Worksheetsसाहित्य सागर गद्य -9. भेड़ें और भेड़िये
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9. भेड़ें और भेड़िये
एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए। और, एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो। पशु-समाज में इस 'क्रांतिकारी' परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गई कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया। जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं, उसमें भेड़ें बहुत थीं- निहायत नेक, ईमानदार, कोमल, विनयी, दयालु, निर्दोष पशु जो घास तक को फूंक-फूंककर खाता है। भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा। हम अपने प्रतिनिधियों से कानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारी किसी को न सताए, न मारे। सब जिएँ और जीने दें। शांति, स्नेह, बंधुत्व और सहयोग पर समाज आधारित हो। इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया। भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका ही बहुमत होगा और अगर उन्होंने कानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे, तो हम खाएँगे क्या ? क्या हमें घास चरना सीखना पड़ेगा ? ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ों का उल्लास बढ़ता जाता। ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ियों का दिल बैठता जाता। एक दिन बूढ़े सियार ने भेड़िये से कहा, "मालिक, आजकल आप बड़े उदास रहते हैं।" हर भेड़िए के आसपास दो-चार सियार रहते ही हैं। जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे मांस को कुतरकर खाते हैं, और हड्डियाँ चूसते रहते हैं। ये भेड़िए के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके "हुआँ-हुआँ" चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं। तो बूढ़े सियार ने बड़ी गंभीरता से पूछा, "महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के मेघ क्यों छाए हैं ?" खैर, भेड़िए ने कहा, "तुझे क्या मालूम नहीं है कि वन-प्रदेश में नई सरकार बनने वाली है? हमारा राज तो अब गया।" सियार ने दाँत निपोरकर कहा, "हम क्या जानें महाराज ! हमारे तो आप ही 'माई-बाप' हैं। हम तो कोई और सरकार नहीं जानते। आपका दिया खाते हैं, आपके गुन गाते हैं।" भेड़िए ने कहा, "मगर अब समय ऐसा आ रहा है कि सूखी हड्डियाँ भी चबाने को नहीं मिलेंगी।" सियार सब जानता था, मगर जानकर भी न जानने का नाटक करना न आता, तो सियार शेर न हो गया होता ! आख़िर भेड़िए ने वन-प्रदेश की पंचायत के चुनाव की बात बूढ़े सियार को समझाई और बड़े गिरे मन से कहा, "चुनाव अब पास आता जा रहा है। अब यहाँ से भागने के सिवा कोई चारा नहीं, पर जाएँ भी कहाँ ?" सियार ने कहा, "मालिक, सरकस में भरती हो जाइए।" भेड़िए ने कहा, "अरे, वहाँ भी शेर और रीछ को तो ले लेते हैं, पर हम इतने बदनाम है कि हमें वहाँ भी कोई नहीं पूछता।" "तो", सियार ने खूब सोचकर कहा, "अजायबघर में चले जाइए।" भेड़िए ने कहा, "अरे, वहाँ भी जगह नहीं है, सुना है। वहाँ तो आदमी रखे जाने लगे हैं।" बूढ़ा सियार अब ध्यानमग्न हो गया। उसने एक आँख बंद की, नीचे के होंठ को ऊपर के दाँत से दबाया और एकटक आकाश की तरफ़ देखने लगा। फिर बोला, "बस सब समझ में आ गया। मालिक, अगर पंचायत में आप भेड़िया जाति का बहुमत हो जाए तो ?" भेड़िया चिढ़कर बोला, "कहाँ की आसमानी बातें करता है ? अरे, हमारी जाति कुल दस फीसदी है और भेड़ें तथा अन्य छोटे पशु नब्बे फीसदी। भला वे हमें काहे को चुनेंगे? अरे, कहीं जिंदगी अपने को मौत के हाथ सौंप सकती है ? मगर हाँ, ऐसा हो सकता, तो क्या बात थी !" बूढ़ा सियार बोला, "आप खिन्न मत होइए सरकार ! एक दिन का समय दीजिए। कल तक कोई योजना बन ही जाएगी, मगर एक बात है। आपको मेरे कहे अनुसार कार्य करना पड़ेगा।" मुसीबत में फँसे भेड़िए ने आख़िर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली।
दूसरे दिन बूढ़ा सियार अपने तीन सियारों को लेकर आया। उनमें से उसने एक को पीले रंग में रँग दिया था, दूसरे को नीले में और तीसरे को हरे में। भेड़िए ने देखा और पूछा, "अरे ये कौन हैं ?" बूढ़ा सियार बोला, "ये भी सियार हैं सरकार, मगर रँगे सियार हैं। आपकी सेवा करेंगे। आपके चुनाव का प्रचार करेंगे।" भेड़िए ने शंका की, "मगर इनकी बात मानेगा कौन ? ये तो वैसे ही छल-कपट के लिए बदनाम हैं।" सियार ने भेड़िए का हाथ चूमकर कहा, "बड़े भोले हैं आप सरकार ! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं। फिर ये तो सियार हैं।" और तब, बूढ़े सियार ने भेड़िये का भी रूप बदला। मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए। बोला, "अब आप पूरे संत हो गए। अब भेड़ों की सभा में चलेंगे। मगर तीन बातों का ख्याल रखना- अपनी हिंसक आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा ज़मीन की ओर देखना और कुछ बोलना मत, नहीं तो सब पोल खुल जाएगी और वहाँ बहुत-सी भेड़ें आएँगी, सुंदर-सुंदर, मुलायम-मुलायम, तो कहीं किसी को तोड़ मत खाना।" भेड़िए ने पूछा "लेकिन ये रँगे सियार क्या करेंगे ? ये किस काम आएँगे ?" बूढ़ा सियार बोला, "ये बड़े काम के हैं। आपका सारा प्रचार तो ये ही करेंगे। इन्हीं के बल पर आप चुनाव लड़ेंगे। यह पीला वाला सियार बड़ा विद्वान है, विचारक है, कवि भी है, लेखक भी। यह नीला सियार नेता और पत्रकार है। और यह हरा धर्मगुरु। बस, अब चलिए।" "जरा ठहरो," भेड़िए ने बूढ़े सियार को रोका, "कवि, लेखक, नेता, विचारक- ये तो सुना है बड़े अच्छे लोग होते हैं। और ये तीनों...." बात काटकर सियार बोला, "ये तीनों सच्चे नहीं हैं, रँगे हुए हैं महाराज ! अब चलिए, देर मत करिए।" और वे चल दिए। आगे बूढ़ा सियार था, उसके पीछे रँगे सियारों के बीच भेड़िया चल रहा था-मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुख में घास के तिनके। धीरे-धीरे चल रहा था, अत्यंत गंभीरतापूर्वक, सिर झुकाए विनय की मूर्ति। उधर एक स्थान पर सहस्रों भेड़ें इकट्ठी हो गईं थीं, उस संत के दर्शन के लिए, जिसकी चर्चा बूढ़े सियार ने फैला रखी थी। चारों सियार भेड़िए की जय बोलते हुए भेड़ों के झुंड के पास आए। बूढ़े सियार ने एक बार ज़ोर से संत भेड़िए की जय बोली ! भेड़ों में पहले से ही यहाँ-वहाँ बैठे सियारों ने भी जयध्वनि की। भेड़ों ने देखा तो वे बोलीं, "अरे भागो, यह तो भेड़िया है।" तुरंत बूढ़े सियार ने उन्हें रोककर कहा, "भाइयो और बहनो ! अब भय मत करो। भेड़िया राजा संत हो गए हैं। उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है।" उनका 'हृदय परिवर्तन' हो गया है। वे आज सात दिनों से घास खा रहे हैं। रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं। उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया है। अब वे किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी का रोम तक नहीं छूते। भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है। इस जाति ने जो कष्ट सहे हैं, उनको याद करके कभी-कभी भेड़िया संत की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उनकी अपनी भेड़िया जाति ने जो अत्याचार आप पर किए हैं उनके कारण भेड़िया संत का माथा लज्जा से जो झुका है, सो झुका ही हुआ है, परंतु अब वे शेष जीवन आपकी सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित करेंगे। आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गया, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतों से निकाला, दाँतों से ! पर जब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेड़िया संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की। अब तो वे सर्वस्व त्याग चुके हैं। अब आप उनसे भय मत करें। उन्हें अपना भाई समझें। सब मिलकर बोलो संत भेड़िया जी की जय ! भेड़िया जी अभी तक उसी तरह गरदन डाले विनय की मूर्ति बने बैठे थे। बीच में कभी-कभी सामने की ओर इकट्ठी भेड़ों को देख लेते और टपकती हुई लार को गुटक जाते। बूढ़ा सियार फिर बोला, "भाइयो और बहनो, मैं भेड़िया संत से अपने मुखार-विंद' से आपको प्रेम और दया का संदेश देने की प्रार्थना करता, पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है, वे गद्गद् हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है। वे बोल नहीं सकते। अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिए। आप इन्हें न पहचान पाए होंगे। पहचानें भी कैसे ? ये इस लोक के जीव तो हैं नहीं। ये तो स्वर्ग के देवता हैं जो हमें सदुपदेश देने के लिए पृथ्वी पर उतरे हैं। ये पीले-विचारक हैं, कवि हैं, लेखक हैं। नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं और हरे वाले-धर्मगुरु हैं। अब कविराज आप को स्वर्ग-संगीत सुनाएँगे। हाँ कवि जी...." पीले सियार को 'हुआँ-हुआँ' के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था। ' हुआँ-हुआँ' चिल्ला दिया। शेष सियार भी 'हुआँ-हुआँ' बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना किया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला, "भाई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग ? कैसे समझ सकते हैं ? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का ? कह रहे हैं कि जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया। हे भेड़िया जी, महान ! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं। प्रातः आपके मस्तक पर तिलक करती है, साँझ को उषा आपका मुख चूमती है, पवन आप पर पंखा करती है, और रात्रि में आपकी ही ज्योति लक्ष-लक्ष खंड होकर आकाश में तारे बनकर चमकती है। हे-विराट् ! आपके..... आपके चरणों में इस क्षुद्र का प्रणाम है।" फिर नीले रंग के सियार ने कहा, "निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं। भेड़ें कोमल हैं, निर्बल हैं, अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं। भेड़िए बलवान हैं, इसलिए उनके हाथ में अपने हितों को छोड़ निश्चिंत हो जाओ, वे भी तुम्हारे भाई हैं। आप एक ही जाति के हो। तुम भेड़ वह भेड़िया। कितना कम अंतर है! और बेचारा भेड़िया व्यर्थ ही बदनाम कर दिया गया है कि वह भेड़ों को खाता है। अरे खाते और हैं, हड्डियाँ उनके द्वार पर फेंक जाते हैं। ये व्यर्थ बदनाम होते हैं। तुम लोग तो पंचायत में बोल भी नहीं पाओगे। भेड़िए बलवान होते हैं। यदि तुम पर कोई अन्याय होगा, तो डटकर लड़ेंगे। इसलिए अपने हित की रक्षा के लिए भेड़ियों को चुनकर पंचायत में भेजो। बोलो संत भेड़िया की जय !" फिर हरे रंग के धर्मगुरु ने उपदेश दिया, "जो यहाँ त्याग करेगा, वह उस लोक में पाएगा। जो यहाँ दुख भोगेगा, वह वहाँ सुख पाएगा। जो यहाँ राजा बनाएगा, वह वहाँ राजा बनेगा। जो यहाँ वोट देगा, वह वहाँ वोट पाएगा। इसलिए सब मिलकर भेड़िये को वोट दो। वे दानी हैं, परोपकारी हैं, संत हैं। मैं उनको प्रणाम करता हूँ।" यह एक भेड़िए की कथा नहीं है, यह सब भेड़ियों की कथा है। सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िए से बड़ा उनका कोई हित-चिंतक और हित-रक्षक नहीं है। और, जब पंचायत का चुनाव हुआ तो भेड़ों ने अपनी हित-रक्षा के लिए भेड़ियों को चुना। और, पंचायत में भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए भेड़िए प्रतिनिधि बनकर गए। और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला कानून यह बनाया- 'हर भेड़िए को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए, दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए।'
वन के पशुओं ने किस प्रकार की शासन-व्यवस्था अपनाने का निर्णय लिया?
राजतंत्र
प्रजातंत्र
साम्यवाद
अराजकता
भेड़ों ने प्रजातंत्र की स्थापना से क्या उम्मीद की थी?
भय का अंत
सुख-समृद्धि
सुरक्षा
सभी विकल्प सही हैं
भेड़ियों ने चुनाव के दौरान अपनी स्थिति को कैसे सुधारने की योजना बनाई?
सरकस में शामिल होकर
अजायबघर में जाकर
रंगीन सियारों की मदद से
वन छोड़कर
बूढ़े सियार ने भेड़ियों को चुनाव जीतने के लिए क्या सुझाव दिया?
भेड़ों को डराना
भेड़ों को बहकाना
भेड़ों को विश्वास दिलाना
भेड़ों को मारना
भेड़ों ने भेड़ियों को पंचायत में क्यों चुना?
भेड़ियों ने उन्हें बहकाया
भेड़ों को भेड़ियों पर विश्वास हो गया
भेड़ों को कोई विकल्प नहीं मिला
भेड़ों ने डर के कारण चुना
पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों के लिए कौन सा पहला कानून बनाया?
भेड़ों को सुरक्षा प्रदान करना
भेड़ों को भोजन देना
भेड़ों को मारने का नियम बनाना
भेड़ों को शिक्षा देना
भेड़िया संत बनने के बाद भेड़ों को क्या विश्वास दिलाया गया?
भेड़िया अब हिंसा नहीं करेगा
भेड़िया अब घास खाएगा
भेड़िया अब भेड़ों का भाई है
सभी विकल्प सही हैं
वन-प्रदेश के पशुओं ने क्या स्थापना करने का निर्णय लिया?
राजतंत्र
प्रजातंत्र
सैन्य शासन
कोई शासन नहीं
भेड़ों की मुख्य विशेषताएँ क्या बताई गई हैं?
हिंसक और बलवान
नेक, ईमानदार, कोमल, विनयी, दयालु, निर्दोष
छल-कपट करने वाली
घास न खाने वाली
भेड़ियों को चुनाव से पहले क्या चिंता सता रही थी?
भेड़ों का बहुमत होने से हिंसा पर कानून बन जाना
सियारों का साथ छोड़ देना
वन छोड़ना पड़ना
सरकस में जाना
बूढ़े सियार भेड़िए के क्या हैं?
शत्रु
हड्डियाँ चूसने वाले सेवक
भाई
नेता
बूढ़े सियार ने भेड़िए को चुनाव जीतने के लिए क्या योजना बनाई?
वन छोड़ भाग जाना
भेड़िए को संत का रूप देकर प्रचार करना
भेड़ों को मारना
सरकस में भरती होना
तीन सियारों को किस रूप में रंगा गया?
लाल, काला, सफेद
पीला, नीला, हरा
सुनहरा, चाँदी, ताँबा
भूरा, काला, पीला
भेड़िए को संत बनाने के लिए क्या-क्या किया गया?
मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुँह में घास के तिनके
पूंछ काट दी
नहला-धुला दिया
भेड़ का रूप दिया
पीले सियार का रूप क्या बताया गया?
नेता
धर्मगुरु
विचारक, कवि, लेखक
पत्रकार
नीले सियार ने भेड़ों को क्या समझाया?
भेड़िए हिंसक हैं
निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं
घास चरना सीखो
वोट मत दो
हरे सियार ने क्या उपदेश दिया?
भेड़ियों से दूर रहो
जो यहाँ त्याग करेगा, वह परलोक में पाएगा
हिंसा करो
चुनाव बहिष्कार करो
भेड़ियों ने पंचायत में पहला कानून क्या बनाया?
कोई हिंसा न करे
हर भेड़िए को प्रतिदिन भेड़ों का कोटा
सब घास खाएँ
सियारों को सजा
कहानी का मुख्य व्यंग्य किस पर है?
भेड़ों की मूर्खता
प्रजातंत्र में छल-प्रचार से बहुमत की भूल
सियारों की बुद्धि
वन की शांति
बूढ़े सियार ने भेड़ियों को भेड़ों के समक्ष 'स्वर्ग के देवता' किसे बताया?
भेड़िए को
रंगीन सियारों को
स्वयं को
भेड़ों को
भेड़िए की आँखों में भेड़ों को देखकर क्या होता था?
आँसू आ जाते थे
लार टपकती थी
हँसी आती थी
डर लगता था
कहानी का अंतिम वाक्य क्या संदेश देता है?
भेड़ें विजयी हुईं
यह भेड़ियों की कथा है, जहाँ वे भेड़ों को ठग लेते हैं
प्रजातंत्र असफल है
सियार बूढ़े हुए
