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Worksheets37. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_8.18–8.27
Total questions: 48
Worksheet time: 1hrs 15mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल नं0 लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।
हम जीव कितनी अवधि तक अव्यक्त अवस्था में रहते हैं ?
एक सतयुग के समान कालांतर तक
एक द्वापर युग के समान कालांतर तक
एक महायुग के समान कालांतर तक
एक कल्प के समान कालांतर तक
हम जीव कितनी अवधि तक व्यक्त अवस्था में रहते हैं ?
4,32,00,000 वर्ष
43,20,00,000 वर्ष
4,32,00,00,000 वर्ष
43,20,00,00,000 वर्ष
हम जीव कितने समय से इस अव्यक्त तथा व्यक्त अवस्था के चक्र में घूम रहे हैं ?
1000 कल्प पूर्व से ।
जब से चतुर्मुखी ब्रह्मा का जन्म हुआ है ।
जब से इस ब्रह्मांड में हमारी सृष्टि हुई है ।ॉ
अनादि काल से ।
पृथ्वी पर रात्रि के समय तो जीव व्यक्त अवस्था में रहते हैं परंतु ब्रह्मा जी की रात्रि में अव्यक्त अवस्था में क्यों चले जाते हैं ?
क्योंकि ब्रह्मा जी (प्रधान संचालक) के निद्रा में जाते ही संपूर्ण ब्रह्मांड की समस्त गतिविधियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं ।
क्योंकि हम जीव ब्रह्मा जी के दिन के समय ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त जीवन यापन सुविधाओं को समाप्त कर देते हैं । अतः पुनः पूर्ति हेतु हमें अव्यक्त अवस्था में चला जाना होता है ।
ताकि हमारी गतिविधियों से ब्रह्मा जी की निद्रा भंग न हो जाए ।
ताकि ब्रह्मा जी को हम जीवों कि जीवन यापन की चिंता न रहे ।
हम जीवों का इस ब्रह्माण्ड के उच्चतर तथा निम्नतर लोकों में आरोहण तथा अवरोहण करते रहने का मूल कारण क्या है ?
भौतिक भोग की इच्छाएँ
भगवान् से विमुखता
भौतिक भोग की विविधताएँ
यह सभी हम जीवों के इस ब्रह्माण्ड के उच्चतर तथा निम्नतर लोकों में आरोहण तथा अवरोहण करते रहने के मूल कारण हैं ।
हमारे भौतिक शरीर ब्रह्मा जी की रात्रि के दौरान भगवान् विष्णु के शरीर में ही क्यों विलुप्त होते हैं ?
क्योंकि भगवान् विष्णु पदार्थ के स्त्रोत महत तत्त्व के स्वामी हैं ।
क्योंकि सभी कुछ भगवान् विष्णु के शरीर से ही उत्पन्न होता है ।
दोनों ही कथन सत्य हैं ।
दोनों ही कथन मिथ्या हैं ।
हम जीवों के भौतिक जीवन की अव्यक्त तथा व्यक्त अवस्थाओं की धुरी कौन है ?
ब्रह्मा जी का जीवन चक्र ।
महाविष्णु का श्वास लेना और छोड़ना ।
गर्भोदकशायी विष्णु का प्रकट और अप्रकट होना ।
क्षीरोदकशायी विष्णु का हमारे हृदय में प्रकट और अप्रकट होना ।
पुनर्जन्म के चक्र से वास्तविक मुक्ति का मार्ग क्या है ?
कृष्णभावनामृत
ध्यानयोग
हठयोग
ज्ञानयोग
श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के किन श्लोकों में भौतिक प्रकृति एवं भौतिक जीवन का वर्णन हुआ है ?
8.11 - 8.12
8.12 - 8.15
8.15 - 8.19
8.17 - 8.22
श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के किस श्लोक में भौतिक प्रकृति एवं आध्यात्मिक प्रकृति के मध्य के अंतर को स्पष्ट किया गया है ?
8.15
8.18
8.19
8.20
पराशक्ति भौतिक प्रकृति के गुण से सर्वथा विपरीत होती है । तो यह स्पष्ट करें कि निम्न में से कौन सा गुण परा प्रकृति का है ?
विशुद्ध सत्व गुण
सतोगुण
रजोगुण
तमोगुण
क्या परा प्रकृति भी भौतिक प्रकृति की भक्ति व्यक्त तथा अव्यक्त होती रहती है ?
नहीं, क्योंकि परा प्रकृति दिव्य तथा शाश्वत होती है ।
हाँ, क्योंकि परा प्रकृति भी काल के अधीन कार्य करती है ।
नहीं, क्योंकि परा प्रकृति गुण विहीन होती है ।
हाँ, क्योंकि परा प्रकृति भी परिवर्तनशील होती है ।
श्रीमद्भागवद्गीता के श्लोक संख्या 8.21 में भगवान् श्रीकृष्ण अपने परमधाम की कौन सी विशेषताएँ बताते हैं ?
परमधाम अप्रकट तथा अविनाशी है ।
परमधाम परम गंतव्य है ।
परमधाम से कोई वापस नहीं आता ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
ब्रह्मसंहिता में ब्रह्मा जी ने भगवान् श्रीकृष्ण के परमधाम को क्या कहा है ?
चिन्तामणि
पारसमणि
सामयन्तक मणि
कौस्तुभ मणि
चिन्तामणि का क्या अर्थ होता है ?
समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाला ।
एक तरह की मणि जिससे चिंता शून्यता उत्पन्न होती है ।
समस्त इच्छाओं को चिंताओं में परिवर्तित करने वाली मणि ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् का परमधाम क्या कहलाता है ?
गोलोक वृंदावन धाम
भूमो वृंदावन धाम
मथुरा वृंदावन धाम
ब्रजमंडल वृंदावन धाम
भगवान् के परमधाम में इमारतें निम्न में से किस सामग्री से निर्मित होती हैं ?
पारसमणियों से
कौस्तुभ मणियों से
सामयन्तक मणियों से
पंचमहाभूतों से
भगवान् के परमधाम में उपलब्ध वृक्षों को कल्पतरु क्यों कहा जाता है ?
क्योंकि वह जीव की इच्छानुसार खाद्य पदार्थ प्रदान करते हैं ।
क्योंकि उन वृक्षों की आयु ब्रह्मा जी के एक कल्प के समान होती है ।
क्योंकि वह वृक्ष जीव की कल्पना मात्र से ही उपस्थित हो जाते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् के परमधाम में उपलब्ध गौएँ क्या कहलाती हैं ?
सुरभि गौएँ
गीर गौएँ
कामधेनु गौएँ
बहुला गौएँ
वेणुं क्वणन्तम् का क्या अर्थ है ।
वंशी बजाना
फूलों की माला
मनमोहक दृश्य
स्वर्णिम लताएँ
ब्रह्मसंहिता में भगवान् श्रीकृष्ण के सौंदर्य का वर्णन करते हुए ब्रह्मा जी ने क्या नहीं कहा है ?
भगवान् का दिव्य स्वरूप समस्त लोकों में सर्वाधिक आकर्षक है ।
भगवान् के नेत्र कमल दलों के समान है ।
भगवान् का शरीर मेघों के वर्ण के समान है ।
भगवान् का सौंदर्य कामदेव के समान है ।
क्या श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने निजी धाम का संपूर्ण वर्णन किया है ?
नहीं, केवल संकेत मात्र दिया है ।
हाँ, केवल श्रीमद्भगवद्गीता ही ऐसा शास्त्र है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने निजी धाम का संपूर्ण वर्णन किया है ।
नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य धाम को गोपनीय रखा है ।
हाँ, भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने निजी धाम की प्रत्येक विशेषता का बारीकी से वर्णन किया है ।
भगवान् श्रीकृष्ण का परमधाम गोलोक वृंदावन धाम आध्यात्मिक जगत् के समस्त लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्यों है ?
क्योंकि वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने मूल रूप में सदैव उपस्थित रहते हैं ।
क्योंकि वह अन्य सभी लोकों के ऊपर स्थित है ।
क्योंकि वह अन्य सभी लोकों में सबसे सुंदर है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
कौन से उपनिषद् में कहा गया है कि भगवान् का धाम सर्वश्रेष्ठ है और यही परमधाम है । एक बार वहाँ पहुँचकर फिर से भौतिक संसार में वापस नहीं आना होता है ?
कठोपनिषद्
कलिसंतरण उपनिषद्
श्वेताश्वेतर उपनिषद्
छांदोग्य उपनिषद्
कृष्ण का धाम तथा स्वयँ कृष्ण अभिन्न हैं । ऐसा क्यों ?
क्योंकि दोनों के गुण एक समान हैं ।
क्योंकि कृष्ण अपने निजी धाम में सदैव उपस्थित रहते हैं ।
क्योंकि कृष्ण के धाम में स्वतः प्रकाशित होने की योग्यता है ।
क्योंकि जहाँ कृष्ण होते हैं वहीं उनका धाम होता है ।
अनन्य भक्ति से आप क्या समझते हैं ?
भगवान् श्रीकृष्ण की एकनिष्ठ भक्ति ।
भगवान् के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की भक्ति भी ।
भगवान् के अतिरिक्त अन्य सभी की भक्ति ।
भगवान् की भक्ति से अधिक उनके धाम की भक्ति ।
ब्रह्मा जी ने ब्रह्मसंहिता में परमधाम को आनंदचिन्मय रस क्यों कहा है ?
क्योंकि वहाँ प्रत्येक वस्तु परम आनंद से पूर्ण है ।
क्योंकि वहाँ पर विविधता का प्राकट्य परमानन्द का ही गुण है ।
क्योंकि वहाँ पर लेश मात्र भी भौतिकता नहीं है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् तो सदैव अपने धाम में ही रहते हैं फिर सर्वव्यापक कैसे रहते हैं ?
भगवान् अपनी परा तथा अपरा शक्तियों के माध्यम से भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में एक साथ उपस्थित रहते हैं ।
भगवान् अपने भक्तों के गुणगान के द्वारा ही भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में एक साथ उपस्थित रहते हैं ।
जब हम मनुष्य एक साथ दो स्थानों पर उपस्थित नहीं रह सकते हैं तो भगवान् कैसे रह सकते हैं ? यह संभव नहीं है ।
भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में दूरी के कारण सर्वव्यापकता के इस सिद्धांत स्वीकार कर पाना अत्यंत कठिन है ।
यस्यान्तःस्थानि का क्या अर्थ है ?
अर्थात् प्रत्येक वस्तु स्वयँ भगवान् में या उनकी पराशक्ति या अपरा शक्ति में निहित है ।
अर्थात् भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में उपस्थित विभिन्न लोक ।
अर्थात् प्रत्येक ब्रह्मांड में उपस्थित स्वर्ग लोक ।
अर्थात् स्वयँ भगवान् में या उनकी पराशक्ति या अपरा शक्ति में निहित भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् के अतिरिक्त अन्य लोक ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 8.22 क्या स्थापित करता है ?
यह कि कृष्ण के परमधाम में या असंख्य वैकुण्ठ लोकों में भक्ति के द्वारा ही प्रवेश संभव है ।
यह कि प्रत्येक जीव के लिए भौतिक जगत् से आध्यात्मिक जगत् में जाना संभव है ।
यह कि भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों का अस्तित्व शाश्वत है ।
यह कि भौतिक जगत् आध्यात्मिक जगत् से वृहद एवं व्यापक है ।
वेदों में भगवान् के रूप की उपमा किससे दी गई है ?
उस शान्त वृक्ष से जिसकी पत्तियाँ निरंतर बदलती रहती हैं ।
उस कल्पतरू से जो सभी को इच्छानुसार खाद्य पदार्थ प्रदान करता है ।
उस पर्वत से जो सूर्य की रोशनी के साथ अपनी कलाएँ निरंतर बदलता रहता है ।
उस वृक्ष से जिसका आकार निरंतर बदलता रहता है ।
वैकुण्ठ लोगों की अध्यक्षता करने वाले भगवान् के स्वांश निम्न में से कैसे हैं ?
द्विभुजी
चतुर्भुजी
षटभुजी
अष्टभुजी
हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें उन विभिन्न कालों को बताऊँगा, जिनमें इस संसार से प्रयाण करने के बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता । भगवान् श्रीकृष्ण ने यह किस श्लोक में कहा है ?
8.21
8.22
8.23
8.24
श्रीभगवान् के कौन से भक्त शुभ मुहूर्त में मृत्यु की चिंता नहीं करते है ?
पूर्ण कृष्णभावनाभावित भक्त
अनन्य भक्त
पूर्ण शरणागत भक्त
यह सभी भक्त शुभ मुहूर्त में मृत्यु की चिंता नहीं करते हैं ।
कर्मयोगी, ध्यानयोगी तथा हठयोगी उपयुक्त समय (शुभमुहूर्त) में ही शरीर को त्यागना क्यों चाहते हैं ?
यह सुनिश्चित करने के लिए कि उन्हें वापस इस जन्म मृत्यु वाले संसार में लौटना न पड़े ।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका अगला जन्म मनुष्य योनि में हो ।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका अगला जन्म किसी धनाढ्य परिवार में पुरुष के रूप में हो ।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि शेष भक्ति हेतु उनका अगला जन्म किसी सुसंस्कृत ब्राह्मण परिवार में पुरुष के रूप में हो ।
वह कौन से शुभमुहूर्त हैं जिनमें देह त्यागने पर जीवात्मा निर्विशेष ब्रह्मज्योति को प्राप्त होता है ?
अग्नि के प्रभाव में ।
दिन के शुभक्षण में ।
शुक्ल पक्ष में ।
सूर्य के उत्तरायण होने में ।
यह सभी शुभमुहूर्त हैं ।
यदि कोई योगी धुएँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष में या सूर्य के दक्षिणायन रहने के छह महीनों में दिवंगत होता है, तो किस लोक को जाता है ?
चंद्रलोक
सूर्यलोक
पाताल लोक
इंद्रलोक
वैदिक मत के अनुसार इस संसार से प्रयाण करने के कितने मार्ग हैं ? और वह कौन से हैं ?
दो - एक प्रकाश का मार्ग तथा दूसरा अंधकार का मार्ग ।
दो - एक उत्तर दिशा का मार्ग और दूसरा दक्षिण दिशा का मार्ग ।
दो - एक उर्ध्व गति का मार्ग तथा दूसरा अधोगति का मार्ग ।
दो - एक आकाश का मार्ग तथा दूसरा जल का मार्ग ।
किस मार्ग से जाने वाला मनुष्य वापस लौट कर इस संसार में नहीं आता है ?
प्रकाश के मार्ग से जाने वाला ।
अंधकार के मार्ग से जाने वाला ।
दोनों ही मार्गों से जाने वाला ।
इनमें से कोई नहीं ।
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार सकाम कर्मियों तथा दार्शनिक चिंतकों का इस संसार में आवागमन क्यों बना रहता है ?
उन्हें परममोक्ष प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वे कृष्ण की शरण में नहीं जाते ।
क्योंकि वे अल्पज्ञ होते हैं ।
क्योंकि वह इंद्र भोग की इच्छाओं से पूर्णतः मोहित होते हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 8.27 में भगवान् श्री कृष्ण ने हमें क्या उपदेश दिया है ?
यह कि भक्तजनों को आत्मा के प्रयाण करने के विभिन्न मार्गों के विषय में सुनकर विचलित हुए बिना सदैव भक्ति में स्थिर रहना चाहिए ।
यह कि भक्तजनों को प्रकाश मार्ग से प्रयाण करना चाहिए।
यह कि भक्तजनों को अंधकार मार्ग से प्रयाण करना चाहिए।
यह कि भक्त जनों के लिए प्रयाण का कोई भी मुहूर्त निश्चित नहीं है ।
कृष्णभावनामृत में तल्लीन होने की सर्वोत्तम विधि क्या है ?
सदैव भगवान् की सेवा में रत रहना ।
सदैव दार्शनिक चिंतन में लगे रहना ।
सदैव ध्यानयोग के अभ्यास में लगे रहना ।
सदैव वैदिक शास्त्रों के स्वाध्ययन में लगे रहना ।
निम्न में से कौन सी योग पद्धति में भगवद्धाम का मार्ग स्वतः सुगम, सुनिश्चित तथा सीधा होता है ?
कृष्णभावनामृत अथवा भक्ति योग
ध्यान योग
ज्ञान योग
कर्म योग
युक्तवैराग्य किसे कहते हैं ?
भौतिक कार्यों से अनासक्ति तथा कृष्णभावनाभावित कार्यों में आसक्ति युक्त वैराग्य कहलाती है ।
भौतिक कार्यों से आसक्ति तथा कृष्णभावनाभावित कार्यों में अनासक्ति युक्त वैराग्य कहलाती है ।
वैरागियों की ब्रह्म ज्योति में तादात्म्य की युक्ति युक्त वैराग्य कहलाती है ।
इनमें से कोई भी कथन युक्त वैराग्य को परिभाषित नहीं करता है ।
