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Worksheets21. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_5.07–5.15
Total questions: 45
Worksheet time: 1hrs 25mins
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अब तक श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे, तीसरे व चौथे अध्याय में हमने पढ़ा कि हमें द्वन्द्वातीत होना चाहिए, अर्थात् प्रत्येक द्वन्द्व में बिना विचलित हुए सम्भाव होकर कर्म करना चाहिए । श्लोक संख्या 5.7 में श्रील प्रभुपाद जी ने अविचलित भाव या समभाव को विकसित करने की प्रक्रिया का वर्णन किया है । अतः निम्नलिखित में से इस प्रक्रिया को पहचानें ।
कृष्णभावनाभावित कर्म - चेतना का शुद्धिकरण - मन का नियंत्रण - इंद्रियों का संयमन - मन कृष्ण में स्थिर = अविचलित भाव ।
कृष्णभावनाभावित कर्म - चेतना का शुद्धिकरण - बुद्धि का प्रक्षेपण - इंद्रियों का संयमन - बुद्धि का कृष्ण में स्थिर होना = अविचलित भाव ।
कृष्णभावनाभावित कर्म - चेतना का स्पष्टीकरण - मन का नियंत्रण - इंद्रियों का संयमन - बुद्धि कृष्ण में स्थिर = अविचलित भाव ।
कृष्णभावनाभावित कर्म - चेतना का शुद्धिकरण - मन का नियंत्रण - इंद्रियों का संयमन - मन चेतना में स्थिर = अविचलित भाव ।
निम्नलिखित में से संयमित इंद्रियों वाले (अर्थात् कृष्णभावनाभावित) व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं ?
कृष्ण कथा के अतिरिक्त कुछ न सुनना ।
कृष्ण को अर्पित किए हुए भोजन के उच्छिष्ट को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना ।
कृष्ण से संबंधित स्थलों के अतिरिक्त अन्य स्थानों का भ्रमण न करना ।
यह सभी लक्षण संयमित इंद्रियों वाले कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के होते हैं ।
इनमें से सर्वप्रिय व्यक्ति का क्या लक्षण नहीं होता है ?
वह भक्त्याभाव से कर्म करता है ।
वह विशुद्ध आत्मा होता है अर्थात् उसकी चेतना शुद्ध होती है ।
उसका मन तथा इंद्रियाँ उसके वश में होती हैं ।
यह सभी लक्षण सर्वप्रिय व्यक्ति के होते हैं ।
निम्न में से कौन सा व्यक्ति कभी किसी के प्रति अपराध नहीं करता है ।
ऐसा व्यक्ति जिसकी इंद्रियाँ संयमित होती हैं ।
ऐसा व्यक्ति जो डरपोक होता है ।
ऐसा व्यक्ति जो सभ्य एवं अत्याधिक शिक्षित होता है ।
ऐसा व्यक्ति जो विधि-विधानों का स्वार्थ पूर्ण ढंग से पालन करता है ।
महाभारत की युद्ध भूमि में मारे गए व्यक्ति वास्तव में मारे नहीं गए । ऐसा क्यों ? कारण स्पष्ट करें ।
क्योंकि आत्मा कभी भी मारा नहीं जाता है अतः युद्ध क्षेत्र में केवल उनके वस्त्र अर्थात् भौतिक शरीर बदल दिए गए । वे सभी अपने-अपने स्वरूप में सदैव जीवित बने रहेंगे ।
महाभारत के युद्ध क्षेत्र में उपस्थित सेना केवल भगवान् श्रीकृष्ण की माया के कारण दृष्टिगोचर हो रही थी, वास्तव में वह सभी सैनिक वहाँ उपस्थित नहीं थे ।
केवल मात्र अर्जुन को शरीर और आत्मा के भेद को समझाने के लिए ही भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माया द्वारा महाभारत के इस युद्ध का प्रपंच रचा था ।
सभी विकल्प सही हैं ।
वृक्ष की जड़ में जल एवं आमाशय को भोजन देने के इन उदाहरणों से श्रील प्रभुपाद हमें क्या समझाते हैं ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करने से सभी सेवित हो जाते हैं ।
यह कि जिस प्रकार वृक्ष की टहनियों का सिंचन करने से वृक्ष में फल नहीं लगते, ठीक उसी प्रकार बुद्धि को भोजन खिलाने से बुद्धि कर्म नहीं करती ।
यह कि वृक्ष को हरा भरा रखने के लिए हमें पर्याप्त मात्रा में वृक्ष की जड़ में जल डालना चाहिए और अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने के लिए अपने अमाशय को भोजन की पर्याप्त मात्रा से भरना चाहिए ।
यह सभी विकल्प उचित हैं ।
ऐसा कैसे संभव है कि केवल मात्र भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करने से सभी सेवित हो जाते हैं । स्पष्ट करें ।
क्योंकि हम जीवात्माओं सहित समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक गोचरागोचर वस्तुएँ भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य चेतना में ही स्थापित हैं । अतः प्रत्येक सेवा से सभी को पर्याप्त पोषण प्राप्त होता है ।
क्योंकि केवल इस ब्रह्मांड के सजीव व निर्जीव सभी प्रकार के प्राणी भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा पर आश्रित हैं । अतः प्रत्येक सेवा से सभी को पर्याप्त पोषण प्राप्त होता है ।
क्योंकि इस ब्रह्मांड के गोचरागोचर जीव, प्रकृति, जीवन की समस्त व्यवस्था ब्रह्मा जी पर निर्भर है और ब्रह्मा जी सदा भगवान् श्रीकृष्ण पर आश्रित रहते हैं । अतः प्रत्येक सेवा से सभी को पर्याप्त पोषण प्राप्त होता है ।
यह सभी विकल्प मान्य हैं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किसी भी जीव को कृष्ण से पृथक् नहीं जान पाता है । ऐसा क्यों ? कारण स्पष्ट करें ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा शुद्ध हुई उसकी चेतना के द्वारा प्राप्य जीवों की स्वाभाविक स्थिति के ज्ञान के कारण ।
क्योंकि ऐसा व्यक्ति प्रत्येक जीव को कृष्ण के समान मानता है ।
क्योंकि ऐसा व्यक्ति समस्त जीवों को कृष्ण का आधार मानता है ।
क्योंकि ऐसा व्यक्ति समस्त जीवों को कृष्ण की प्रसन्नता का कारण मानता है ।
भौतिक इंद्रियाँ तो जीवात्मा के निर्देशन में कार्य करती हैं, तो फिर जीवात्मा स्वयँ को भौतिक इंद्रियों से पृथक् कैसे जान सकता है ? स्पष्ट करें ।
यह विचार देहात्मबुद्धि जन्य है । वास्तव में, मन तथा इंद्रियाँ प्रकृति के तीनों गुणों के निर्देशन में कार्य करती हैं । शुद्ध चेतना द्वारा प्राप्य इस वास्तविक ज्ञान के कारण ही जीवात्मा स्वयँ को भौतिक इंद्रियों से पृथक् जान पाता है ।
यह विचार देहात्मबुद्धि जन्य है । वास्तव में, जीवात्मा भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा मोहित होने के कारण ही स्वयँ को अपनी भौतिक देह एवं भौतिक इंद्रियों से पृथक् जानने लगता है ।
ऐसा नहीं है वास्तव में अनादि काल से जीवात्मा का अस्तित्व भौतिक देह एवं भौतिक इंद्रियों से पृथक् होता है अन्यथा जीवात्मा का देहांतरण कैसे संभव होता ।
वास्तव में, यह सभी विचार इस प्रश्न की पुष्टि करते हैं ।
पाँच निकट तथा दूरस्थ कारण बताएँ, जिनसे कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का कोई सरोकार नहीं होता ।
कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, प्रयास तथा भाग्य ।
कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, सेवा तथा भाग्य ।
कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, आसक्ति तथा भाग्य ।
कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, इच्छा तथा भाग्य ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भौतिक कर्म करते हुए भी अपनी वास्तविक स्थिति के प्रति सदैव सचेत रहता है । इसमें वास्तविक स्थिति से आपका क्या अभिप्राय है ?
यह कि वह कृष्ण का शाश्वत दास है ।
यह कि वह वास्तविक भगवान् नहीं है ।
यह कि वह वास्तविक भोक्ता नहीं है ।
यह कि वह वास्तविक कर्ता नहीं है ।
श्लोक संख्या 5.8 व 5.9 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद जी ने 'आध्यात्मिक व्यस्तता' शब्द का प्रयोग किया है । इससे आप क्या समझते हैं ?स्पष्ट करें ।
आध्यात्मिक व्यस्तता का अर्थ है जीवात्मा का कृष्ण की इंद्रियों की तुष्टि में लगा रहना ।
आध्यात्मिक व्यस्तता का अर्थ है जीवात्मा का अपनी आध्यात्मिक इंद्रियों की तुष्टि में लगा रहना ।
आध्यात्मिक व्यस्तता का वास्तविक अर्थ है जीवात्मा का धार्मिक अनुष्ठानों अथवा कर्मकांडों में व्यस्त रहना ।
आध्यात्मिक व्यस्तता का वास्तविक अर्थ है जीवात्मा का समाज के प्रति परोपकारिता के कार्यों में लगे रहना ।
"यह भौतिक जगत प्रकृति के तीन गुणों की समग्र अभिव्यक्ति है ।" इस कथन में तीन गुणों की समग्र अभिव्यक्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
श्लोक संख्या 4.24 में यह स्पष्ट हुआ है कि वास्तव में इस भौतिक जगत् का पदार्थ, कर्म, गतिविधियाँ, वस्तुएँ इत्यादि-इत्यादि आध्यात्मिक हैं, परंतु प्रकृति के तीनों गुणों के संसर्ग में आने पर जीवात्मा को इस जगत् में प्रत्येक वस्तु से भौतिक क्रिया-प्रतिक्रिया की अनुभूति होती है ।
यह कि प्रकृति के तीनों गुणों के संपूर्ण वर्चस्व के अधीन इस भौतिक जगत् का अस्तित्व मिथ्या है ।
यह कि इस भौतिक जगत् में प्रकृति के तीनों गुणों का प्रभाव इतना गहरा है कि काल भी यहाँ अपना प्रभाव दिखाने लगता है । अन्यथा काल के लिए यहां कोई स्थान नहीं है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
इस भौतिक जगत् में जीवात्माओं द्वारा किए जाने वाले एक ही प्रकार के कार्य भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट होते हैं । किंतु तो भी वे कारण से अभिन्न है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
ब्रह्म संहिता के अनुसार एकमात्र कृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं । जीवात्माओं द्वारा प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव के अधीन किए जाने वाले कर्म भिन्न-भिन्न होते हैं परंतु वास्तविक कारण केवल परमेश्वर ही हैं ।
एक ही कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के ज्ञान का स्तर भिन्न भिन्न होता है परंतु इसके पीछे कारण अर्थात् शिक्षा से अभिन्न होता है ।
एक ही कार्यालय में कार्यरत अधिकारियों की कार्यशैली भिन्न-भिन्न होती है । परंतु इसके पीछे कारण अर्थात् उद्देश्य से अभिन्न होती हैं ।
यहाँ सभी कथन उपरोक्त प्रश्न का स्टीक स्पष्टीकरण करते हैं ।
निम्न में से कौन सा कथन यह स्पष्ट करता है कि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को शुभ-अशुभ कर्मफलों से कोई प्रयोजन नहीं होता है ?
जो यह भलीभांति जानता हो कि प्रत्येक वस्तु कृष्ण की है ।
जो यह भलीभांति जानता हो कि प्रत्येक वस्तु के स्वामी कृष्ण हैं ।
जो यह जानता हो कि प्रत्येक वस्तु भगवान् की सेवा में ही नियोजित है ।
यह सभी कथन कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के प्रयोजन का स्पष्टीकरण करते हैं ।
विशेष प्रकार के कर्म को संपन्न करने के लिए भगवान् द्वारा प्रदत्त मनुष्य को शरीर कैसे कृष्णभावनामृत में संलग्नित किया जा सकता है ? कृपया स्पष्ट करें ।
प्रत्येक कर्म यह समझकर करके कि यह देह कृष्ण की संपत्ति है, अतः इसे कृष्ण की सेवा में प्रवृत्त होना चाहिए ।
इस मनुष्य जीवन में प्रत्येक कर्म को देहात्मबुद्धि द्वारा निष्पादित करके, हम इस देह को कृष्ण की सेवा में लगा सकते हैं ।
अपनी दैहिक इंद्रियों की तुष्टि करके मनुष्य अपनी देह को कृष्ण की सेवा में समर्पित कर सकता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 5.10 में भगवान् श्रीकृष्ण ने कमलपत्र का उदाहरण क्यों दिया है ? कृपया स्पष्ट करें ।
यह स्पष्ट करने के लिए कर्मफल से आसक्ति रहित कर्म करने से मनुष्य पाप कर्मों से उसी प्रकार अप्रभावित रहता है, जिस प्रकार कमल पत्र जल से अस्पृश्य रहता है ।
यह स्पष्ट करने के लिए कि कमलपत्र मनुष्य द्वारा किए जाने वाले कर्मों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है । क्योंकि कमलपत्र जल में रहते हुए भी जल से प्रभावित रहता है ।
दोनों ही कथन सत्य हैं ।
दोनों ही कथन असत्य हैं ।
योगीजन आसक्तिरहित होकर ................................. के द्वारा भी केवल शुद्धि के लिए कर्म करते हैं ।
शरीर, मन, बुद्धि तथा इंद्रियों
शरीर, मन, अहंकार तथा इंद्रियों
शरीर, मन, काम तथा इंद्रियों
शरीर, मन, धैर्य तथा इंद्रियों
कृष्णभावनाविहीन व्यक्तियों के लिए दुःसाध्य सामान्य सदाचार भी कृष्णभावनामृत में रहते हुए सरलता से संपन्न हो जाते हैं । कैसे ?
क्योंकि आसक्तिरहित कर्म करने के कारण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कर्मों से भौतिक फल प्रकट नहीं होता ।
क्योंकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति प्रत्येक प्रकार के कर्म को करने में पूर्णतः दक्ष होता है ।
क्योंकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपना प्रत्येक कर्म कृष्ण को समर्पित करते हुए निष्पादित करता है ।
यह सभी कथन सत्य प्रतीत होते हैं ।
अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है और इसका प्रभाव तो अत्यंत सूक्ष्म होता है । अहंकार रहित होने का क्या उपाय है ? कृपया सांझा करें ।
इस ज्ञान के साथ कर्म करना कि न तो मैं यह शरीर हूँ और न ही मैं इस शरीर या इससे जुड़ी किसी भी वस्तु का स्वामी हूँ । मेरे, मेरे शरीर के तथा मेरी समस्त संपत्ति के स्वामी कृष्ण हैं । इस प्रकार कर्म करने से मनुष्य अहंकार मुक्त हो जाता है ।
स्वयँ को सभी का दास मान कर कर्म करने से मनुष्य अहंकार मुक्त हो जाता है ।
स्वयँ के मिथ्या भौतिक वर्चस्व को भगवत्दासत्त्व की अग्नि में भस्मसात् करके मनुष्य अहंकार मुक्त हो जाता है ।
यह सभी विकल्प सत्य हैं ।
निम्न में से कौन सा कथन मिथ्या है ?
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा कृष्ण से एकरूप हो जाता है ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा कृष्ण से तदाकार हो जाता है ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा कृष्ण के सारुप्य हो जाता है ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा कृष्ण के अधीनस्थ हो जाता है ।
निश्चल भक्त शुद्ध शांति कैसे प्राप्त करता है ?
निश्चल भाव से कर्म करते हुए वह अपने समस्त कर्मफल श्रीभगवान् को अर्पित कर देता है ।
निश्चल भाव से कर्म करते हुए वह अपने समस्त कर्मफलों को भोगकर आनंद प्राप्त करता है ।
यह दोनों कथन सत्य हैं ।
यह दोनों कथन मिथ्या हैं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तथा देहात्मबुद्धि वाले व्यक्ति में क्या अंतर होता है ?
पहला कृष्ण के प्रति आसक्त रहता है और दूसरा अपने कर्म फलों के प्रति आसक्त रहता है ।
पहला कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है दूसरा कर्मफलों को भोगने के लिए कर्म करता है ।
पहला शुद्ध शांति को प्राप्त करता है और दूसरा कर्मबंधन प्राप्त करता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
कृष्णभावनामृत में संपन्न कर्मों के क्या लक्षण होते हैं ?
कृष्णभावनाभावित कर्म परम पद पर होते हैं ।
कृष्णभावनाभावित कर्म दिव्य होते हैं ।
कृष्णभावनाभावित कर्मों का कोई भौतिक प्रभाव नहीं होता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
कृष्णभावनामृत का क्या रहस्य है ?
यह अनुभूति कि कृष्ण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, शांति तथा अभय का पद है ।
यह अनुभूति कि इंद्रियतृप्ति ही शांति का वास्तविक एवं सुगम स्रोत है ।
यह अनुभूति कि प्रकृति के तीन गुण ही शांति का वास्तविक एवं सुगम स्रोत है ।
यह अनुभूति कि 'अहम् ब्रह्मास्मि' ही परम सत्य का आधार है ।
जीवात्मा की वास्तविक प्रकृति क्या है ?
परा प्रकृति
अपरा प्रकृति
भौतिक प्रकृति
तटस्थ प्रकृति
भौतिक बंधन में फंसने का और भौतिक बंधन से छूटने का उपाय एक ही है । निम्न में से वह क्या उपाय है ? उचित विकल्प का चुनाव करें ।
इच्छा
कर्म
अस्तित्व
कर्मफल
इस भौतिक शरीर को "नवद्वारे पुरे देही" क्यों कहा गया है ?
क्योंकि इसमें नौ द्वार होते हैं ।
क्योंकि इसमें छः द्वार होते हैं ।
क्योंकि इसमें दस द्वार होते हैं ।
क्योंकि इसमें निरंतर परिवर्तन होने के कारण जीवात्मा को नवीन द्वार प्राप्त होते रहते हैं ।
इस भौतिक जगत् में कृष्णभावनामृत ही जीवात्मा के कष्टों का समाधान है । सिद्ध करें ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा अपनी वास्तविक स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकता है ।
कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवात्मा बंधन से मुक्त हो सकता है ।
कृष्णभावनामृत से प्राप्त संयमित जीवन में जीवात्मा की कार्य प्रणाली में परिवर्तन आ जाता है ।
यह सभी तथ्य सत्य हैं ।
नौ द्वारों वाले नगर में वास करते हुए जीवात्मा स्वयँ को मुक्त कब अनुभव करता है ?
जब वह अपनी पहचान अपने अंतर में भगवान् से करता है ।
जब वह समस्त आसक्तियों, संपत्ति के स्वामित्व देहात्मबुद्धि को त्याग कर भगवान् की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है ।
जब वह इस ज्ञान के साथ कर्म करता है कि आध्यात्मिक तथा भौतिक समस्त प्रकार की वस्तुओं के स्वामी केवल कृष्ण हैं ।
इन सभी परिस्थितियों में देहधारी जीवात्मा स्वयँ को मुक्त अनुभव करता है ।
निम्न में से कौन सी परिस्थिति जीवात्मा की बद्धावस्था की जनक है ?
परा प्रकृति (जीव) का अपरा प्रकृति से संसर्ग ।
जीवात्मा की अपने कर्मफलों का भोग करने की इच्छा ।
जीवात्मा का स्वयँ को भौतिक शरीर मानना ।
जीवात्मा द्वारा निरंतर देहांतरण करना ।
जीवात्मा का बद्धावस्था में अनंत काल से बने रहने का कारण अज्ञान है, किंतु यह अज्ञान क्या है ?
जीवात्मा का स्वयँ को शरीर मानकर कर्मफलों का भोग करते रहना ।
जीवात्मा का अपने कर्मों के प्रति आसक्त होना ।
जीवात्मा का स्वयँ से संबंधित प्रत्येक वस्तु के प्रति स्वामित्व का भाव ।
यह सभी कथन जीवात्मा का अज्ञान हैं ।
"सागर की लहरें उछालती रहती हैं, किंतु उन पर उसका वश नहीं चलता ।" इस कथन में सागर व सागर की लहरों से क्या आशय है ?
भौतिक जगत् व भौतिक जगत् के कष्ट
मन व मन के विभिन्न-विभिन्न प्रस्ताव
बुद्धि तथा बुद्धि की समस्त क्रियाएँ
जीवात्मा तथा जीवात्मा की इच्छाएँ
निम्न में से कौन सा कथन विभु शब्द के अर्थ को स्पष्ट करता है ?
परमेश्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौंदर्य तथा त्याग से युक्त है ।
परमेश्वर जो सदैव आत्मतृप्त तथा पाप-पुण्य से विचलित रहता है ।
परमेश्वर जो किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थितियों उत्पन्न नहीं करता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
कर्म तथा फल की श्रृंखला के प्रारंभ होने का क्या कारण होता है ?
जीवात्मा द्वारा अज्ञान से मोहित होकर भोग की विशिष्ट परिस्थिति की कामना करना ।
जीवात्मा का स्वयँ को शरीर मानकर कर्मफलों का भोग करते रहना ।
जीवात्मा का अपने कर्मों के प्रति आसक्त होना ।
जीवात्मा का स्वयँ से संबंधित प्रत्येक वस्तु के प्रति स्वामित्व का भाव ।
निम्न में से अणु (जीवात्मा) की क्या विशेषताएँ हैं ?
इच्छा करने की आंशिक स्वतंत्रता ।
अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त होना ।
इच्छाशक्ति का दुरुपयोग करना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् जीव आत्मा को अपनी इच्छापूर्ति कब करने देते हैं ?
जब जीवात्मा अपनी इच्छाओं के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है ।
जैसे ही जीवात्मा इच्छा करता है तो तुरंत उसकी इच्छापूर्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बना देते हैं ।
जब जीवात्मा की इच्छाएँ अपरिपक्व हो जाती हैं ।
यह सभी कथन सत्य है ।
"आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल।" इस कथन के द्वारा श्रील प्रभुपाद जी ने क्या स्पष्ट किया है ?
यह कि भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं ।
यह कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए सर्वशक्तिमान् होता है ।
यह कि इस संसार में व्यक्ति की योग्यता के अनुसार नहीं, अपितु भगवान् की इच्छा के अनुसार उसे सुविधाएँ प्राप्त होती हैं ।
यह कि भगवान् जीव के चिरसंगी होने के कारण उसकी समस्त इच्छाओं को जान लेते हैं ।
जब कोई जीव कृष्ण की इच्छा करता है तब क्या होता है ?
तो कृष्ण उसकी विशेष चिंता करते हैं । ताकि उसकी यह इच्छा पूर्ण हो सके ।
उसे स्वयँ को प्राप्त करवाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं । ताकि उसकी यह इच्छा पूर्ण हो सके ।
उसे स्वयँ को प्राप्त करवाने के लिए यथायोग्य ज्ञान प्रदान करते हैं । ताकि उसकी यह इच्छा पूर्ण हो सके ।
यह सभी तथ्य वास्तविक हैं ।
"एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते। एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते।।" कृपया इस श्लोक का हिंदी अनुवाद बताएँ ।
भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे । भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए ।
जीव अपने सुख-दुख में पूर्णतया आश्रित है ।परमेश्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल ।
भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है ।"
इनमें से कोई भी अनुवाद इस श्लोक से संबंधित नहीं है ।
जीवात्मा यह क्यों कहता है कि उसके भवबंधन के लिए भगवान् ही उत्तरदायी हैं ?
देहधारी जीव की कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति उत्पन्न मोह के कारण ।
स्वभावतः सच्चिदानंद स्वरूप होते हुए भी जीव द्वारा अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति को भूल जाना ।
दोनों कारणों से उत्पन्न अज्ञानतावश ।
यह सभी तथ्य उचित हैं ।
