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Worksheets18. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_4.21–4.29
Total questions: 51
Worksheet time: 1hrs 24mins
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श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.21 में वर्णित "ऐसा ज्ञानी पुरुष पूर्ण रूप से संयमित मन तथा बुद्धि से कार्य करता है ।" ऐसे पुरुष का इनमें से कौन सा ज्ञान संदर्भित नहीं है ?
जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है ।
जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है ।
अपने कर्म फलों की सारी आसक्ति को त्याग कर सदैव संतुष्ट रहता है ।
जो सभी प्रकार के कार्य में व्यस्त रह कर, केवल सकाम कर्म करता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.21 में भगवान् श्री कृष्ण ने कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के जो लक्षण प्रस्तुत किए हैं । उनमें निम्न में से कौन सा लक्षण नहीं है ?
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण रूप से संयमित मन तथा बुद्धि से कार्य करता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपनी संपत्ति के सारे स्वामित्व को त्याग देता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति केवल शरीर निर्वाह के लिए कर्म करता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पाप रूपी दुर्जेय फलों से सदैव प्रभावित होता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति समस्त प्रकार के कर्मों को करते हुए भी, सदैव कर्मफलों से मुक्त रहता है । निम्न में से इसका कौन सा कारण नहीं है ? चयन करें।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को यह ज्ञान होना कि कृष्ण के भिन्नांश के रूप में उसके द्वारा संपन्न कोई भी कर्म उसका न होकर उसके माध्यम से परमेश्वर द्वारा संपन्न हुआ होता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कर्म के द्वारा अपने शरीर का निर्वाह करता है, ताकि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति करने के लिए उसका शरीर उचित स्थिति में बना रहे ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदैव भगवदिच्छा का अनुगामी होता है, क्योंकि उसकी निजी इन्द्रियतृप्ति की कोई कामना नहीं होती है । अपितु वह अपने प्रयासों के समस्त फलों के प्रति सदैव निश्चेष्ट रहता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने पद-प्रतिष्ठा हेतु भौतिक उपाधियों तथा वस्तुओं का संग्रह करता है । ताकि उसके धार्मिक वर्चस्व का क्रमिक विकास हो सके ।
क्या व्यक्ति को अपने जीवन निर्वाह के लिए भ्रष्टाचार, रिश्वत, धोखाधड़ी, चोरी, लूटपाट, गबन, अपने प्रभाव या शक्ति जैसे अनुचित साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा धन का संग्रह अथवा अर्जन करना चाहिए ? निम्न में से उपयुक्त उत्तर चुनें।
नहीं, ऐसे कुकृत्य केवल क्षणिक आनंद अथवा संतोष प्रदान करते हैं । जबकि भविष्य में इस भवसागर में घोर भौतिक बंधन उत्पन्न करते हैं।
नहीं, क्योंकि ऐसे कर्मों में अकर्म की तनिक भी सम्भावना नहीं होती है ।
हाँ, हमें प्रत्येक अधिकार प्राप्त है कि हम अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए किसी भी प्रकार का कर्म कर सकते हैं ।
हाँ, इस कलयुग में एक प्रतिष्ठित जीवन यापन के लिए सुख सुविधाओं का होना अति आवश्यक है और इन सुख-सुविधाओं को अर्जित करने के लिए ऐसे कुकृत्य करने पड़ते हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.22 में भगवान् श्रीकृष्ण ने कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के जो लक्षण प्रस्तुत किए हैं । उनमें निम्न में से कौन सा लक्षण नहीं है ?
जो स्वतः होने वाले लाभ से संतुष्ट रहता है ।
जो भौतिक द्वन्द्वों से सदैव मुक्त रहता है ।
जो ईर्ष्या करते हुए सफलता तथा असफलता दोनों में समभाव रहता है ।
जो कर्म करता हुआ भी कभी बंधता नहीं ।
मैं एक गृहस्थ, श्रील प्रभुपाद जी के कृष्णभावनामृत आंदोलन में यथा सामर्थ्य सेवाएँ कर रहा हूँ । परन्तु मुझे अत्यधिक धनार्जन हेतु, मेरी नौकरी और मेरे व्यवसाय में बहुत से अनुचित/प्रतिकूल कार्य करने पड़ते हैं, जिनसे मेरी सेवाएँ बाधित होती हैं तथा मेरी चेतना भी दूषित हो जाती है । अतः कृपया आप मेरे लिए निम्न में से एक उपयुक्त उपाय को चयन करने में मेरी सहायता करें ।
क्या मुझे अपनी नौकरी तथा व्यवसाय दोनों को बदल कर, अपने परिवार की आजीविका के लिए आय के किसी अन्य स्रोत को अपना लेना चाहिए जिसमें मुझे कम से कम अनुचित कार्य करने पड़ें।
क्या मुझे अपनी व अपने परिवार की भौतिक इच्छाओं तथा आवश्यकताओं को सीमित कर अपनी वर्तमान नौकरी तथा व्यवसाय के स्वरूप को इस प्रकार बदलने का प्रयास करना चाहिए, ताकि कोई अनुचित कार्य न करना पड़े ।
क्या मुझे अपने परिवारजनों, नौकरी तथा व्यवसाय का त्याग कर, एकांत अथवा निर्जन स्थान में वासकर भिक्षाटन द्वारा अपना जीवन निर्वाह कर, कृष्णभावनामृत के इस आंदोलन में सेवाएँ प्रदान करनी चाहिएँ ।
क्या मुझे जीवन निर्वाह के लिए यथावत् कार्य करते हुए, इस कृष्णभावनामृत आंदोलन में अपनी सेवाएँ प्रदान करते रहना चाहिए ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के "द्वन्द्वातीत" होने का इनमें से कौन सा कथन प्रामाणिक है ?
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपनी निजी इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य नहीं करता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किसी भी कर्म को करने में विचलित नहीं होता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सफलता और असफलता से भयभीत होकर अकर्म का मार्ग चुनता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने जीवन में आने वाले समस्त द्वन्द्वों का डटकर मुकाबला करता है ।
किसी व्यक्ति के समस्त प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होने एवं फलतः भौतिक गुणों के कल्मष से मुक्त होने की इनमें से कौन सी योग्यता है ?
पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होना ।
पूर्णतः कृष्णभावनाहीन होना ।
पूर्णतः जिज्ञासु होना ।
पूर्णतः पारम्परिक योगी होना ।
किसी साधक अथवा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय कब आता है, जब उसके सारे कर्म यज्ञ स्वरूप होकर ब्रह्म में विलीन हो जाएँ और उनके कर्म फल उसकी कृष्णमयी चेतना को लेशमात्र स्पर्श न कर पाएँ ?
जब कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध की स्वभाविक स्थिति के पूर्ण ज्ञान में स्थापित होकर, कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कृत्तसंकल्प हो कार्य करता है ।
जब कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध की स्वभाविक स्थिति के पूर्ण ज्ञान में स्थापित होकर, कृष्ण की प्रसन्नता के लिए समस्त द्वन्द्वों से ग्रस्त होकर कार्य करता है ।
जब कोई कृष्णभावनाभावित व्यक्ति व्यावहारिकता (Practical) स्तर के बजाय, केवल सैद्धांतिक (Theoretical) स्तर पर ही कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कार्य करने का दिखावा करने लगे ।
ऐसा समय कभी नहीं आता है चाहे कोई कृष्णभावनाभावित व्यक्ति हो अथवा कृष्णभावनाहीन व्यक्ति, सभी को अपने कर्म फलों को भोगना पड़ता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.24 के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण कृष्णभावनामृत अंगीकार करने वाले व्यक्तियों को क्या आश्वासन दे रहे हैं ?
यह कि कृष्णभावनामृत में पूर्णतः लीन व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक कर्मों के योगदान के कारण अंततोगत्वा अवश्यम्भावी भगवद्धाम प्राप्त होता है ।
यह कि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक कर्मों के योगदान के कारण अंततोगत्वा स्वर्ग लोक प्राप्त होते हैं ।
यह कि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक कर्मों के योगदान के कारण अंततोगत्वा सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है ।
यह कि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक कर्मों के योगदान के कारण अंततोगत्वा भगवान् की अप्रत्यक्ष सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.24 में भगवान् श्रीकृष्ण ने इनमें से किस के लिए "हवन" शब्द का प्रयोग किया है ?
कृष्णभावनामृत
कृष्णभावनाभावित कर्म
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति
कृष्णभावनामृतमय आनंद
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.24 में भगवान् श्रीकृष्ण ने इनमें से किस के लिए "हवि" शब्द का प्रयोग किया है ?
कृष्णभावनामृत
कृष्णभावनाभावित कर्म
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति
कृष्णभावनामृतमय आनंद
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.24 में भगवान् श्रीकृष्ण ने इनमें से क्या स्पष्ट किया है ?
कृष्णभावनामृत का सिद्धांत
भौतिक जगत् का सिद्धांत
आध्यात्मिक जगत् का सिद्धांत
जीवात्मा के भौतिक जीवन का सिद्धांत
कृष्णभावनामृत का क्या सिद्धांत है स्पष्ट करें?
यह कि भौतिक पदार्थ, कर्म, गतिविधियाँ, वस्तुएँ इत्यादि-इत्यादि वास्तव में ये सभी आध्यात्मिक हैं ।
यह कि कृष्णभावनाभावित कर्म इस भौतिक जगत् के बंधनों से मुक्ति का एकमात्र साधन है ।
यह कि अंततोगत्वा भगवान् श्रीकृष्ण के सेवक के रूप में अपनी स्वभाविक स्थिति को प्राप्त करना ।
यह कि इस भौतिक जगत् में बद्ध जीवात्माओं के लिए प्रामाणिक गुरु-परम्परा ही कृष्णभावनामृत को सुलभ करवा सकती है ।
श्रील प्रभुपाद जी द्वारा दिए गए उदाहरण "यदि कोई रोगी दूध से बनी वस्तुओं के अधिक सेवन से पेट की गड़बड़ी से ग्रस्त हो जाता है तो उसे दही दिया जाता है ।" में आप दूध से बनी वस्तुओं तथा दही से क्या समझते हैं ?
दूध से बनी वस्तुएँ अर्थात् - भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन किए गए कर्म जो भौतिक बंधन उत्पन्न करते हैं तथा दही अर्थात् - कृष्णभावनाभावित कर्म जो भौतिक बंधनों से मुक्त करते हैं ।
दूध से नाना प्रकार की मिठाईयाँ यथा बर्फी, रबड़ी, रसमलाई, रसगुल्ला, मुरकी छैना, इत्यादि बनाई जाती हैं। दूध में जमावन लगाकर दही बनाया जाता है ।
दूध से बनी वस्तुएँ अर्थात् - जीवों द्वारा किए जाने वाले पाप कर्म । दही अर्थात् - जीवों द्वारा किए जाने वाले पुण्य कर्म ।
दूध से बनी वस्तुएँ अर्थात् - जीवों द्वारा किए जाने वाले पाप कर्म । दही अर्थात् - भगवान् द्वारा की जाने वाली अहैतुकी कृपा ।
भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर से निकलने वाली किरण क्या कहलाती हैं ?
ब्रह्मज्योति
हवन
हवि
आध्यात्मिक आकाश
जब मन पूरी तरह कृष्णभावनामृत में निमग्न रहता है, तो उस अवस्था को क्या कहते हैं ?
आसन
ध्यान
धारणा
समाधि
ब्रह्मज्योति जब माया या इन्द्रियतृप्ति द्वारा आच्छादित हो जाती है तो क्या कहलाती है ?
भौतिक ज्योति
समाधि
कृष्णभावनामृत
हवि
इनमें से कौन सी विशेषता कृष्णभावनामृत की नहीं है ?
कृष्णभावनामृत मोहजनित चेतना को ब्रह्म या परमेश्वरोन्मुख करने की विधि है ।
कृष्णभावनामृत में किया गया प्रत्येक कार्य यज्ञ कहलाता है ।
कृष्णभावनामृत द्वारा भौतिक पदार्थ पुनः अपने आध्यात्मिक गुणों को प्राप्त करता है ।
कृष्णभावनामृत भौतिक स्तर पर ही क्रियान्वित की जाने वाली दिव्य एवं सरल विधि है ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.25 में भगवान् श्रीकृष्ण के "कुछ परब्रह्म रूपी अग्नि में आहुति डालते हैं ।" कथन में आहुति का क्या तात्पर्य है ?
आत्म स्वरूप का विलय
भौतिक संपत्ति का दान
इन्द्रियतृप्ति का निर्वाण
आत्मसंयम से मुक्ति
जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होकर अपना कर्म करने में लीन रहता है, वह क्या कहलाता है ?
पूर्ण योगी
पूर्ण ज्ञानी
पूर्ण ब्रह्मचारी
पूर्ण गृहस्थ
यज्ञों को कितनी श्रेणियों में बाँटा जा सकता है?
2
4
6
8
सांसारिक उपलब्धियों के लिए किए जाने वाले यज्ञ को क्या कहते हैं ?
द्रव्य यज्ञ
ज्ञान यज्ञ
तप यज्ञ
स्वाध्याय यज्ञ
दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले यज्ञ को क्या कहते हैं ?
द्रव्य यज्ञ
ज्ञान यज्ञ
तप यज्ञ
स्वाध्याय यज्ञ
निम्न में से किसे बह्वीश्वरवादी की संज्ञा दी गई है ?
वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार देवताओं की पूजा करने वाले लोगों को ।
शुष्क मानसिक चिंतन द्वारा परम सत्य को समझने का प्रयास करने वाले दार्शनिकों को ।
परब्रह्म रूपी अग्नि में अपने आत्मस्वरूप की आहुति डालने वाले लोगों को ।
कृष्णभावनाभावित कर्मों में निरंतर तल्लीन रहने वाले लोगों को ।
क्या निर्विशेषवादी व्यक्ति की भान्ति कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का भी आत्मस्वरूप विलय हो जाता है ?
नहीं, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के आत्मस्वरूप का अस्तित्व शाश्वत होता है ।
नहीं, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में सदैव पृथक अस्तित्व बना रहता है ।
हाँ, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के भौतिक स्वरूप का विलय हो जाता है ।
हाँ, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए अपने आत्मस्वरूप की आहुति दे देता है ।
वर्णाश्रम व्यवस्था का मुख्य प्रयोजन क्या है ?
यह कि मनुष्य आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सके ।
यह कि मनुष्य भौतिक जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सके ।
यह कि मनुष्य देवताओं की उपाधि प्राप्त करने योग्य बन सके ।
ताकि मनुष्य योनि 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ योनि बनी रह सके ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.26 में भगवान् श्रीकृष्ण के कथन "इनमें से कुछ (विशुद्ध ब्रह्मचारी) श्रवणादि क्रियाओं तथा इन्द्रियों को मन की नियंत्रण रूपी अग्नि में स्वाहा कर देते हैं ।" में श्रवणादि क्रियाओं से आपका क्या तात्पर्य है ।
भौतिक विषय वासनाओं से सम्बंधित विचारों तथा चर्चाओं का श्रवण करना ।
कृष्णभावनामृत संबंधित शब्दों का श्रवण करना ।
हरे कृष्ण महामंत्र की आध्यात्मिक ध्वनि का श्रवण करना ।
भौतिक विषय वासनाओं से सम्बंधित विचारों तथा चर्चाओं के श्रवण के प्रति अन्यमनस्क होना ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.26 में भगवान् श्रीकृष्ण के कथन "दूसरे लोग (नियमित गृहस्थ) इन्द्रियविषयों को इन्द्रियों की अग्नि में स्वाहा कर देते हैं ।" में इन्द्रियों की अग्नि से आपका क्या तात्पर्य है ।
इंद्रियों के नियमन से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति ।
इंद्रियों के संयमन से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति ।
इंद्रियों के अतिक्रमण से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति ।
इंद्रियों के विलयीकरण से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति ।
संयमित अनासक्त यौन जीवन को यज्ञ क्यों कहा गया है ?
क्योंकि संयमित गृहस्थ उच्चतर दिव्य जीवन के लिए अपनी इंद्रियतृप्ति की प्रवृत्ति की आहुति कर देता है ।
क्योंकि यौन जीवन ही इस भौतिक जगत् को नवीन संतति के द्वारा चलायमान रखता है ।
क्योंकि अनासक्त यौन जीवन ही मनुष्य की पाप कर्मों की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाता है ।
क्योंकि अनासक्त यौन जीवन ही मनुष्य को स्वर्ग लोकों का अधिकारी बनाता है ।
ज्ञान का मूल आधार क्या है ?
श्रवण
कीर्तन
वंदन
अर्चन
संयमित मन रूपी अग्नि से आपका क्या अभिप्राय है ?
संयमित मन की आध्यात्मिक शक्ति अग्नि की भांति इंद्रियतृप्ति के विचारों को तुरंत नष्ट कर देती है ।
संयमित मन अपनी अग्नि से इंद्रियतृप्ति के विचारों के अतिरिक्त सब कुछ नष्ट कर देता है ।
संयमित मन अपनी अग्नि से समस्त भौतिक इंद्रियों को भस्मसात् कर देता है ।
संयमित मन का अर्थ है मन द्वारा माया के नियंत्रण से छूट कर अपनी आध्यात्मिक प्रकृति को पुनः प्राप्त करना ।
पतंजलि कृत योगसूत्र के अनुसार कब तक जीवात्मा परागात्मा की अवस्था में रहता है ?
जब तक जीवात्मा इंद्रियभोग में आसक्त रहता है ।
जब जीवात्मा इंद्रियभोग से विरत हो जाता है ।
जब तक जीवात्मा इंद्रियभोग के लिए भोग-त्याग की प्रवृत्ति में लीन रहता है ।
जब तक जीवात्मा इंद्रियभोग के लिए समाधि में रहता है ।
पतंजलि कृत योगसूत्र के अनुसार जीवात्मा कब प्रत्यगात्मा की अवस्था में पहुँचता है ?
जैसे ही जीवात्मा इंद्रियभोग से विरत हो जाता है ।
जैसे ही जीवात्मा इंद्रियभोग में पुनः आसक्त हो जाता है ।
जैसे ही जीवात्मा इंद्रियभोग की भोग-त्याग प्रवृत्ति में पहुँचता है ।
जैसे ही जीवात्मा इंद्रियों के संयमन मी प्रवृत्त हो जाता है ।
पतंजलि योगपद्धति के अनुसार शरीर के वायु के कार्यों को नियंत्रित करने का क्या उद्देश्य है ?
ताकि वायु के सभी आंतरिक कार्य आत्मा को भौतिक आसक्ति से शुद्ध कराने में सहायक बनें ।
ताकि वायु के सभी आंतरिक कार्य आत्मा को भौतिक इंद्रिय सुख प्रदान करने में सहायक बनें ।
ताकि वायु के सभी आंतरिक कार्य आत्मा को भौतिक मन के चंगुल से छुड़ाने में सहायक बनें ।
ताकि वायु के सभी आंतरिक कार्य आत्मा को मनुष्य जीवन की चरम सिद्धि प्रदान करने में सहायक बनें ।
बुद्धिमान् मनुष्य शरीर की समस्त वायु को किस में लगाता है ?
आत्म-साक्षात्कार की खोज में ।
इंद्रिय विषयों के भोग में ।
भौतिक उपाधियों को अर्जित करने में ।
शरीर को सदैव स्वस्थ बनाए रखने में ।
इनमें से कौन सा द्रव्यमय यज्ञ कहलाता है ?
विभिन्न प्रकार के दान-पुण्य द्वारा अपनी संपत्ति का यजन करना ।
चांद्रायण तथा चातुर्मास जैसे विविध तपों के कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत अंगीकार कर जीवन के सुखों का परित्याग करना ।
पतंजलि योग अथवा हठयोग अथवा अष्टांग योग पद्धतियों अथवा तीर्थ स्थानों की यात्रा जैसे योग का क्रियान्वयन करना ।
विभिन्न वैदिक साहित्य यथा उपनिषद् तथा वेदांतसूत्र या सांख्य दर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाना ।
इनमें से कौन सा तपोमय यज्ञ कहलाता है ?
विभिन्न प्रकार के दान-पुण्य द्वारा अपनी संपत्ति का यजन करना ।
चांद्रायण तथा चातुर्मास जैसे विविध तपों के कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत अंगीकार कर जीवन के सुखों का परित्याग करना ।
पतंजलि योग अथवा हठयोग अथवा अष्टांग योग पद्धतियों अथवा तीर्थ स्थानों की यात्रा जैसे योग का क्रियान्वयन करना ।
विभिन्न वैदिक साहित्य यथा उपनिषद् तथा वेदांतसूत्र या सांख्य दर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाना ।
इनमें से कौन सा योग-यज्ञ कहलाता है ?
विभिन्न प्रकार के दान-पुण्य द्वारा अपनी संपत्ति का यजन करना ।
चांद्रायण तथा चातुर्मास जैसे विविध तपों के कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत अंगीकार कर जीवन के सुखों का परित्याग करना ।
पतंजलि योग अथवा हठयोग अथवा अष्टांग योग पद्धतियों अथवा तीर्थ स्थानों की यात्रा जैसे योग का क्रियान्वयन करना ।
विभिन्न वैदिक साहित्य यथा उपनिषद् तथा वेदांतसूत्र या सांख्य दर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाना ।
इनमें से कौन सा स्वाध्याय यज्ञ कहलाता है ?
विभिन्न प्रकार के दान-पुण्य द्वारा अपनी संपत्ति का यजन करना ।
चांद्रायण तथा चातुर्मास जैसे विविध तपों के कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत अंगीकार कर जीवन के सुखों का परित्याग करना ।
पतंजलि योग अथवा हठयोग अथवा अष्टांग योग पद्धतियों अथवा तीर्थ स्थानों की यात्रा जैसे योग का क्रियान्वयन करना ।
विभिन्न वैदिक साहित्य यथा उपनिषद् तथा वेदांतसूत्र या सांख्य दर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाना ।
"कृष्णभावनामृत शेष सभी यज्ञों से भिन्न है ।" निम्न में से कौन सा कथन इसकी प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है ?
कृष्णभावनामृत भगवान् श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष सेवा है ।
कृष्णभावनामृत किसी भी अन्य यज्ञ द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है ।
कृष्णभावनामृत को केवल भगवान् तथा उनके प्रामाणिक भक्तों की अहैतुकी कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है ।
कृष्णभावनामृत आत्म-साक्षात्कार की अत्यंत दुर्लभ एवं कठिन विधि है ।
जब अपान वायु को प्राणवायु में अर्पित कर दिया जाता है, तो ऐसी अवस्था को क्या कहते हैं ?
रेचक
कुम्भक योग
हठयोग
अष्टांग योग
जब प्राण तथा अपान वायुओं को पूर्णतया रोक दिया जाता है, तो ऐसी अवस्था क्या कहते हैं ?
रेचक
कुम्भक योग
हठयोग
अष्टांग योग
इनमें से किस योग अभ्यास द्वारा योगी आत्म-सिद्धि के लिए अपने जीवन की अवधि को अनेक वर्षों के लिए बढ़ा सकता है ?
कुम्भक योग
हठयोग
अष्टांग योग
प्राणायाम
कृष्णभावनाभावित मनुष्य दीर्घजीवी बनने का प्रयत्न क्यों नहीं करता है ? निम्न में से कौन सा कथन इसकी प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है ।
क्योंकि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में स्थित रहने के कारण कृष्णभावनाभावित मनुष्य स्वतः ही इंद्रियों का नियन्ता बन जाता है ।
क्योंकि उसकी इंद्रियां कृष्ण की सेवा में तत्पर रहने के कारण अन्य किसी कार्य में प्रवृत्त होने का अवसर ही नहीं पाती हैं ।
क्योंकि जीवन के अंत में उसे स्वतः भगवान् कृष्ण के दिव्य पद पर स्थानांतरित कर दिया जाता है ।
क्योंकि कृष्णभावनाभावित मनुष्य एक ही जीवनकाल में जीवन की सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त करने का लोभी नहीं होता है ।
कृष्ण प्रसादम् खाने का क्या परिणाम होता है ?
इंद्रियों का स्वतः निग्रह होता है ।
इंद्रियतृप्ति की इच्छा पूर्ण होती है ।
इंद्रियों का भौतिक विकास होता है ।
इंद्रियों के स्वामी मन को संतुष्टि प्राप्त होती है ।
इंद्रियों का विमलीकरण अथवा इंद्रियों का निग्रह क्यों आवश्यक है ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि इंद्रियतृप्ति ही भौतिक अस्तित्व का मूल कारण है । अतः इंद्रियों का विमलीकरण अथवा इंद्रियों का निग्रह अत्यावश्यक है ।
क्योंकि मलिन तथा अनियंत्रित इंद्रियों के साथ स्वर्ग लोकों की प्राप्ति करना असंभव होता है ।
क्योंकि मलिन तथा अनियंत्रित इंद्रियों के साथ इंद्रियतृप्ति करना असंभव है ।
यह प्रश्न वृथा है क्योंकि इंद्रियों का अस्तित्व सर्वदा शुद्ध होता है ।
