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16. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.42–4.11

Total questions: 49

Worksheet time: 2hrs 32mins

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Class
Date
1.

कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।

4 lines
2.

कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।

4 lines
3.

कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल न0 लिखें ।

4 lines
4.

कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।

4 lines
5.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.7 में श्रील प्रभुपाद जी के द्वारा सृजामि शब्द की व्याख्या करना क्यों महत्वपूर्ण है ?

a)

यह स्पष्ट करने के लिए कि श्रीकृष्ण का शरीर अपनी माता के गर्भ से भौतिक पञ्चमहाभूतों द्वारा निर्मित होकर प्रकट होता है ।

b)

यह स्पष्ट करने के लिए कि श्रीकृष्ण हमारी तरह साधारण मनुष्य नहीं अपितु अलौकिक शक्ति के दिव्य अवतार हैं ।

c)

यह स्पष्ट करने के लिए कि श्रीकृष्ण के शरीर की सृष्टि भौतिक पञ्चमहाभूतों से नहीं होती, अपितु वह अपने दिव्य एवं शाश्वत रूप में प्रकट होते हैं ।

d)

यह स्पष्ट करने के लिए कि श्रीकृष्ण के शरीर की सृष्टि दिव्य एवं आध्यात्मिक तत्वों द्वारा होती है, न कि भौतिक पंचमहाभूतों के द्वारा ।

6.

क्या भगवान् श्रीकृष्ण का ब्रह्मा जी के प्रत्येक दिन के सातवें मनवंतर के 28वें चतुर्युग के द्वापर के अंत में प्रकट होना पूर्व निर्धारित है ?

a)

हाँ, परन्तु भगवान् इस नियम के पालन के लिए बाध्य नहीं हैं क्योंकि श्लोक संख्या 4.7 में भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है तथा अधर्म की प्रधानता होती है, तब-तब वह अवतार लेते हैं ।

b)

नहीं, क्योंकि भगवान् ऐसे किसी नियम के पालन के लिए बाध्य नहीं हैं क्योंकि श्लोक संख्या 4.7 में भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है तथा अधर्म की प्रधानता होती है, तब-तब वह अवतार लेते हैं ।

c)

हाँ, परन्तु भगवान् समयानुसार नियमों में परिवर्तन करते रहते हैं अतः श्लोक संख्या 4.7 में भगवान् इसकी पुष्टि करते हैं कि जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है तथा अधर्म की प्रधानता होती है, तब-तब वह अवतार लेते हैं ।

d)

नहीं, क्योंकि भगवान् समयानुसार नियमों में परिवर्तन करते रहते हैं अतः श्लोक संख्या 4.7 में भगवान् इसकी पुष्टि करते हैं कि जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है तथा अधर्म की प्रधानता होती है, तब-तब वह अवतार लेते हैं ।

7.

कृपया “धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्राणीतम्” का अर्थ समझाएँ ।

a)

यह कि धर्म के नियम भगवान् के प्रत्यक्ष आदेश हैं ।

b)

यह कि भगवान् का धर्म है जीवों को आदेश देना ।

c)

यह कि धर्म भी साक्षात् भगवान् का सेवक है ।

d)

यह कि धर्म भी साक्षात् भगवान् को प्रणिपात करता है ।

8.

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण आद्योपान्त (Thorough) अपने उपदेशों के माध्यम से किसके पालन का आदेश देते हैं ?

a)

धर्म के नियमों के पालन का ।

b)

अर्जुन को क्षत्रिय धर्म के पालन का ।

c)

जीवों को नियत कर्मों के पालन का ।

d)

क्षत्रिय को ब्राह्मण धर्म के पालन का ।

9.

गीता के अन्त में भगवान् श्री कृष्ण क्या आदेश देते हैं ?

a)

यह कि हम जीवों का सर्वोच्च धर्म है उनकी शरण ग्रहण करना ।

b)

यह कि हम जीवों का सर्वोच्च धर्म है उनके समतुल्य (Equivalent) बनना ।

c)

यह कि हम जीवों का सर्वोच्च धर्म है उनकी सृष्टि का सम्मान करना ।

d)

यह कि हम जीवों का सर्वोच्च धर्म है उनके समकक्ष अपना साम्राज्य स्थापित करना ।

10.

भगवान् बुद्ध का अवतार क्यों हुआ ?

a)

वैदिक नियमों के दुरुपयोग को रोकने के लिए वेदों का खंडन और अहिंसा के वैदिक नियमों की पुन: स्थापना करने लिए ।

b)

वेदों के वर्चस्व (Predominance) को बचाने और उनकी पुनर्स्थापना के लिए ।

c)

वैदिक नियमों के पालन हेतु सामान्य जीवों में रूचि जागृत करने के लिए ।

d)

वेदों की संरचना में परिवर्तन करने हेतु और सामान्य जीवों को उनके समयोचित (Timeous) क्रियान्वन का प्रशिक्षण देने के लिए ।

11.

भगवान् के प्रत्येक अवतार का मुख्य उद्देश्य क्या होता है ?

a)

सामान्य लोगों को ईशभावनाभावित करना तथा धार्मिक नियमों के प्रति आज्ञाकारी बनाना ।

b)

सामान्य लोगों को उनकी समझानुसार तथा कालोचित (Timeous) धर्म का ज्ञान देने के लिए ।

c)

सामान्य लोगों को धर्म की विशेषताओं के बारे में ज्ञान देने के लिए ।

d)

सामान्य लोगों को धर्म के नियमों के पालन के प्रति आकर्षित करने के लिए ।

12.

भगवान् प्रत्येक अवतार में एक जैसे सिद्धांतों की शिक्षा देते हैं, जो कि सदैव एक ही स्तर पर होते हैं परन्तु फिर भी वह हमें उच्च या निम्न प्रतीत होते हैं । ऐसा क्यों ?

a)

ऐसा प्रकृति के तीनों गुणों के द्वारा निर्मित हमारी प्रकृति के कारण होता है ।

b)

ऐसा ज्ञान को ग्रहण करने की हमारी परिवर्तनशील क्षमता के कारण होता है ।

c)

ऐसा हमारी इन्द्रिय भोग में निरंतर संलिप्तता के कारण होता है ।

d)

ऐसा काल के द्वारा निरंतर परिवर्तनशील परिस्थितियों के कारण होता है ।

13.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.8 के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण के प्रकट होने का कारण इनमें से कौन सा नहीं है ?

a)

भक्तों का उद्धार करने के लिए ।

b)

दुष्टों का विनाश करने के लिए ।

c)

धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए ।

d)

अपनी भगवत्ता (Supremacy) को प्रदर्शित करने के लिए ।

14.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.8 में दुष्कृताम् शब्द किन व्यक्तियों लिए प्रयुक्त हुआ है ?

a)

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में तनिक भी रुचि नहीं रखते हैं ।

b)

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में रुचि रखते हैं ।

c)

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में थोड़ा सा अग्रसर होने के उपरांत किसी कारणवश उसे त्याग देते हैं ।

d)

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत ने अल्प प्रगति ही कर पाते हैं ।

15.

यदि कोई व्यक्ति विद्वान् या सुसंस्कृत न भी हो, परन्तु वह पूर्णतः कृष्णभावनामृत में निमग्न हो, तो क्या ऐसे व्यक्ति को हम साधु पुरुष मान सकते हैं ?

a)

हाँ, क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार प्रत्येक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति चाहे वह अधार्मिक ही क्यों ना हो, उसे प्रत्येक परिस्थिति में साधु ही समझना चाहिए ।

b)

नहीं, कृष्णभावनामृत किसी भी प्रकार के भौतिक या आध्यात्मिक ज्ञान पर निर्भर नहीं होता है, क्योंकि कृष्णभावनामृत के अनुशीलन से जीव के हृदय में वास्तविक ज्ञान स्वतः प्रकट होता है ।

c)

हाँ, क्योंकि विद्वत्ता के बिना कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करना अत्यंत दुर्लभ है ।

d)

नहीं, कृष्णभावनामृत भक्ति की एक दिव्य सरल एवं स्वतंत्र विधि है यह किसी भी परिस्थिति में ज्ञान के पराधीन

नहीं होती है।

16.

क्या केवल दुष्टों अर्थात् अनीश्वरवादियों (Atheist) के विनाश के लिए भगवान् का अवतरित होना आवश्यक होता है ?

a)

नहीं, क्योंकि इस कार्य को संपन्न करने के लिए भगवान् के पास असंख्य सक्षम अनुचर (Follower) है ।

b)

हाँ, क्योंकि भगवान् को दुष्टों अर्थात् अनीश्वरवादियों का विनाश करने में अत्यंत आनंद प्राप्त होता है ।

c)

हाँ, क्योंकि केवलमात्र स्वयं भगवान् ही दुष्टों अर्थात् अनीश्वरवादियों का विनाश करने में सक्षम है ।

d)

नहीं, भगवान् केवल मात्र दुष्टों अर्थात अनिसुर वादियों के विनाश हेतु ही अवतरित नहीं होते हैं अपितु उनके अवतार बहुउद्देश्य (Multipurpose) होते हैं ।

17.

चैतन्य चरितामृत के अनुसार अवतार (Incarnation)) की क्या परिभाषा होती है ?

a)

भगवान् अपने विभिन्न शाश्वत विस्तारों अथवा रूपों एवं मूल रूप में भगवद्धाम में विद्यमान् रहते हैं । विशेष परिस्थितियों में उनका अपने विशेष रूप या विस्तार में भौतिक प्राकट्य (Appearance), अवतार कहलाता है ।

b)

भगवान् का परिस्थिति एवं प्रयोजनानुसार विशेष भौतिक शरीर में प्रादुर्भाव अवतार कहलाता है ।

c)

किसी विशेष प्रयोजन हेतु भगवान् के अनुचरों का भौतिक प्राकट्य भगवान् का अवतार कहलाता है ।

d)

भगवान् का केवल भौतिक पशु योनियों में भौतिक प्राकट्य ही अवतार कहलाता है ।

18.

अवतार कई तरह के होते हैं यथा पुरुषावतार, गुणावतार, लीलावतार, शक्तयावेश अवतार मन्वन्तर अवतार तथा युगावतार । इन सभी अवतारों से श्रीकृष्ण का क्या संबंध है ?

a)

आदि भगवान् श्रीकृष्ण इन समस्त अवतारों के उद्गम (Origin) हैं, अतएव वैदिक शास्त्र उन्हें अवतार नहीं अपितु अवतारी कहते हैं ।

b)

यह समस्त अवतार आदि भगवान् श्रीकृष्ण के अधीन हैं और उनके आज्ञापालक हैं ।

c)

यह समस्त अवतार भगवान् के समतुल्य एवं समकक्ष हैं अतएव भगवान् श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं ।

d)

यह समस्त अवतार भगवान् की अनंत शक्ति के परिचायक (Indicative) हैं ।

19.

श्रीकृष्ण अवतार का मूल उद्देश्य क्या है ?

a)

अपनी मूल वृंदावन लीलाओं के द्वारा अपने निष्काम भक्तों को प्रसन्न करना ।

b)

अपनी मूल वृंदावन लीलाओं के द्वारा अपने सकाम भक्तों को प्रसन्न करना ।

c)

अपनी मूल वृंदावन लीलाओं के द्वारा अपनी भगवत्ता का प्रचार प्रसार करना ।

d)

अपनी मूल वृंदावन लीलाओं के द्वारा सामान्यजनों का मनोरंजन करना ।

20.

कलियुग में भगवान् श्रीकृष्ण अपने किस युगावतार के रूप में प्रकट होते हैं ?

a)

भगवान् चैतन्य महाप्रभु

b)

भगवान् कल्कि

c)

भगवान् बुद्ध

d)

भगवान् शंकराचार्य

21.

भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अपने अवतारावधि (Period of Incarnation)) में क्या भविष्यवाणी की है ?

a)

यह कि हरिनाम संकीर्तन का सारे विश्व के नगर-नगर तथा ग्राम-ग्राम में प्रचार होगा ।

b)

यह कि इस भौतिक ब्रह्माण्ड के समस्त जीव वर्तमान देह को त्यागने के उपरान्त भगवद्धाम वापिस जाएंगे ।

c)

यह कि हरिनाम संकीर्तन के फलस्वरूप मनुष्य समाज में शाँति तथा समन्वय की व्यवस्था पुनः स्थापित होगी ।

d)

यह कि हरिनाम संकीर्तन ही कलियुग का युग धर्म होगा ।

22.

भगवान् श्रीकृष्ण के चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार की, इनमें से कौन सी विशेषता नहीं है ?

a)

औदार्य भाव - भगवान् अपने इस अवतार में दुष्टों का विनाश नहीं करते, अपितु अपनी अहैतुकी कृपा से उनका उद्धार करते हैं ।

b)

भक्ति भाव - भगवान् अपने इस अवतार के माध्यम से हरिनाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार करके भक्ति करना सिखाते हैं ।

c)

भक्तवत्सल भाव - भगवान् अपने इस अवतार के माध्यम से अपने भक्तों को अपना प्रेम प्रदान करके उनका उद्धार करते हैं ।

d)

रूद्र भाव - भगवान् अपने इस अवतार के माध्यम से दुष्टों का विनाश करके हरिनाम की पुनः स्थापना करते हैं ।

23.

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.9 में भगवान् श्रीकृष्ण सर्वोच्च सिद्धि अर्थात् भगवत्प्रेम प्राप्त कर भगवद्धाम वापस जाने की क्या विधि बताते हैं ?

a)

भगवान् श्रीकृष्ण के आविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति का ज्ञान होना ।

b)

भगवान् श्रीकृष्ण की अनंत शक्तियों का ज्ञान होना ।

c)

भगवान् श्री कृष्ण के आविर्भाव तथा कर्मों की अनन्त प्रकृति का ज्ञान होना।

d)

भगवान् श्रीकृष्ण के भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् का संपूर्ण ज्ञान होना ।

24.

निर्विशेषवादी तथा योगीजन पर्याप्त कष्ट तथा अनेकानेक जन्मों के बाद सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । सायुज्य मुक्ति सर्वोच्च सिद्धि की तुलना में अपूर्ण क्यों होती है ?

a)

क्योंकि यह आंशिक होती है और इस भौतिक संसार में पुनः लौट आने का भय बना रहता है ।

b)

क्योंकि सायुज्य मुक्ति में जीव सक्रिय अवस्था में रहता है । फलतः उसका इस भौतिक जगत् में पुनः पतन हो जाता है ।

c)

क्योंकि सायुज्य मुक्ति प्राप्त करके, जीव इस भवबंधन से स्थाई मुक्ति प्राप्त करता है ।

d)

क्योंकि सायुज्य मुक्ति जीव को भगवद्धाम में स्थापित करती है ।

25.

ब्रह्म संहिता के श्लोक संख्या 5.33 में "अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपम" क्या स्थापित करता है ?

a)

यह कि भगवान् के अनेक दिव्य रूप तथा अवतार हैं, किन्तु फिर भी वह अद्वय (One and the same) भगवान् हैं ।

b)

यह कि भगवान् के अनेक दिव्य रूप तथा अवतार हैं, किन्तु फिर भी वह सर्वशक्तिमान् भगवान् हैं ।

c)

यह कि भगवान् के अनेक दिव्य रूप तथा अवतार हैं, किन्तु फिर भी वह एकनिष्ठ भगवान् हैं ।

d)

यह कि भगवान् के अनेक दिव्य रूप तथा अवतार हैं, किन्तु फिर भी वह अगम्य (Incomprehensible) भगवान् हैं ।

26.

संसारी विद्वानों तथा ज्ञानयोगियों के लिए भगवान् तथा उनके अवतार अगम्य (Incomprehensible) में क्यों हैं ?

a)

क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपने शुष्क चिंतन के द्वारा सृजित मनोधर्म के माध्यम से ही भगवान् को समझने का प्रयत्न करते हैं ।

b)

क्योंकि ऐसे व्यक्ति भगवान् के स्वरूप तथा उनके अवतारों में तनिक भी विश्वास नहीं करते हैं ।

c)

क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपने मनोधर्म के अहंकार के कारण भगवद्भक्तों से भगवान् के स्वरूप तथा उनके अवतारों के विषय में समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं ।

d)

ऐसे व्यक्तियों को अहंकारवश अपनी विद्वत्ता के सामने बाकी सब कुछ गौण (Secondary) लगता है ।

27.

"एक भगवान् अपने निष्काम भक्तों के साथ अनेकानेक दिव्य रूपों में सदैव संबंधित हैं ।" इस कथन से आप क्या समझते हैं स्पष्ट करें ?

a)

जो इस सत्य को वेद तथा भगवान् के प्रमाण के आधार पर स्वीकार करता है, वह मुक्ति की चरम सिद्धि को प्राप्त करता है ।

b)

जो इस सत्य को शुष्क चिंतन से उत्पन्न मनोधर्म के आधार पर स्वीकार नहीं करता है, वह मुक्ति की चरम सिद्धि (Highest perfection) को प्राप्त करता है ।

c)

जो इस सत्य को अस्वीकार करता है वह सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है ।

d)

किसी भी प्रकार के मुक्ति लाभ को प्राप्त करने के लिए इस सत्य को जानना अत्यंत आवश्यक है ।

28.

इनमें से कौन सी मुक्ति की चरम सिद्धि नहीं है ?

a)

भगवत्प्रेम प्राप्ति ।

b)

भगवद्धाम प्राप्ति ।

c)

भगवद् पदाश्रय की प्राप्ति ।

d)

सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति ।

29.

भगवान् श्रीकृष्ण को जान लेने मात्र से जो मुक्ति की चरम सिद्धि प्राप्त होती है । क्या उसे प्राप्त करने का कोई अन्य विकल्प भी उपलब्ध है ?

a)

नहीं, इसका कोई विकल्प नहीं है ।

b)

हाँ, मनोधर्म ही इसका विकल्प है ।

c)

हाँ, योग साधना भी इसका विकल्प है ।

d)

नहीं, ऐसे चरम सिद्धि प्राप्त नहीं होती है ।

30.

अभिमानी संसारी विद्वानों को भगवद्भक्ति में रत होने के लिए किसकी प्रतीक्षा करनी पड़ती है ?

a)

भगवद्भक्त की अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।

b)

विधि द्वारा निर्धारित समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।

c)

भगवान् श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष कृपा की प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।

d)

भगवान् की अंतरंगा शक्ति माया की प्रत्यक्ष कृपा की प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।

31.

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 4.9 के अनुसार सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का वास्तविक उपाय क्या है ?

a)

श्रद्धा तथा ज्ञान के साथ कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करना ।

b)

श्रद्धा तथा ज्ञान के साथ शुष्क मानसिक चिंतन करना ।

c)

श्रद्धा तथा ज्ञान के साथ भौतिक समाज की सेवा करना ।

d)

श्रद्धा तथा ज्ञान के साथ भगवद्भक्तों की आलोचना (Criticize) करना ।

32.

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 4.10 में भगवान् श्रीकृष्ण ने जिन व्यक्तियों द्वारा जीवन की सर्वोच्च सिद्धि की प्राप्ति पर चर्चा की है । निम्न में से वह कौन से व्यक्ति हैं ?

a)

पूर्णतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति

b)

पूर्णतः कृष्णभावनाहीन व्यक्ति

c)

पूर्णतः शुष्क दार्शनिक व्यक्ति

d)

पूर्णतः ज्ञानी तथा योगी

33.

भौतिकतावादी व्यक्तियों के लिए परम सत्य के स्वरूप को समझ पाना अत्यंत कठिन होता है । निम्नलिखित कारणों में से कौन सा इसका कारण नहीं है ?

a)

देहात्मबुद्धि जन्य यह विश्वास कि परमात्मा व्यक्ति नहीं हो सकता है ।

b)

देहात्मबुद्धि जन्य यह विश्वास कि ऐसा दिव्य शरीर जो नित्य तथा सच्चिदानन्दमय हो, नहीं हो सकता है ।

c)

देहात्मबुद्धि जन्य यह विश्वास कि भगवान् का शरीर भी नाशवान् होता है ।

d)

देहात्मबुद्धि जन्य यह विश्वास कि भगवान् सच्चिदानन्द विग्रह होते हैं ।

34.

भौतिकतावादी व्यक्तियों द्वारा परम सत्य को शून्य मानने का इनमें से कौन सा कारण नहीं है ?

a)

भौतिकतावादी व्यक्ति विराट भौतिक जगत् के स्वरूप को ही परम तत्व मानते हैं ।

b)

भौतिकतावादी व्यक्ति भौतिक पदार्थ से मुक्ति के बाद भी अपना स्वरूप बनाए रखने के विचार से डरते हैं ।

c)

भौतिकतावादी व्यक्ति दार्शनिक चिंतन की विविध विसंगतियों से परेशान होकर मूर्खतावश यह निष्कर्ष निकालते हैं कि परम कारण जैसा कुछ नहीं होता अतः प्रत्येक वस्तु अन्ततोगत्वा (Ultimately) शून्य होती है ।

d)

भौतिकतावादी व्यक्ति परम सत्य के विषय में यह जानते हैं कि परम सत्य का स्वरूप साकार, दिव्य एवं सच्चिदानन्दमय होता है ।

35.

"निराकार शून्य में तदाकार होना (To be merge)" भौतिकतावादियों की इस विचार को श्रील प्रभुपाद जी ने किस उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया है ?

a)

समुद्र के बुलबुलों से

b)

समुद्र के ऊपर बरसात के बादलों से

c)

समुद्र के ऊपर हवा के झोंकों से

d)

समुद्र में उठने वाले ज्वार भाटा से

36.

पृथक् व्यक्तित्व से रहित आध्यात्मिक जीवन की चरम सिद्धि क्या है ?

a)

सायुज्य मुक्ति

b)

सारुप्य मुक्ति

c)

सालोक्य मुक्ति

d)

सामीप्य मुक्ति

37.

मनुष्य को भौतिक जगत् के प्रति आसक्ति की अवस्थाओं में से "आध्यात्मिक साकार रूप का भय" का इनमें से कौन सा लक्ष्ण नहीं है ?

a)

आध्यात्मिक जगत् में भगवान् श्रीकृष्ण के दास के रूप में अवस्थित होने का भय ।

b)

आध्यात्मिक जगत् में भी कर्मशील जीवन यापन करने का भय ।

c)

आध्यात्मिक जीवन में इंद्रियभोग के अवसर प्राप्त न होने का भय ।

d)

आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करने की दृढ़ संकल्प एवं निष्ठा ।

38.

मनुष्य को भौतिक जगत् के प्रति आसक्ति की अवस्थाओं से छुटकारा पाने के लिए क्या करना चाहिए ?

a)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की शरण ग्रहण कर, भक्तिमय जीवन के नियम तथा विधि-विधानों का पालन करना चाहिए ।

b)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में नियमित इंद्रियभोग कर, अपने जीवन को इंद्रियतृप्ति की कामनाओं से मुक्त करवाना चाहिए ।

c)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भौतिक नियमों एवं विधि-विधानों का पालन कर आपने बहुत ही के जीवन को सुखमय एवं शान्तिमय बनाना चाहिए ।

d)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की शरण ग्रहण कर भगवान् से भौतिक सुख-सुविधा सम्पन्न जीवन के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।

39.

इनमें से भक्ति की नौ अवस्थाओं को सही क्रम में पहचानें ।

a)

श्रद्धा - भक्तों का संग - भजन क्रिया - अनर्थ निवृत्ति - निष्ठा - रूचि - आसक्ति - भाव – भगवत्प्रेम

b)

श्रद्धा - भक्तों का संग - भजन क्रिया - अनर्थ निवृत्ति - रूचि - निष्ठा - आसक्ति - भाव – भगवत्प्रेम

c)

श्रद्धा - भक्तों का संग - अनर्थ निवृत्ति - भजन क्रिया - रूचि - निष्ठा - आसक्ति - भाव – भगवत्प्रेम

d)

श्रद्धा - भक्तों का संग - भजन क्रिया - अनर्थ निवृत्ति - निष्ठा - आसक्ति - रूचि - भाव – भगवत्प्रेम

40.

जीवन की क्या सार्थकता है ?

a)

ईश्वर के प्रति प्रेम

b)

ईश्वर के प्रति ईर्ष्या

c)

ईश्वर के प्रति घृणा

d)

ईश्वर के प्रति मोह

41.

भगवान् श्रीकृष्ण के उपदेशानुसार हमें आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होने के लिए क्या करना होगा ?

a)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भक्ति की मंद विधि के सतत अभ्यास द्वारा सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करना होगा ।

b)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में नियमित इंद्रियभोग कर, अपने जीवन को इंद्रियतृप्ति की कामनाओं से मुक्त करवाना होगा ।

c)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भौतिक नियमों एवं विधि-विधानों का पालन कर आपने बहुत ही के जीवन को सुखमय एवं शान्तिमय बनाना होगा ।

d)

प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान् की शरण ग्रहण कर भगवान् से भौतिक सुख-सुविधा सम्पन्न जीवन के लिए प्रार्थना करनी होगा ।

42.

“जिस भाव से सारे लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ ।” भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन के आधार पर निम्नलिखित में से अशुद्ध कथन चुनें ।

a)

सकाम कर्मियों को भगवान् श्रीकृष्ण यज्ञेश्वर के रूप में उनके कर्मों के वांछित फल प्रदान करते हैं ।

b)

योग शक्ति की खोज में रत योगियों को भगवान् श्रीकृष्ण योग शक्ति प्रदान करते हैं ।

c)

निर्विशेषवादियों को भगवान् श्रीकृष्ण अपने तेज रूपी ब्रह्मज्योति (Effulgence) में लीन करके उनकी सहायता करते हैं ।

d)

धर्म के नियमों एवं विधि-विधानों की पुन: स्थापना हेतु दुष्ट और अधर्मी व्यक्तियों का भगवान् श्रीकृष्ण विनाश करते हैं ।

43.

भगवान् श्रीकृष्ण के विभिन्न स्वरूपों में अभिव्यक्ति की अनुभूति की निम्न व्याख्या में से अशुद्ध व्याख्या को पहचानें ।

a)

निर्विशेषवादी भगवान् श्रीकृष्ण को ब्रह्मज्योति के रूप में अनुभव करते हैं ।

b)

योगी भगवान् श्रीकृष्ण को प्रत्येक कण-कण में विद्यमान रहने वाले सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में अनुभव करते हैं ।

c)

भक्त भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्ण साक्षात्कार को अनुभव करते हैं ।

d)

दार्शनिक अपने शुष्क चिंतन द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण को अधोक्षज रूप में अनुभव करते हैं ।

44.

प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति का मुख्य विषय क्या है ?

a)

विभिन्न स्वरूपों में भगवान् श्रीकृष्ण

b)

आध्यात्मिक जगत् के कार्यकलाप

c)

भौतिक जगत् के विभिन्न कल्मष

d)

भौतिक जगत् में विद्यमान विषय भोग

45.

आध्यात्मिक जगत् में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के साथ विभिन्न रसों में विनिमय करते हैं निम्नलिखित में वर्णित अशुद्ध रस को पहचानें ।

a)

शांत रस

b)

साख्य रस

c)

दास्य रस

d)

दमन रस

46.

भगवान् श्रीकृष्ण का अपने भक्तों को फल प्रदान करने का मापदंड क्या है ?

a)

भक्तों के प्रेम की प्रगाढ़ता

b)

भक्तों के समर्पण की कोटी

c)

भक्तों के भाव की कोटी

d)

भक्तों के ज्ञान की कोटी (Degree)

47.

निर्विशेषवादी व्यक्ति ब्रह्मज्योति को चुनकर किस से वंचित रह जाते हैं ?

a)

भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सगुण भक्ति के आनन्द से ।

b)

भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा के बदले में मनवाँछित फल की प्राप्ति से ।

c)

आध्यात्मिक जगत् के विविध विषयभोग के आनन्द से ।

d)

भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य निर्गुण भक्ति के आनंद से ।

48.

कुछ निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति से वापस भौतिक जगत् में क्यों आ जाते हैं ?

a)

अपनी कार्य करने की सुप्त इच्छाओं को प्रदर्शित करने के लिए ।

b)

पुनः भौतिक विषयभोग का आनन्द लेने के लिए ।

c)

अपने स्वजनों तथा सम्बन्धियों से पुनः मिलने के लिए ।

d)

अपनी भौतिक संपत्तियों एवं उपाधियों को पुनः प्राप्त करने के लिए ।

49.

जब तक कोई कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धि तक नहीं पहुँच जाता, तब तक उसके सारे प्रयास ............. रहते हैं ।

a)

अपूर्ण

b)

सम्भावित

c)

निष्क्रिय

d)

सक्रिय