Worksheetsसमयसार गाथा २०-२५
Total questions: 41
Worksheet time: 21mins
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार अज्ञानी किसमे एकत्व-ममत्व नही करता ?
सचित स्त्री पुत्रादिक में
अचित्त धन-धान्यादिक में
मिश्र ग्राम-नरगादिक में
एकत्व-विभक्त ज्ञायक मे
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार भुतार्थ जाननहार पुरुष क्या मानता है ?
मै ये परद्रव्य हूँ, ये सब परद्रव्य मैं हूँ
भविष्य में परद्रव्य मेरे होंगे, मैं भी भविष्य में परद्रव्यका होऊँगा
मैं परद्रव्य इनका हूँ, ये परद्रव्य मेरे हैं
ये परद्रव्य मेरे पहले थे परद्रव्य,इनका मैं पहले था
मेरा परद्रव्य नही है
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार मूढ़ क्या मानता है ?
मै ये परद्रव्य हूँ, ये सब परद्रव्य मैं हूँ
भविष्य में परद्रव्य मेरे होंगे, मैं भी भविष्य में परद्रव्यका होऊँगा
मैं परद्रव्य इनका हूँ, ये परद्रव्य मेरे हैं
ये परद्रव्य मेरे पहले थे परद्रव्य,इनका मैं पहले था
सभी
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार ज्ञानी पुरुष का ज्ञान कैसा है
मैं मेरा हूँ और परद्रव्य के परद्रव्य हैं
मैं तो मैं ही हूँ और परद्रव्य हैं वे परद्रव्य ही हैं
मेरा ही मैं पहले था
ये परद्रव्य भविष्य में इनके ही रहेंगे
सभी
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार गृहस्थ की अपेक्षा किन परद्रव्य मे एकत्व ममत्व मिथ्यात्व है ?
छात्रादि स्त्री आदि सचित्त, स्वर्णादि अचित्त एवं वस्त्राभूषण सहित स्त्री आदि मिश्र
छात्रादि सचित्त; पीछी-कमण्डलु पुस्तक आदि अचित्त और उपकरण सहित छात्रादि मिश्र
सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप सचित्त, पुद्गल आदि पाँच द्रव्य अचित्त और गुणस्थान, जीव समास, मार्गणादिरूप परिणत संसारीजीव का स्वरूप मिश्र
रागादि भावकर्म सचित्त, ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्म अचित्त एवं
द्रव्य कर्म और भाव - दोनों मिलाकर मिश्र हैं।
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार विषय-कषाय रहित निर्विकल्प समाधि में स्थित पुरुष की अपेक्षा किन परद्रव्य मे एकत्व ममत्व मिथ्यात्व है ?
छात्रादि स्त्री आदि सचित्त, स्वर्णादि अचित्त एवं वस्त्राभूषण सहित स्त्री आदि मिश्र
छात्रादि सचित्त; पीछी-कमण्डलु पुस्तक आदि अचित्त और उपकरण सहित छात्रादि मिश्र
सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप सचित्त, पुद्गल आदि पाँच द्रव्य अचित्त और गुणस्थान, जीव समास, मार्गणादिरूप परिणत संसारीजीव का स्वरूप मिश्र
रागादि भावकर्म सचित्त, ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्म अचित्त एवं
द्रव्य कर्म और भाव - दोनों मिलाकर मिश्र हैं।
समयसार परमागम गाथा २०-२२ के अनुसार तपोधन की अपेक्षा
किन परद्रव्य मे एकत्व ममत्व मिथ्यात्व है ?
छात्रादि स्त्री आदि सचित्त, स्वर्णादि अचित्त एवं वस्त्राभूषण सहित स्त्री आदि मिश्र
रागादि भावकर्म सचित्त, ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्म अचित्त एवं
द्रव्य कर्म और भाव - दोनों मिलाकर मिश्र हैं।
सिद्ध परमेष्ठी का स्वरूप सचित्त, पुद्गल आदि पाँच द्रव्य अचित्त और गुणस्थान, जीव समास, मार्गणादिरूप परिणत संसारीजीव का स्वरूप मिश्र
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार "हे जगत के जीवो ! अनादि से लेकर आजतक अनुभव किये गये __________को कम से कम अब तो छोड़ो"
मोह
राग
द्वेष
कर्म
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार "रसिकजनों को रुचिकर उदित _________ का आस्वादन करो क्योंकि आत्मा इस लोक में किसी भी स्थिति में अनात्मा के साथ तादात्म्य को धारण नहीं करता"
ज्ञान
आत्मा
ज्ञायक
चेतन
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार अनादि से आज तक क्या किया है जिसकारण अनंत दु:ख उठाये हैं
परपदार्थों में ही अपनापन स्थापित किया
निज भगवान आत्मा को कभी जाना ही नहीं
दोनों
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार अनादि से आज तक क्या किया है जिसकारण अनंत दु:ख उठाये हैं
परपदार्थों में ही अपनापन स्थापित किया
निज भगवान आत्मा को कभी जाना ही नहीं
दोनों
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार "भगवान आत्मा ज्ञान स्वरूप है और _______ अचेतन है
राग
विभाव
पुद्गल
सभी
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार ________________________ ये सब विकल्प अचेतन है
दया
दान
व्रतादि
गुण-गुणी
सभी
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार ________________________ ये सब विकल्प अचेतन है, इनमें ज्ञानस्वभाव की किरण नहीं हैं
दया
दान
व्रतादि
गुण-गुणी
सभी
समयसार परमागम कलश २२ के अनुसार अनादिकाल से राग का स्वाद लिया वह दुख का, आकुलता का स्वाद था उसमें कुछ नया नहीं है यदि कुछ नया करना हो तो _______ को आस्वादो
ज्ञान
ज्ञायक
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार कैसा जीव कहता है कि ये शरीरादि बद्ध और धनधान्यादि अबद्ध पुद्गल द्रव्य मेरे हैं?
जिसकी मति अज्ञान से मोहित है
जो मोह-राग-द्वेष आदि अनेक भावों से युक्त है
दोनों
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "सर्वज्ञ के ज्ञान द्वारा देखा गया जो सदा _________लक्षण वाला जीव है
उपयोग
ज्ञान
दर्शन
चेतना
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "कब कहा सकता है कि यह पुद्गलद्रव्य मेरा है"?
यदि जीव द्रव्य पुद्गल द्रव्य रूप हो जाय
यदि पुद्गल द्रव्य जीवत्व को प्राप्त करे
दोनों
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार " •हे दुरात्मन् ! ऐसा कभी होता नहीं है; __________ दोनों सर्वथा भिन्न-भिन्न हैं"
जड़ और चेतन द्रव्य
जिव और अजीव
दोनों
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "नित्य _________ लक्षण वाला जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्यरूप होता दिखाई नहीं देता
उपयोग
ज्ञान
दर्शन
चेतन
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "नित्य _________ लक्षण वाला पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्यरूप होता दिखाई नहीं देता
अनुपयोग
अज्ञान
अदर्शन
अचेतन
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार जिसकारण स्फटिक के स्वभाव को न जाननेवाले लौकिकजन उसे अनेक वर्णवाला ही मान लेते हैं उसीप्रकार अनादिबंधन की उपाधि से होनेवाले ________को ही आत्मा का स्वभाव मान लेते हैं
विभावभावों
रागभावो
शुभ-अशुभ
सभी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार अज्ञान से विमोहित है हृदय जिसका ऐसा अप्रतिबुद्ध (अज्ञानी) जीव स्वपर का भेद न करके उन ______________ को अपना मानता है _________ में अपनापन स्थापित करता है
अस्वभावभावों, पुद्गलद्रव्य
स्वभावभावो, जिवद्रव्य
अज्ञान, अजीव
सभी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार घास और अनाज को परम-अविवेकपूर्वक एकसाथ खानेवाले _______के समान मिश्रितस्वाद में यह भेद नहीं कर पाते हैं कि इसमें घास का स्वाद क्या है और अनाज का स्वाद क्या है। वे उस मिश्र स्वाद को घास का ही स्वाद समझते हैं
हाथी
गाय
बैल
बकरी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "•तू _________ को मिलाकर एक देखने के इस स्वभाव को छोड़ ! छोड़ !! "
स्व और पर
जिव और पुद्गल
जिव और अजीव
सभी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार पुद्गल द्रव्य मे अपनापन स्थापित करना अज्ञान है, मिथ्यात्व है, अनंतसंसार का कारण है क्योकि
युक्तिसंगत नहीं है
शास्त्रसंमत नहीं है;
प्रत्यक्ष प्रमाणों से असिद्ध है
विरुद्ध है
सभी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार पुद्गल का अध्यात्मिक अर्थ क्या है ?
शरीर, स्त्री, लड़का, ग्राम और देश
अन-उपयोगस्वरूप दया का परिणाम
अन-उपयोगस्वरूप दान का परिणाम
अन-उपयोगस्वरूप व्रतादिक का परिणाम
सभी
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "भगवान ने तो तुझे उपयोगस्वरूप देखा है, पर तू यह झूठी मान्यता कहाँ से लाया कि मैं तो __________ हूँ"
रागस्वरूप
पुद्गलस्वरुप
अजीवस्वरुप
कर्मस्वरुप
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार "वर्तमान पर्याय ने उपयोग में दया, दान, व्रतादि के राग को लक्ष्य में लेकर 'यह राग मेरा अस्तित्व' - ऐसा माना तो यह तो ________का ही अनुभव हुआ, भगवान आत्मा का अनुभव तो रह ही गया।
पुद्गल
राग
अजीव
कर्म
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार ज्ञान पर्याय ने उसी आत्म द्रव्य को ज्ञेय न बनाकर जो राग उसमें नहीं है उस राग को ज्ञेय बनाया और उसी में ____________ की यही मिथ्यात्व है
एकत्व बुद्धि
ममत्व बुद्धि
कर्तुत्व बद्धि
भोक्तृत्व बुद्धि
समयसार परमागम गाथा २३ से २५ के अनुसार त्रिकालीध्रुव भगवान आत्मा को दृष्टि में लेकर 'यह आत्मा मैं हूँ'- ऐसा जिस पर्याय ने स्वीकार किया, वह पर्याय सत्य हुई; क्योंकि उस पर्याय में सत्य की स्वीकृति है; और यही पर्याय ____________________
सम्यग्दर्शन है, धर्म है
सम्यकज्ञान है, धर्म है
सम्यक चरित्र है, धर्म है
सभी
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार शरीरादि मूर्तिक पुद्गल द्रव्य के साथ एकत्व के मोह को शीघ्र ही कैसे छोड़ ते है ?
महा कष्ट से अथवा मरकर भी
निजात्मतत्त्व का कौतूहली होकर
शरीरादि मूर्त द्रव्यों का एक मुहूर्त को पड़ोसी बनकर
अपने आत्मा के विलास को सर्व परद्रव्यों से भिन्न देखकर
सभी
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार जिसप्रकार हम पड़ौसी को अपना भी नहीं मानते और उससे असद्व्यवहार भी नहीं करते उसीप्रकार
देह में एकत्वबुद्धि भी नहीं रखना
उससे असद्व्यवहार भी नहीं करना
पड़ौसी धर्म तो निभाना
अपने घर में नहीं बिठा लेना
सभी
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार देह के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए ?
देह की सुरक्षा के लिए शुद्ध सात्विक आहार का ग्रहण अवश्य करें
उसके पीछे अभक्ष्यादि का भक्षण कर नरक-निगोद जाने की तैयारी मत करो।
शत्रु भी मत मानो, इससे शत्रु जैसा व्यवहार भी मत करो
घरवाला भी मत मानो, घरवालों जैसा भी व्यवहार न करो
सभी
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार शुद्धचैतन्य का अनुभव सहजसाध्य है या यत्नसाध्य ?
सहजसाध्य है
यत्नसाध्य है
दोनों
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार जब हमारी दृष्टि में आत्मानुभव अत्यन्त उपादेयपने स्थापित हो जावेगा तो अन्तर में रुचि की _____अन्तरोन्मुखी पुरुषार्थ ________ ही स्फुरित होगा
तीव्रता से, सहज
सहज, तीव्रता से
सम्यकता से, सहज
सम्यकता से, तीव्र
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार " _________ अनुसार_________" सूक्ति के अनुसार तीव्र पुरुषार्थ भी सहज होता है
रूचि, वीर्य
श्रद्धान, चारित्र
परिणाम, क्रिया
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार मरण और जीवन क्या है ?
मोह की उत्पत्ति हो मरण है, भावमरण है और मोह का अभाव ही जीवन है
राग की उत्पत्ति हो मरण है, भावमरण है और राग का अभाव ही जीवन है
क्रोध की उत्पत्ति हो मरण है, भावमरण है और क्रोध का अभाव ही जीवन है
दश प्राणों का नष्ट होना मरण है, भावमरण है और दश प्राण ही जीवन है
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार मोह का अर्थ क्या है ?
शरीरादि परपदार्थों में अपनापन ही मोह है,
शरीरादि परपदार्थों के लक्ष्य से होने वाले मोह राग-द्वेषादि भावों में अपनापन ही मोह है,
दोनों
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार मोह के नाश का उपाय क्या है
क्रियाकाण्ड
व्रत-शील संयमादि
सेवा-चाकरी
गुणभेद प्रदेशभेद का चिंतन
कोई नही
समयसार परमागम कलश २३ के अनुसार मोह के नाश का उपाय क्या है?
पर से भिन्न, राग से भित्र, पर्याय से पार एवं सर्वपर्यायों में एकाकार तथा गुणभेद से भिन्न, प्रदेशभेद से भिन्न अनन्तगुणात्मक असंख्यातप्रदेशी एक भगवान आत्मा में अपनापन स्थापित करना
भगवान आत्मा का विचार करना, उसी का मंथन करना, घोलन करना, उसी का ध्यान करना इसीप्रकार जीवन भर उसी का रसपान करते रहना
अपने ज्ञान के परमशुद्धनिश्चयनयरूप अंश को जगाकर निज भगवान आत्मा, त्रिकाली शुद्धज्ञायकभावरूपी हंसको खोजना
सभी
