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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-31 (7.22-30, 8.1)
Total questions: 32
Worksheet time: 3hrs 50mins
किन शब्दों से भगवान् बताते हैं कि सभी लाभ उन्हीं द्वारा प्रदान किये जाते हैं? (7.22)
स तया श्रद्धया युक्तस्
तस्याराधनमीहते
लभते च तत: कामान्
मयैव विहितान्हि तान्
परमेश्वर की भक्ति तथा देवताओं की पूजा समान स्तर पर कैसे नहीं होती? (7.22)
भौतिक इच्छाओं से पगलाया जीव देवताओं के पास जाता है
भगवान् जीव की अनुचित कामना को पूरा नहीं करते
देवताओं की पूजा आध्यात्मिक है
परमेश्वर की भक्ति नितान्त भौतिक है
देवताओं की पूजा करने वालों को अल्पमेधसाम् - अल्प बुद्धि वाले, अल्पज्ञ क्यों कहा गया है? (7.23)
उन्हें प्राप्त होने वाले फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं
देवताओं से प्राप्त वर शाश्वत होते हैं क्योंकि सारे देवता शाश्वत हैं
देवताओं के उपासक भी भगवान् के परमधाम को जाते हैं
यदि विभिन्न देवता परमेश्वर के शरीर के विभिन्न अंग हैं, तो उन सबकी पूजा करने से एक ही जैसा फल क्यों नहीं मिलता? (7.23)
यह जानना चाहिए कि शरीर के किस अंग को भोजन दिया जाय, क्या कोई कानों या आँखों से शरीर को भोजन पहुँचा सकता है?
भगवान् के विराट शरीर के विभिन्न अंगस्वरुप देवताओं को पृथक ईश्वर और परमेश्वर का प्रतियोगी मानना अज्ञानता है
कुछ भाष्यकार कहते हैं कि देवता की पूजा करने वाला व्यक्ति परमेश्वर के पास पहुँच सकता है, भगवान् इसका किन शब्दों में खंडन करते हैं? (7.23)
अन्तवत्तु फलं तेषां
तद्भवत्यल्पमेधसाम्
देवान्देवयजो यान्ति
मद्भक्ता यान्ति मामपि
भगवान् ने बुद्धिहीन मनुष्य (अबुद्धयः) के क्या लक्षण बताये हैं? (7.24)
जो अपने अल्पज्ञान के कारण भगवान् की अविनाशी तथा सर्वोच्च प्रकृति को नहीं जान पाते
जो सोचते हैं कि भगवान् कृष्ण पहले निराकार थे और अब उन्होंने इस स्वरूप को धारण किया है
श्रीमद्भागवत के अनुसार परम सत्य की अनुभूति कहाँ से प्रारम्भ होती है? (7.24)
निर्विशेष ब्रह्म
अन्तर्यामी परमात्मा
परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण
परम सत्य की अंतिम अवस्था परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण को कैसे जाना जा सकता है? (7.24)
रजो तथा तमोगुण के वश में रहने से
अभक्त द्वारा वेदान्त, उपनिषद् तथा वैदिक ग्रंथों की निपुणता से व्याख्या करने से
केवल भगवत्कृपा से
आधुनिक निर्विशेषवादी क्यों और भी अधिक अल्पज्ञ हैं? (7.24)
वे पूर्वगामी शंकराचार्य का भी अनुसरण नहीं करते
वे सोचते हैं कि कृष्ण तो बस देवकी -वसुदेव के पुत्र हैं
वे सोचते हैं कि कृष्ण तो बस एक राजकुमार हैं
वे सोचते हैं कि कृष्ण तो बस एक शक्तिमान जीवात्मा हैं
वे सोचते हैं कि कृष्ण तो बस एक सामान्य पुरुष हैं
कौन से निर्विशेषवादी मायावादी कहलाते हैं? (7.24)
जो मानते हैं कि भगवान् कृष्ण का शरीर इसी भौतिक प्रकृति का बना है
जो कहते हैं कि भगवान् के कार्य, उनका रूप इत्यादि सभी माया हैं
जो हरे कृष्ण के महानतम जप से प्रारम्भ करके कृष्णभावनामृत में पूर्णतया तन्मय हो जाते हैं
गीता से क्या प्रमाण है कि देवता व भगवान् कोई थोपे हुए रूप नहीं बल्कि व्यक्ति हैं और उनके अपने अपने लोक भी हैं? (7.24)
7.20 - कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः – मतलब भगवान् से भिन्न अन्य देवता हैं
7.23 – देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि – मतलब दोनों के भिन्न लोक हैं जहां जाने की विधि अलग अलग है
मूर्ख तथा अल्पज्ञ अभक्तों को भगवान् दृश्य क्यों नहीं होते? (7.25)
उनके समक्ष भगवान् आनन्द के आगार के रूप में प्रकट होते हैं
उनके लिए भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति से आच्छादित रहते हैं
कुरु सभा में किसने श्रीकृष्ण के सभाध्यक्ष चुने जाने का विरोध किया? (7.25)
शिशुपाल
भीष्म
पाण्डव
कृष्ण
कहाँ कहाँ भगवान् के योगमाया के आवरण से आवृत होने की पुष्टि हुई है? (7.25)
श्रीमद्भागवत में (1.8.19) कुन्ती ने अपनी प्रार्थना में कहा है
ईशोपनिषद् में (मन्त्र 15)
श्रीमद्भागवत में भी (10.14,7) ब्रह्मा द्वारा
भगवद्गीता (7.25) में स्वयं भगवान् द्वारा
भगवान् के कौन से गुणों को अल्पज्ञ अभक्त नहीं जान पाता? (7.25)
मूढः (मूर्ख)
अजं (अजन्मा)
अव्ययं (अविनाशी)
क्या प्रमाण है कि श्रीकृष्ण एक सामान्य व्यक्ति न होकर परमपुरुष श्रीभगवान् हैं? (7.26)
साधारण जीवात्मा की भाँति उन्हें शरीर बदलना नहीं पड़ता
वे भूतकाल, वर्तमान और भविष्य को भलीभाँति जानते हैं
लाखों वर्ष पूर्व सूर्यदेव विवस्वान दिया उपदेश उन्हें स्मरण है
कृष्ण हृदय में परमात्मारूप में स्थित होने से सबको जानते हैं
क्या सूर्य के समान कृष्ण को माया का बादल ढ़क देता है?(7.26)
हाँ, जैसे आकाश में बादल सदा के लिए सूर्य को ढ़क सकता है
नहीं, बादल का आवरण हमारी दृष्टि तक ही सीमित होता है, सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे सचमुच ढके नहीं होते
माया परमेश्वर को आच्छादित नहीं कर सकती, वे अपनी अन्तरंगा शक्ति के कारण अल्पज्ञों को दृश्य नहीं होते
जीव को मोहग्रस्त करने वाला द्वंद्व किससे उत्पन्न होता है? (7.27)
परमेश्वर से तदाकार होने की इच्छा
भगवान् के रूप में कृष्ण से ईर्ष्या (द्वेष)
परमेश्वर की अधीनता के शुद्धज्ञान से
संकल्पपूर्वक (दृढव्रताः) भगवान् की सेवा में तत्पर होने के दिव्य पद को प्राप्त करने की क्या योग्यता है? (7.28)
पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म
पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन
मोह के द्वन्द्वों से मुक्त
धर्म के विधि-विधानों का अभ्यास
शुद्धभक्तों की संगति
भौतिकतावादी पुरुषों और महान भक्तों की संगति के प्रभाव में क्या अंतर है? (7.28)
(महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेः) महान भक्तों की सेवा करने से मुक्ति का द्वार खुल जाता है
(तमोद्वारं योषितां सङगिसङम्) भौतिक संग से संसार के गहन अंधकार की ओर अग्रसर होता है
परमेश्वर के अधीन रहने की अपनी स्वाभाविक स्थिति को भूलने से क्या होता है? (7.28)
बद्धजीव अपने मोह से उबर जाते हैं
परमेश्वर को समझ पाना सरल हो जाता है
यह ईश्वरीय नियम की सबसे बड़ी अवहेलना है
संकल्पपूर्वक भक्ति करना अत्यंत सुगम हो जाता है
जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग किसे सताते हैं? (7.29)
भौतिक शरीर को
आध्यात्मिक शरीर को
"अहंब्रह्मास्मि" का क्या अर्थ है? (7.29)
मैं शरीर हूँ
मैं आत्मा हूँ
मैं परमात्मा हूँ
मैं भगवान् हूँ
भगवान् के शुद्ध भक्तों के अतिरिक्त कौन कृष्ण के परमधाम, गोलोक वृन्दावन को प्राप्त कर पाते हैं? (7.29)
भगवान् की दिव्यसेवा में रत 4 प्रकार के अशुद्ध भक्त (माम् आश्रित्य)
भौतिक इच्छापूर्ति के लिए लोलुप देवताओं के उपासक
कृष्ण के विषय में कोई भ्रान्त अल्पज्ञ ब्रह्मभूत
कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों के सान्निध्य का क्या प्रभाव होता है? (7.30)
मनुष्य समझ सकता है कि भगवान् किस तरह भौतिक जगत् तथा देवताओं तक के नियामक हैं
मनुष्य का भगवान् में विश्र्वास बढ़ता है, अतः व्यक्ति कृष्ण को कभी भुला नहीं पाता
कृष्णभावना का शुभारम्भ ऐसे व्यक्तियों के सान्निध्य से होता है
दृढव्रत श्रद्धा क्या होती है? (7.30)
अपनी बात मनवाने के लिए की गयी जिद्द
विभिन्न विधियां त्यागकर कृष्णभावनामृत का पालन
पूर्णविश्र्वास कि भक्ति करने से सारे उद्देश्यों की पूर्ति होगी
भक्तियोग या दिव्य प्रेमाभक्ति की शुरुआत
मनुष्य जीवन का सदुपयोग किस प्रकार करना चाहिए? (7.30)
कृष्णभावनामृत को पुनः प्राप्त करने के लिए
परमेश्वर की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने के लिए
खाने, पीने, मौज करने के लिए
भगवद्गीता के आठवें अध्याय का क्या नाम है?
ध्यानयोग
भगवद्ज्ञान
भगवत्प्राप्ति
परम गुह्य ज्ञान
वैदिक कोश (निरुक्ति) के अनुसार आत्मा का क्या क्या अर्थ होता है? (8.1)
मन
आत्मा
शरीर
इन्द्रियाँ
अर्जुन ने पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से क्या प्रश्न पूछे? (8.1)
किं तद्ब्रह्म - ब्रह्म क्या है?
किमध्यात्मं - आत्मा क्या है?
किं कर्म - सकाम कर्म क्या है?
अधिभूतं च किं - यह भौतिक जगत क्या है?
अधिदैवं किं - देवता क्या हैं?
ब्रह्म किसे कहते हैं? (8.1)
जिसके विषय में भ्रम हो, उसे ब्रह्म कहते हैं
श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि परम सत्य ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के नाम से जाना जाता है
जीवात्मा या जीव को भी ब्रह्म कहते हैं
क्या आप भगवान् द्वारा दिए गए तर्कों के आधार पर संतुष्ट हैं कि देवी-देवताओं को स्वतंत्र नियंता के रूप में पूजना बुद्धिहीनता है? अपने घर के मंदिर में पहले से उपस्थित देवी-देवताओं के चित्रों, मूर्तियों के प्रति अब आपका कैसा व्यवहार होगा?
