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Worksheets19. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_4.30–4.40
Total questions: 49
Worksheet time: 1hrs 28mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल न0 लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।
इस भौतिक जगत् में हमारे भौतिक अस्तित्व का मूल कारण क्या है ?
हमारे आत्मस्वरूप के प्रति हमारी अनभिज्ञता ।
हमारे द्वारा अज्ञानता के कारण पापपूर्ण जीवन व्यतीत किया जाना ।
हमारे पाप पूर्ण जीवन के बहुगुणित कर्मफल ।
ये सभी विकल्प उचित हैं ।
इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि चक्र रूपी भौतिक बंधन से मुक्ति का द्वार क्या है ?
मनुष्य जीवन ही एकमात्र द्वार है ।
देवता रूपी जीवन ही एकमात्र द्वार है ।
ब्रह्मा रूपी जीवन ही एकमात्र द्वार है ।
पशु जीवन ही एकमात्र द्वार है ।
वेद मनुष्य के जीवन में निम्न में से क्या भूमिका निभाते हैं ?
वेदों से धर्म विषयक ज्ञान प्राप्त होता है, जो स्वतः मनुष्यों की आर्थिक समस्याओं का समाधान करता है ।
वेदों में इन्द्रियतृप्ति के लिए पवित्र विवाह का विधान है ।
वेद सम्मत इन्द्रियतृप्ति के विधानों द्वारा मनुष्य मोक्ष का अधिकारी बनता है ।
ये सभी विकल्प सही हैं।
मुक्त जीवन की पूर्णता निम्न में से किस में है ?
परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त करने में है ।
इन्द्रियतृप्ति द्वारा चरम आनंद प्राप्त करने में है ।
स्वर्गलोकों को प्राप्त करने में है ।
निराकार ब्रह्मज्योति में तादात्म्य प्राप्त करने में है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ सुख कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
सर्वश्रेष्ठ सुख कृष्णभावनामृत के अभ्यास द्वारा वैकुण्ठ जाकर प्राप्त किया जा सकता है ।
सर्वश्रेष्ठ सुख मायावाद के द्वारा ब्रह्मज्योति में विलीन होकर प्राप्त किया जा सकता है ।
सर्वश्रेष्ठ सुख विशिष्ट यज्ञों के द्वारा स्वर्गलोकों में जाकर प्राप्त किया जा सकता है ।
सर्वश्रेष्ठ सुख केवल इस भौतिक जगत् में इन्द्रियतृप्ति के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है ।
वेदों में कर्ताभेद के अनुसार यज्ञों के विधान का मूल कारण क्या है ?
जीवों का देहात्मबुद्धि के वशीभूत होना ।
जीवों का नियत कर्मों से विपथिकरण न हो ।
जीवों को नियमित इन्द्रियतृप्ति के साथ मोक्ष के अवसर उपलब्ध करवाना ।
ये सभी विकल्प सही हैं ।
वेदसम्मत यज्ञों का चरम लक्ष्य क्या है ?
जीवों को आत्मा तथा भगवान् विषयक वास्तविक ज्ञान में स्थापित कर, भौतिक बंधनों से मुक्त करवाना ।
जीवों को विशिष्ट भौतिक उपाधियों से अलंकृत्त करना ।
जीवों को स्वर्गलोक उपलब्ध करवाकर इन्द्रियतृप्ति के विशिष्ट अवसर प्रदान करना ।
जीवों के लिए इस भौतिक संसार में जीवन यापन हेतु संघर्ष को सुगम बनाना ।
द्रव्ययज्ञ इनमें से किन परिस्थितियों में भौतिक स्तर पर नहीं होता है ?
जब यज्ञ कर्ता की श्रद्धा सकाम कर्मों के स्तर पर हो ।
जब यज्ञ कर्ता की श्रद्धा परोपकारपूर्ण कर्मों के स्तर पर हो ।
जब यज्ञ कर्ता की श्रद्धा पुण्य कर्मों के स्तर पर हो ।
जब यज्ञ कर्ता की श्रद्धा निष्काम भाव के स्तर पर हो ।
"यथार्थ ज्ञान का अन्त कृष्णभावनामृत में होता है, जो दिव्य ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है ।" श्रील प्रभुपाद जी के इस कथन से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट करें ।
यह कि समस्त प्रकार के यज्ञों के फलों की सर्वोच्चता दिव्य ज्ञान है । और दिव्य ज्ञान का वास्तविक स्वरूप कृष्णभावनामृत को प्राप्त करना है ।
यह कि समस्त प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठान से ज्ञान प्राप्त होता है और वह ज्ञान कृष्णभावनामृत में शून्य हो जाता है । अर्थात् यज्ञ निरर्थक होते हैं ।
यह कि समस्त प्रकार के यज्ञों का वास्तविक स्वरूप या ज्ञान जीवों को भौतिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करना होता है । परंतु कृष्णभावनामृत यज्ञ फल को समाप्त कर यज्ञ के वास्तविक प्रयोजन का पराभव कर देता है ।
यह कि समस्त यज्ञ प्रयोजन विहीन होते हैं इसीलिए उनकी यथार्थ ज्ञान का अंत कृष्णभावनामृत में हो जाता है ।
ज्ञान की उन्नति के बिना यज्ञ मात्र भौतिक कर्म बना रहता है । ऐसे में यज्ञ को आध्यात्मिक स्तर पर ले जाने के लिए क्या करना होता है ?
प्रत्येक प्रकार के यज्ञ को कृष्णभावनाभावित कर्म के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा के लिए ही क्रियान्वित करना होता है ।
प्रत्येक प्रकार के यज्ञ को अपने परिवार जनों के हित के लिए क्रियान्वित करना होता है ।
प्रत्येक प्रकार के यज्ञ को अपने राष्ट्र के हित के लिए ही क्रियान्वित करना होता है ।
प्रत्येक प्रकार के यज्ञ को देव समाज के हित के लिए ही क्रियान्वित करना होता है ।
चेतनाभेद के कारण यज्ञकर्म कभी कभी कर्मकाण्ड कहलाते हैं और कभी ज्ञानकाण्ड । ऐसा क्यों ?
हमारे समस्त कर्म हमारी चेतना के अनुसार क्रियान्वित होते हैं । अतः यदि हमारी चेतना सकाम कर्ममय हो तो यज्ञ कर्मकाण्ड कहलाता है और यदि हमारी चेतना निष्काम भावनाभावित हो तो यज्ञकर्म ज्ञानकाण्ड कहलाता है ।
हमारे समस्त कर्म हमारी चेतना के अनुसार क्रियान्वित होते हैं । अतः यदि हमारी चेतना निष्काम भावनाभावित हो तो यज्ञ कर्मकाण्ड कहलाता है और यदि हमारी चेतना सकाम कर्ममय हो तो यज्ञकर्म ज्ञानकाण्ड कहलाता है ।
हमारे समस्त कर्म हमारी चेतना के अनुसार क्रियान्वित होते हैं । अतः यदि हमारी चेतना अकर्ममय हो तो यज्ञ कर्मकाण्ड कहलाता है और यदि हमारी चेतना विकर्ममय हो तो यज्ञकर्म ज्ञानकाण्ड कहलाता है ।
हमारे समस्त कर्म हमारी चेतना के अनुसार क्रियान्वित होते हैं । अतः यदि हमारी चेतना कृष्णभावनाभावित हो तो यज्ञ कर्मकाण्ड कहलाता है और यदि हमारी चेतना कृष्णभावनाहीन हो तो यज्ञकर्म ज्ञानकाण्ड कहलाता है ।
प्रामाणिक गुरु के विषय में इनमें से कौन सा कथन मिथ्या है ?
प्रामाणिक गुरु वही होता है जो केवल भगवान् श्रीकृष्ण से प्रारंभ हुई गुरु-परंपरा का शिष्य होता है ।
प्रामाणिक गुरु वही होता है जो केवल भगवान् श्रीकृष्ण से प्रारंभ हुई गुरु-परंपरा के सिद्धांतों का पालन करता है ।
प्रामाणिक गुरु वही होता है जो भगवान् श्रीकृष्ण के संदेश को यथारूप अपने शिष्यों को प्रदान कर सकता है ।
प्रामाणिक गुरु वही होता है जो भगवान् श्रीकृष्ण के समतुल्य होता है और उन्हीं की भांति निर्दोष उपदेश कर सकता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के आदेशानुसार व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति के लिए निम्न में से क्या नहीं करना चाहिए ?
ज्ञान-प्राप्ति के लिए व्यक्ति को प्रामाणिक गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए ।
ज्ञान-प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपने गुरु को पूर्ण समर्पण करके स्वीकार करना चाहिए ।
ज्ञान-प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अहंकाररहित होकर अपने गुरु की दास के रूप में सेवा करनी चाहिए ।
ज्ञान-प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपने गुरु से तार्किक भाव में प्रश्न करने चाहिए ।
एक शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति इनमें से किस बात पर निर्भर करती है ?
स्वरूपसिद्ध गुरु की प्रसन्नता पर
स्वरूपसिद्ध गुरु के शिष्टाचार पर
स्वरूपसिद्ध गुरु के सदविचार पर
स्वरूपसिद्ध गुरु के ज्ञान पर
प्रामाणिक गुरु से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक शिष्य में इनमें से कौन से दो मुख्य घटक हैं, जो अनिवार्यतः होने चाहिएँ ?
जिज्ञासा और विनीत भाव
प्रतिभा और समर्पण भाव
योग्यता और जिज्ञासा भाव
निश्छलता एवं समर्पण भाव
एक शिष्य के लिए विनीत भाव तथा सेवा भाव का संयोग कितना महत्वपूर्ण है ?
बिना इस संयोग के एक शिष्य की स्वरूपसिद्ध गुरु से समस्त जिज्ञासाएँ प्रभावहीन होती हैं ।
बिना इस संयोग के भी एक शिष्य अपने स्वरूपसिद्ध गुरु से जिज्ञासाएँ कर त्वरित आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है ।
बिना इस संयोग के भी एक शिष्य अपने स्वरूपसिद्ध गुरु की चापलूसी कर उनकी कृपा प्राप्त कर सकता है ।
बिना इस संयोग के भी एक शिष्य अपने स्वरूप सिद्ध गुरु के समतुल्य स्थान प्राप्त कर सकता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.34 में भगवान् श्रीकृष्ण ने इनमें से किसकी भर्त्सना की है ?
अन्धानुगमन तथा निरर्थक जिज्ञासा
सकाम कर्म तथा निष्काम कर्म
प्रामाणिक गुरु तथा शिष्य
प्रामाणिक गुरु-परम्परा तथा ज्ञान
प्रामाणिक गुरु तथा शिष्य के मध्य ज्ञान और जिज्ञासा के विनिमय की पूर्णता के लिए क्या आवश्यक होता है ?
शिष्य में विनीत भाव और त्वरित सेवा भाव का होना ।
शिष्य में प्रतिभा और त्वरित समर्पण भाव का होना ।
शिष्य में योग्यता और त्वरित जिज्ञासा भाव का होना ।
शिष्य में निश्छलता एवं त्वरित विनीत भाव का होना ।
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति से ज्ञान प्राप्त करने का क्या परिणाम होता है ?
व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि सारे जीव भगवान् श्रीकृष्ण के भिन्न अंश हैं ।
व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि जीव की भौतिक जगत् में क्या जीवन शैली होनी चाहिए ।
व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि जीव को इंद्रियतृप्ति की शैली में परिवर्तन करना होता है ।
व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि आत्मसाक्षात्कार का मार्ग अत्यंत कठिन है ।
कृष्ण से पृथक् अस्तित्व का भाव माया (मा-नहीं, या-यह) कहलाती है । ऐसा क्यों है ? स्पष्ट करें ।
कृष्ण तथा कृष्ण की कृपा के बिना जीव का अस्तित्व असंभव है, फिर भी जीव का अपनी इंद्रियों की तुष्टि हेतु अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के विचार से मोहित होना, माया कहलाती है ।
भगवान् श्रीकृष्ण की बहिरंगा शक्ति है जो जीवों को उनके पृथक् अस्तित्व के लिए मोहित करती है, माया कहलाती है ।
माया जीवों को अपने अधीनस्थ रखने के लिए उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण से पृथक् अस्तित्व का विचार देकर उनसे अलग करने वाली शक्ति माया कहलाती है ।
जो समझ में न आए, वही माया कहलाती है ।
सामान्यतः लोग कृष्ण को क्या मानते हैं ?
एक महान् ऐतिहासिक पुरुष ।
एक असाधारण ग्वाला ।
एक छद्म अवतारी पुरुष ।
भगवान् का सर्वोच्च व्यक्तित्व ।
मायावादी मानते हैं कि कृष्ण अपने अनेक अंशों में अपने निजी पृथक् अस्तित्व को मिटा देते हैं अर्थात् परब्रह्म निराकार है ।, ऐसा क्यों ?
क्योंकि मायावादी व्यक्ति कृष्ण की तुलना भौतिक पदार्थ से करता है अतः भौतिक पदार्थों के विखंडन उपरांत मूलस्वरूप नष्ट होने के अपने अनुभवों के कारण ऐसा मानता है ।
क्योंकि मायावादी व्यक्ति आध्यात्मिक गणित से सदैव भिज्ञ होता है ।
क्योंकि मायावादी व्यक्ति वैष्णव दर्शन का अंधानुगमन और निरर्थक जिज्ञासा करता है।
क्योंकि मायावादी व्यक्ति कृष्ण की प्रकृति से भलीभांति परिचित होते हैं अतः वह उनके वास्तविक स्वरूप को स्पष्टतः जानते हैं ।
निम्न में से आध्यात्मिक गणित (जो परब्रह्म के स्वरूप को स्पष्ट करता है) को पहचानने में हमारा सहयोग करें ।
1 + 1 = 1, 1 - 1 = 1
1 + 1 = 11, 1 - 1 = 10
1 + 1 = 2, 1 - 1 = 0
1 + 1 = 1, 1 - 1 = 0
जीवों का अस्तित्व किस के निमित्त है ?
जीवों का अस्तित्व केवल कृष्ण को प्रसन्न करने के निमित्त है ।
जीवों का अस्तित्व केवल माया को प्रसन्न करने के निमित्त है ।
जीवों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रसन्न करने के निमित्त है ।
जीवों का अस्तित्व केवल स्वयँ की प्रसन्नता के निमित्त है ।
परब्रह्म के भिन्न अंश के रूप में जीवों का क्या कर्तव्य होता है ?
विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति करना ।
अपने निजी अस्तित्व की खोज करना ।
अपने निजी उद्देश्यों की पूर्ति करना ।
नए-नए ब्रह्मांडों की खोज करना ।
इस भौतिक जगत् में हम समस्त जीवों का अनादिकाल से मानव, पशु, देवता आदि देहों में आवागमन का मूल कारण क्या है ?
भगवान् की दिव्य सेवा का विस्मरण ।
भगवान् के प्रति प्रेम की अथाह पिपासा ।
भगवान् की अत्यधिक चापलूसी करना।
भगवान् की अत्यधिक सेवा करना ।
जीवों का माया के चंगुल से मुक्त होकर, आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लेने का दिव्य एवं सरल मार्ग क्या है ?
कृष्णभावनामृत के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में लग जाना ।
अपने विशेष भौतिक प्रयोजन के लिए माया की चापलूसी छोड़कर कृष्ण की चापलूसी में लग जाना ।
माया के रहस्यों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर उसे नियंत्रित करने की विद्या के द्वारा ।
माया की विशिष्ट सेवा के द्वारा उसे प्रसन्न करना।
इनमें से कौन सा कथन पूर्ण ज्ञान को प्रदर्शित नहीं करता है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जीवों के परम आश्रय हैं ।
यह कि इस आश्रय को त्याग देने पर जीव माया द्वारा मोहित होते हैं ।
यह कि जीव माया के कारण अपना अस्तित्व को भगवान् श्रीकृष्ण से पृथक् मानने लगते हैं ।
यह कि जीव भगवान् के अभिन्न अंश होते हैं, जीवों का अस्तित्व भगवान् से सदैव स्वतंत्र होता है ।
मुक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है ?
मुक्ति का वास्तविक अर्थ है - कृष्ण के नित्य दास के रूप में (कृष्णभावनामृत में) अपनी स्वाभाविक स्थिति पर स्थापित होना ।
मुक्ति का वास्तविक अर्थ है कृष्ण के समान वैभव को प्राप्त करना - अर्थात् सार्ष्टि मुक्ति ।
मुक्ति का वास्तविक अर्थ है कृष्ण के स्वरूप को प्राप्त करना - अर्थात् सारूप्य मुक्ति ।
मुक्ति का वास्तविक अर्थ है निराकार परब्रह्म में विलीन हो जाना - अर्थात् सायुज्य मुक्ति ।
यदि हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, दुर्योधन इत्यादि सभी पापियों को समय रहते भगवान् श्री कृष्ण के साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति का बोध हो जाता । तो क्या यह सब भगवद्धाम चले जाते ?
हाँ, क्योंकि समस्त जीवों को भगवद्धाम जाने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण के साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति का दिव्य ज्ञान होना अति आवश्यक है ।
हाँ, क्योंकि पापी से पापी मनुष्य का अंतिम आश्रय स्थल भगवद्धाम ही होता है ।
नहीं, क्योंकि पापी मनुष्य का शुद्धिकरण उसकी स्वाभाविक स्थिति के दिव्य ज्ञान से नहीं होता है ।
नहीं, क्योंकि पापी मनुष्य कभी भी भगवद्धाम जाकर दासत्व स्वीकार करने की इच्छा नहीं करते, वह तो केवल इस भौतिक जगत् में प्रभुत्व तथा इंद्रिय तृप्ति की ही इच्छा करते हैं ।
कृष्णभावनामृत की नाव अत्यंत ............. है किंतु उसी के साथ साथ अत्यंत .............. भी ।
सुगम, उदात्त
सुलभ, उदात्त
सुलभ, दुर्लभ
सुगम, दुर्लभ
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.36 में इस भौतिक जगत् की तुलना किससे की गई है ?
अज्ञान सागर तथा जलते हुए जंगल से ।
कुशल तैराक तथा जीवन के संघर्ष से ।
रक्षक तथा भक्षक से ।
सुलभ तथा दुर्लभ से ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.37 में किस ज्ञान की तुलना अग्नि से की गई है ?
आत्मा-परमात्मा तथा उनके संबंध के पूर्ण ज्ञान की ।
आत्मा-आत्मा तथा उनके संबंध के पूर्ण ज्ञान की ।
स्थाई आत्मा- अस्थाई आत्मा तथा उनके संबंध के पूर्ण ज्ञान की ।
आत्मा- भौतिक देह तथा उनके संबंध के पूर्ण ज्ञान की ।
यह अग्नि न केवल समस्त पापकर्मों को जला देती है, अपितु पुण्यकर्मों के फलों को भी भस्मसात् करने वाली है । पुण्य कर्मफल भस्मसात् क्यों होते हैं ?
क्योंकि पुण्य कर्मफल भी इस भौतिक जगत् में बंधन का कारण होते हैं ।
क्योंकि पुण्य कर्मफल पाप कर्मफलों के साथ होते हैं इसलिए भस्मसात् हो जाते हैं ।
क्योंकि पुण्य कर्मफलों को भस्मसात् करने से जीव की भौतिक इच्छाएँ भी समाप्त हो जाती हैं ।
पुण्य कर्मफल तो सदैव जीव को मुक्ति की ओर ले जाते हैं अतः उन्हें भस्मसात् करना उचित नहीं है ।
जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है, वह ..................... अपने अंतर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है ।
यथासमय
यथावत्
यथारूप
यथासामर्थ्य
अज्ञान हमारे ............... का कारण है, और ज्ञान हमारी ............. का ।
बंधन, मुक्ति
पापकर्मों, आसक्ति
पुण्यकर्मों, इंद्रियतृप्ति
लक्ष्य, दृष्टि
वास्तव में ज्ञान क्या है ?
भक्ति का परिपक्व फल
भक्ति का उच्छिष्ट
भक्ति का बाह्य स्वरूप
भक्ति का अंतः करण
क्या एक भक्त को शान्ति प्राप्त करने के लिए अन्यत्र कोई उपाय करना होता है ?
नहीं, क्योंकि दिव्यज्ञान में स्थापित भक्त मन ही मन शान्ति का आनंद लेता रहता है ।
नहीं, क्योंकि भक्त प्रारंभ से ही शांति के लिए प्रयासरत रहता है ।
हाँ, एक भक्त को शान्ति प्राप्ति के लिए भक्ति के साथ-साथ अष्टाँगयोग के द्वारा अपने मन तथा इंद्रियों का निग्रह करना होता है ।
हाँ, एक भक्त को शान्ति प्राप्ति के लिए भक्ति के साथ-साथ हठयोग के द्वारा अपने मन तथा इंद्रियों का निग्रह करना होता है ।
निम्न में से आध्यात्मिक शान्ति को प्राप्त करने की योग्यता क्या नहीं है ?
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा ।
दिव्य ज्ञान के प्रति समर्पण ।
इन्द्रियों का वश में होना ।
यह सभी विकल्प अनुचित हैं ।
वह पुरुष क्या कहलाता है जो यह सोचता है कि कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करने से वह परमसिद्धि को प्राप्त कर सकता है ?
श्रद्धावान
अश्रद्धालु
शठ-पुरुष
दार्शनिक
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा प्राप्त करने का क्या उपाय है ?
यह श्रद्धा भक्ति तथा हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।। - मंत्र के जाप द्वारा प्राप्त की जाती है ।
यह श्रद्धा भक्ति तथा हरे कृष्ण कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।। - मंत्र के जाप द्वारा प्राप्त की जाती है ।
यह श्रद्धा भक्ति तथा हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम राम हरे राम राम हरे हरे ।। - मंत्र के जाप द्वारा प्राप्त की जाती है ।
यह श्रद्धा भक्ति तथा हरे कृष्ण हरे राम कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे कृष्ण राम राम हरे हरे ।। - मंत्र के जाप द्वारा प्राप्त की जाती है ।
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा की आवश्यकता को इनमें से कौन सा कथन प्रदर्शित नहीं करता है ?
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा, हमारे हृदय की सारी भौतिक मालिनता को दूर करती है ।
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा, हमारी भौतिक इंद्रियों के निग्रह में सहायक सिद्ध होती है ।
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा से आध्यात्मिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त होता है ।
दिव्य ज्ञान के प्रति श्रद्धा से जीवों की भौतिक आसक्तियाँ बढ़ती हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.40 के तात्पर्य में भगवद्भावनामृत प्राप्त करने के लिए अयोग्य व्यक्तियों का वर्गीकरण किया गया है । निम्न में से कौन से व्यक्ति अयोग्य नहीं है ?
जो लोग पशुतुल्य हैं उनमें न तो प्रामाणिक शास्त्रों के प्रति कोई श्रद्धा है और न उनका ज्ञान होता है ।
यद्यपि कुछ लोगों को प्रामाणिक शास्त्रों का ज्ञान होता है और उनमें से वे उद्धरण देते रहते हैं, किंतु उनमें वास्तविक विश्वास नहीं करते ।
कुछ लोगों को भगवद्गीता जैसे प्रामाणिक शास्त्रों में श्रद्धा होती है फिर भी वे न तो भगवान् कृष्ण में विश्वास करते हैं, न ही उनकी पूजा करते हैं ।
कुछ लोगों को प्रामाणिक शास्त्रों में पूर्ण श्रद्धा होती है उनका ज्ञान भी होता है और वह भगवान् श्री कृष्ण की परम स्थिति से भी भलीभांति भिज्ञ होते हैं ।
निम्न में से कौन सा व्यक्ति कृष्णभावनाभावित हो सकता है ?
जिसकी प्रामाणिक शास्त्रों में कोई श्रद्धा नहीं है ।
जो भगवान् तथा भगवान् के दिव्य ज्ञान के प्रति सदैव संशयग्रस्त रहता है ।
जो आध्यात्मिक मार्ग पर तनिक भी उन्नति नहीं कर पाता है ।
जिसे यह श्रद्धा है कि कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करने से वह परमसिद्धि प्राप्त कर सकता है ।
भगवद्भावनामृत में सफलता प्राप्त करने के लिए निम्न में से कौन सा सूत्र सक्षम नहीं है ?
मनुष्य को चाहिए कि वह श्रद्धाभाव से शास्त्रों के सिद्धांतों का पालन करे और ज्ञान प्राप्त करे ।
दिव्य ज्ञान से ही मनुष्य आध्यात्मिक अनुभूति के दिव्य पद तक हो सकता है ।
मनुष्य को चाहिए कि प्रामाणिक गुरु-परम्परा के महान् आचार्यों के पदचिन्हों का अनुसरण करे ।
मनुष्य को चाहिए कि वह है प्रमाणिक शास्त्रों के स्वतन्त्र अध्ययन द्वारा दिव्य ज्ञान में स्थापित होने का प्रयास करे ।
