन्यास ग्रहण कर लेता है ।

c)

जो यह समझता है कि समस्त गोचरागोचर भौतिक वस्तुएँ उसकी संपत्ति हैं और प्रत्येक वस्तु का उपयोग कृष्ण के कल्याण हेतु ही करता है ।

d)

जो सन्यास को कृष्णभावनाभावित कर्मों से श्रेष्ठ समझता हो ।

29.

कर्मफल की इच्छा न करना तो समझ में आता है, परन्तु कर्मफलों से घृणा न करने से क्या तात्पर्य है ?

a)

यह कि पूर्ववर्ती कर्मफलों के कारण कितनी भी दुखदायी घटना क्यों न घटित हो जाए हमें उसे नि:संकोच विनम्र भाव से स्वीकार करना चाहिए ।

b)

यह कि अन्यों की उपलब्धियों को देखकर स्वयँ के कर्मफलों से ईर्ष्यावश घृणा नहीं करनी चाहिए ।

c)

जिस प्रकार कर्मफलों की इच्छा करने से इस भवसागर में बंधन उत्पन्न होता है, ठीक उसी प्रकार कर्मफलों से घृणा करने से भी बंधन उत्पन्न होता है ।

d)

यह सभी कथन उचित हैं ।

30.

निम्न में से पूर्ण ज्ञान को चुनें।

a)

कृष्ण के साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना ।

b)

कृष्ण पूर्ण (अंशी) हैं और जीवात्मा उनका अंश मात्र ।

c)

एकता गुणों की है न कि गुणों की मात्रा की ।

d)

यह सभी कथन पूर्णज्ञान प्रस्तुत कर रहे हैं ।

31.

"एकता गुणों की है न कि गुणों की मात्रा की ।" स्पष्ट करें ।

a)

यह कि भगवान् का अंश होने के कारण जीवात्मा में भी भगवान् के सदृश (संख्यात्मक दृष्टि से कम) गुण होते हैं, परन्तु भगवान् के पास प्रत्येक गुण पूर्ण होता है जबकि जीवात्मा में अति न्यून मात्रा में विद्यामान् होता है ।

b)

यह कि गुणात्मक दृष्टिकोण से जीवात्मा भगवान् के समतुल्य है परंतु अंश होने के कारण जीवात्मा भगवान् के समकक्ष नहीं है ।

c)

यह कि यदि गुणों के दृष्टिकोण को अनदेखा कर दिया जाए तो भगवान् और जीवात्मा में कोई अंतर नहीं है ।

d)

यह सभी कथन सत्य हैं ।

32.

जीवात्मा पूर्णात्म अवस्था में कब स्थापित होता है ?

a)

जब जीवात्मा को न तो किसी वस्तु की आकांक्षा करता है और न ही किसी वस्तु के लिए शोक करता है ।

b)

इंद्रियभोग की चरम सीमा ही जीवात्मा के लिए पूर्णात्म अवस्था होती है ।

c)

जब जीवात्मा 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' करता है, तो वह पूर्णात्म अवस्था मैं स्थापित समझा जाता है ।

d)

यह सभी कथन सत्य हैं ।

33.

वर्तमान युग में सांख्ययोग का क्या उद्देश्य होता है ?

a)

वर्तमान युग में सांख्ययोग का उद्देश्य भौतिक जगत् की आत्मा अर्थात् विष्णु या परमात्मा को जाना होता है ।

b)

वर्तमान युग में सांख्ययोग का उद्देश्य जीवात्मा द्वारा भौतिक परिपेक्ष्य में अपनी स्थिति को जानना होता है ।

c)

वर्तमान युग में सांख्ययोग का उद्देश्य वैज्ञानिकों द्वारा इस भौतिक ब्रह्मांड की संरचना को समझना होता है ।

d)

वर्तमान युग में सांख्य योग का उद्देश्य जीवात्माओं द्वारा ज्योतिषीय गणना करके अपने भविष्य को जानना होता है ।

34.

भगवान् की भक्ति का क्या अर्थ है ?

a)

भगवान् की सेवा

b)

भगवान् की प्रसन्नता

c)

भगवान् का आदेश

d)

भगवान् का उपदेश

35.

"एक विधि से वृक्ष की जड़ खोजी जाती है तथा दूसरी विधि से उसको सींचा जाता है ।" इस कथन में वृक्ष किसे कहा गया है, पहली तथा दूसरी विधियों के नाम भी बताएँ।

a)

वृक्ष - भगवान विष्णु या कृष्ण

प्रथम विधि – सांख्ययोग

द्वितीय विधि – भक्तियोग

b)

वृक्ष – वटवृक्ष

प्रथम विधि – भक्तियोग

द्वितीय विधि – सांख्य योग

c)

वृक्ष – भौतिक जगत्

प्रथम विधि – कर्म योग

द्वितीय विधि – सांख्य योग

d)

वृक्ष – आध्यात्मिक जगत् का प्रतिबिंब

प्रथम विधि – सांख्य योग

द्वितीय विधि – ध्यान योग

36.

क्या सांख्ययोग तथा भक्तियोग एक दूसरे से भिन्न पद्धत्तियाँ हैं ? स्पष्ट करें।

a)

नहीं, क्योंकि दोनों पद्धत्तियों का उद्देश्य एक है और प्रतिफल भी एक ही है ।

b)

नहीं, क्योंकि दोनों पद्धतियां जीव आत्माओं द्वारा क्रियान्वित की जाती है ।

c)

हाँ, क्योंकि दोनों पद्धत्तियों की क्रियान्वयन प्रक्रिया एक दूसरे से बहुत भिन्न है ।

d)

हाँ, क्योंकि सांख्ययोग भौतिक जगत् में जीव परिस्थिति को दर्शाता है, जबकि भक्तियोग जीवों को सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करवाता है ।

37.

मनुष्य सांख्यदर्शन के द्वारा भौतिक जगत् के मूल अर्थात् विष्णु के बारे में जानने के उपरांत क्या करता है ?

a)

वह स्वयं को पूर्ण ज्ञान सहित भगवान् के दिव्य सेवा में लगा देता है ।

b)

वह भगवान् विष्णु की शरण स्थली को ढूंढने में लग जाता है ।

c)

वह भगवान् के सदृश वैभव प्राप्त करने में लग जाता है ।

d)

वह भगवान् के सदृश शक्तियाँ प्राप्त करने में लग जाता है ।

38.

जो बद्धजीवात्माएँ मनुष्य जीवन के चरम उद्देश्य को नहीं जानती हैं । सांख्य तथा कर्मयोग के विषय में उनका क्या मत होता है ?

a)

वे सांख्ययोग तथा कर्मयोग (भक्तियोग) को एक दूसरे से भिन्न मानते हैं ।

b)

वे सांख्ययोग तथा कर्मयोग (भक्तियोग) को एक दूसरे से अभिन्न मानते हैं ।

c)

वे सांख्ययोग को कर्मयोग से उत्तम मानते हैं ।

d)

वे कर्मयोग को सहयोग से उत्तम मानते हैं ।

39.

साधक समस्त भौतिक वस्तुओं को निम्न में से किस परिस्थिति में यथारूप में देखता है ?

a)

जब वह यह जान जाता है कि सांख्ययोग द्वारा प्राप्य स्थान भक्तियोग द्वारा भी सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है ।

b)

जब साधक सांख्ययोग तथा भक्तियोग को एकसमान देखता है ।

c)

जब साधक न तो कर्मफलों से घृणा करता है और न ही कर्मफल की इच्छा करता है । अर्थात् हर परिस्थिति में समभाव रहता है ।

d)

यह सभी विकल्प उचित हैं ।

40.

सांख्य दार्शनिक शोध के द्वारा किस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है ?

a)

यह कि जीव इस भौतिक जगत् का नहीं अपितु पूर्ण परमात्मा का अंश है ।

b)

यह कि जीव और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है ।

c)

यह कि जीव का अस्तित्व भौतिक जगत् में है जबकि परमात्मा का अस्तित्व आध्यात्मिक जगत् में ।

d)

यह कि जीव और परमात्मा गुणात्मक दृष्टिकोण से भिन्न है ।

41.

क्या जीवात्मा का भौतिक जगत् से कोई संबंध होता है ?

a)

नहीं, जीवात्मा के सारे कार्य भगवान् से संबद्ध होने चाहिए ।

b)

नहीं, क्योंकि जीवात्मा की स्वाभाविक स्थिति आध्यात्मिक है ।

c)

नहीं, क्योंकि यदि जीवात्मा का संबंध भौतिक जगत् से होता तो उसे बार-बार विभिन्न योनियों में देहांतरण न करना पड़ता ।

d)

सभी कथन सही हैं ।

42.

निम्न में से किसी एक कारण का चयन करें जो जीवात्मा को उसकी स्वाभाविक स्थिति का बोध करवाने के लिए उत्तरदायी होता है ।

a)

कृष्णभावनामृत

b)

ध्यानयोग

c)

ज्ञानयोग

d)

हठयोग

43.

सांख्ययोग में मनुष्य को पदार्थ से विरक्त होना पड़ता है और भक्तियोग में उसे कृष्णभावनाभावित कर्म में आसक्त होना पड़ता है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।

a)

सांख्ययोग में मनुष्य को भौतिक जगत् से विरक्ति के लिए प्रयास करना पड़ता है जबकि भक्तियोग (कृष्णभावनामृत) में उसे भौतिक जगत् से विरक्ति के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है । क्योंकि इस विधि के द्वारा वह ऐसी विरक्ति तथा कृष्ण में आसक्ति स्वतः ही प्राप्त कर लेता है ।

b)

भौतिक पदार्थ से विरक्त हुए बिना भी सांख्ययोग क्रियान्वित किया जा सकता है और भक्तियोग के बिना भी कृष्ण में आसक्ति प्राप्त की जा सकती है ।

c)

हालांकि पदार्थ से विरक्त हुए बिना सांख्ययोग संपन्न नहीं हो सकता और जबकि कृष्ण में आसक्त हुए बिना भक्तियोग संपन्न हो सकता ।

d)

यह सभी कथन सत्य हैं।

44.

सन्यासी कितने प्रकार के होते हैं ?

a)

मायावादी सन्यासी - सांख्यदर्शन का अध्ययन करते हैं ।

वैष्णव सन्यासी - भागवत् दर्शन का अध्ययन करते हैं ।

b)

मायावादी सन्यासी - भागवत् दर्शन का अध्ययन करते हैं

वैष्णव सन्यासी - सांख्यदर्शन का अध्ययन करते हैं ।

c)

एक दंडी संन्यासी - भागवत् दर्शन का अध्ययन करते हैं ।

द्विदंडी संन्यासी - सांख्यदर्शन का अध्ययन करते हैं ।

d)

एक दंडी संन्यासी - भागवत् दर्शन का अध्ययन करते हैं ।

त्रिदंडी संन्यासी - सांख्यदर्शन का अध्ययन करते हैं ।

45.

मायावादी सन्यासियों और वैष्णव सन्यासियों में क्या मुख्य अंतर होता है ?

a)

वैष्णव सन्यासी भगवान् की भक्तिमय सेवा हेतु कर्मों में दिव्य आनंद प्राप्त करता है जबकि मायावादी सन्यासी कर्मों का परित्याग करने के कारण इस दिव्य आनंद से वंचित रह जाता है ।

b)

मायावादी सन्यासी सांख्यदर्शन का अध्ययन करते हैं जबकि वैष्णव सन्यासी भागवत् दर्शन का अध्ययन करते हैं ।

c)

मायावादी सन्यासियों के पतन की संभावना सदैव बनी रहती है जबकि वैष्णव सन्यासी भगवद्धाम को प्राप्त होते हैं ।

d)

अनेक जन्मों के उपरान्त मायावादी सन्यासियों को भी अंततः कृष्णभावनामृत को ही अंगीकार करना पड़ता है जबकि वैष्णव सन्यासी प्रारंभ से ही कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करते हैं ।

46.

मायावादी सन्यासियों के लिए श्रीमद्भागवत का अध्ययन कष्टपूर्ण क्यों होता है ?

a)

क्योंकि वे समुचित बोध के बिना ही भागवत की शरण ग्रहण कर लेते हैं ।

b)

क्योंकि वे पहले से ही ब्रह्मचिंतन में आनन्द प्राप्त कर चुके होते हैं ।

c)

क्योंकि वे श्रीमद्भागवत को भी शुष्क चिंतन तथा कृत्रिम साधनों द्वारा समझ लेते हैं ।

d)

यह सभी कथन उचित हैं ।