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Worksheets58. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_13.14-13.20
Total questions: 40
Worksheet time: 1hrs 20mins
कृप्या यहाँ पर अपना नाम लिखे ?
कृप्या यहाँ पर अपना फ़ोन नो. लिखे ?
कृप्या यहाँ पर अपनी आयु लिखे ?
कृप्या यहाँ पर अपना पता लिखे ?
श्लोक संख्या 13.15 में परमात्मा को समस्त इंद्रियों तथा गुणों से रहित बताया गया है । क्या इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि परम सत्य निराकार और निर्गुण है ?
हाँ, क्यूँकि सगुण ईश्वर की अवधारणा आध्यात्मिक चेतना में स्थित होने के लिए शुरू में आवश्यक है किंतु बाद में तो निराकार ब्रह्म तक पहुँचना होता है
नहीं, क्यूँकि परम सत्य भौतिक इंद्रियों से रहित है किंतु उनके पास आध्यात्मिक इंद्रियाँ हैं और परम सत्य तीन भौतिक गुणो से ऊपर होकर दिव्य गुणो से युक्त है
परम सत्य निराकार और साकार दोनो है, जो भी रूप या निराकार स्वरूप को साधक मान ले वही सत्य हो जाता है
2 और 3
श्रील प्रभुपाद जी श्लोक संख्या 13.15 के तात्पर्य में समझाते हैं की कृष्ण अर्थात् परम सत्य दिव्य गुणों से युक्त हैं।इस तथ्य को स्वयं श्री कृष्ण ने कौन से श्लोक में कहा है ?
3.33
4.9
8.9
15.3
परमात्मा या श्री कृष्ण तो दिव्य इंद्रियों से युक्त हैं , क्या जीवात्मा भी दिव्य इंद्रियों से युक्त हैं ?
जी नहीं , जीवात्मा में मुक्त होने पर कोई इंद्रियाँ नहीं रहती है
जी नहीं , जीवात्मा में केवल सामान्य भौतिक जगत की इंद्रियाँ हैं
इस भौतिक जगत में तो जीवात्मा के पास केवल भौतिक इंद्रियाँ हैं किंतु भगवत् प्रेम प्राप्त करने पर जीव की इंद्रियाँ शुद्ध होने पर अपनी दिव्य स्थिति को प्राप्त हो जाती हैं
2 और 3
भगवान कृष्ण ने कौन से श्लोक में कहा है कि वह प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा रूप में भी स्थित हैं ?
9.19
11.30
13.14
15.15
श्लोक संख्या 13.16 के अनुसार परम सत्य को इंद्रियों और बुद्धि से नहीं समझा जा सकता क्यूँकि वह इनसे परे हैं ।फिर ऐसा क्यों कहा जाता है इंद्रियों को भगवान कृष्ण की सेवा करने से कृष्ण को समझा जा सकता है ?
निरंतर अभ्यास करने पर इंद्रियों से भगवान कृष्ण को समझा जा सकता है
जीव कभी भी परम सत्य भगवान को नहीं जान सकता
इंद्रियों से भगवान कृष्ण की सेवा करने से कृष्ण कृपा वश सेवक के सामने अपने को प्रकट कर देते हैं
1 और 3
श्लोक संख्या 13.16 के अनुसार परम सत्य सब जीवों के अंदर और बाहर स्थित हैं ।इस तथ्य को हम किस प्रकार समझ सकते हैं ?
परम सत्य अपने निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप में सभी जीवों के अंदर और बाहर स्थित है
परमात्मा सभी जीवों के हृदय में तथा प्रत्येक वस्तु में स्थित है
कृष्ण बाहर नित्य अपने दिव्य धाम में स्थित हैं
2 और 3
श्लोक संख्या 13.13 से 13.19 तक कृष्ण ज्ञेय के विषय में बताते हैं , किंतु इन श्लोकों के अध्ययन पर ऐसा लगता है की कृष्ण किसी और के विषय में बोल रहे हैं। फिर हम कैसे समझें कि ये ज्ञेय कृष्ण ही परमात्मा रूप में हैं ?
इन श्लोकों में कृष्ण द्वारा ज्ञान मार्ग से भक्ति मार्ग तक पहुँचने का वर्णन किया गया है और ज्ञानमार्गी साधक शुरू में परम सत्य को सगुण रूप में नहीं जानते किंतु धीरे धीरे प्रगति करने पर कृष्ण को भगवान रूप में समझते हैं|
क्यूँकि कृष्ण 13.19 श्लोक में कहते हैं कि इस ज्ञान, ज्ञेय और क्षेत्र ,क्षेत्रज्ञ को केवल उनका भक्त समझ पाएगा और इस प्रकार उन्हें प्राप्त करेगा|
ये ज्ञेय कृष्ण नहीं है , अगर कृष्ण ही परम सत्य ज्ञेय होते तो अवश्य इन श्लोकों में इस बात को अवश्य कहते|
1 और 2
भगवान कृष्ण अगर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित रहते हैं तो फिर उनका अलग से स्वरूप अलग से कैसे बना रहता है ?
कृष्ण प्रत्येक जीव के हृदय में विभक्त होकर निरकार ब्रह्म के रूप में सदैव स्थित रहते हैं
क्यूँकि कृष्ण का दिव्य स्वरूप है और इस से अनंत विस्तार होने पर भी मूल स्वरूप विद्यमान रहता है
क्यूँकि कृष्ण पूर्ण हैं और पूर्ण से पूर्ण प्रकट होने पर भी मूल पूर्ण यथावत बना रहता है
2 और 3
इस भौतिक जगत में श्री कृष्ण का दिव्य ब्रह्म ज्योति/तेज किस वस्तु से आव्रत रहता है ?
अज्ञान
महत तत्व
अंधकार
तमस्
भगवत् गीता में कृष्ण कितने प्रकार के ज्ञेय के विषय के बारे में वर्णन करते हैं ?
जीवात्मा
जीवात्मा और परमात्मा
जीवात्मा , परमात्मा और स्वयं कृष्ण
जीवात्मा, परमात्मा ,कृष्ण और निराकार ब्रह्म
क्या ज्ञान भक्ति मार्ग में सहायक है ?
नहीं, क्यूँकि भक्ति सर्वथा स्वतंत्र है
हाँ, क्यूँकि भक्ति करने का फल ही है ज्ञान प्राप्त करना
हाँ, ज्ञान साधक के ह्रदय में प्रारम्भिक अवस्था भक्ति को समझने में सहायक है
नहीं, क्यूँकि ज्ञान भक्ति करने का प्रतिफल होता है
श्लोक संख्या 13.19 के अनुसार केवल भगवान कृष्ण का भक्त ही क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को समझ सकता है। क्या कारण है की ज्ञानी, योगी और कर्मी इन सब को क्यू नहीं समझ सकते ?
क्यूँकि भगवान कृष्ण परम सत्य हैं तथा निराकार ब्रह्म और परमात्मा की अनुभूति भगवान की अनुभूति से निचले स्तर की है
क्यूँकि जीव का नित्य स्वरूप है भगवान कृष्ण का नित्य दास होना
क्योंकि भगवान कृष्ण परम सत्य हैं तथा कर्मी, ज्ञानी और योगी इस सत्य को नहीं जानते
उपरोक्त सभी
जब कोई क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को पूर्ण अनुभूति से जान जाता है तो उसका क्या फल क्या होता है ?
साधक का ज्ञान बढ़ जाता है
साधक ज्ञान से आगे भक्ति में स्थित हो जाता है
साधक कृष्ण के भाव को प्राप्त करता है
साधक कृष्ण में लीन हो जाता है
जीवात्मा और परमात्मा दोनो कृष्ण के अंश हैं , तो क्या दोनो समान हैं ?
जी हाँ, क्यूँकि कृष्ण ही परम नियंता हैं बाक़ी सब उनके दास हैं
जी नहीं, क्यूँकि जीव कृष्ण की तटस्थ शक्ति हैं तथा परमात्मा कृष्ण के स्व अंश हैं और माया के अधीन नहीं हैं
जी हाँ , क्यूँकि जीवात्मा और परमात्मा दोनो शरीर में स्थित रहते हैं
1 और 3
कौन से श्लोक में कृष्ण बताते हैं की सारी आत्माएँ उनकी नित्य अंश हैं ?
2.20
7.26
10.10
15.7
अगर आत्मा कृष्ण की अंश हैं तो फिर इस भौतिक जगत में क्यूँ कष्ट भोग रही हैं , वो वैकुंठ जगत में क्यूँ नहीं रहती ?
क्यूँकि इस जगत में सुख दुःख दोनो है और पुण्य कर्म करके आत्माएँ सुख भोग सकती हैं
क्यूँकि इस जगत की जीवात्माएँ वैकुंठ नहीं जाना चाहती और इस संसार में ही भौतिक सुख भोग करना चाहती हैं
क्यूँकि इस जगत की जीवात्माएँ अत्यंत नीच हैं और वैकुंठ जाने की अधिकारी नहीं हो सकती
2 और 3
जैसा कि गीता कहती है कि हम कृष्ण को अपनी भौतिक इंद्रियों से नहीं समझ सकते। हमारी भौतिक इंद्रियों को शुद्ध करने का अधिकृत और व्यवहारिक तरीका क्या है?
इन्द्रियों को तब तक सकारात्मक कार्यों में लगाये रखें जब तक कि वे शुद्ध न हो जाएँ
इंद्रियों की गतिविधियों को पूरी तरह से रोकने के लिए अभ्यास करें
हमेशा संसार को त्यागने की सलाह दी जाती है ताकि इंद्रियों के पास आनंद लेने के लिए कोई विकल्प न हो और अंततः शुद्ध हो जाए
इंद्रियों को भक्ति के कार्य में लगा कर कृष्णभावनाभावित होने का अभ्यास करना चाहिए
परमेश्र्वर के लिए जिस भक्त में प्रेम उपज चुका है, वह निरन्तर उनका दर्शन कर सकता है. ये वक्या किस शास्त्र से लिया गया है?
श्रीमद भागवतम
चैतन्य चरितामृत
चैतन्य भागवत
ब्रह्मसंहिता
भौतिक संसार में रहते हुए ईश्वर को देखने और साक्षात्कार करने के लिए निम्नलिखित में से कौन सी विधि युगों से स्वीकार की जा रही है?
समाज के कल्याण में स्वयं को संलग्न करने की प्रक्रिया से, लोगों ने आसानी से भगवान का साक्षात्कार किया है
पदार्थ और आत्मा के बीच अंतर का गहराई से अध्ययन और विश्लेषण करके, लोगों ने आसानी से भगवान का साक्षात्कार किया है
भक्ति की प्रक्रिया में खुद को लगा कर, लोगों ने कृष्ण का साक्षात्कार किया है और सफलतापूर्वक भगवतधाम लौट गए
जैसा कि कई आध्यात्मिक संगठन सिखाते हैं, आंतरिक शांति ही वास्तविक ईश्वर प्राप्ति है। मैं उनके दर्शन का समर्थन करता हूं और स्वीकार करता हूं कि आपको आंतरिक रूप से संतुष्ट होना होगा और यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है
भगवान् सभी के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं. यह एक बहुत ही चौंकाने वाला बयान लगता है। क्या इसका मतलब यह है कि वह लाखों और खरबों में विभाजित है?
हाँ बिल्कुल। कथन स्वयं व्याख्यात्मक है
नहीं | वास्तव में वे एक हैं
यह एक बहुत ही विरोधाभासी बयान है। प्रत्येक जीव के साथ उपस्थित होना व्यावहारिक रूप से असंभव है जिनकी संख्या खरबों में हैं
वह विभाजित तो है परंतु हर जीव के हृदय मैं नहीं केवल मनुष्य के साथ है
भगवान _______ के रूप में सब का भक्षण करता है
प्रकृति
शिव
काल
प्रलय
सृष्टि के बाद सारी वस्तुएँ उनकी सर्वशक्तिमता पर टिकी रहती हैं और प्रलय के बाद सारी वस्तुएँ पुनः उन्हीं में विश्राम पाने के लिए लौट आती हैं. कौन सा उपनिषद इस कथन की पुष्टि करता है?
तैत्तिरीय उपनिषद्
मुक्तिक उपनिषद्
हदारण्यक उपनिषद
ईसा उपनिषद
वैकुण्ठ स्वयं प्रकाशित होने का कारण___________ है
सूर्य का तेज
परमेश्र्वर का तेज
भौतिक अंधकार न होना है
प्राकृतिक उत्पन्न प्रकाश
वैदिक ज्ञान के अनुसार, जन्म और मृत्यु के चक्र को पार करने के लिए किसे समर्पण करना चाहिए?
कृष्णा
ब्रह्मज्योति
वैदिक ज्ञान के अनुसार हम भौतिक तत्वों से बने हैं और मृत्यु के बाद स्वत: मुक्त हो जाएंगे
वैदिक ज्ञान हमें अंतिम निष्कर्ष पर नहीं ले जाता है इसलिए हम सभी अनादि काल से संघर्ष कर रहे हैं
गीता के अनुसार, कार्य क्षेत्र को जानने वाला ज्ञाता कौन हैं?
जीवात्मा
परमात्मा
जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा
कोई भी नहीं
ज्ञान की परिपक्व अवस्था क्या है?
कृष्णा भगवान है, सब कुछ कृष्णा से ही है और वह हर चीज का कारण है
भौतिक मामलों का विशेषज्ञ होना ज्ञान की परिपक्व अवस्था है
सर्वोच्च निराकार है और हमें उसे प्राप्त करने के लिए अभ्यास करना चाहिए
ज्ञान कभी पूर्ण नहीं होता। इसलिए ज्ञान की कोई परिपक्व अवस्था नहीं है
परमात्मा भगवान कृष्ण का कौन सा अंश है?
विभीनांश
स्वांश
सारांश
प्रत्याकांश
निम्न में से कौन कृष्ण की श्रेष्ठ शक्ति है
प्रकृति
दोनो समान है
जीव
दोनो अस्थायी है
समय संपन्न होने पर जब प्रकृति अव्यक्त होती तो जीव वैकुंठ लौट जाते हैं?
हाँ, जिस क्षण भौतिक जगत् अव्यक्त होता है, जीव स्वतः ही वापस वैकुंठ में चला जाता है
नहीं, जीव महाविष्णु में प्रवेश करता है और भौतिक दुनिया में वापस आता है जब भौतिक प्रकृति फिर से प्रकट होती है
नहीं, यह पूरी तरह से महाविष्णु में विलीन हो जाता है और कभी वापस नहीं आता
जब भौतिक प्रकृति अव्यक्त होती है तो जीवात्मा भौतिक प्रकृति में विलीन हो जाती है
इस भौतिक संसार को प्रकट करने के पीछे कृष्ण का उद्देश्य क्या है?
जीव यहां शांति से रह सकता है क्योंकि वैकुंठ पूरी तरह से आबाद है
जीवों को आश्रय देना कृष्ण का कर्तव्य है और इसलिए उन्होंने जीवों के आराम से रहने के लिए इस भौतिक संसार की रचना की है
वैकुण्ठ-लोक में प्रवेश करने की तैयारी करने का अवसर प्रदान करने के लिए भौतिक संसार का निर्माण हुआ
भौतिक प्रकृति को किसी गतिविधि में शामिल करने के लिए, यह कृष्ण द्वारा प्रकट किया गया था
चूँकि हम भगवत गीता पढ़ रहे हैं, हमें इस बात का ध्यान होना चाहिए कि हम वर्तमान में किस अध्याय का अध्ययन कर रहे हैं। क्या आप कृपया 13वें अध्याय का नाम चुन सकते हैं?
भक्तियोग
प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
विराट रूप
श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
भौतिक प्रकृति में कितने प्रकार की योनियां है?
84 लाख
54 लाख
74 लाख
94 लाख
जीव को अपनी _______तथा _____के अनुसार नया शरीर और परिस्थितियों के वश में रहना पड़ता है?
स्वतंत्रता, सुख-दुख
अपनी पूर्व आकांक्षा, कर्म के अनुसार
कर्म, सुख-दुख
बुद्धि, स्वतंत्रता
परमेश्र्वर जीव पर इतना कृपालु है कि वह सदा जीव के साथ रहता है और सभी परिस्थितियों में परमात्मा रूप में विद्यमान रहता है. कौन सा उपनिषद इस कथन की पुष्टि करता है?
मुण्डक उपनिषद्
मुक्तिक उपनिषद्
हदारण्यक उपनिषद
ईसा उपनिषद
कलियुग में सरलता तथा सुखपूर्वक परम धाम पहुंचने की विधि क्या है?
ध्यान लगाना
गायत्री मंत्र का जाप करें
हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करे
पवित्र स्थानों पर जाएँ और गंगा स्नान करें
क्या जीवात्मा भौतिक शरीर से भिन्न है?
आधुनिक विज्ञान इस बात का प्रमाण देता है कि यह शरीर विभिन्न पदार्थों का मेल है। तो हम आत्मा के अस्तित्व के बारे में क्यों बात कर रहे हैं?
हाँ निश्चित रूप से वे अलग हैं। शरीर पदार्थ से बना है और आत्मा विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है
हाँ वे अलग हैं लेकिन दोनों रासायनिक प्रतिक्रियाओं का परिणाम हैं
नहीं दोनों समान हैं। वास्तव में अनेक आध्यात्मिक संगठन आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानते हैं
