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Worksheets35. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_8.05–8.09
Total questions: 41
Worksheet time: 1hrs 12mins
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निम्न में से कौन सा श्लोक कृष्णभावनामृत के महत्व को प्रदर्शित करता है ?
8.2
8.6
8.5
8.7
भगवान् श्रीकृष्ण के स्वभाव को प्राप्त करने की कसौटी क्या है ?
पूर्ण कृष्णभावनामृत में भौतिक देह का त्याग ।
अप्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत में भौतिक देह का त्याग ।
आंशिक कृष्णभावनामृत में भौतिक देह का त्याग ।
धार्मिक मनोवृति में भौतिक देह का त्याग ।
हमें ऐसा क्या करना होगा कि जीवन के अंत काल में हम भगवान् श्रीकृष्ण का स्पष्ट स्मरण कर सकें ?
अपने इस मनुष्य जीवन में भक्ति का विकास करना होगा ।
अपने इस मनुष्य जीवन में हमें कृष्णभावनामृत को पुनः जागृत करना होगा ।
अपने भक्तिमय जीवन में कृष्णभावनामृत का अभ्यास करना होगा ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
कृष्णभावनाहीन भक्ति से आप क्या समझते हो ?
भौतिक उपलब्धि हेतु ब्रह्मा, शिव या किसी देवता विशेष की भक्ति ।
समाज अथवा राष्ट्र के हितों हेतु धार्मिक उत्पात ।
धर्म परायणता की आड़ में धार्मिक कट्टरता ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति निम्न में से क्या होता है ?
शुद्धातिशुद्ध ।
अशुद्धातिशुद्ध ।
निर्गुण ।
कुशल भक्त ।
एक भक्त की शुद्धता की कसौटी क्या है ?
उसका कृष्णभावनाभावित न होना ।
उसकी धर्म परायणता ।
उसका कृष्णभावनाभावित होना ।
उसका दूसरों के प्रति दयालु होना ।
मनुष्य को कृष्णभावनामृत को पुनः जागृत करने के लिए क्या करना चाहिए ?
मनुष्य को हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर जप करना चाहिए ।
मनुष्य को हवन, यज्ञ आदि करने अथवा करवाने चाहिए ।
मनुष्य को प्रतिदिन धार्मिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए ।
मनुष्य को प्रतिदिन देवी देवताओं की पूजा-अर्चना करनी चाहिए ।
भगवान् चैतन्य ने हमें क्या उपदेश दिया है ?
यह कि मनुष्य को वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु होना चाहिए ।
यह कि मनुष्य को जल से भी अधिक सहिष्णु होना चाहिए ।
यह कि मनुष्य को वायु से भी अधिक सहिष्णु होना चाहिए ।
यह कि मनुष्य को तृण से भी अधिक सहिष्णु होना चाहिए ।
भक्ति की पूर्णता निम्न में से किस पर निर्भर करती है ?
कृष्णभावनामृत
कृष्णभावना विहीनता
धर्म परायणता
धार्मिक कट्टरता
कृष्णभावनामृत के विकास का मूलाधार क्या है ?
हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर जप ।
धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन ।
वैदिक अथवा धार्मिक साहित्य का अध्ययन ।
समाज अथवा राष्ट्र की निःस्वार्थ सेवा ।
हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर जप करने पर भी भौतिक जीवन में व्यवधान क्यों आते हैं ?
पूर्व जन्मों के कर्मबंधनों के निराकरण हेतु ।
जीवात्मा के शुद्धिकरण हेतु ।
कृष्णभावनामृत के विकास के विभिन्न स्तरों पर परीक्षार्थ ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
मृत्यु के समय अपना स्वभाव बदलने की विधि का वर्णन किस श्लोक में हुआ है ?
8.2
8.6
8.5
8.7
मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व मेरे चाचा ने मांसाहार की इच्छा व्यक्त की थी । क्या आप बता सकते हैं कि मृत्यु उपरांत उन्हें कौन सी योनि प्राप्त हुई होगी ?
उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार निम्न मांसाहारी योनि प्राप्त हुई होगी ।
उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार उच्च शाकाहारी योनि प्राप्त हुई होगी ।
उन्हें निश्चित रूप से शेर की योनि प्राप्त हुई होगी ।
उन्हें निश्चित रूप से मांसाहारी मनुष्य योनि प्राप्त हुई होगी ।
मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व मेरे चाचा ने मांसाहार की इच्छा व्यक्त की थी । क्या आप बता सकते हैं कि मृत्यु उपरांत उन्हें कौन सी योनि प्राप्त हुई होगी ?
उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार निम्न मांसाहारी योनि प्राप्त हुई होगी ।
उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार उच्च शाकाहारी योनि प्राप्त हुई होगी ।
उन्हें निश्चित रूप से शेर की योनि प्राप्त हुई होगी ।
उन्हें निश्चित रूप से मांसाहारी मनुष्य योनि प्राप्त हुई होगी ।
जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में अपने देह को त्यागता है वह निश्चित रूप से भगवान् के दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है ऐसे में उसे प्राप्त होने वाले शरीर की प्रकृति कैसी होती है ?
सच्चिदानंद
आध्यात्मिक
दिव्य
निर्गुण
मृत्यु के समय मन की सही अवस्था से आपका क्या तात्पर्य है ?
मन का पूर्ण रूप से कृष्णभावनामृत में अवशोषित होना ।
मन का पूर्ण रूप से धार्मिक परायण होना ।
मन का पूर्ण रूप से सतोगुणी होना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
महाराज भरत का अगले जन्म में हिरण के रूप में पैदा होने का क्या कारण था ?
मृत्यु के समय हिरण में उनकी आसक्ति होना ।
पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार उन्हें हिरण की योनि प्राप्त होना ।
उनका जंगल में रहकर एकाकी भक्ति करना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
मृत्यु के समय हमारे कौन से विचार मन के भाव को प्रभावित करते हैं ?
वह विचार जिनका हमने जीवन के अधिकांश समय में चिंतन किया होता है ।
वह विचार जिनमें हमारा मन निरंतर अवशोषित रहता है ।
वह विचार जिन पर आधारित हमने अपना जीवन व्यतीत किया होता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
हमें अगला शरीर निश्चित रूप से आध्यात्मिक ही प्राप्त हो । ऐसा सुनिश्चित करने के लिए हमें क्या करना होगा ?
हमें हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर जप करना होगा ।
अपने मन को सदैव कृष्ण के चिंतन में ही लगाए रखना होगा ।
भगवान् श्री कृष्ण को परमभोक्ता, परमनियंता, परमपुरुष, परमस्वामी आदि मानते हुए अपनी प्रवृत्तियों एवं प्रकृति को परिवर्तित करना होगा ।
कृष्ण के प्रति सेवा के भाव को अपने भीतर पुनः जागृत करने के लिए हमें कृष्णभावनाभावित कर्म करने होंगे ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण में श्लोक संख्या 8.7 में निम्न में से कौन सा उपदेश नहीं दिया है ?
तुम्हें सदैव मेरा चिंतन करना चाहिए ।
अपने नियत कर्मों का निर्वहन करना चाहिए ।
अपने कर्मों को मुझे समर्पित करना चाहिए ।
अपने मन तथा बुद्धि को ही अपना स्वामी समझना चाहिए ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 8.7 साथ में कृष्णभावनामृत के विकास की विधि का वर्णन किया है निम्न में से उस विधि को पहचानें ।
भगवान् श्रीकृष्ण का निरंतर चिंतन + नियत कर्मों का निष्काम भाव से निर्वहन + मन तथा बुद्धि का कृष्ण को समर्पण = कृष्णभावनामृत
भगवान् श्रीकृष्ण का यदा-कदा चिंतन + नियत कर्मों का सकाम भाव से निर्वहन + मन तथा बुद्धि का कृष्ण को समर्पण = कृष्णभावनामृत
भगवान् श्रीकृष्ण का निरंतर चिंतन + नियत कर्मों का निष्काम भाव से त्याग + मन तथा बुद्धि का कृष्ण को समर्पण = कृष्णभावनामृत
भगवान् श्रीकृष्ण का यदा-कदा चिंतन + नियत कर्मों का निष्काम भाव से उपेक्षा + मन तथा बुद्धि का कृष्ण को समर्पण = कृष्णभावनामृत
भगवान् श्री कृष्ण द्वारा श्लोक संख्या 8.7 में दिए गए उपदेश विशेषकर किसके लिए महत्वपूर्ण है ?
जो व्यक्ति भौतिक कार्य में व्यस्त रहते हैं ।
जो व्यक्ति आध्यात्मिक कार्य में व्यस्त रहते हैं ।
जो व्यक्ति अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में व्यस्त रहते हैं ।
जो व्यक्ति सदैव कृष्णभावनाभावित कर्मों में व्यस्त रहते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण श्लोक संख्या 8.8 के माध्यम से किस विषय पर बल देते हैं ?
भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्मरण किए जाने की महत्ता पर बल देते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्वामित्व को मनवाने पर बल देते है ।
भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य जीवन के महत्व को समझने पर बल देते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण अपनी भगवत्ता को स्थापित करने पर बल देते हैं ।
हरे कृष्ण महामंत्र के जप का क्या प्रभाव होता है ?
इससे कृष्ण की स्मृति होती है ।
इससे सुप्त कृष्णभावनामृत पुनःजागृत होता है ।
इससे कृष्ण के साथ पुनः संबंध स्थापित होता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भौतिक कल्मषों से मुक्ति का एकमात्र साधन क्या है ?
हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर जप ।
निरंतर धार्मिक अनुष्ठानों में संलग्नता ।
धार्मिक कट्टरता ।
समाज एवं राष्ट्र के हितों के लिए धर्म परायणता ।
पुरुषम् का क्या अर्थ होता है ?
परम भोक्ता
परम भोग्य
परम सेव्य
परम सेवक
मन तो चंचल होता है । तो मन को किस प्रकार से भगवान् के चिंतन में लगाया जा सकता है ?
मन को बलपूर्वक कृष्ण-चिंतन में लगाना चाहिए ।
मन के भाव के अनुरूप कृष्ण-चिंतन करना चाहिए ।
मन के अनुगामी होकर कृष्ण-चिंतन करना चाहिए ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 8.9 में किस विधि का वर्णन हुआ है ?
कृष्ण-चिंतन की विधि का ।
भौतिक जीवन जीने की विधि का ।
सात्विक भोजन की विधि का ।
मन को नियंत्रित करने की विधि का ।
निम्न में से किस रूप में भगवान् का चिंतन नहीं करना चाहिए ?
सर्वज्ञ तथा पुरातन के रूप में ।
लघुतम से भी लघुतर के रूप में ।
अचिंत्य तथा नित्य पुरुष के रूप में ।
परम सेवक के रूप में ।
भौतिक जीवन में हम दैनिक गतिविधियों एवं संघर्ष के दौरान भगवान् को क्या समझते हैं ?
हमारे आराध्य देव ।
हमारे परम सेवक ।
हम सबके स्वामी ।
समस्त सुख-सुविधाओं के भोक्ता ।
भगवान् के कवि रूप से क्या तात्पर्य है ?
अर्थात् भगवान् भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता हैं ।
भगवान् हमारे मनोरंजन हेतु कविताओं तथा गीतों की रचना करते हैं ।
भगवान् हमारे मनोरंजन हेतु समस्त सुख-सुविधाओं के व्यवस्थापक हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
अचिंत्य का क्या अर्थ है ?
भौतिक जगत से परे ।
हमारे समस्त तर्कों से परे ।
नीति शास्त्र तथा दार्शनिक चिंतन से परे ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
ज्ञान प्राप्त करने की वास्तविक विधि क्या है ?
वेदों, भगवद्गीता कथा भागवत जैसे शास्त्रों के कथनों पर विश्वास करना ।
प्रामाणिक प्रवंचक से वैदिक शास्त्रों में वर्णित प्रवचनों का श्रवण करना ।
शुद्धभक्तों का संग करना ।
यह सभी ज्ञान प्राप्त करने की वास्तविक विधि के अभिन्न अंग हैं ।
बुद्धिमान मनुष्यों को किस प्रकार के तर्कों से दूरी बनाए रखनी चाहिए ?
मायावादी तर्कों से ।
भौतिकतावादी तर्कों से ।
शुष्क दार्शनिक अथवा मनोधर्मी तर्कों से ।
बुद्धिमान मनुष्यों को इन सभी प्रकार के तर्कों से सदैव दूरी बनाए रखनी चाहिए ।
भगवत्योग के लिए ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों में से कौन सी इंद्री की भूमिका महत्वपूर्ण है ?
जिह्वा
कान
नाक
उपस्थ
भगवत्प्राप्ति हेतु भक्तियोग में जिह्वा की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण क्यों है ?
क्योंकि जिह्वा द्वारा भगवान्नाम का जप करने से मन, बुद्धि, शरीर तथा अन्य समस्त इंद्रियों के नियंत्रित, संरेखित तथा शुद्ध होती हैं । फलतः हृदय का शुद्धिकरण होता है ।
क्योंकि जिह्वा द्वारा भगवान्नाम का जप करने से कानों का शुद्धिकरण होता है ।
क्योंकि जिह्वा द्वारा भगवान्नाम का जप करने से बुद्धि का विकास होता है । फलतः हृदय का शुद्धिकरण होता है ।
क्योंकि जिह्वा द्वारा भगवान्नाम का जप करने से मन नियंत्रित तथा शुद्ध होता है ।
भगवत्प्राप्ति हेतु निम्न में से कौन सी योग की विधि सरलतम् है और क्यों ?
ज्ञानयोग - भगवत्प्राप्ति की यह अप्रत्यक्ष विधि है ।
ध्यानयोग - भगवत्प्राप्ति की यह अप्रत्यक्ष विधि है ।
भक्तियोग - भगवत्प्राप्ति की यह प्रत्यक्ष विधि है ।
हठयोग - भगवत्प्राप्ति की यह अप्रत्यक्ष विधि है ।
