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Worksheetsसमयसार गाथा ३१-३३
Total questions: 35
Worksheet time: 26mins
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार "जो___________ को जीतकर आत्मा को अन्य द्रव्यों से _____________जानते है ; वे वस्तुत: जितेन्द्रिय हैं ऐसा निश्चयनय में स्थित साधुजन कहते हैं
इन्द्रियों, भिन्न
कषायो, मुक्त
इन्द्रियों, मुक्त
इन्द्रियों, भेद
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार प्रथम निश्चयस्तुति है जो _____________ के परिहारपूर्वक होती
ज्ञेय-ज्ञायकसंकर दोष
भावक-भाव्य संकर दोष
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार निचे दिए गए विकल्पों मे से गाथा के ३ महत्व पूर्ण बिंदु मे से कौनसा नही है
जो इन्द्रियों को जीतता है, उसे जितेन्द्रियजिन कहते हैं
इन्द्रियों को जीतना ही प्रथम प्रकार की निश्चय स्तुति है
वह ज्ञेय-ज्ञायक संकरदोष के परिहारपूर्वक होती है
ज्ञायक =जानने-देखने के स्वभाववाला भगवान आत्मा, ज्ञेय = जानने में आने वाले पदार्थ
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार ऐसे कौन-कौन से ज्ञेय हैं जिन्हें ज्ञायक मान लिया जाता है?
इन्द्रिया
द्रव्य-इन्द्रियाँ
भाव-इन्द्रिया
इन्द्रियों के विषयभूत पदार्थ
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार अज्ञानी जन जितेन्द्रिय बनने के लिए क्या करते हैं?
इन्द्रियों से भिन्न ज्ञायकस्वभावी निजभगवान आत्मा को जानना
ज्ञायकस्वभावी निजभगवान में अपनत्व स्थापित करना
आत्मानुभूति प्राप्त करना
पंचेन्द्रियों के भोगों को त्यागना
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार ज्ञानी जन जितेन्द्रिय बनने अर्थ क्या नही है ?
इन्द्रियों से भिन्न ज्ञायकस्वभावी निजभगवान आत्मा को जानना
ज्ञायकस्वभावी निजभगवान में अपनत्व स्थापित करना
आत्मानुभूति प्राप्त करना
पंचेन्द्रियों के भोगों को त्यागना
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार द्रव्येंद्रिया के सन्दर्भ मे क्या सही नही है
स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण
शरीर के अंग हैं, इसीकारण इन्हें शरीर परिणाम को प्राप्त कहा गया है
तो जड़ है, जानने-देखने में असमर्थ हैं
जड़ इन्द्रियों के परज्ञेय रूप होने पर भी वे मेरी हैं ऐसी एकत्वबुद्धि मिथ्याभाव रूप संकर दोष है
कदाचित जानने-देखने का काम करती है
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार द्रव्येंद्रियो को जितने का उपाय क्या है ?
निर्मल भेदाभ्यास की प्रवीणता से प्राप्त अंतरंग में प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभाव के अवलम्बन के बल से
प्रतीति में आती हुई अखण्ड चैतन्यशक्ति के द्वारा अपने से सर्वथा भिन्न जानना
स्वयं अनुभव में आनेवाला चैतन्यशक्ति का असंगपना के द्वारा अपने से सर्वथा अलग जानना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार भावेंद्रियो के सन्दर्भ मे क्या सही नही है
भिन्न-भिन्न अपने विषयों में व्यापार से जो विषयों को खण्ड खण्ड ग्रहण करती हैं
ज्ञान को खण्ड-खण्ड रूप बतलाती हैं
आत्मा के ज्ञान गुण की वह क्षयोपशम दशा जो इन्द्रियों के माध्यम से जानने-देखने का काम करती है
ज्ञान सामान्य का परिणमन
अखण्ड एक ज्ञायक को खण्ड-खण्ड रूप बताती हैं
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार इनमे से क्या मिथ्यात्व है
द्रव्येन्द्रियों को और आत्मा को एक मानना
भावेन्द्रियों को और ज्ञायक को एक मानना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार भावेंद्रियो को जितने का उपाय क्या है ?
निर्मल भेदाभ्यास की प्रवीणता से प्राप्त अंतरंग में प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभाव के अवलम्बन के बल से
प्रतीति में आती हुई अखण्ड चैतन्यशक्ति के द्वारा अपने से सर्वथा भिन्न जानना
स्वयं अनुभव में आनेवाला चैतन्यशक्ति का असंगपना के द्वारा अपने से सर्वथा अलग जानना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार इन्द्रिय विषयों को जितने का उपाय क्या है ?
निर्मल भेदाभ्यास की प्रवीणता से प्राप्त अंतरंग में प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभाव के अवलम्बन के बल से
प्रतीति में आती हुई अखण्ड चैतन्यशक्ति के द्वारा अपने से सर्वथा भिन्न जानना
स्वयं अनुभव में आनेवाला चैतन्यशक्ति का असंगपना के द्वारा अपने से सर्वथा अलग जानना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार क्या सही नही है ?
अज्ञानी जीव अनादि से इन इन्द्रियों को आत्मा जानता रहा है
इन्द्रियोंमें ही अपनापन स्थापित किये रहा है
इन्द्रियोंमें जमा-रमा रहा है; यही इसकी इन्द्रिय अधीनता (लम्पटता, आसक्ति, गुलामी, लुलुपता) है
इन्द्रिय जानने मे सहाकरी होती है
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार क्या सही नही है ?
इन्द्रियों के विषयभूत पदार्थ तो ज्ञेय हैं
द्रव्येन्द्रियाँ ज्ञेय हैं
क्षयोपशमज्ञानरूप भावेन्द्रियाँ ज्ञेय हैं
ज्ञायकस्वभावी भगवान आत्मा भी ज्ञेय ही है
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार ज्ञेय-ज्ञायक संकरदोष के सन्दर्भ क्या सही नही है
इन्द्रियों को ज्ञायक जानना, इन्द्रियों के विषयों को ज्ञेय जानना
ज्ञायक को जानना ही नहीं
ज्ञायक भगवान आत्मा और इन तीनों प्रकार की इन्द्रियों को एकमेक मानना
ज्ञेय-ज्ञायक में कोई भेद नहीं कर पाना
कोई नही
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार ज्ञेय-ज्ञायक संकर दोष का परिहार के लिए तीनों प्रकार की इन्द्रियों को ज्ञेय जानकर ज्ञाता भगवान आत्मा को उनसे भिन्न _________________
मानना
जानना
अनुभव करना
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३१ के अनुसार सच्ची भक्ति कैसी होती है ?
रोग निवारण के लिए की गयी भक्ति
वांछा से की गयी भक्ति
आज्ञा का पालन करना अर्थात भगवान आत्मा का अनुभव
कोरे गुणानुवाद
पुन्य बंधने लिए की गयी भक्ति
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार "दुसरी निश्चयस्तुति जो मुनि __________को जीतकर अपने आत्मा को ज्ञानस्वभाव के द्वारा अन्य द्रव्यभावों से अधिक जानता है, भिन्न जानता है; उस मुनि को परमार्थ के जाननेवाले जितमोह कहते हैं "
मोह
राग
द्वेष
चारित्र मोह
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार "तीसरी निश्चयस्तुति (भाव्य भावक भाव के अभावपूर्वक)_________________ऐसे साधु के जब मोह क्षीण होकर सत्ता में से नष्ट हो, तब उस साधु को निश्चयनय के जानकार क्षीणमोह कहते हैं
जिसने मोह को जीत लिया है
जिसने मोह कर्म को जित लिया है
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार कब संसारी आत्मा राग-द्वेषरूप परिणमित होते हैं?
चारित्रमोहनीय कर्म के उदय या उदीरणा का निमित्त पाकर
मोहनीय कर्म के उदय या उदीरणा का निमित्त पाकर
दर्शनमोहनीय कर्म के उदय या उदीरणा का निमित्त पाकर
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार भावक अर्थात कौन ?
उदय को प्राप्त चारित्र मोहनीय कर्म
उदय को प्राप्त दर्शन मोहनीय कर्म
कर्मके उदयानुसार राग-द्वेष रूप परिणमित आत्मा
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार "भाव्य और भावक दोनों का ___________के साथ जो संकर अर्थात् संयोग है, संयोग संबंध है वह ही भाव्य-भावकसंकर दोष है"
शुद्धजीव
चारित्र मोहनिय कर्मो के उदय
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार " ___________ के बल से भावकरूप द्रव्यमोह को और भाव्यरूप भाव मोह को उपशमित कर देना द्वितीय निश्चयस्तुति है और क्षय कर देना तृतीय निश्चयस्तुति है
शुद्धोपयोग
ज्ञायक
आत्मा
सभी
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार इनमे से कौन जिन नही है ?
जितेन्द्रिय जिन=सम्यग्दृष्टि
जितमोह जिन = उपशमश्रेणी धारक
क्षीणमोह जिन= क्षपकश्रेणी धारक
वीतरागी सर्वज्ञ भगवान
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार प्रथम निश्चयस्तुति कौनसे गुणस्थान मे होती है ?
चौथे गुणस्थान से लेकर सातवें
आठवे से ग्यारहवे उपशमश्रेणीवाले
आठवे से बारहवे क्षपक श्रेणीवाले
चौथे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार द्वितीय निश्चयस्तुति कौनसे गुणस्थान मे होती है ?
चौथे गुणस्थान से लेकर सातवें
आठवे से ग्यारहवे उपशमश्रेणीवाले
आठवे से बारहवे क्षपक श्रेणीवाले
चौथे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार तृतीय निश्चयस्तुति कौनसे गुणस्थान मे होती है ?
चौथे गुणस्थान से लेकर सातवें
आठवे से ग्यारहवे उपशमश्रेणीवाले
आठवे से बारहवे क्षपक श्रेणीवाले
चौथे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार निश्चयस्तुति कौनसे गुणस्थान मे होती है ?
चौथे गुणस्थान से लेकर सातवें
आठवे से ग्यारहवे उपशमश्रेणीवाले
आठवे से बारहवे क्षपक श्रेणीवाले
चौथे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार भावक-भव्य दोष का परिहार कैसे होता है ?
राग से भिन्न चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुभव होने पर
कर्म के उदय का लक्ष्य छोड़कर अखण्ड, एक चैतन्यघन प्रभु के सन्मुख होकर उसमें अपने उपयोग का जुड़ान करने से
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार____________के कर्म के उदय की ओर के झुकाव से स्वयं के कारण भावकर्म के निमित्त से विकारी भाव्य होता है । यह भाव्य-भावक संकर दोष है
सम्यग्दृष्टि
मिथ्यादृष्टि
दोनों के
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार निमित्त से जो विकारी भाव्य हुआ; उसे स्वभाव के आश्रय से दबा दिया
तीसरे प्रकार की स्तुति में प्रबल पुरुषार्थ
दुसरे प्रकार की स्तुति में मंद पुरुषार्थ
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार देह के आश्रय से की गई भगवान की विकल्पात्मक स्तुति __________ का कारण तो हो सकती है.मुक्ति का कारण नहीं
पुण्यबंध
पापबंध
समयसार परमागम के गाथा ३२-३३ के अनुसार भावक-भाव्य का भेदज्ञान कैसा होता है
कषाय प्रगट हुई, पश्चात् जीतकर छोड़ देता है ऐसा नहीं
कषाय उत्पन्न ही नहीं होने देता है
कषाय के उदय की ओर का लक्ष्य छोड़कर स्वभाव के लक्ष्य से स्वभाव का अनुसरण
भेदज्ञान के कारण भाव्य कषाय उत्पन्न ही नहीं होती है
सभी\
समयसार परमागम कलश २७-२८ के अनुसार "तत्त्व से परिचित मुनिराजों ने आत्मा और शरीर के एकत्व को इसप्रकार_____________की युक्ति द्वारा जड़मूल से उखाड़ फेंका है तब निजरस के वेग से आकृष्ट हुए प्रस्फुटित किस पुरुष को वह ज्ञान तत्काल ही यथार्थपने को प्राप्त न होगा
नयविभाग
तत्वज्ञान
भेद ज्ञान
न्याय
समयसार परमागम कलश २७-२८ के अनुसार जिसकी समझ में अब भी न आवे तो समझना चाहिए
कि वह आत्मा ही नहीं है
आत्मा उसे आकर्षित ही नहीं करता है
आत्मा की प्राप्ति के लिए उसका वीर्य उल्लसित ही नहीं होता है
सभी
