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Worksheets33. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_7.24–7.28
Total questions: 44
Worksheet time: 1hrs 9mins
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भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 7.24 में निम्न में से किसे अल्पज्ञ नहीं कहा है ?
निर्विशेषवादियों को
मायावादियों को
ब्रह्मवादियों को
देवताओं के उपासकों को
महान् भगवद्भक्त यामुनाचार्य वेदांत, उपनिषद् तथा वैदिक ग्रंथों के ज्ञानी व्यक्तियों को, जो रजो तथा तमोगुण के वश में होने के कारण भगवान् को नहीं समझ पाते हैं, उन्हें क्या संज्ञा दी है ?
यामुनाचार्य जी ने ऐसे व्यक्तियों को असुर तथा अभक्तगण कहा है ।
यामुनाचार्य जी ने ऐसे व्यक्तियों को देवता तथा भक्त कहा है ।
यामुनाचार्य जी ने ऐसे व्यक्तियों को विशारद तथा ब्राह्मण कहा है ।
यामुनाचार्य जी ने ऐसे व्यक्तियों को महान् प्रचारक तथा उपदेशक कहा है ।
ब्रह्मसंहिता के अनुसार भगवान् को समझने के लिए निम्न में से क्या अति आवश्यक है ?
परमपुरुष की भगवत्कृपा ।
वेदांत साहित्य का अध्ययन ।
निर्विशेष की ध्यान साधना ।
देवताओं की उपासना ।
निम्न में से कौन से लोग अबुद्धयः कहलाते हैं ?
जो लोग परम सत्य को निर्विशेष मानते हैं ।
जो लोग परम सत्य के परम स्वरूप को नहीं जानते हैं ।
जो लोग परम सत्य को निराकार अथवा शुन्य मानते हैं ।
यह तीनों प्रकार के व्यक्ति अबुद्धयः कहलाते हैं ।
यदि कोई व्यक्ति निर्विशेषवादी है, तो वह परम सत्य अर्थात् भगवत्साक्षात्कार के पथ पर वह कौन से स्तर पर है ?
प्रारंभिक स्तर पर है ।
मध्य स्तर पर है ।
अंतिम स्तर पर है ।
ऐसे अल्पज्ञ व्यक्ति भगवत्साक्षात्कार के पथ से सदैव विपथगामी माने जाते हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी ने आधुनिक निर्विशेषवादियों को और भी अधिक अल्पज्ञ क्यों कहा है ?
क्योंकि वे अपने पूर्वगामी शंकराचार्य का पूर्ण अनुसरण नहीं करते हैं । जिन्होंने यह स्पष्ट बताया कि कृष्ण ही परमेश्वर हैं ।
क्योंकि आधुनिकता से मदांध ऐसे व्यक्ति अब निर्विशेष रूप में अपनी आस्था को भी नकारने लगे हैं ।
क्योंकि आधुनिकता से मदांध ऐसे व्यक्ति स्वयँ को ही भगवान् के रूप में स्थापित करने में प्रयासरत हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण अपने विषय में निर्विशेषवादियों की विचारधारा धारा की श्रीमद्भागवत गीता के किस लोक के माध्यम से भर्त्सना करते हैं ?
1.11
1.19
9.11
9.19
भगवान् श्रीकृष्ण को समझने के लिए भक्ति अथवा कृष्णभावनामृत में से कौन अधिक महत्वपूर्ण है ?
भगवान् श्रीकृष्ण को समझने के लिए दोनों ही महत्वपूर्ण हैं ।
भक्ति अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि भक्ति के बिना कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं हो सकता ।
कृष्णभावनामृत अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि कृष्णभावनामृत रहित भक्ति से भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं समझा
जा सकता है ।
इन दोनों के अतिरिक्त भगवान श्री कृष्ण को वेदाध्ययन द्वारा भी समझा जा सकता है ।
कृष्णभावनामृत के विकास का प्रारंभिक चरण क्या है ?
"हरे कृष्ण" महामंत्र का जप करना ।
वेदों का स्वाध्ययन करना ।
शुष्क मानसिक चिंतन करना ।
कृष्ण से ईर्ष्या करना ।
निर्विशेषवादियों की भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में क्या धारणा होती है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण का शरीर भी भौतिक प्रकृति का बना होता है ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण के समस्त कार्य, उनका रूप इत्यादि सभी माया है ।
यह कि भगवान् निर्विशेष हैं और उन पर विभिन्न रूप ऊपर से थोपे गए हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
समस्त देवताओं की अपने-अपने लोक हैं भगवान् श्रीकृष्ण का भी अपना लोक है इस कथन से क्या सिद्ध होता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण तथा देवता निर्विशेष नहीं है ।
यह कि भगवान् तथा देवता दोनों ही निर्विशेष हैं ।
यह कि भगवान् निर्विशेष हैं, परन्तु देवता सविशेष हैं ।
यह सभी कथन मिथ्या हैं ।
किस ग्रंथ के अध्ययन से हमें यह पता चलता है कि भगवान् तथा देवता निर्विशेष नहीं है ?
वैदिक साहित्य से
विज्ञापन पत्रिकाओं से
भौतिक प्रचार पत्रिकाओं से
निर्विशेषवादी साहित्य से
"परम सत्य आनंदमयोऽभ्यासात्" इस आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थात् परम सत्य स्वभाव से ही आनंदमय हैं ।
अर्थात् परम सत्य अनंत शुभ गुणों के आगार हैं ।
यह दोनों कथन सत्य हैं ।
यह दोनों कथन मिथ्या हैं ।
निर्विशेषवादियों अद्वैतवादियों का यह .................... मिथ्या है ।
आरोपित सिद्धांत
निरूपक सिद्धांत
पक्षपाती सिद्धांत
द्वेषपूर्ण सिद्धांत
भगवान् श्रीकृष्ण के कथन अनुसार वह किसके लिए प्रकट नहीं होते हैं ?
मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिए ।
बुद्धिमान् व्यक्तियों के लिए ।
कृष्णभावनाभावित भक्तों के लिए ।
आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी व्यक्तियों के लिए ।
भगवान् अपनी किस शक्ति के द्वारा आच्छादित रहते हैं ?
अंतरंगा शक्ति
बहिरंगा शक्ति
संकर्षण शक्ति
अपरा शक्ति
5,000 वर्ष पूर्व जब भगवान् श्रीकृष्ण अपने मूल रूप में इस ब्रह्मांड के इस धराधाम पर प्रकट हुए थे, तो क्या वह है सभी मनुष्यों को दृश्य थे ?
नहीं, क्योंकि ऐसे बहुत कम व्यक्ति थे, जो उन्हें परमेश्वर के रूप में जानते थे ।
हाँ, क्योंकि निर्विशेषवादियों का कहना है कि कृष्ण सभी व्यक्तियों को एक समान दृश्य थे ।
नहीं, क्योंकि केवल श्रील व्यासदेव ही यह जानते थे कि श्रीकृष्ण ही परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं ।
हाँ, क्योंकि सभी निर्विशेषवादी अद्वैतवादी उनके निराकार स्वरूप को देख सकते थे ।
कुरु सभा में कृष्ण के सभाध्यक्ष चुने जाने का विरोध किसने किया था ?
भीष्म पितामह
शिशुपाल
जरासंध
दुर्योधन
"भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अंतरंगाशक्ति या योगमाया के आवरण से आवृत्त रहते हैं" इस कथन की पुष्टि निम्न में से किस उपनिषद् में हुई है ?
ईशोपनिषद् ।
छांदोग्य उपनिषद् ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् ।
कलि संतरण उपनिषद् ।
निर्विशेषवादी अथवा निराकारवादी अथवा अद्वैतवादी जिस ब्रह्मज्योति को परब्रह्म मानते हैं । वह वास्तव में क्या है ?
ब्रह्मज्योति वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति से उत्पन्न प्रकाश है ।
ब्रह्मज्योति वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण की सूर्य शक्ति से उत्पन्न प्रकाश है ।
ब्रह्मज्योति वास्तव में भगवान् श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से उत्पन्न प्रकाश है ।
ब्रह्मज्योति वास्तव में एक खगोलीय घटना से उत्पन्न प्रकाश है ।
निर्विशेषवादी भगवान् के सच्चिदानंद विग्रह का दर्शन क्यों नहीं कर पाते हैं ?
ब्रह्मज्योति में उनकी आसक्ति के कारण ।
निराकार में उनकी आसक्ति के कारण ।
निर्विशेष में उनकी आसक्ति के कारण ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
"संसार में ऐसा कौन है जो आपकी शक्ति तथा लीलाओं का अनुमान लगा सके ?" यह किसके द्वारा की गई स्तुति का अंश है ?
ब्रह्मा
यामुनाचार्य
कुन्ती
अर्जुन
भगवान् श्रीकृष्ण अपनी किस शक्ति का निरंतर विस्तार करते रहते हैं ?
योगमाया
माया
अपरा शक्ति
संकर्षण शक्ति
भगवान् की शक्तियाँ अव्यय क्यों हैं ?
क्योंकि भगवान् अव्यय हैं ।
क्योंकि भगवान् अजन्मा हैं ।
क्योंकि भगवान् सच्चिदानंद है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्रीभगवान् को भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्यकाल की स्मृति कैसे बनी रहती है ?
क्योंकि प्रत्येक काल में भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति एक समान रहती है ।
क्योंकि काल भगवान् श्रीकृष्ण के अधीन कार्य करता है ।
क्योंकि समस्त घटनाक्रम भगवान् श्रीकृष्ण के निर्देशन के अधीन घटित होते हैं ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
जीवात्मा भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्य काल की सभी घटनाओं को क्यों भूल जाता है ?
क्योंकि प्रत्येक काल में जीवात्मा की स्थिति परिवर्तनीय होती है ।
क्योंकि जीवात्मा काल के अधीन कार्य करता है ।
भौतिक कल्मष से युक्त होने के कारण जीवात्मा समस्त घटनाक्रमों को भूल जाता है ।
प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन बद्धावस्था के कारण जीवात्मा सभी घटनाओं को भूल जाता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञान यदि कृष्णभावनामृत पथ का प्रारंभिक चरण है तो निर्विशेष वादी भक्त भगवान् श्रीकृष्ण को क्यों नहीं जान पाते ?
क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञान आंशिक किंतु अप्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत है । अतः ऐसे भक्त बिना प्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत के कृष्ण को नहीं जान पाते ।
क्योंकि वे कृष्ण के सच्चिदानंद विग्रह स्वरूप से भिज्ञ होते हैं ।
क्योंकि वह कृष्ण को निराकार ब्रह्म का अवतार मानते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
यदि माया रूपी बादल भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर को आवृत्त नहीं कर पाता है तो फिर हम भगवान् श्रीकृष्ण को क्यों हम नहीं देख पाते हैं ?
क्योंकि इस भौतिक जगत् में माया रूपी बादल हम समस्त सूक्ष्म जीवात्माओं को ढक देता है ।
क्योंकि हम जीवात्माओं के पास माया के आर-पार देखने हेतु उपयुक्त दृष्टि नहीं होती है ।
क्योंकि माया रूपी बादल ने हमारी समस्त आध्यात्मिक इंद्रियों को आवृत्त कर लिया है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
भले ही कोई निराकार ब्रह्म या अंतर्यामी परमात्मा की अनुभूति के कारण सिद्ध ही क्यों न हो ले । फिर भी वह भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता है । ऐसा क्यों ?
क्योंकि कृष्णभावनामृत के बिना भगवान् श्रीकृष्ण को समझ पाना असंभव है ।
क्योंकि निराकार ब्रह्म या अंतर्यामी परमात्मा भगवान् की आंशिक अभिव्यक्तियाँ हैं ।
क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण को समझने की प्रथम योग्यता भौतिक इच्छा शून्यता है ।
भगवत्ज्ञान के संदर्भ में यह सभी तर्क सत्य हैं ।
जीवात्मा किससे उत्पन्न द्वंद्वों से मोहग्रस्त होकर इस भौतिक जगत् में भ्रमित अवस्था में परिगमन करता है ?
इच्छा तथा घृणा
अहंकार तथा द्वेष
काम तथा क्रोध
जन्म तथा मृत्यु
इच्छा तथा घृणा से उत्पन्न द्वंद्व वास्तव में क्या है ?
माया
योगमाया
काम
अहंकार
मनुष्य का परमेश्वर में तदात्मय होने का क्या कारण है ?
भगवान् के रूप में कृष्ण से घृणा करना तथा निष्क्रियता की इच्छा करना ।
इस भौतिक संसार में अहंकार तथा द्वेष से संगति करना ।
इस भौतिक संसार में काम तथा क्रोध से संगति करना ।
इस भौतिक संसार में जन्म तथा मृत्यु से घृणा करना और निष्क्रियता की इच्छा करना ।
निम्न में से कौन सा द्वंद्वमोहेन का कारण नहीं है ?
स्त्री-पुरुष
सुख-दुख
मान-अपमान
सेवक-सेव्य
भगवान् की सेवा अथवा भक्ति में कौन से मनुष्य संकल्पपूर्वक तत्पर होते हैं ?
जिन्होंने धर्म के विधि-विधानों का अभ्यास करने में अपना जीवन लगाया है ।
जिन्होंने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किए हैं ।
जिन्होंने अपने पाप कर्मों के पूर्ण उच्छेदन में अपना जीवन लगाया है ।
यह सभी मनुष्य भगवान् की सेवा अथवा भक्ति में संकल्पपूर्वक तत्पर रहते हैं ।
इच्छा तथा घृणा के द्वंद्व को पार कर पाना किसके लिए कठिन नहीं होता है ?
पापी
नास्तिक
मूर्ख
धर्मी
मनुष्य को द्वंद्वों से उत्पन्न मोह से कौन उबार सकता है ?
भगवान् के शुद्धभक्तों की संगति
मनोधर्म से उत्पन्न ज्ञान की संगति
निर्विशेषवादी भक्तों की संगति
यह सभी कथन सत्य है ।
"महत्सेवां द्वारमाहूर्विमुक्तेः" का क्या तात्पर्य है ?
शुद्धभक्तों की सेवा ही वास्तविक मुक्ति का द्वार है ।
अपन परिवार की सेवा ही वास्तविक मुक्ति का द्वार है ।
अपने समाज अथवा धर्म की सेवा ही वास्तविक मुक्ति का द्वार है ।
अपने देश की सेवा ही वास्तविक मुक्ति का द्वार है ।
"तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम" का क्या तात्पर्य है ?
भौतिकतावादी पुरुषों की संगति अधोगति का द्वार है ।
स्त्रियों की संगति करने वाले पुरुषों की संगति अधोगति का द्वार है ।
इंद्रियभोग के लोभियों की संगति अधोगति का द्वार है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जीवात्मा और परमेश्वर के संबंध में ईश्वरीय नियम की सबसे बड़ी अवहेलना क्या है ?
जीवात्मा का परमेश्वर के अधीन अपनी स्वाभाविक स्थिति को भूलना ।
जीवात्मा का निर्विशेष ब्रह्म में तादात्म्य हेतु कृत संकल्प होना ।
जीवात्मा का अंतर्यामी परमात्मा को प्राप्त होने हेतु ध्यानयोग में लीन होना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जीवात्मा कब तक भगवान् श्रीकृष्ण को समझ नहीं पाता है और कब तक उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में पूर्णतया प्रवृत्त नहीं हो पाता है ?
जब तक जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति को पुनः प्राप्त नहीं कर लेता है ।
जब तक जीवात्मा निर्विशेष ब्रह्म तथा अंतर्यामी परमात्मा के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता है ।
जब तक जीवात्मा समस्त वैदिक साहित्य का स्वाध्ययन नहीं कर लेता है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
