Worksheetsसैनिक स्कूल रीवा नियतकालिक परीक्षा 01
Total questions: 20
Worksheet time: 10mins
अपठित गद्यांश को पढ़कर सही उत्तर चयन करें-
भय को जीवन की सहज प्रवृत्ति माना जाता है। अनुशासन, व्यवस्था , नियम आदि के पालन के लिए भय की उपयोगिता है इसीलिए कहा गया है-"भय बिनु होइ न प्रीति।"जीवन की सुरक्षा ,बचाव,सावधानी के लिए भी इसकी आवश्यकता है। यह एक सीमा तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो ,किंतु बराबर इससे सहमे रहना,मूढता, जड़ता, संत्रास और आतंक से त्रस्त -ग्रस्त रहना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही नहीं पैदा होती है अपितु कुकल्पनाओं का जाल -जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिंतन को बिगाड़ लेता है। इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भय को मानसिक रोग माना जाता है, जो अच्छे -भले विचारवंत को लड़खड़ा देता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से मरते हैं, उससे कहीं अधिक भय, चिंता और थोथी कल्पनाओं से मरते हैं।
प्रश्न -१ जीवन की सुरक्षा, बचाव ,सावधानी और नियम आदि के पालन के लिए किस की आवश्यकता है?
साहस
क्रोध
विश्वास
भय
भय को जीवन की सहज प्रवृत्ति माना जाता है। अनुशासन, व्यवस्था , नियम आदि के पालन के लिए भय की उपयोगिता है इसीलिए कहा गया है-"भय बिनु होइ न प्रीति।"जीवन की सुरक्षा ,बचाव,सावधानी के लिए भी इसकी आवश्यकता है। यह एक सीमा तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो ,किंतु बराबर इससे सहमे रहना,मूढता, जड़ता, संत्रास और आतंक से त्रस्त -ग्रस्त रहना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही नहीं पैदा होती है अपितु कुकल्पनाओं का जाल -जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिंतन को बिगाड़ लेता है। इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भय को मानसिक रोग माना जाता है, जो अच्छे -भले विचारवंत को लड़खड़ा देता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से मरते हैं, उससे कहीं अधिक भय चिंता और थोथी कल्पनाओं से मरते हैं।
प्रश्न - 2"भय बिनु होत न प्रीत का आशय क्या है"?
भय और प्रीत साथ साथ नहीं होते।
भय के बिना प्रीत नहीं होती।
भय से ही प्रीत नहीं होती।
प्रीति में भय होता है।
भय को जीवन की सहज प्रवृत्ति माना जाता है। अनुशासन, व्यवस्था , नियम आदि के पालन के लिए भय की उपयोगिता है इसीलिए कहा गया है-"भय बिनु होइ न प्रीति।"जीवन की सुरक्षा ,बचाव,सावधानी के लिए भी इसकी आवश्यकता है। यह एक सीमा तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो ,किंतु बराबर इससे सहमे रहना,मूढता, जड़ता, संत्रास और आतंक से त्रस्त -ग्रस्त रहना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही नहीं पैदा होती है अपितु कुकल्पनाओं का जाल -जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिंतन को बिगाड़ लेता है। इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भय को मानसिक रोग माना जाता है, जो अच्छे -भले विचारवंत को लड़खड़ा देता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से मरते हैं, उससे कहीं अधिक भय चिंता और थोथी कल्पनाओं से मरते हैं।
प्रश्न 3 बराबर डरे सहमे रहना हानिकारक है क्योंकि-
इससे मनोबल छेड़ होता है।
इससे अधीरता ,व्याकुलता की मनो:स्थिति पैदा होती है।
इससे भीरूता पैदा होती है
उपर्युक्त सभी
भय को जीवन की सहज प्रवृत्ति माना जाता है। अनुशासन, व्यवस्था , नियम आदि के पालन के लिए भय की उपयोगिता है इसीलिए कहा गया है-"भय बिनु होइ न प्रीति।"जीवन की सुरक्षा ,बचाव,सावधानी के लिए भी इसकी आवश्यकता है। यह एक सीमा तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो ,किंतु बराबर इससे सहमे रहना,मूढता, जड़ता, संत्रास और आतंक से त्रस्त -ग्रस्त रहना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही नहीं पैदा होती है अपितु कुकल्पनाओं का जाल -जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिंतन को बिगाड़ लेता है। इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भय को मानसिक रोग माना जाता है, जो अच्छे -भले विचारवंत को लड़खड़ा देता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से मरते हैं, उससे कहीं अधिक भय चिंता और थोथी कल्पनाओं से मरते हैं।
प्रश्न- 4 मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बीमारी से कहीं अधिक लोग किस से मरते हैं?
मैं चिंता और थोथी कल्पनाओं से
गरीबी ,भुखमरी और कुपोषण से
आपसी लड़ाई -झगड़े से
आतंकी घटनाओं से।
भय को जीवन की सहज प्रवृत्ति माना जाता है। अनुशासन, व्यवस्था , नियम आदि के पालन के लिए भय की उपयोगिता है इसीलिए कहा गया है-"भय बिनु होइ न प्रीति।"जीवन की सुरक्षा ,बचाव,सावधानी के लिए भी इसकी आवश्यकता है। यह एक सीमा तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो ,किंतु बराबर इससे सहमे रहना,मूढता, जड़ता, संत्रास और आतंक से त्रस्त -ग्रस्त रहना ठीक नहीं है। इससे भीरूता ही नहीं पैदा होती है अपितु कुकल्पनाओं का जाल -जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिंतन को बिगाड़ लेता है। इस प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भय को मानसिक रोग माना जाता है, जो अच्छे -भले विचारवंत को लड़खड़ा देता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से मरते हैं, उससे कहीं अधिक भय चिंता और थोथी कल्पनाओं से मरते हैं।
प्रश्न- 5" विचारवंत" शब्द का सही अर्थ होगा-
बलवंत
मतिमंद
विचार वान
कुविचारी
सुबह हुई और पक्षी चहकने लगे।
मिश्र वाक्य
सरल वाक्य
संयुक्त वाक्य
खिलाड़ियों के मैच जीते ही पटाखे फूटने लगे।
संयुक्त वाक्य
सरल वाक्य
मिश्र वाक्य
छुट्टी हुई और छात्र अपनी -अपनी बसों की ओर भागे।
सरल वाक्य
मिश्र वाक्य
संयुक्त वाक्य
जिसने लाल टोपी पहनी है उसे बुला लाओ।
सरल वाक्य
संयुक्त वाक्य
मिश्र वाक्य
श्रृंगार रस का स्थाई भाव है
क्रोध
हास
रति
करुण
वीर रस का स्थाई भाव है-
क्रोध
भय
उत्साह
रति
शांत रस का स्थाई भाव है-
निर्वेद
विस्मय
वात्सल्य
जुगुप्सा
प्रीति नदी में पाऊं न बोरियौ , दृष्टि न रूप परागी।
कौन सा रस है।
वीर रस
करुण रस
वात्सल्य रस
ऋंगार रस
अवधि अधार आस आवन की,
तन मन में था सही।
अधार शब्द का अर्थ बताइए।
किनारा
पास में
बहुत दूर
सहारा
लखन कहा हंसी हमारे जाना।
सुनहूं देव सब धनुष समाना।।
कौन किस से कह रहा है-
लक्ष्मण परशुराम से
परशुराम विश्वामित्र से
विश्वामित्र लक्ष्मण से
राम परशुराम से
पान वाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा' मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल ' वाकई कस्बे का अध्यापक था । बेचारे ने महीने -भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए -कांच वाला - यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ......
पान वाले के लिए मजेदार बात थी-
नेता जी की मूर्ति के चेहरे पर चश्मा ना होना
नेता जी की मूर्ति केवल वक्ष तक होना
नेता जी की मूर्ति फौजी वर्दी में होना
नेता जी की मूर्ति का संगमरमर से निर्मित होना।
पान वाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा' मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल ' वाकई कस्बे का अध्यापक था । बेचारे ने महीने -भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए -कांच वाला - यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ......
मूर्ति के नीचे लिखा था-
मूर्तिकार मास्टर हीरालाल
मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल
मूर्तिकार मास्टर पन्नालाल
पान वाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा' मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल ' वाकई कस्बे का अध्यापक था । बेचारे ने महीने -भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए -कांच वाला - यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ......
मूर्ति पर चश्मा ना होने का संभावित कारण हो सकता था-
पारदर्शी चश्मा पत्थर से निर्मित ना हो पाना
बनाते समय ज्यादा बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट जाना
अलग से बनाकर फिट किया गया पत्थर पर चश्मा मूर्ति से निकल जाना
उपर्युक्त सभी
पान वाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा' मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल ' वाकई कस्बे का अध्यापक था । बेचारे ने महीने -भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए -कांच वाला - यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ......
जिसके आर पार देखा जा सके उसे कहते हैं-
दूरदर्शी
आर -पारदर्शी
पारदर्शी
अपारदर्शी
पान वाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा' मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल ' वाकई कस्बे का अध्यापक था । बेचारे ने महीने -भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए -कांच वाला - यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या बनाते बनाते कुछ और बारीकी के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ......
मूर्ति को बिना चश्मे के देख कर हालदार साहब के द्रवित होने से पता चलता है कि हालदार साहब हैं-
समझदार व्यक्ति
देशभक्तों का सम्मान करने वाले
मूर्ति निर्माण कला के ज्ञाता
नेताजी के पक्षपाती
