Search Header Logo

बरषही जलद कविता का भावार्थ

Authored by Rubeena Peerjade

World Languages

10th Grade

Used 4+ times

बरषही जलद कविता का भावार्थ
AI

AI Actions

Add similar questions

Adjust reading levels

Convert to real-world scenario

Translate activity

More...

    Content View

    Student View

7 questions

Show all answers

1.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

30 sec • 1 pt

दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई | बेद पढ़ही जनु बटु समुदाई ||

नव पल्लव भए बिटप अनेका | साधक मन जस मिले बिबेका||

अर्क-जवास पात बिनु भयउ |जस सुराज खल उद्यम गयऊ ||

खोजत कतहूँ मिलई नहीं धूरी | करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ||

ससि संपन्न सोह महि कैसी | उपकारी कै संपति जैसी ।।

इन पंक्तियों में राम बादलों की गर्जना और बिजली की अस्थिरता का वर्णन कर रहे हैं।

यहाँ रात के अँधेरे, जुगनुओं और चक्रवाक पक्षी के माध्यम से समाज की स्थिति बताई गई है।

यहाँ तेज हवा द्वारा बादलों के बिखरने की तुलना कुपुत्र से की गई है।

इन पंक्तियों में मेंढकों की आवाज और वृक्षों की दशा की तुलना की गई है।

2.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

30 sec • 1 pt

घन घमंड नभ गरजत घोरा| प्रिया हीन डरपत मन मोरा||

दामिनी दमक रहहीं घन माहीं | खल कै प्रीती जथा थिर नाहीं ||

बरषही जलद भूमि निअराएँ | जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ ।।

इन पंक्तियों में राम बादलों की गर्जना और बिजली की अस्थिरता का वर्णन कर रहे हैं।

यहाँ दिन-रात के खेल की तुलना कुसंगति और सत्संगति से की गई है।

यहाँ रात के अँधेरे, जुगनुओं और चक्रवाक पक्षी के माध्यम से समाज की स्थिति बताई गई है।

इन पंक्तियों में मेंढकों की आवाज और वृक्षों की दशा की तुलना की गई है।

3.

MULTIPLE SELECT QUESTION

45 sec • 1 pt

निसि तम घन खद्योत बिराजा | जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा ||

कृषी निरावहीं चतुर किसाना | जिमि बुध तजहिं मोह-मद-माना ||

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं | कलिहीं पाई जिमि धर्म पराहीं ||

विविध जंतु संकुल मही भ्राजा |प्रजा बाढ़ जिमि पाई सुराजा ||

जहँ-तहँ रहे पथिक थकि नाना | जिमि इंद्रिय गन उपजे ग्याना ।।

यह पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई ऐसी शोभा दे रही है, जैसे अच्छे राजा (सुराज्य) को पाकर प्रजा की वृद्धि होती है।

चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लग रही है, मानो विद्यार्थियों का समूह वेद पाठ कर रहा हो।

जहाँ-तहाँ पथिक (यात्री) थककर ऐसे ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इन्द्रियां शिथिल (शांत) हो जाती हैं।

रात के घने अँधेरे में जुगनू ऐसे चमक रहे हैं, मानो दंभियों (घमंडियों) का समाज जुटा हो।

4.

MULTIPLE SELECT QUESTION

45 sec • 1 pt

घन घमंड नभ गरजत घोरा| प्रिया हीन डरपत मन मोरा||

दामिनी दमक रहहीं घन माहीं | खल कै प्रीती जथा थिर नाहीं ||

बरषही जलद भूमि निअराएँ | जथा नवहिं बुध विद्या पाएँ ।।

आकाश में बादल घमंड से भरकर भयंकर गर्जना कर रहे हैं। सीता जी के बिना मेरा मन डर रहा है।

बिजली बादलों में ऐसे चमक रही है जैसे दुष्ट व्यक्ति की प्रीति (मित्रता) स्थिर नहीं रहती।

पर्वत वर्षा की बूंदों के प्रहार को वैसे ही सह रहे हैं, जैसे संत दुष्टों के कटु वचनों को सहते हैं।

बादल पृथ्वी के नजदीक आकर ऐसे बरस रहे हैं, जैसे विद्वान व्यक्ति विद्या पाकर विनम्र हो (झुक) जाते हैं।

5.

MULTIPLE SELECT QUESTION

45 sec • 1 pt

सरिता जल जलनिधि महुँ जाई| होई अचल जिमि जिव हरि पाई ||

हरित भूमि तृण संकुल, समुझि परहि नहिं पंथ ||

जिमि पाखंड बिबादा तें, लुप्त होहिं सदग्रंथ ।।

नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव ईश्वर (हरि) को पाकर अचल (मोक्ष प्राप्त) हो जाता है।

पृथ्वी घास से हरी-भरी हो गई है जिससे रास्ते समझ नहीं आ रहे हैं; यह दृश्य वैसा ही है जैसे पाखंडी मत के प्रचार से सद्ग्रंथ लुप्त हो जाते हैं।

यहाँ नदी के समुद्र में मिलने और हरी घास से रास्तों के लुप्त होने का वर्णन है।

अनेक वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, वे ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे साधक का मन ज्ञान (विवेक) प्राप्त होने पर खिल उठता है।

6.

MULTIPLE SELECT QUESTION

45 sec • 1 pt

कबहुँ प्रबल बह मारुत, जहँ-तहँ मेघ बिलाहिं |

जिमि कपूत के उपजें, कुल सद्धर्म नसाहिं ।।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कुसंगति पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंगति पाकर ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

यह दृश्य वैसा ही है जैसे कुपुत्र (कपूत) के पैदा होने से कुल के उत्तम धर्म (मर्यादा) नष्ट हो जाते हैं।

कभी वायु बहुत तेज गति से बहने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं।

यहाँ तेज हवा द्वारा बादलों के बिखरने की तुलना कुपुत्र से की गई है।

7.

MULTIPLE SELECT QUESTION

45 sec • 1 pt

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम, कबहुँक प्पारगट पतंग |

बिनसइ-उपजइ ग्यान जिमि,पाइ कुसंग-सुसंग ।।

यहाँ दिन-रात के खेल की तुलना कुसंगति और सत्संगति से की गई है।

कभी बादलों के कारण दिन में घोर अँधेरा छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाता है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कुसंगति पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंगति पाकर ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।


यहाँ तेज हवा द्वारा बादलों के बिखरने की तुलना कुपुत्र से की गई है।

Access all questions and much more by creating a free account

Create resources

Host any resource

Get auto-graded reports

Google

Continue with Google

Email

Continue with Email

Classlink

Continue with Classlink

Clever

Continue with Clever

or continue with

Microsoft

Microsoft

Apple

Apple

Others

Others

Already have an account?