Worksheets17. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_4.12–4.20
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इस संसार में मनुष्य सकाम कर्मों (Fruitive actions) में सिद्धि क्यों चाहते हैं ?
क्योंकि इस संसार में मनुष्य को सकाम कर्मों के फल शीघ्र प्राप्त होते हैं ।
क्योंकि मनुष्य जीवन का चरम उद्देश्य काम सकाम कर्मों में सिद्धि प्राप्त करना ही है ।
क्योंकि जीव को मनुष्य के रूप में जीवन निर्वाह करने के लिए सकाम कर्म ही सहायक होते हैं ।
क्योंकि सकाम कर्म ही इस संसार में जीवन के मुख्य स्रोत हैं ।
श्लोक संख्या 4.12 में श्रील प्रभुपाद जी ने "विद्वत्ता का दम्भ करने वाले अल्पज्ञ मनुष्य" इनमें से किसे कहा है ?
सकाम कर्मियों को - जो अपनी भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए देवताओं को परमेश्वर के विभिन्न रूप मानकर उनकी पूजा करते हैं ।
निष्काम कर्मियों को - जो केवल भगवान् की इंद्रियों की तुष्टि के लिए कर्मफलों की इच्छाओं के रहित कर्म करते हैं ।
मायावादियों को - जो निर्विशेष ब्रह्म में लीन होने के अपने सम्पूर्ण ज्ञान का उपयोग करते हैं ।
तथाकथित दार्शनिकों को - जो अपने शुष्क चिंतन से उत्पन्न मनोधर्म द्वारा परमेश्वर को समझने का प्रयास करते रहते हैं ।
वास्तव में देवता क्या होते हैं ? निम्न में से पहचानें ।
शक्तिप्रदत्त जीवात्माएँ
परमेश्वर की विभिन्न शक्तियाँ
परमेश्वर के विभिन्न रूप
विभिन्न लोकों के परमेश्वर
ब्रह्माजी तथा शिवजी जैसे बड़े-बड़े देवता भी भगवान् श्रीकृष्ण या विष्णु के तुल्य क्यों नहीं होते हैं ?
क्योंकि भौतिक जगत् के प्रबंधन के लिए यह देवता भौतिक शक्तियों को धारण करते हैं । जोकि इस संसार के विनाश के साथ ही लुप्त हो जाती हैं ।
ये सभी कथन सही हैं ।
क्योंकि यह देवता भगवान् श्रीकृष्ण के अंश मात्र होते हैं और अंश किसी भी परिस्थिति में अपने अंशी के तुल्य नहीं होता है ।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार समस्त देवी-देवता भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन कार्य करते हैं । जबकि भगवान् श्रीकृष्ण सदैव भौतिक गुणों से परे होते हैं ।
"हिरण्यकशिपु ने भगवान् ब्रह्मा जी की और भस्मासुर ने भगवान् शिवजी की हज़ारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या के उपरान्त क्षणिक भौतिक वरदान् प्राप्त किए ।" वैष्णव दृष्टिकोण से इस कथन में क्या असंगत है ?
ब्रह्मा जी तथा शिव जी को भगवान् संबोधित किया जाना ।
हिरण्यकशिपु और भस्मासुर की घोर तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त वरदान को क्षणिक भौतिक कहना ।
हज़ारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या ।
वास्तव में, भस्मासुर ने ब्रह्मा जी की तथा हिरण्यकशिपु ने शिव जी की जीवन पर्यन्त तपस्या की थी ।
जो व्यक्ति ईश्वर तथा देवताओं को एक स्तर पर समझता है वह क्या कहलाता है ?
पाषंडी
आस्तिक
धार्मिक
समभाव
"इह देवताः" से आपका क्या अभिप्राय है ?
इस श्लोक में यह पद इस संसार के शक्तिशाली मनुष्य तथा देवता के लिए प्रयुक्त हुआ है ।
इस श्लोक में यह पद सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है ।
इस श्लोक में यह पद सकाम कर्मियों द्वारा देवताओं की पूजा के लिए प्रयुक्त हुआ है ।
इस श्लोक में यह पद केवल मात्र ब्रह्मा जी तथा शिव जी जैसे बड़े-बड़े देवताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है ।
भौतिक उपाधियों से अलंकृत्त अल्पज्ञ मनुष्यों से साधारण जीवन यापन करने वाले बुद्धिमान् मनुष्य क्यों श्रेष्ठ होते हैं ?
क्योंकि ऐसे बुद्धिमान् मनुष्य कृष्णभावनामृत को अंगीकार किए हुए रहते हैं ।
क्योंकि ऐसे बुद्धिमान् मनुष्य देवताओं की विशेष विधि से पूजा करते हैं ।
क्योंकि ऐसे बुद्धिमान् मनुष्य देवताओं की पूजा मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, न कि भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए ।
क्योंकि ऐसे बुद्धिमान् मनुष्य सांसारिक दिखावे के लिए जीवन नहीं जीते हैं ।
श्लोक संख्या 4.12 में श्रील प्रभुपाद जी ने इस भौतिक संसार तथा इसके निवासी - देवताओं तथा उनकी पूजकों की तुलना किससे की है ?
विराट सागर के बुलबुलों से
विराट जलाशय के बुलबुलों से
विराट जलप्रपात के बुलबुलों से
विराट हिमखंड के बुलबुलों से
श्लोक संख्या 4.12 इस संसार के मनुष्यों की किस अभिरुचि को स्पष्ट करता है ?
कृष्णभावनामृत में अभिरुचि को
भौतिक भोग में अभिरुचि को
देवताओं की पूजा में अभिरुचि को
मोक्ष प्राप्ति की अभिरुचि को
श्लोक संख्या 4.13 में भगवान् श्रीकृष्ण यह स्पष्ट बताते हैं कि वह वर्णाश्रम व्यवस्था के स्रष्टा हैं । अतः आप कृपा करके यह बताएँ कि भगवान् ने इस चतुर्वर्णीय व्यवस्था की सृष्टि किस आधार पर की है ?
प्रकृति के तीनों गुणों और उनसे संबद्ध कर्मों के आधार पर ।
प्रकृति के तीनों गुणों और उनसे संबद्ध काल के अनुसार ।
प्रकृति के तीनों गुणों और मनुष्यों की इच्छाओं के वर्गीकरण के आधार पर ।
प्रकृति के तीनों गुणों और मनुष्यों के चरित्र के आधार पर ।
निम्न में से वर्णाश्रम व्यवस्था को पहचानें ।
वर्ण व्यवस्था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । आश्रम व्यवस्था- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास ।
वर्ण व्यवस्था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वानप्रस्थ, शूद्र । आश्रम व्यवस्था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वैश्य, सन्यास ।
वर्णाश्रम व्यवस्था = ब्राह्मण - ब्रह्मचारी, क्षत्रिय - गृहस्थी, वैश्य - वानप्रस्थी, शूद्र - सन्यासी ।
वर्णाश्रम व्यवस्था = ब्राह्मण - सन्यासी, क्षत्रिय - वानप्रस्थी, वैश्य - गृहस्थी, शूद्र - ब्रह्मचारी।
प्रकृति के गुणों की प्रधानता के आधार पर मनुष्य को चार वर्गों में वर्गीकृत्त किया गया है । निम्न में से असंगत वर्ण हो पहचानें ।
सतोगुणी मनुष्य - ब्राह्मण वर्ण।
रजोगुणी मनुष्य - क्षत्रिय वर्ण।
तमोगुणी मनुष्य - वैश्य वर्ण।
इनमें से कोई नहीं है ।
प्रकृति के गुणों के अनुसार कर्मों के आधार पर मनुष्यों को चार वर्गों में वर्गीकृत्त किया गया है । निम्न में से संगत वर्ण को पहचानें ।
प्रशासक वर्गीय कर्म - ब्राह्मण ।
श्रमिक वर्गीय कर्म - शुद्र ।
वाणिक वर्गीय कर्म - क्षत्रिय ।
परमसत्य के ज्ञान के प्रचार संबंधी कर्म - वैश्य ।
"यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूँ, किन्तु तुम यह जान लो कि मैं इतने पर भी अव्यय अकर्ता हूँ।" इस कथन में अव्यय अकर्ता का अर्थ स्पष्ट करें ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों और किसी भी प्रकार के कर्मों के प्रभाव से परे हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष संबंध आध्यात्मिक जगत् से है न कि भौतिक जगत् से ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण स्वयँ को अपनी माया शक्ति द्वारा प्रकृति के तीनों गुणों और उनसे संबंधित कर्मों से पृथक् कर लेते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण भौतिक प्रकृति के गुणों और उनसे संबंधित कर्मों से उत्पन्न होने वाले भवबंधन से भली भांति परिचित हैं ।
यदि भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्यों को वर्णाश्रम में वर्गीकृत्त नहीं करते, तो मानव समाज अन्य किसी भी पशु समाज के तुल्य ही होता । ऐसा क्यों होता ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि वर्णाश्रम की व्यवस्था मनुष्यों के शुद्धिकरण के लिए की गई है यदि कोई मनुष्य अपने शुद्धिकरण के लिए प्रयास नहीं करता है तो वह पशु तुल्य होता है ।
क्योंकि वर्णाश्रम के अंतर्गत निर्धारित धर्म तथा नियत कर्म ही हैं, जो मनुष्यों को "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" के स्तर पर स्थापित कर पशु समाज से पृथक करते हैं ।
यह कथन एकदम अनुचित है भला मनुष्य समाज और पशु समाज में भी कोई समानता होती है ।
वर्तमान युग में वर्णाश्रम व्यवस्था का नाममात्र प्रभाव होने पर भी मनुष्यों की तुलना पशु समाज से नहीं की जा सकती है । क्योंकि आज का मनुष्य आधुनिक है, कोई आदिमानव नहीं।
वैष्णव (कृष्णभावनाभावित व्यक्ति) ब्राह्मणों से श्रेष्ठ क्यों होते हैं ?
क्योंकि अधिकांश ब्राह्मणों को परमसत्य का (निर्विशेष ब्रह्मावस्था तक) सीमित ज्ञान होता है, जबकि वैष्णव भगवान् श्रीकृष्ण के ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं।
क्योंकि ब्राह्मण सतोगुण के स्तर पर होते हैं, जबकि वैष्णव भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों को लांघ चुके होते हैं ।
क्योंकि अधिकांश ब्राह्मण सतोगुण में होने के बावजूद भी भौतिक भोग में संलिप्त रहते हैं जबकि वैष्णव समस्त भौतिक भोगों की प्रवृत्ति को त्याग चुके होते हैं ।
मैं इन सभी कथनों से सहमत हूँ ।
जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण मानव समाज की चातुर्वर्ण्य प्रणाली से परे हैं, ठीक उसी प्रकार कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भी चातुर्वर्ण्य प्रणाली से परे होता है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत जीवों को प्रकृति के तीनों गुणों के बंधन तथा संबंधित कर्मों से मुक्त कर देता है ।
क्योंकि जीव कृष्णभावनामृत के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के स्वभाव और शक्तियों को प्राप्त कर लेते हैं ।
क्योंकि जीव कृष्णभावनामृत के द्वारा एक लोक से दूसरे लोक को जाने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं ।
क्योंकि भगवान् की माया शक्ति का मुख्य उद्देश्य जीवों को चातुर्वर्ण्य प्रणाली से मुक्त करना है ।
श्लोक संख्या 4.14 के अनुसार भगवान् के संबंध में किस सत्य को जानने से मनुष्य कर्मफलों के पाश में नहीं बंधता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण पर किसी कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता और न ही वे कर्मफल की कामना करते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन कार्य करते हैं और हमें ऐसा करने से बचना चाहिए ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण भी भौतिक प्रकृति के बंधनों से बचने के लिए अपने नियत कर्मों को यथासमय निष्पादित करते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी भगवत्ता को बनाए रखने के लिए अपनी माया शक्ति पर आश्रित रहते हैं ।
जीवात्माओं का भौतिक कार्यकलापों के सकाम कर्मफलों में बंधन का मुख्य कारण क्या है ?
जीवात्माओं की प्राकृतिक साधनों पर प्रभुत्व दिखाने की प्रवृत्ति ।
जीवात्माओं की इन्द्रियतृप्ति के लिए एक दूसरे के साथ संघर्षशील रहने की प्रवृत्ति ।
जीवात्माओं की भौतिक जीवन के आरम्भिक स्तर पर भौतिक भोग न करने की प्रवृत्ति ।
जीवात्माओं की भौतिकभोग में अनियमितता की प्रवृत्ति ।
जीवात्माएँ इस संसार में अपनी-अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के अच्छे तथा बुरे कार्यों में लगी रहती हैं । क्या यह सब कार्य भगवान् के द्वारा निर्दिष्ट होते हैं ?
नहीं, इसके विपरीत भगवान् जीवात्माओं को ऐसी प्रवृत्ति से मुक्त करवाने के लिए ही वर्णाश्रम की व्यवस्था करते हैं ।
नहीं, यह जीव आत्माओं की अपनी व्यक्तिगत् रुचि के विषय होते हैं, भगवान् इसमें तनिक भी हस्तक्षेप नहीं करते हैं ।
हाँ, जीवात्माओं को इन्द्रियतृप्ति की चरम सीमा तक पहुंचाने के लिए यह सब कार्य भगवान् द्वारा निर्दिष्ट होते हैं ।
हाँ, भगवान् ही जीवात्माओं की इन्द्रियतृप्ति के लिए इन सब कार्यों की व्यवस्था करते हैं ।
देवताओं की वास्तविक स्थिती क्या है ?
देवता स्वर्ग में भगवान् के द्वारा नियुक्त किए गए सेवक हैं ।
देवता स्वर्ग में भगवान् के द्वारा प्राधिकृत अधिकारी हैं ।
देवता वह जीव आत्माएँ हैं जो स्वर्गीय आनंद की इच्छा रखती हैं ।
देवता अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में भगवान् के समतुल्य अधिकारी होते हैं ।
"पृथ्वी पर उगने वाली विभिन्न वनस्पतियों के उगने के लिए वर्षा उत्तरदायी नहीं है, यद्यपि वर्षा के बिना वनस्पति नहीं उग सकती ।" कृपया इस उदाहरण को स्पष्टतः समझने में मेरी सहायता करें ।
यह कि भौतिक सृष्टि के लिए भगवान् ही परम कारण हैं। प्रकृति तो केवल निमित्त कारण है ।
यह आवश्यक नहीं है कि वर्षा होने पर सारे के सारे बीज उग जाएंगे, कुछ बीज सड़ भी सकते हैं ।
यह कि एकाकी वर्षा की शक्ति बीजों को उगाने में अक्षम है, वर्षा के साथ साथ प्रकृति बीजों को उगने के लिए और भी बहुत से अनुकूल तत्व उपलब्ध करवाती है ।
यह उदाहरण हमें स्पष्टतः समझ में नहीं आया है ।
सभी जीवात्माएँ अपने पूर्व शुभाशुभ कर्मों के फल भोगने को बाध्य हैं, उन्हें ऐसे कर्म करने के लिए समुचित सुविधाएँ कौन सुलभ करवाता है ?
भगवान् स्वयँ
प्रकृति (भगवान् की बहिरंगा शक्ति)
प्रकृति के गुण
जीवात्मा की इच्छा शक्ति
क्या भगवान् जीवात्मा के शुभाशुभ कर्मों के लिए उत्तरदायी होते हैं ?
नहीं, अपने समस्त कर्मों के लिए केवल मात्र जीवात्मा ही उत्तरदायी होता है ।
हाँ, क्योंकि जीवात्मा भगवान् का अंश होता है अतः उसके समस्त कर्मों का उत्तरदायित्व केवल भगवान् का ही होता है ।
नहीं, अपने-अपने कर्मों के लिए हम सभी स्वयँ उत्तरदायी नहीं होते हैं ।
हाँ, हमारे अधिकांश कर्मों का उत्तरदायित्व अन्य जीवात्माओं का होता है ।
निम्न में से एक असंगत तथा अव्यवहारिक कथन चुनें ।
भगवान् कभी किसी भी जीव के प्रति पक्षपात्पूर्ण व्यवहार नहीं करते हैं ।
सभी जीवात्माएँ अपने-अपने कर्मों के लिए स्वयँ उत्तरदायी होती हैं ।
भगवान् जीवात्मा को प्रकृति अर्थात् बहिरंगा शक्ति के माध्यम से केवल सुविधाएँ प्रदान करते हैं ।
भगवान् समस्त जीवात्माओं से उनकी शक्ति छीन कर उन्हें निरीह प्राणी बनाकर इस भौतिक जगत् में कष्ट भोगने के लिए छोड़ देते हैं।
जो व्यक्ति ..................... की सारी बारीकियों से भलीभांति अवगत होता है वह अपने ................ से कभी प्रभावित नहीं होता है
कर्म-नियम, कर्मों के फल
वेदों, मनोधर्म
वेदान्त सूत्र, शुष्क चिंतन
प्रकृति के गुणों, तमोगुण
"जो व्यक्ति भगवान् के दिव्य स्वभाव से परिचित होता है ।......................" निम्न में से उचित वाक्य चुनकर इस कथन को पूरा करें।
वह कृष्णभावनामृत्त में अनुभवी व्यक्ति होता है ।
उस व्यक्ति पर कर्म के नियम लागू नहीं होते हैं ।
वह व्यक्ति कृष्णभावनामृत्त में स्थिर मुक्त जीव होता है ।
इनमें से सभी वाक्य उपरोक्त कथन को पूर्ण करते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.15 के माध्यम से किसके महत्त्व स्पष्ट स्थापना करते हैं ?
प्रामाणिक गुरु-शिष्य परम्परा के महत्त्व की ।
कृष्णभावनाभावित कर्म के महत्त्व की ।
पूर्ववर्ती वैष्णवाचार्यों के पदचिन्हों के अनुसरण के महत्त्व की ।
इनमें से सभी के महत्त्व की ।
"भौतिक दृष्टि से स्वतंत्र" होने से आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थात् जो भौतिक इन्द्रियभोग की समस्त कामनाओं, आसक्तियों, कर्म फलों के बंधन से मुक्त हों ।
अर्थात् जो समस्त प्रकार के भौतिक ऋणों से मुक्त हो ।
अर्थात् जिसने अपने नियत कर्म त्याग दिए हों ।
अर्थात् जिसे प्रामाणिक गुरु ने समस्त सेवाओं से मुक्त कर दिया हो ।
श्लोक संख्या 4.15 में भगवान् श्रीकृष्ण किन कर्मों को करने का उपदेश देते हैं ?
नियत कर्मों को
विकर्मों को
अकर्मों को
इनमें से कोई नहीं
भौतिक दृष्टि से स्वतन्त्र मनुष्यों को कृष्णभावनामृत में क्या करना चाहिए ?
उन्हें कृष्णभावनामृत में अग्रसर होते रहना चाहिए, जिससे अन्य लोग उनके आदर्श कार्यों का अनुसरण कर लाभान्वित हो सकें ।
उन्हें अपने शुद्धिकरण का लाभ उठाते हुए कृष्णभावनामृत में अपने शिष्यों की भीड़ जुटानी चाहिए । ताकि बहुत से लोग कृष्णभावनामृत से लाभान्वित हो सकें ।
उन्हें अपने शुद्धिकरण का लाभ उठाकर, कृष्णभावनामृत में यथा मान-प्रतिष्ठा, सुख-सुविधाएँ, धन-वैभव इत्यादि अर्जित करने चाहिएँ । ताकि अन्य लोग भी इस विधि को अपनाकर अपनी जीवन शैली सुधार सकें ।
उन्हें लोगों की परवाह न करते हुए केवल अपने उद्धार के लिए कृष्णभावनामृत में अग्रसर होते रहना चाहिए ।
क्या कृष्णभावनामृत नियत कर्मों को त्यागने की संस्तुति करता है ?
नहीं, अपितु कृष्णभावनामृत मनुष्यों को अपने नियत कर्मों को कृष्णभावनाभावित होकर करने के लिए प्रेरित करने की दिव्य एवं सरल विधि है ।
नहीं, कृष्णभावनामृत नियत कर्मों पर आधारित शुद्धिकरण की एक मात्र विधि है ।
हाँ, यदि मनुष्य अपने नियत कर्मों को नहीं त्यागता है, तो कृष्णभावनामृत को कैसे निष्पादित कर पाएगा ।
हाँ, क्योंकि नियत कर्मों को त्यागे बिना इन्द्रियतृप्ति की विषय वासनाओं से मुक्ति असंभव है ।
बुद्धिमान् से बुद्धिमान् व्यक्ति भी कर्म और अकर्म को निश्चित करने में मोहग्रस्त हो जाते हैं । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि केवल शुष्क मानसिक चिंतन से उत्पन्न मनोधर्म के द्वारा हम कर्म तथा अकर्म के भेद को निश्चित नहीं कर सकते ।
क्योंकि केवल पूर्व अनुभवों के द्वारा हम कर्म तथा अकर्म के भेद को निश्चित नहीं कर सकते ।
क्योंकि केवल नियत कर्मों को त्याग कर हम कर्म फलों के बंधन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते।
क्योंकि केवल हठयोग या अष्टाँगयोग के द्वारा हम कर्म फलों के बंधन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते ।
कृष्णभावनाभावित कर्म करने की वास्तविक विधि क्या है ? जिसका श्रीभगवान् ने श्लोक संख्या 4.16 में कृष्णभावनामृत के पथ पर मोहग्रसित होने से बचने का उपदेश दिया है ।
प्रामाणिक गुरु-परम्परा में पूर्ववर्ती प्रामाणिक भक्तों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए कर्म करना ।
प्रामाणिक गुरु-परम्परा में पूर्ववर्ती प्रामाणिक भक्तों के पदचिन्हों का अनुकरण करते हुए कर्म करना ।
पूर्ववर्ती स्वतन्त्र (गुरु-परम्परा विहीन) भक्तों के पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए कर्म करना ।
अपने नियत कर्मों को अधर में त्याग कर भक्ति में स्थापित हुए भक्तों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए कर्म करना ।
श्लोक संख्या 4.16 में भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अहैतुकी कृपावश हमें यह क्यों बता रहे हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है ?
क्योंकि केवल कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म ही मनुष्य को भवबंधन से मुक्त करवा सकता है ।
क्योंकि मनुष्य को अपने शुद्धिकरण हेतु कर्म तथा अकर्म के भेद का ज्ञान होना अति आवश्यक है ।
क्योंकि मनुष्य को सुख सुविधा संपन्न भौतिक जीवन यापन के लिए कर्म तथा अकर्म के भेद का ज्ञान होना अति आवश्यक है ।
क्योंकि मनुष्य को पाप तथा पुण्य के अंतर को जानने के लिए कर्म तथा अकर्म के भेद का ज्ञान होना अति आवश्यक है ।
कर्म का विधान अत्यंत गूढ़ और अपने आप में अत्यंत गहन विषय है । साधारण मनुष्य के लिए इसे समझ पाना अत्यंत कठिन है । फिर भी किसके लिए इसे समझना अति आवश्यक होता है ?
जो व्यक्ति वास्तव में इस भव-बंधन से मुक्ति चाहता है ।
जो व्यक्ति अपने कर्मों का विश्लेषण करना चाहता है ।
जो व्यक्ति मनोविज्ञान में दक्षता प्राप्त करना चाहता है ।
जो व्यक्ति अपने हज़ारों अनुयायी बनाना चाहता है ।
कृष्णभावनामृत को तथा गुणों के अनुसार कर्मों को समझने के लिए व्यक्ति को क्या करना होता है ?
सर्वप्रथम व्यक्ति को परमेश्वर के साथ अपने संबंध को जानना होता है ।
सर्वप्रथम व्यक्ति को भक्तों का संग करना होता है ।
सर्वप्रथम व्यक्ति को दार्शनिक भाव से मानसिक चिंतन करना होता है ।
सर्वप्रथम व्यक्ति को इस विश्लेषण हेतु स्वयं को तैयार करना होता है ।
कृष्णभावनामृत के विरुद्ध सारे निष्कर्ष एवं परिणाम क्या कहलाते हैं ?
विकर्म
अकर्म
कर्म
सकाम कर्म
भक्तों से कृष्णभावनामृत के गूढ़ रहस्य को समझना किसके समान होता है ?
भगवान् से समझने के समान होता है ।
शिक्षक से समझने के समान होता है ।
वैदिक शास्त्रों से समझने के समान होता है ।
स्वयँ की चेतना के द्वारा समझने के समान होता है ।
जो मनुष्य कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखता है, मनुष्य समाज में उसकी स्थिति कैसी होती है ?
वह सभी मनुष्यों में बुद्धिमान् होता है ।
वह सभी मनुष्यों में शक्तिशाली होता है ।
वह सभी मनुष्यों में निकृष्टतम् होता है ।
वह सभी मनुष्यों के नेतृत्त्व का अधिकारी होता है ।
"कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखने" से आपका क्या अभिप्राय है ?
अपने समस्त प्रकार के कर्म चाहे वह निषिद्ध कर्म ही क्यों न हों कृष्ण की यथा आज्ञा, इच्छा, प्रसन्नता के लिए अच्छे या बुरे कर्मफलों की आकांक्षा के बिना निष्पादित करना ।
कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखकर निर्विशेषवादियों की भान्ति यह समझ कर समस्त कर्म करना बंद कर देना कि ये सभी आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधक होते हैं ।
कर्म को अकर्म और अकर्म को कर्म की भान्ति निष्पादित करके अच्छे कर्मफलों की आकांक्षा करना तथा बुरे कर्मफलों की उपेक्षा करना ।
अपने समस्त प्रकार के कर्म चाहे वह निषिद्ध कर्म ही क्यों ना हों कृष्ण की यथा आज्ञा, इच्छा, प्रसन्नता के लिए अच्छे या बुरे कर्मफलों की आकांक्षा सहित निष्पादित करना ।
एक भक्त सदैव कर्मफल के बंधनों से कैसे मुक्त रहता है ?
श्रीकृष्ण के प्रति उसके नित्य दास्यभाव के कारण ।
श्रीकृष्ण के प्रति उसके ईर्ष्या भाव के कारण ।
श्रीकृष्ण के प्रति उसके प्रतिद्वंद्विता के भाव के कारण ।
कर्म विधान की जटिलता के प्रति उसके अज्ञान के कारण ।
पूर्णज्ञान की अग्नि में कर्मफलों को भस्मसात् कर देने वाला पूर्णज्ञानी किसे समझा जाता है ?
जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है ।
जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास केवल मात्र अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए ही होता है ।
जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास इस संसार के प्रत्येक व्यक्ति की इन्द्रियतृप्ति के लिए होता है ।
जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास सायुज्य मुक्ति के लिए होता है ।
निम्न में से कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कार्यकलापों को कौन समझ सकता है ?
पूर्णज्ञानी
पूर्ण दार्शनिक
पूर्ण योगी
निर्विशेषवादी
श्लोक संख्या 4.19 में भगवान् श्रीकृष्ण ने किसकी तुलना अग्नि से की है ?
भगवान् की नित्य दासता के ज्ञान के विकास की ।
भगवान् द्वारा निर्मित भौतिक जगत् के ज्ञान के विकास की ।
भगवान् द्वारा निर्मित आध्यात्मिक जगत् के ज्ञान के विकास की ।
भगवान् द्वारा प्रत्येक योनि में प्रज्वलित जठराग्नि की ।
"अपने कर्मफलों की सारी आसक्ति को त्यागकर सदैव संतुष्ट तथा स्वतंत्र रहकर वह सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहकर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता ।" ये किसके लक्षण है ? स्पष्ट करें।
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति
दार्शनिक व्यक्ति
पूर्ण कृष्णभावनाहीन व्यक्ति
निर्विशेषवादी व्यक्ति
