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Worksheets23. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_5.26–6.02
Total questions: 45
Worksheet time: 1hrs 22mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल नं0 लिखें ।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें ।
निम्न में से किस व्यक्ति की मुक्ति सुनिश्चित नहीं होती है ?
स्वरूपसिद्ध एवं आत्मसंयमी व्यक्ति ।
क्रोध तथा कामेच्छाओं में लिप्त व्यक्ति ।
संसिद्धि के लिए प्रयासरत व्यक्ति ।
अपने गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला व्यक्ति ।
संसिद्धि से आपका क्या अभिप्राय है ?
मनुष्य जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य अर्थात् भगवत्प्रेम प्राप्ति संसिद्धि कहलाती है ।
जीवात्मा की बद्धावस्था की तुलना में मुक्तावस्था संसिद्धि कहलाती है।
जीवात्मा का कृष्णभावनामृत को अंगीकार करना संसिद्धि कहलाता है ।
मनुष्य की अन्यों के प्रति दयालुता संसिद्धि कहलाती है ।
मोक्ष के लिए सतत प्रयत्नशील रहने वाले साधु पुरुषों में कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ होता है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को परमसत्य विषयक ज्ञान होता है । अतः वह परमसत्य से योग के लिए प्रत्यक्ष मार्ग अर्थात् कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने नियत कर्मों का परित्याग नहीं करता, अपितु अपने नियत कर्मों को परमसत्य से योग के लिए साधन के रूप में क्रियान्वित करता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इंद्रियभोग की इच्छाओं का कृत्रिम दमन नहीं करता, अपितु अपनी इच्छाओं को कृष्ण की तुष्टि अथवा प्रसन्नता मे अभिनिविष्ट करके, उनकी गुणवत्ता को भौतिकता से आध्यात्मिकता में परिवर्तित कर, कृष्णभावनामृत के पथ पर निरंतर अग्रसर होता है ।
यह सभी कथन कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की स्थिति को स्पष्ट करते हैं ।
जब बड़े-बड़े साधु पुरुष भी इंद्रियों के वेग को अपनी कुशलता से रोक पाने में समर्थ नहीं हो पाते, तो सकाम कर्मों की तीव्र इच्छा को कैसे समूल नष्ट कर सकते हैं ?
प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करके ।
प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में अष्टाँगयोग का अभ्यास करके ।
प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में हठयोग का अभ्यास करके ।
प्रमाणिक गुरु के निर्देशन में वेदसम्मत यज्ञादि अनुष्ठान करके ।
"आत्म-साक्षात्कार का पूर्ण ज्ञान होने से वह निरंतर समाधिस्थ रहता है ।" इस कथन से आप क्या समझते हो ? स्पष्ट करें ।
यह कि स्वरूपसिद्ध व्यक्ति का मन प्रतिक्षण कृष्ण में ही लीन रहता है ।
यह कि स्वरूपसिद्ध व्यक्ति की चेतना प्रतिक्षण कृष्णमयी रहती है ।
यह कि स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के पास भौतिकताओं में संलिप्त होने का कोई अन्य कारण शेष नहीं रह जाता है ।
यह सभी कथन उचित है ।
श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 5.26 में मछली,कछुवा तथा पक्षी का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट किया है ? कृपया बताएँ ।
यह कि भगवद्भक्त भगवद्धाम से दूर स्थित रहकर भी भगवान् का चिंतन करके कृष्णभावनामृत द्वारा उनके धाम पहुँच सकता है ।
यह कि अपने स्वजनों के पालन-पोषण के लिए अत्याधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है । उनका पालन-पोषण तो मछली, कछुए तथा पक्षी की भाँति भी किया जा सकता है ।
श्रील प्रभुपाद जी ने इस उदाहरण के माध्यम से निम्न योनियों के द्वारा अपनी-अपनी संतानों के पालन-पोषण की विशेषताओं को उद्घाटित करने का प्रयास किया है ।
यह सभी तर्क उचित हैं ।
ब्रह्मनिर्वाण अवस्था से आपका क्या अभिप्राय है ?
ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् भगवद्भक्ति में निरंतर लीन रहने के कारण भौतिक कष्टों का अनुभव न होना ।
ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् निर्विशेष ब्रह्म में तदाकार होना ।
ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् ब्रह्मातीत अवस्था को प्राप्त हो जाना ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने किस योग पद्धति के विषय में इंगित मात्र किया है ?
अष्टाँगयोग
हठयोग
कर्मयोग
भक्तियोग
एक योगी मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करने के लिए निम्न में से क्या नहीं करता है ?
समस्त इन्द्रिय विषयों को बाहर कर देता है ।
दृष्टि को भौहों के मध्य में केंद्रित कर देता है ।
प्राण तथा अपान वायु को नथुनों के भीतर रोक लेता है ।
इन समस्त विधियों का सामर्थ्यानुसार समय-समय पर अभ्यास करता रहता है ।
"कृष्णभावनामृत में रत होने पर मनुष्य तुरन्त ही अपने आध्यात्मिक स्वरूप को जान लेता है ।" ऐसा कैसे संभव है ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया मनुष्य के मन, बुद्धि एवं इन्द्रियों का स्वतः ही शुद्धिकरण एवं संयमीकरण करके, उसके आध्यात्मिक स्वरूप को उजागर कर देती है ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया में मनुष्य को सर्वप्रथम उसके आध्यात्मिक स्वरूप के विषय में ही बताया जाता है ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया में मनुष्य स्वाध्ययन द्वारा केवल अपने आध्यात्मिक स्वरूप विषयक जानकारी प्राप्त करने में ही प्रयासरत रहता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
निम्न में से कौन सी विधियाँ अष्टाँगयोग की आठ विधियों में से नहीं हैं ?
यम, नियम
आसन, ध्यान
धारणा, समाधि
प्रत्याणाम, प्राणाहार
मनुष्य कब अपने कर्म क्षेत्र में भगवान् की उपस्थिति को अनुभव करने के योग्य हो जाता है ?
जब मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वरूप को जान लेता है ।
जब मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वरूप में स्थित होकर भक्ति के द्वारा भगवान् को समझ लेता है ।
जब मनुष्य अपने मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों को इन्द्रिय विषयों से विरक्त कर लेता है ।
जब मनुष्य स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के निर्देशन में कृष्णभावनामृत को अंगीकार कर लेता है ।
प्रत्याहार विधि से इनमें से किस का निराकरण नहीं होता है ।
शब्द
स्पर्श
स्वरूप
गंध
अष्टाँगयोग पद्धति में अधखुली पलकों का क्या महत्त्व है ?
ताकि योगी को न तो नींद आने की संभावना रहे और न ही इन्द्रियविषयों की ओर आकृष्ट होने का भय रहे ।
ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि योग साधना में बैठा व्यक्ति जीवित है ।
ताकि योग साधना समाप्त होने के उपरांत भी उसकी दृष्टि शक्ति यथावत् बनी रहे ।
ताकि योगी दिन के समय रात्रि का और रात्रि के समय दिन का स्पष्ट अनुभव कर सके ।
निम्न में से कौन सी विधि सर्वोत्तम है ?
कृष्णभावनामृत
अष्टाँगयोग
हठयोग
ज्ञानयोग
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 5.29 में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा वर्णित शान्ति के सूत्र का निम्न में से कौन सा अवयव नहीं है ?
यह ज्ञान कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं के परम भोक्ता हैं ।
यह ज्ञान कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त लोकों तथा देवताओं के परमेश्वर हैं ।
यह ज्ञान कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवों के उपकारी एवं हितैषी हैं ।
यह ज्ञान कि भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त बद्धजीवों के कर्मों के परम कर्ता हैं ।
हम सभी जीवात्माएँ इस भौतिक जगत् में सर्वत्र अपना-अपना प्रभुत्व जताने में असफल क्यों रहते हैं ?
इस भौतिक जगत् में सर्वत्र भगवान् की माया का प्रभुत्व होने के कारण ।
हम सभी जीवात्माओं में एकता के अभाव के कारण ।
हम सभी जीवात्माओं का रहस्यमयी ढंग से कार्य करना ।
हम सभी जीवात्माओं की एक दूसरे के ऊपर प्रभुत्व जताने की प्रवृत्ति ।
1. "जब तक कोई इन तथ्यों को समझ नहीं लेता तब तक इस संसार में व्यष्टि या समष्टि रूप से शान्ति प्राप्त करना संभव नहीं है ।" इस कथन में किन तथ्यों के विषय में कहा गया है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण ही परम भोक्ता हैं ।
यह कि जीव भगवान् श्रीकृष्ण के नित्य दास हैं ।
यह कि जीव अपनी कामेच्छाओं की पूर्ति के लिए माया के अधीन कार्य करते हैं ।
यह सभी तथ्य उचित हैं ।
कृष्णभावनाभावित कर्म करने से आपका क्या अभिप्राय है ?
भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्णज्ञान के साथ निष्काम भाव से कर्म करना ।
भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्णज्ञान के साथ सकाम भाव से कर्म करना ।
भगवान् श्रीकृष्ण की उपस्थिति में ही उनके लिए निष्काम भाव से कर्म करना ।
कर्मफल की इच्छा के रहित कर्म करना ।
साधक के आध्यात्मिक जीवन में ज्ञानयोग का क्या महत्त्व है ?
ज्ञानयोग से भक्तियोग प्राप्त होता है ।
ज्ञानयोग से हठयोग प्राप्त होता है ।
ज्ञानयोग से कर्मयोग प्राप्त होता है ।
ज्ञानयोग से धर्मयोग प्राप्त होता है ।
हम जीवात्माओं का इस भौतिक जगत् में कष्टों का मूल कारण क्या है ?
माया पर प्रभुत्व जताने की हमारी इच्छा के कारण माया के संपर्क में आना ।
माया द्वारा इस भौतिक जगत् का प्रबंधन एवं संचालन ।
माया द्वारा हम बद्धजीवों को पाप कर्मों में प्रवृत्त होने के लिए विवश करना ।
यह सभी तर्क उचित हैं ।
निम्नलिखित में से कौन सी विशेषता कृष्णभावनामृत की नहीं है ?
कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया जीव को भौतिक पदार्थ की परिधि में स्थित होते हुए ही आध्यात्मिक जीवन में स्थापित कर देती है ।
कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया जीव को भौतिक जगत् में ही भक्ति का अभ्यास करवाकर, उसके दिव्य स्वरुप को पुनः प्रकट कर देती है ।
कृष्णभावनामृत जीव का भगवान् श्रीकृष्ण के साथ पुनः योग करवाने के लिए प्रामाणिक प्रक्रिया है ।
कृष्णभावनामृत की प्रक्रिया की पूर्णावस्था से भी जीव के पतन की संभावना बनी रहती है ।
व्यक्ति की कृष्णभावनामृत में प्रगति निम्न में से किस पर निर्भर करती है ?
उसकी व्यक्तिगत व्यवहारिक कर्तव्यपालन पर ।
प्रामाणिक गुरु के प्रति उसके समर्पण पर ।
कृष्णभावनामृत ने उसकी व्यष्टि श्रद्धा पर ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
क्या भगवान् जीवों में पक्षपात करते हैं ?
हाँ, अन्यथा किसी को दुख तथा किसी को सुख क्यों प्राप्त होते हैं ।
नहीं, सुख-दुख हमारे पूर्व व्यक्तिगत कर्मों के प्रतिफल होते हैं ।
हाँ, दोनों कथन उचित हैं ।
नहीं, दोनों कथनों में से कोई भी उचित नहीं है ।
मनुष्य इच्छा तथा क्रोध के प्रभाव का कब पराभव कर सकता है ?
जब उसकी इन्द्रियाँ उसके नियंत्रण में हों ।
जब उसका मन समस्त प्रकार के प्रस्ताव अथवा प्रलोभन देना बंद कर दे ।
जब उसकी बुद्धि निष्क्रिय हो जाए ।
जब जीवात्मा स्वयँ निष्क्रिय हो जाए ।
क्या कृष्णभावनामृत को अंगीकार करने से पूर्व अष्टाँगयोग पद्धति को संपन्न करना आवश्यक होता है ?
नहीं, क्योंकि कृष्णभावनामृत में अष्टाँगयोग पद्धति का अभ्यास स्वतः ही हो जाता है ।
हाँ, क्योंकि कृष्णभावनामृत को अंगीकार करने से पूर्व जीवात्मा का शुद्धिकरण अति आवश्यक है
नहीं, क्योंकि कृष्णभावनामृत स्वतः शुद्धिकरण की प्रक्रिया है ।
हाँ, क्योंकि अष्टाँगयोग पद्धति मन तथा इन्द्रियों को वश में करने की एकमात्र प्रामाणिक प्रक्रिया है ।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 6.1 में "वह नहीं जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है ।" भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन में "अग्नि" से क्या तात्पर्य है ?
वास्तव में, इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने अग्नि शब्द का प्रयोग "कर्मयोग की प्रक्रिया" के लिए किया है ।
वास्तव में, इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने अग्नि शब्द का प्रयोग कर्मों द्वारा जीव के शुद्धिकरण की प्रक्रिया के लिए किया है ।
वास्तव में, इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने अग्नि शब्द का प्रयोग कर्मों द्वारा भौतिक आसक्तियों से निवृत्ति के लिए किया है ।
यह सभी कथन इस श्लोक में अग्नि शब्द के महत्त्व को स्पष्ट करते हैं ।
पूर्णता की क्या कसौटी है ?
कृष्णभावनामृत में कर्म करना ।
आत्मकेन्द्रित तृप्ति हेतु स्वार्थपूर्ण कर्म करना ।
व्यापक तृप्ति हेतु स्वार्थपूर्ण कर्म करना ।
अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देना ।
निम्न में से प्रत्येक व्यक्ति का क्या परम कर्तव्य है ?
कृष्णभावनामृत में कर्म करना ।
अपने परिवार व स्वजनों के पालन-पोषण हेतु कर्म करना ।
अपने समाज के लिए कर्म करना ।
अपने राष्ट्र के लिए कर्म करना ।
निम्न में से आप किसे पूर्ण सन्यासी या पूर्ण योगी कहेंगे ?
जो जीव अपनी इन्द्रियतृप्ति हेतु नहीं, अपितु भगवान् श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर्म करता है ।
जो जीव अपनी एवं अपने परिवारजनों की इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर्म करता है ।
जो जीव अपनी समस्त संपत्ति के स्वामित्व एवं अपने नियत कर्मों का परित्याग करके एकांतवास में ध्यानयोग का अभ्यास करता है ।
जो जीव अपनी इन्द्रियतृप्ति हेतु नहीं, अपितु ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवताओं की इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर्म करता है ।
निर्विशेषवादी सन्यासियों अथवा योगियों का मुख्य स्वार्थ क्या होता है ?
निर्विशेष ब्रह्म के साथ एक हो जाना ।
अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देना ।
निर्विशेष ब्रह्म का प्रचार करना ।
यह सभी कथन निर्विशेषवादियों के स्वार्थ को दर्शाते हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय "ध्यानयोग" में भगवान् श्रीकृष्ण किस योग पद्धति की संस्तुति करते हैं ?
अष्टाँगयोग
ज्ञानयोग
हठयोग
कर्मकांड योग
निम्नलिखित तर्कों के माध्यम से अष्टाँगयोग से कर्मयोग की श्रेष्ठता को सिद्ध करें ।
कर्मयोग अर्थात् कृष्णभावनाभावित कर्म, परब्रह्म से योग की प्रत्यक्ष विधि है ।
कर्मयोग में जीवात्मा को अपनी कर्म करने की प्रवृत्ति को संतुष्ट करने का अवसर निरंतर प्राप्त होता रहता है ।
कर्मयोग में जीवात्मा अपने कर्मफल परब्रह्म को अर्पित करता है ।
यह सभी तर्क अष्टाँगयोग से कर्मयोग की श्रेष्ठता को सिद्ध करते हैं ।
निम्न में से भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु कौन सी प्रार्थना नहीं करते हैं ?
मुझे न तो धन-संग्रह करने की कामना है ।
मुझे न सुंदर स्त्रियों के साथ रमण करने की कोई अभिलाषा है ।
मुझे तो केवल अनुयायियों की कामना है ।
मुझे तो जन्म-जन्मांतर आपकी प्रेमाभक्ति की अहैतुकी कृपा की अभिलाषा है ।
निम्न में से योगी बनने की प्राथमिक योग्यता क्या है ?
अपनी इन्द्रियतृप्ति की इच्छा को त्यागना ।
नियत कर्मों का परित्याग करना ।
एकाँत स्थान में वास करना ।
निर्विशेष ब्रह्म के विषय में ज्ञान होना ।
योग का वास्तविक अर्थ क्या है ?
परब्रह्म से युक्त होना ।
पदार्थ व आत्मा को जोड़ना ।
भौतिक वस्तुओं का वर्गीकरण करना ।
निर्विशेष ब्रह्म में तादात्म्य ।
सन्यास-योग या भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है ?
जीवात्मा द्वारा अपने स्वाभाविक स्थिति को जानना और तदनुसार कर्म करना ।
नियत कर्मों का परित्याग करना ।
एकाँत स्थान में वास करना ।
निर्विशेष ब्रह्म के विषय में ज्ञान होना ।
"जीव परमेश्वर के तटस्था शक्ति है ।" तटस्था शक्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
यह कि जीव कृष्णभावनाभावित होकर अपनी सहज अवस्था में रहता है अन्यथा माया के वशीभूत होकर बद्धावस्था में रहता है ।
यह कि जीव स्वतन्त्र है वह अपनी इच्छानुसार भौतिक जगत् में अथवा आध्यात्मिक जगत् में कहीं भी रह सकता है ।
यह कि जीव उर्ध्वगति पाकर उच्च लोकों में भी जा सकता है और अधोगति को प्राप्त होकर निम्न लोकों में भी वास कर सकता है ।
यह कि जीव पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी ।
"कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सन्यासी तथा योगी साथ-साथ होता है ।" यह कैसे संभव है ? स्पष्ट करें ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपनी समस्त इन्द्रियतृप्ति की कामनाओं को त्यागने के कारण सन्यासी होता है और साथ ही साथ भगवान् की इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर्मफल की इच्छा के रहित कर्म करने के कारण योगी होता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने नियत कर्मों का परित्याग करने के कारण सन्यासी कहलाता है और साथ ही साथ अष्टाँगयोग का साधक होने के कारण योगी कहलाता है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपनी समस्त भौतिक संपत्ति के स्वामित्व को त्यागने के कारण सन्यासी कहलाता है और साथ ही साथ निर्विशेष ब्रह्म में तादात्म्य के लिए प्रयासरत होने के कारण योगी कहलाता है ।
यह सभी तर्क इस कथन की वास्तविकता को स्पष्ट करते हैं ।
ज्ञान तथा योग के व्यर्थ होने का मुख्य कारण क्या है ?
मनुष्य का स्वार्थ ।
मनुष्य की इंद्रिय तृप्ति की प्रवृत्ति ।
मनुष्य की कर्म फलों को भोगने की इच्छा ।
यह सभी मुख्य कारण हैं ।
निम्न में से किस का अभ्यास करने से जीव के सारे कार्य सुचारू रूप से संपन्न हो जाते हैं ?
कृष्णभावनामृत
अष्टाँगयोग
हठयोग
कर्मकांड योग
