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Worksheets29. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.01–7.07
Total questions: 50
Worksheet time: 1hrs 20mins
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भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.01 में असंशयं शब्द क्यों प्रयोग किया है ?
क्योंकि अनादिकाल से भौतिक प्रकृति के संपर्क से उत्पन्न अज्ञानता के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।
क्योंकि अपूर्ण इन्द्रियों से उत्पन्न भ्रम के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।
क्योंकि प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन बद्धावस्था के कारण हम जीवात्माओं की प्रकृति संदेहपूर्ण हो गई है ।
यह सभी कथन भगवान् द्वारा असंशयं शब्द की प्रयुक्ति के महत्त्व को स्पष्ट करते हैं ।
परम सत्य को जानने की वास्तविक विधि क्या है ?
कृष्णभावना से पूरित होकर मन को योगाभ्यास द्वारा कृष्ण में आसक्त करके संशयरहित परमसत्य अर्थात भगवान् श्रीकृष्ण को जाना जा सकता है ।
शास्त्रों के अध्ययन तथा शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण को किसी भी परिस्थिति में - देश अथवा काल के प्रभाव में स्पष्टतः जाना जा सकता है ।
विद्वानों तथा आचार्यों द्वारा परस्पर शास्त्रार्थ अथवा तर्क-वितर्क के माध्यम से ही भगवान् की स्वाभाविक स्थिती को समझा जा सकता है ।
केवल ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग/अष्टाँगयोग के योगाभ्यास द्वारा ही भगवान् की स्वाभाविक स्थिती को पूर्णतः समझा जा सकता है ।
निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा की अनुभूति परमसत्य का पूर्ण ज्ञान नहीं है । जबकि यह दोनों अवस्थाएँ परमसत्य की पूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म केवल सत विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है, अन्तर्यामी परमात्मा (सत + चित) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है जबकि परमसत्य या श्रीभगवान् सच्चिदानन्द (सत + चित + आनन्द) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं ।
क्योंकि अन्तर्यामी परमात्मा केवल सत विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है, निर्विशेष ब्रह्म (सत + चित) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति है जबकि परमसत्य या श्रीभगवान् सच्चिदानन्द (सत + चित + आनन्द) विग्रह की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं ।
क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा श्रीभगवान् के अंशावतार हैं । अतः इनकी अनुभूति से परमसत्य या श्रीभगवान् को नहीं समझा जा सकता है ।
क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा का श्रीभगवान् के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । अतः इनकी अनुभूति के माध्यम से परमसत्य या श्रीभगवान् को जानने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है ।
"विभिन्न प्रकार के योग तो कृष्णभावनामृत के मार्ग के सोपान सदृश हैं ।"- इस कथन में 'सोपान सदृश' का क्या अर्थ है ?
सीढ़ी के समान
एक समान रस वाले
एक समान ग्रहण किये जाने वाले
एक समान
भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के 6.47 श्लोक में कृष्णभावनामृत के योगाभ्यास का निर्देश देते हैं । क्या आप मुझे बता सकते हैं कि इसका योगाभ्यास हम किस विधि द्वारा सरलता से कर सकते हैं ?
नवधा भक्ति द्वारा ।
ध्यानयोग के द्वारा ।
ज्ञानयोग के द्वारा ।
इन सभी विधियों के संयुक्त अभ्यास द्वारा ।
कृष्णभावनामृत के योगाभ्यास के लिए नवधा भक्ति की कौन सी विधि अग्रणी एवं महत्त्वपूर्ण है ?
श्रवणं
विष्णो स्मरणं
कीर्तनं
दास्यं
मनुष्य को कृष्णभावनामृत का योगाभ्यास इनमें से किससे नहीं सीखना चाहिए ?
साक्षात् कृष्ण से ।
कृष्ण के शुद्ध भक्त से ।
शुष्क दार्शनिक से ।
प्रामाणिक गुरु से ।
भगवान् श्रीकृष्ण किसके लिए एक शुभचिंतक मित्र के रूप में कार्य करते हैं ?
जो व्यक्ति निरन्तर कृष्ण के विषय में सुनता है ।
जो व्यक्ति निरन्तर वैदिक शास्त्रों के अध्ययन में व्यस्त रहता है ।
जो व्यक्ति निरन्तर मानसिक चिंतन द्वारा श्रीकृष्ण को जानने में प्रयासरत रहता है ।
इन सभी व्यक्तियों के प्रति भगवान् श्रीकृष्ण का सदैव शुभ व्यवहार रहता है ।
कृष्णभावनामृत द्वारा परमसत्य विषयक पूर्ण दिव्यज्ञान किस क्रम में प्राप्त होता है ?
निरन्तर श्रवणं - हृदय का शुद्धिकरण - सुप्त दिव्यज्ञान की जागृति - भगवद्भक्ति में स्थिरता - भक्ति का क्रमशः विकास - रजो तथा तमो गुणों का उन्मूलन - भौतिक काम तथा लोभ में कमी - भौतिक कल्मषों से मुक्ति - सतोगुण में स्थिरता - आध्यात्मिक स्फूर्ति का प्राप्ति - भगवद्भक्ति का पूर्ण ज्ञान ।
निरन्तर श्रवणं - हृदय का शुद्धिकरण - भक्ति का क्रमशः विकास - सुप्त दिव्यज्ञान की जागृति - भगवद्भक्ति में स्थिरता - भौतिक काम तथा लोभ में कमी - रजो तथा तमो गुणों का उन्मूलन - भौतिक कल्मषों से मुक्ति - सतोगुण में स्थिरता - आध्यात्मिक स्फूर्ति का प्राप्ति - भगवद्भक्ति का पूर्ण ज्ञान ।
निरन्तर श्रवणं - हृदय का शुद्धिकरण - भक्ति का क्रमशः विकास - सुप्त दिव्यज्ञान की जागृति - भगवद्भक्ति में स्थिरता - भौतिक काम तथा लोभ में कमी - रजो तथा तमो गुणों का उन्मूलन - सतोगुण में स्थिरता - भौतिक कल्मषों से मुक्ति - आध्यात्मिक स्फूर्ति का प्राप्ति - भगवद्भक्ति का पूर्ण ज्ञान ।
निरन्तर श्रवणं - हृदय का शुद्धिकरण - भक्ति का क्रमशः विकास - भौतिक काम तथा लोभ में कमी - रजो तथा तमो गुणों का उन्मूलन - भौतिक कल्मषों से मुक्ति - आध्यात्मिक स्फूर्ति का प्राप्ति - सतोगुण में स्थिरता - सुप्त दिव्यज्ञान की जागृति - भगवद्भक्ति में स्थिरता - भगवद्भक्ति का पूर्ण ज्ञान ।
असंशयं समग्रं से आपका क्या अभिप्राय है ?
पूर्ण संशयरहित अवस्था
पूर्ण ज्ञानयुक्त अवस्था
पूर्ण ज्ञानरहित अवस्था
पूर्ण संशययुक्त अवस्था
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.2 में क्या कहा है ?
समस्त योगियों में से जो योगी अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे परायण है, अपने अन्तःकरण में मेरे विषय में सोचता है और मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति करता है वह योग में मुझसे परम अन्तरंग रूप में युक्त रहता है । और सबों में सर्वोच्च है यही मेरा मत है ।
अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो ।
अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यवहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा । इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा ।
कई हज़ार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.2 के माध्यम से चतुर्थ अध्याय के किस श्लोक की पुष्टि की है ?
4.3
4.13
4.18
4.24
निम्न में से कौन सा गुण श्रीभगवान् का नहीं है ?
श्रीभगवान् समस्त ज्ञान के उद्गम हैं ।
श्रीभगवान् समस्त योगों में ध्यान का एकमात्र लक्ष्य हैं ।
श्रीभगवान् समस्त कारणों के कारण हैं ।
यह सभी गुण श्रीभगवान् के हैं ।
“पूर्णज्ञान में प्रत्यक्ष जगत्, इसके पीछे काम करने वाला आत्मा तथा इन दोनों के उद्गम सम्मिलित हैं ।“ श्रील प्रभुपाद के इस कथन में आत्मा शब्द निम्न में से किसके लिए प्रयुक्त हुआ है ?
जीवात्मा
परमात्मा
धर्मात्मा
महात्मा
ऐसा क्यों है कि कोई विरला ही भगवान् श्रीकृष्ण को जान पाता है ? कृपया कारण स्पष्ट करें ।
यह इसलिए क्योंकि कोई विरला व्यक्ति ही इस भौतिक जगत् में अपनी नितांत दयनीय बद्धावस्था को समझ पाता है और वास्तविक मुक्ति के लिए प्रयास करता है । जोकि कृष्ण को वस्तुतः जानने में है ।
यह इसलिए क्योंकि कोई विरला व्यक्ति ही अष्टाँगयोग के आठवें अंग अथवा अंतिम पड़ाव अर्थात् समाधि तक पहुँच पाता है ।
यह इसलिए क्योंकि कोई विरला व्यक्ति ही कपोलकल्पना अर्थात् शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा ज्ञान की इस पराकाष्ठा को प्राप्त कर पाता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
गीता के पहले छह अध्याय निम्न में से कौन से लोगों के लिए हैं ?
जो पदार्थ से आत्मा के पृथकता को जानने में रुचि लेते हैं ।
ज्ञानी अथवा ब्रह्मवादी अथवा निर्विशेषवादी व्यक्तियों के लिए हैं ।
योगी अथवा परमात्मावादी व्यक्तियों के लिए हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
मायावादी आदिगुरु श्रीशंकराचार्य के शिष्य श्रीकृष्ण को भगवान् क्यों स्वीकार नहीं करते हैं ?
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण को समझने के लिए केवल निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञान पर्याप्त नहीं है ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण को समझने के लिए केवल अंतर्यामी परमात्मा का ज्ञान पर्याप्त नहीं है ।
क्योंकि परमसत्य की अनुभूति के बिना कोरा ज्ञान व्यर्थ होता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
मीमांसक शब्द का क्या अर्थ है ?
शुष्क मानसिक चिंतन करने वाला ।
मीमांसा का समर्थक ।
मीमांसा का प्रवंचक ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
भक्तिमार्ग से मीमांसाकों तथा दार्शनिकों के च्युत होने का मूल कारण क्या है ?
भौतिक भोग की इच्छाओं का होना ।
विधि-विधानों का कुछ ज़्यादा ही दृढ़ता से पालन करना ।
मिथ्या अहंकार की मात्रा का आवश्यकता से अधिक होना ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
निम्न में से कौन ब्रह्मवेत्ता कहलाता है ?
ब्रह्मज्ञानी
परमात्माज्ञानी
आत्मज्ञानी
जगत्ज्ञानी
निम्न में से कौन परमात्मावेत्ता कहलाता है ?
ब्रह्मज्ञानी
परमात्माज्ञानी
आत्मज्ञानी
जगत्ज्ञानी
ब्रह्मवेत्ता या परमात्मावेत्ता योगी भगवान् श्रीकृष्ण को यशोदा नन्दन अथवा पार्थसारथी के रूप में क्यों नहीं समझ पाते हैं ?
परमेश्वर विषयक आंशिक ज्ञान के कारण वे सदैव भगवान् के श्याम सुन्दर रूप से अनभिज्ञ रहते हैं ।
मायावाद रूपी अद्वैतवाद के ज्ञान के कारण उन्हें केवल भगवान् के निराकार रूप का ही बोध होता है ।
ऐसे योगी भगवान् को आराध्य और स्वयँ को आराधक के रूप में ही जानते हैं, उन्हें सेव्य और सेवक के रूप में भगवान् से अपने संबंध का रंचमात्र भी बोध नहीं होता है ।
यह सभी तर्क प्रामाणिक हैं ।
"कभी-कभी बड़े-बड़े देवता भी कृष्ण के विषय में भ्रमित हो जाते हैं ।" इस कथन का समर्थन करने वाला सबसे प्रमुख उदाहरण क्या है ?
ब्रह्मविमोहन लीला
कालिया दमन लीला
रासलीला
राधाकुंड लीला
भगवान् को तत्त्वतः जानने की क्या विधि है ?
भगवान् की भक्ति
भगवान् की शक्ति
भगवान् की कृपा
भगवान् की संगति
तत्त्वतः शब्द का क्या अर्थ है ?
परम सत्य का यथावत् ज्ञान
परम सत्य का यथासामर्थ्य ज्ञान
परम सत्य का यथाशक्ति ज्ञान
परम सत्य का यथोचित ज्ञान
ब्रह्म साक्षात्कार की पराकाष्ठा कौन है ?
ब्रह्मा
शिव
कृष्ण
विष्णु
भगवान् अपने भक्तों को आत्मतत्त्व कब प्रकाशित करते हैं ?
भक्तों की दिव्य सेवा से प्रसन्न होकर ।
भक्तों के वैभव से प्रसन्न होकर ।
भक्तों के सामर्थ्य से प्रसन्न होकर ।
भक्तों की शक्ति से प्रसन्न होकर ।
भगवान् की भिन्ना शक्ति से आपका क्या तात्पर्य है ?
भगवान् की शक्ति जो हम जीवों की समझ से परे है, अर्थात् अचिंत्य भेदाभेद है ।
भगवान् की अन्य शक्तियों से भिन्न शक्ति जो भगवान् के नियंत्रण में है भी और नहीं भी ।
भगवान् द्वारा नियंत्रित अन्यत्र शक्ति जिस की प्रकृति भगवान् की प्रकृति से नितांत भिन्न है ।
भगवान् द्वारा अर्जित अन्यत्र शक्ति जिस की प्रकृति भगवान् की प्रकृति से नितांत भिन्न है ।
ईश्वर-विज्ञान से आप क्या समझते हैं ?
अर्थात् भगवान् की स्वाभाविक स्थिति तथा उनकी विविध शक्तियों का विश्लेषण ।
अर्थात् भगवान् के ज्ञान की व्यवहारिक अनुभूति ।
अर्थात् भगवान् का व्यवहारिक ज्ञान ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
वास्तव में, भौतिक प्रकृति क्या है ?
भगवान् के विभिन्न पुरुष अवतारों की शक्ति ।
भगवान के विष्णु अवतारों की शक्ति ।
क्षीरोदकशायी विष्णु की शक्ति ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
महाविष्णु जिस महत्तत्व को उत्पन्न करते हैं वास्तव में वह क्या है ?
महत्तत्व महाविष्णु की आध्यात्मिक शक्ति है ।
महत्तत्व महाविष्णु की सृजनात्मक शक्ति है । जो पदार्थ से ब्रह्मांडों तथा उनमें जीवन उपयोगी वस्तुओं को सृजन करने वाली भौतिक शक्ति है ।
महत्तत्व महाविष्णु की सृजनात्मक शक्ति है । जो आध्यात्मिक जगत् का सृजन करती है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
इनमें से कौन से भगवान् के स्वांश विस्तार विष्णु हैं ?
महाविष्णु
गर्भोदकशायी विष्णु
क्षीरोदकशायी विष्णु
यह सभी भगवान् के स्वांश विस्तार हैं ।
इनमें से ब्रह्मांड के पालक विष्णु कौन से हैं ?
महाविष्णु
गर्भोदकशायी विष्णु
क्षीरोदकशायी विष्णु
यह सभी ब्रह्मांड के पालक विष्णु हैं ।
इस भौतिक जगत् में गर्भोदकशायी विष्णु की क्या भूमिका है ?
समस्त ब्रह्मांडों में प्रविष्ट होकर उनमें जीवनोपयोगी विविधता उत्पन्न करना ।
ब्रह्मांड के प्रत्येक कण-कण में यथारूप विद्यमान् रहना ।
समस्त ब्रह्मांडों में ब्रह्मा के रूप में सृष्टि करना ।
केवल गर्भोदक जल में शयन का आनंद लेना ।
परव्योम का क्या अर्थ है ?
आध्यात्मिक जगत् ।
भौतिक जगत् ।
आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों के मध्य की खाई ।
आध्यात्मिक जगत् से परे एक और आकाश ।
आध्यात्मिक जगत् में परमात्मा की अभिव्यक्ति शाश्वत क्यों नहीं होती है ?
क्योंकि आध्यात्मिक जगत् में भगवान् श्रीकृष्ण अपने मूल स्वरूप तथा विस्तारों के रूप में उपस्थित रहते हैं, अतः वहाँ परमात्मा रूप में उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती है ।
क्योंकि परमात्मा की अभिव्यक्ति की आवश्यकता केवल भौतिक जगत् में होती है, जोकि ब्रह्मांड की ही भाँति क्षणिक होती है ।
भौतिक जगत् में पदार्थ के प्रत्येक कण को परमात्मा की अभिव्यक्ति के द्वारा सचेतन किया जाता है, जबकि आध्यात्मिक जगत् में प्रत्येक वस्तु-प्रत्येक कण सदैव कृष्णभावनाभावित रहता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
सांख्यदर्शन की विवेचना का मुख्य विषय क्या है ?
कृष्ण की बहिरंगा शक्ति का प्राकट्य ।
कृष्ण की अंतरंगा शक्ति का प्राकट्य ।
कृष्ण की भिन्ना शक्ति का प्राकट्य ।
कृष्ण की विभिन्न शक्तियों का प्राकट्य ।
भौतिक प्रकृति के स्थूल तत्वों को पहचानें ।
पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश ।
पृथ्वी, अग्नि, मन, वायु, बुद्धि ।
पृथ्वी, अग्नि, मन, वायु, अहंकार ।
मन, बुद्धि, अहंकार, वायु, आकाश ।
वास्तविक मुक्ति क्या होती है ?
भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीचरण कमलों की शरण प्राप्त करना ।
निर्विशेष ब्रह्म में तादात्म्य ।
सविशेष ब्रह्म में तादात्म्य ।
सार्ष्टि मुक्ति ।
क्या जीवात्मा मन तथा बुद्धि को भौतिक जगत् में ही धारण करता है, आध्यात्मिक जगत् में नहीं ?
हाँ, आध्यात्मिक जगत् में जीवात्मा भगवान् के सानिध्य में अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता है । अतः उसे मन तथा बुद्धि की आवश्यकता नहीं होती है ।
नहीं, आध्यात्मिक जगत् में जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति में होने के कारण अपने वास्तविक मन तथा बुद्धि को वहन् करता है ।
हाँ, क्योंकि मन तथा बुद्धि तो भौतिक प्रकृति के पदार्थ रूपी तत्व हैं अतः आध्यात्मिक जगत् में इनका कोई अस्तित्व नहीं होता है ।
नहीं, क्योंकि जीवात्मा मन तथा बुद्धि के माध्यम से ही भौतिक जगत् में इन्द्रिय भोग कर सकता है । आध्यात्मिक जगत में उसके लिए कोई भी भोग्य वस्तु प्राप्त नहीं होती है, अतः उसे वहाँ पर मन तथा बुद्धि की आवश्यकता नहीं होती है ।
अपरा शक्ति को अपने पदार्थों या तत्व को गतिशील रखने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण की किस शक्ति की आवश्यकता होती है ?
पराशक्ति
बहिरंगा शक्ति
संकर्षण शक्ति
यह तीनों एक ही शक्ति के विभिन्न नाम हैं ।
हमारे भौतिक अथवा स्थूल शरीर के विकास का मूल कारण क्या है ?
हम अर्थात् जीवात्मा ।
हमारा मन ।
हमारी बुद्धि ।
काल की गति ।
विराट ब्रह्मांड की समग्र सृष्टि का विकास किस पर आधारित है ?
महाविष्णु
गर्भोदकशायी विष्णु
क्षीरोदकशायी विष्णु
अनन्त विष्णु
भगवान् श्रीकृष्ण को परमसत्य मानने का क्या आधार है ?
श्रीमद्भगवद्गीता के पद-पद पर यह पुष्टि होती है कि परमसत्य तो भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि पुरुष हैं जो सच्चिदानंद स्वरूप हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
वास्तव में अरूपम् शब्द किसका सूचक है ?
निराकार ब्रह्म ।
सच्चिदानंद स्वरूप ।
निर्विशेष ब्रह्म ।
अंतर्यामी परमात्मा ।
श्वेताश्वेतर उपनिषद् के कौन से श्लोक भगवान् श्रीकृष्ण की परमसत्य के रूप में श्रेष्ठता को प्रमाणित करते हैं ?
3.8 – 10
3.7 – 10
3.7 – 9
3.8 – 9
