Font size
Worksheets28. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_6.40–6.47
Total questions: 44
Worksheet time: 1hrs 12mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल नं0 लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।
श्लोक संख्या 6.40 में वर्णित कल्याण-कार्य से आपका क्या अभिप्राय है ?
कृष्णभावनामृत के विकास हेतु किये जाने वाले कार्य ही कल्याण-कार्य होते हैं।
इस भवबंधन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले कार्य ही कल्याण-कार्य होते हैं।
उच्चलोक अथवा स्वर्गलोक की प्राप्ति हेतु किये जाने वाले कार्य ही कल्याण-कार्य होते हैं।
अन्यों की भलाई हेतु किये जाने वाले परोपकारी कार्य ही कल्याण-कार्य होते हैं।
योगी के प्रयासों की इनमें से किस परिस्थिति में "न तो क्षति होती है और न ही पतन होता है ?"
जब योगी समस्त भौतिक इच्छाओं को त्यागकर भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर लेता है।
जब योगी मृगछाला पर बैठकर योगसाधना के अभ्यास में निरत रहने का प्रयास करता है।
जब योगी अपने नियत कर्मों को त्यागकर, सांसारिक मोह-माया से दूर एकान्त स्थान में जाकर योगाभ्यास करता है।
जब योगी ज्ञानयोग की साधना में असफल होकर पुनः भौतिक भोग में लिप्त हो जाता है।
कृष्णभावनामृत में उन्नति के लिए एक योगी को निम्न में से क्या करना होता है ?
भौतिक कार्यकलापों - भौतिक भोग की इच्छाओं, आसक्तियों, आकर्षणों का परित्याग करना होता है।
भौतिक कार्यकलापों - नियत कर्मों, स्वधर्मों, परिवारजनों का परित्याग करना होता है।
भौतिक कार्यकलापों - पुण्य कर्मों, परोपकारी कर्मों, धार्मिक अनुष्ठानों का परित्याग करना होता है।
भौतिक कार्यकलापों - वैदिक शास्त्रों के विधि विधानों के पालन, ज्ञान, योग, तपस्या का परित्याग करना है।
यदि मैं इस जन्म में स्वधर्म का आचरण अथवा दिव्य कार्यों को ठीक ढंग से नहीं कर पाता हूँ तो क्या होगा ?
फलतः मुझे निम्न योनियों में जन्म लेना होगा, परन्तु अब तक क्रियान्वित कृष्णभावनामृत विस्मृत नहीं होगा।
फलतः मुझे उच्च योनियों में जन्म लेना होगा, परन्तु अब तक क्रियान्वित कृष्णभावनामृत विस्मृत नहीं होगा।
फलतः मुझे मनुष्य योनी में जन्म लेना मिलेगा, परन्तु अब तक क्रियान्वित कृष्णभावनामृत विस्मृत नहीं होगा।
इन तीनों में से कुछ भी घटित हो सकता है।
संस्कृत, शिक्षित, शक्तिशाली, सत्तासीन व्यक्तियों को मानवता के अनियमित वर्ग में वर्गिकृत्त करने का मुख्य कारण क्या है ?
इन लोगों में भी पाश्विक जीवन जीने की वृत्तियों का होना।
इन लोगों में भी वैदिक विधि-विधानों के प्रति अनुशासनहीनता का होना।
इन लोगों में भी जीवन के प्रति अनुशासनहीनता का होना।
इन लोगों में भी स्वधर्म, नियत कर्म आदि के प्रति निष्ठा का आभाव होना।
निम्नलिखित में से किसे सकामकर्मी तथा निष्कामकर्मी श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है ?
भौतिक सम्पन्नता का भोग करने वाले शास्त्रीय विधि-विधानों के अनुयायी।
इस संसार से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्नशील लोग।
कृष्णभावनामृत के भक्त।
इन तीनों को ही सकामकर्मी तथा निष्कामकर्मी श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।
शुभ कार्य किसे कहते हैं ?
कृष्णभावनामृत के लिए किये जाने वाले कार्य ही शुभ कार्य कहलाते हैं।
शास्त्र सम्मत धार्मिक अनुष्ठान ही शुभ कार्य कहलाते हैं।
परोपकार हेतु किये जाने वाले कार्य ही शुभ कार्य कहलाते हैं।
स्वहित के लिए किये जाने वाले कार्य ही शुभ कार्य कहलाते हैं।
अष्टाँगयोग पद्धति कल्याणप्रद होती है। सिद्ध करें।
अष्टाँगयोग पद्धति योगी को कृष्णभावनामृत की चरम सीमा तक ले जाती है।
अष्टाँगयोग पद्धति का अनुशीलन करने से योगी योगासनों में निपुण हो जाता है।
अष्टाँगयोग पद्धति का अनुशीलन करने से योगी पूर्ण ब्रह्मवादी हो जाता है।
अष्टाँगयोग पद्धति का अनुशीलन करने से योगी पूर्ण परमात्मावादी हो जाता है।
निम्न में से कौन से योगी को पवित्रत्माओं के लोक भेजा जाता है ?
ऐसा असफल योगी जो अल्पकालिक योगाभ्यास करने के बाद भ्रष्ट हो जाता है।
ऐसा असफल योगी जो दीर्घकाल तक योगाभ्यास करने के बाद भ्रष्ट हो जाता है।
ऐसा योगी जो सदैव कृष्णभावनामृत के दिव्य कार्यों में ही निरत रहता है।
भौतिक देह से मुक्ति के उपरान्त सभी योगियों के लिए पवित्रत्माओं का लोक ही परम गन्तव्य होता है।
अल्पकाल तक योगाभ्यास में लगे रहने के बाद भौतिक आकर्षण के कारण पथभ्रष्ट हुए योगी को मृत्यु के बाद स्वर्गलोक में क्यों भेजा जाता है ?
भौतिक भोग की इच्छाओं की पूर्ति एवं उनके उन्मूलन हेतु।
योगाभ्यास के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु।
देवताओं की संगति में योगाभ्यास करने के लिए।
आपार भौतिक भोग के साथ - साथ योगाभ्यास करने के लिए।
असफल योगी को दीर्घकाल तक स्वर्गलोक में भोग करने के उपरान्त पुनः इस लोक में किसी सदाचारी ब्राह्मण वैष्णव या धनवान् वणिक के कुल में जन्म क्यों मिलता है ?
ताकि योगी को पूर्व योगाभ्यास से आगे योगाभ्यास करने के लिए भक्ति के अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध हो सकें।
स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आने वाले जीव को उच्च कुल में ही जन्म मिलता है, निम्नकुल में नहीं।
योगी की भोग की इच्छा को समाप्त करने के लिए उसे क्रमशः उच्चकुल से निम्नकुल में गिराया जाता है।
यह सभी कथन सत्य हैं।
अध्यवसायी से आपका क्या अभिप्राय है ?
दृढ़संकल्पी
सामर्थ्यहीन
संकल्पहीन
श्रद्धाहीन
निम्न में से अति बुद्धिमान् योगियों के कुल में कौन जन्म लेता है ?
ऐसा असफल योगी जो अल्पकालिक योगाभ्यास करने के बाद भ्रष्ट हो जाता है।
ऐसा असफल योगी जो दीर्घकाल तक योगाभ्यास करने के बाद भ्रष्ट हो जाता है।
ऐसा योगी जो सदैव कृष्णभावनामृत के दिव्य कार्यों में ही निरत रहता है।
भौतिक देह से मुक्ति के उपरान्त सभी योगियों के लिए पवित्रत्माओं का लोक ही परम गन्तव्य होता है।
दीर्घकाल तक योग करने के उपरान्त असफल रहे योगी को अति बुद्धिमान योगियों के कुल जन्म क्यों मिलता है ?
ताकि ऐसे योगी को मनुष्य जीवन के प्रारम्भ से ही आध्यात्मिक प्रोत्साहन प्राप्त हो सके।
क्योंकि ऐसे कुल अत्यन्त विद्वान् होते हैं और परम्परा तथा प्रशिक्षण के कारण श्रद्धावान होते हैं।
इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ होता है। क्योंकि बाल्यावस्था से ही उसे भक्ति के अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं।
यह सभी कथन सत्य हैं।
वास्तव में, अति बुद्धिमान् योगियों के कुल में जन्म लेने का क्या औचित्य है ?
ऐसे कुल में जन्म लेने वाला योगी गुरु परम्परा में गुरु बनकर अन्य पतित जीवात्माओं का उद्धार करता है।
ऐसे कुल में जन्म लेने के लिए योगी अनेकानेक वर्षों तक घोर तपस्या करते हैं, ताकि वे विश्व विख्यात हो सकें।
ऐसे कुल में जन्म के फलस्वरूप योगी सिद्धहस्थ होकर सारे विश्व में अपनी सत्ता स्थापित कर सकता है।
यह सभी कथन सत्य हैं।
श्लोक संख्या 6.42 में श्रील प्रभुपाद जी ने किसका उदाहरण दिया है ?
विष्णुपाद श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा स्वयँ श्रील प्रभुपाद जी
विष्णुपाद श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी
विष्णुपाद श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा श्री नरोत्तम दास ठाकुर जी
विष्णुपाद श्री श्रीमद्भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी जी
योगसाधना से पथभ्रष्ट व्यक्ति जब अपनी दैवी चेतना को पुनः प्राप्त कर लेता है तो वास्तव में वह क्या करता है ?
वह पूर्ण सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से आगे उन्नति करने का प्रयास करता है ।
वह अपने बहुत से अनुयायी बनाने के उद्देश्य से आगे उन्नति के लिए प्रयास करता है ।
वह विविध प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करने के उद्देश्य से आगे उन्नति करने का प्रयास करता है ।
वह उस दैवी चेतना से समाज में मान-प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयास करता है ।
भक्तिमार्ग से च्युत होकर पुनः कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने का सुप्रसिद्ध उदाहरण किसका है ?
भरत महाराज
प्रहलाद महाराज
ध्रुव महाराज
परिक्षित महाराज
क्या जो एक बार भक्तिमार्ग से च्युत हो जाता है उसे पुनः भक्ति करने के सुअवसर प्राप्त होते हैं ?
हाँ, भगवत्कृपा से उसे कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के बारम्बार सुयोग प्राप्त होते हैं ।
नहीं, भक्तिमार्ग से एक बार च्युत होने का अर्थ है, हमेशा के लिए पतन हो जाना ।
हाँ, भगवत्कृपा से उसे कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने का एक अवसर पुनः मिलता है ।
नहीं, भक्तिमार्ग को पुनः अपनाने का सुयोग सभी को प्राप्त नहीं होता है ।
जड़ भरत ने किस राजा के साथ शास्त्रार्थ किया था ?
रहूगण
राहु केतु
राहुगण
शिवगण
योगी न चाहते हुए भी स्वत: योग के नियमों की ओर आकर्षित हो जाता है । इस आकर्षण का मूल कारण क्या है ?
पूर्वजन्म में विकसित उसकी दैवी चेतना ।
विविध सिद्धियों को प्राप्त करने की इच्छा ।
योग द्वारा आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने की इच्छा ।
योग द्वारा समाज में स्वयँ को शीर्ष पर प्रतिष्ठित करने की इच्छा ।
कलियुग के अधिकांश व्यक्ति शास्त्रों के अनुष्ठानों का ढोंग समझ कर तिरस्कार करते हैं । तो क्या यह सभी व्यक्ति पूर्वजन्म के योगी हैं ?
नहीं, वास्तविक योगी शास्त्रों के अनुष्ठानों से कर्मबंधन के ज्ञान के कारण दूर रहता है । परन्तु वह इनका सदैव सम्मान करता है ।
हाँ, हम सभी कलियुग वासी पूर्वजन्म में योगी थे, क्योंकि हमें शास्त्र सम्मत समस्त अनुष्ठान ढोंग प्रतीत होते हैं ।
नहीं, यह कथन सर्वथा मिथ्या है क्योंकि कलियुग में समस्त मनुष्यों को जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुएँ एवं सुविधाएँ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने पर ही प्राप्त होती हैं ।
हाँ, कलियुग में मनुष्य अन्य युगों की अपेक्षा अत्याधिक आधुनिक है । अतः हमें जीवन निर्वाह के लिए ऐसे किसी भी अनुष्ठान की कोई आवश्यकता नहीं होती है ।
चाण्डाल परिवार में ही क्यों न उत्पन्न हुआ हो, यदि व्यक्ति ने भगवान् के पवित्र नाम के जप द्वारा आध्यात्मिक जीवन में अत्याधिक प्रगति प्राप्त कर ली हो, तो शास्त्रों के निर्देशानुसार ऐसा व्यक्ति क्या-क्या प्राप्त किया हुआ माना जाता है ?
ऐसा व्यक्ति सभी प्रकार के तप और यज्ञ कर चुका होता है ।
ऐसा व्यक्ति समस्त तीर्थस्थानों में स्नान कर चुका होता है ।
ऐसा व्यक्ति समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर चुका होता है ।
यह सभी कथन सत्य है ।
यदि कोई व्यक्ति "हरे कृष्ण महामंत्र" का जप तो कर रहा है, परन्तु ध्यानपूर्वक नहीं कर पा रहा है । तो ऐसे व्यक्ति को किस अवस्था में समझा जाता है ?
भौतिक कल्मषों से युक्त ।
भौतिक कल्मषों से मुक्त ।
पूर्णतया शुद्ध हृदय ।
पूर्णतया अशुद्ध हृदय ।
हममें से अधिकांश व्यक्तियों को कृष्णभावनामृत के नियमों को पूर्ण रूप से अंगीकार करने में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है । ऐसा क्यों ? - निम्न में से उपयुक्त विकल्प चुनें ।
व्यक्ति के हृदय में जितना अधिक भौतिक कल्मष होता है, उसे इन नियमों को अंगीकार करने में उतना ही अधिक संघर्ष करना पड़ता है ।
क्योंकि हम कृष्णभावनामृत के इन नियमों की प्रमाणिकता को नहीं समझ पाते और इनकी तुलना भौतिक जीवन से करने की गलती कर बैठते हैं ।
परिपक्व श्रद्धा एवं निष्ठा के अभाव के कारण हम कृष्णभावनामृत के नियमों के प्रभाव का सही आकलन नहीं कर पाते ।
क्योंकि हम कृष्णभावनामृत की इस परम पद्धति को मन की शांति प्राप्त करने के लिए विपषणा की एक सामान्य पद्धति की भांति क्रियान्वित करते हैं ।
व्यक्ति समस्त भौतिक कल्मषों से मुक्त होने पर निम्न में से किस अवस्था को प्राप्त होता है ?
पूर्ण कृष्णभावनामृत
पूर्ण कृष्णभावना
पूर्ण कृष्णसद्भावना
पूर्ण कृष्णकामना
सकामकर्मों से संबंधित योग पद्धति क्या कहलाती है ?
कर्मयोग
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
चिंतन एवं मनन से संबंधित योग पद्धति क्या कहलाती है ?
कर्मयोग
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
भगवान् की भक्ति से संबंधित योग पद्धति क्या कहलाती है ?
कर्मयोग
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
समस्त योगपद्धतियों की परिणति क्या है ?
कर्मयोग
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त करने की योग पद्धति कौन सी है ?
कर्मयोग
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
आत्मज्ञान के बिना तपस्या ............ है ।
अपूर्ण
पूर्ण
कैसे हो सकती
नहीं हो सकती
भजते या भजन्ति शब्द व्यवहारतः किसके लिए प्रयुक्त होता है ?
श्रीभगवान्
ब्रह्मा जी
शिव जी
देवतागण
वर्शिप या पूजन शब्द व्यवहारतः किसके लिए प्रयुक्त होता है ?
श्रीभगवान्
देवतागणों
ब्रह्मचारियों
गृहस्थों
जीव का अपनी स्वाभाविक स्थिति से पतन का मुख्य कारण क्या है
भगवान् की सेवा न करना ।
भगवान् की अवहेलना करना ।
भगवान् से ईर्ष्या करना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
"अन्य समस्त योग पद्धतियाँ भक्तियोग में भक्ति तक पहुंचने के साधन मात्र है ।" ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
जब कर्मयोग में ज्ञान तथा वैराग्य की वृद्धि होती है तो यह अवस्था ज्ञानयोग कहलाती है ।
जब ज्ञानयोग में अनेक भौतिक विधियों के मंथन द्वारा परमात्मा में ध्यान की वृद्धि होने लगती है उनमें मन का निवेश होने लगता है तो इसे अष्टाँगयोग कहते हैं ।
अष्टाँगयोग को पार करने पर जब मनुष्य श्रीभगवान् कृष्ण के निकट पहुँचता है तो यह भक्तियोग कहलाता है ।
यह सभी कथन अन्य समस्त योग पद्धतियों के भक्तियोग में भक्ति तक पहुँचने के साधन होने की प्रामाणिकता को स्पष्ट करते हैं ।
भक्तों के लिए अन्य योगपद्धतियों का विश्लेषण क्यों आवश्यक है ?
भक्तियोग की प्रामाणिकता, सार्थकता एवं श्रेष्ठता को जानने के लिए ।
अन्य समस्त योग पद्धतियों का तुलनात्मक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ।
अन्य समस्त योग पद्धतियों के विविध लक्ष्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण के रंग की तुलना निम्न में से किससे की जा सकती है ?
बरसने को तैयार बादल से ।
साफ़ आकाश में तैरते बादलों से ।
आकाश की नीलिमा से ।
झील के स्वच्छ पानी में आकाश के प्रतिबिंब से ।
वैदिक ज्ञान का संपूर्ण तात्पर्य कौन से महात्माओं के हृदय में स्वतः ही प्रकाशित हो जाता है ?
जिन महात्माओं के हृदय में श्रीभगवान् तथा गुरु के प्रति परम श्रद्धा होती है ।
जो महात्मा परम श्रद्धा के साथ संपूर्ण वैदिक साहित्य का अध्ययन करते हैं ।
जो महात्मा अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए वैदिक साहित्य का अध्ययन करते हैं ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
परम संसिद्धिमयी अवस्था भक्ति का क्या अर्थ है ?
श्रीभगवान् की नैष्कर्म्यम् सेवा ।
श्रीभगवान् की सकर्म्यम् सेवा ।
श्रीभगवान् से आनंद लाभ हेतु सेवा ।
श्रीभगवान् से ज्ञान प्राप्ति हेतु सेवा ।
