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Worksheets5. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_2.03 – 2.12
Total questions: 50
Worksheet time: 53mins
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कृपया यहाँ अपना मोबाईल न0 लिखें ।
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यदि अर्जुन युद्धभूमि छोड़ता, तो उसका यह कृत्य निंदनीय कार्य क्यों होता ?
क्योंकि महाभारत का युद्ध भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए होने वाला साधारण युद्ध नहीं था ।
क्योंकि वह वर्णाश्रम धर्म द्वारा निर्धारित उसके स्वधर्म का पालन न करके च्युत हो जाता ।
क्योंकि वह परम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की इच्छा के लिए युद्ध नहीं कर पाता ।
क्योंकि वह धर्मयुद्ध में अपने निमित्त बनने के सुअवसर को ठुकरा देता ।
कृष्ण के सेवक में इनमें से कौन सा लक्ष्ण अशोभनीय है ?
अन्य जीवों के प्रति उदारता का भाव ।
श्रीकृष्ण के प्रति अवज्ञा का भाव ।
अपनी आत्मा के प्रति करुणा का भाव ।
श्रीकृष्ण के प्रति सेवज्ञता का भाव ।
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की उदारता को उसके हृदय की क्षुद्र दुर्बलता क्यों मानते हैं ?
क्योंकि उदारता कायर व्यक्ति की कमज़ोरी है ।
क्योंकि उदारता शुद्ध भक्त का दिव्य गुण है ।
क्योंकि यह उदारता अर्जुन के स्वजनों के प्रति प्रेम के कारण थी ।
क्योंकि यह उदारता अर्जुन की देहात्मबुद्धि जन्य थी ।
वैदिक शास्त्र किस मिथ्या उदारता का अनुमोदन नहीं करते हैं ?
जो जीव के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक हो ।
जो जीव के भौतिक बंधन की अवधि को बढ़ाती हो ।
जो जीव को कृष्ण के विरोध के लिए प्रेरित करती हो ।
जो जीव भौतिक विषयों से विमुख करती हो ।
श्लोक संख्या 2.3 में कौन्तेय अर्जुन को पार्थ नाम से सम्बोधित करने पीछे श्रीकृष्ण का क्या आशय था ?
क्योंकि माता कुन्ती का एक नाम पृथा था ।
उसे यह स्मरण करवाने के लिए कि वह क्षत्रिय है ।
उसे उसकी माता कुन्ती का स्मरण करवाने का ।
ताकि अर्जुन उनके आदेश को समझ सके ।
जीव को मनुष्य जीवन के रूप में प्राप्त आत्म साक्षात्कार के सुअवसर का व्यर्थ होने का निम्न में से क्या कारण है ?
देहात्मबुद्धि जन्य हृदय की क्षुद्र दुर्बलता
जीव का अहंकारवश आत्मबल
जीव का अपने कर्मों के प्रति आलस्य
जीव का अपने कर्तव्यों के प्रति आलस्य
अर्जुन का भगवान् श्रीकृष्ण को शत्रुहन्ता व मधुसूदन कहने का क्या आशय था ?
कृष्ण को समानता का एहसास करवाने का
कृष्ण को रक्त सम्बन्ध का स्मरण करवाने का
केवल मित्रवत् प्रत्युत्तर देने का
महाभारत के युद्ध को तत्क्षण समापन करवाने का
वैदिक शास्त्र किस गुरु को त्यागे जाने की अनुशंसा करते हैं ?
जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों में रत हो।
जो निन्दनीय कर्मों में रत हो और विवेकशून्य हो।
जो केवल अपने आध्यात्मिक उत्थान में ही रत हो।
जो केवल अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने में ही रत हो।
अर्जुन महाभारत के धर्मयुद्ध को अनावश्यक रक्तपात का कारण क्यों मान रहा था ?
भगवान् श्रीकृष्ण का महान् भक्त होने के कारण अर्जुन में लेशमात्र भी इन्द्रियतृप्ति का भाव न होने के कारण।
भगवान् श्रीकृष्ण का महान् भक्त होने के कारण अर्जुन युद्ध छोड़ कर तुरन्त स्वर्गारोहण करने का बहाना ढूंढ रहा था।
भगवान् श्रीकृष्ण का महान् भक्त होने के कारण अर्जुन के भीतर विपक्षी सेना के लिए उदारता का भाव जागृत्त हो गया ।
भगवान् श्रीकृष्ण का महान् भक्त होने के कारण अर्जुन का कौरवों द्वारा दी यातनाएँ भूल जाने के कारण।
इनमें से कौन सा लक्ष्ण परिस्थापित करता है कि यह मनुष्य मुक्ति के योग्य नहीं है ?
शक्तिशाली न होना ।
धन सम्पन्न न होना ।
आध्यात्मिक रुचि न होना ।
वैदिक ज्ञान न होना ।
अर्जुन का युद्ध न करने के लिए पाँच विभिन्न तर्क प्रस्तुत करना उसकी किस योग्यता को दर्शाता है ?
अद्वैतता
विद्वत्ता
प्रभुता
प्रबुद्धता
मनुष्य को ज्ञान के पद तक उन्नत होने के लिए क्या करना होता है ?
मनुष्य को वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करना होता है ।
मनुष्य को वैदिक जीवन शैली को अपनाना होता है ।
अपनी इन्द्रियों को संयमित करना होता है ।
मनुष्य को सकाम कर्मों का अनुष्ठान होता है ।
इस भवसागर से मुक्ति के लिए क्या आवश्यक है ?
ज्ञान तथा शक्ति
ज्ञान तथा भक्ति
ध्यान तथा भक्ति
कर्मयोग तथा भक्ति
अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण को ही गुरु के रूप में क्यों धारण किया ?
क्योंकि उस समय अर्जुन के पास कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था ।
क्योंकि अर्जुन का मित्र कृष्ण ही उसे उस कृपण-दुर्बलता से उबार सकता था ।
क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण की वास्तविक स्थिति से भली-भान्ति परिचित था ।
क्योंकि अर्जुन को अपने भाई कृष्ण पर विश्वास था ।
अर्जुन अपनी कृपण दुर्बलता के कारण क्या खो चुका था ?
धर्म परायणता व अहंकार
कर्त्तव्य परायणता व धैर्य
क्षत्रिय परायणता व शस्त्र ज्ञान
कृष्ण परायणता व भक्ति
सामान्य जन प्रामाणिक गुरु के पास जाने की अपेक्षा धूर्त गुरुओं के पास जाना अधिक पसन्द करते हैं । क्यों ?
क्योंकि उन्हें भक्ति के वास्तविक स्वरूप का रंचमात्र भी बोध नहीं होता ।
क्योंकि उन्हें ज्ञान की प्रमाणिकता का रंचमात्र भी बोध नहीं होता ।
क्योंकि उनके आकर्षण का केन्द्र कृष्ण के बजाए भौतिक इन्द्रियतृप्ति होता है ।
वास्तविक समस्याओं के ज्ञान के अभाव के कारण ।
इनमें से कौन सी प्रामाणिक गुरु की विशेषता नहीं है ?
प्रामाणिक गुरु प्रामाणिक सम्प्रदाय से दीक्षित होता है ।
प्रामाणिक गुरु कृष्ण तत्त्वज्ञ होता है ।
प्रामाणिक गुरु कृष्ण का प्रतिनिधि होता है ।
प्रामाणिक गुरु संशोधित ज्ञान प्रदान करता है ।
वैदिक शास्त्रों द्वारा अनुमोदित चार सम्प्रदाय ही क्यों प्रामाणिक हैं ?
क्योंकि इनके प्रमुख आचार्य वैष्णव होते हैं ।
क्योंकि इनकी गुरु-परम्परा प्रामाणिक है ।
क्योंकि ये परम सत्य विषयक विशुद्ध ज्ञान प्रदान करते हैं ।
क्योंकि ये गुरु-परम्परा द्वारा ज्ञान प्रदान करते हैं ।
प्रामाणिक गुरु के पास किन परिस्थितियों में जाना चाहिए ?
अनसुलझी उलझनों का हल प्राप्त करने के लिए ।
अनचाही उलझनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए ।
जंगल की आग को बुझाने का उपाय जानने के लिए ।
मन की शांति व शरीर के स्वास्थ्य के उपाय जानने के लिए ।
जीव द्वारा मनुष्य देह के रूप में प्राप्त कालावधि का उपयोग आध्यात्मिक उत्थान में न कर, भौतिक इन्द्रियतृप्ति में व्यर्थ गँवाने की प्रवृत्ति को शास्त्रों में क्या संज्ञा दी गई है ?
नृपणता
कृपणता
शृणवता
विपणता
दूसरों के सूक्ष्म व स्थूल भौतिक शरीर द्वारा उत्पन्न की जाने वाली समस्याएँ क्या कहलाती हैं ?
आधिभौतिक
आधिदैविक
आध्यात्मिक
इनमें से कोई नहीं ।
अर्जुन श्रीमद्भगवद्गीता के 2.7 श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण से क्या अनुरोध करता है ?
आपके लिए जो श्रेयस्कर हो, वह निश्चित रूप से मुझे बताएँ ।
कौरवों के लिए जो श्रेयस्कर हो, वह निश्चित रूप से उन्हें बताएँ ।
मेरे लिए जो श्रेयस्कर हो, वह निश्चित रूप से मुझे बताएँ ।
हे रणछोड़ कृष्ण!, मुझे इस युद्ध से भाग जाने का उपाय बताएँ ।
इस्कॉन संस्था की प्रामाणिकता कैसे सिद्ध होती है ?
इस्कॉन संस्था कृष्णभावनामृत का प्रचार-प्रसार करती है ।
इस्कॉन संस्था प्रामाणिक सम्प्रदाय से जुड़ी हुई है ।
इस्कॉन संस्था के संस्थापकाचार्य प्रामाणिक गुरु थे ।
इस्कॉन संस्था में सभी प्रामाणिक गुरु हैं ।
कुमार सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य "निम्बार्काचार्य" किसके अवतार थे ?
सनत कुमार के
सनन्दन कुमार के
सुदर्शन चक्र के
सनातन कुमार के
"जिसका गुरु प्रामाणिक होता है वह सब कुछ जानता है ।" यह कथन कितना सत्य है?
90%
98%
99%
100%
आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण करने की मुख्य योग्यता क्या है ?
रूचि
विनम्रता
सहजता
स्पष्टता
हमें भौतिक जगत् में मिलने वाले कष्टों का वास्त्विक प्रयोजन क्या है ?
अथातो ब्रह्मा विष्णु को जागृत करना ।
अथातो ब्रह्म पिपासा को जागृत करना ।
अथातो ब्रह्म जिज्ञासा को जागृत्त करना ।
अथातो ब्रह्म तृष्णा को जागृत्त करना ।
कृष्णभावनाभावित होने से आपका क्या अभिप्राय है ?
कृष्ण की भावना का सम्मान करना ।
कृष्ण की भावना का विरोध करना ।
कृष्ण की भावना को जानने का प्रयास करना ।
हर क्षण कृष्णमयी चेतना में रहना ।
अर्जुन को किस विशेषता के कारण सव्यसाची के नाम से जाना जाता था ?
क्योंकि अर्जुन दोनों हाथों से तीर चलाने में पारंगत था ।
क्योंकि अर्जुन दोनों हाथों से खाना खाने में पारंगत था ।
क्योंकि अर्जुन दोनों हाथों से घास काटने में पारंगत था ।
क्योंकि अर्जुन दोनों हाथों से तलवार चलाने में पारंगत था ।
कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता में इस संसार के विषय में कौन सा रहस्य बताया है ?
समस्त दु:खों का हल ढूंढने का नाम ही संसार है ।
यह संसार दु:खालयम् अशाश्वतम् है ।
यह संसार दु:खालयम् आश्वासनम् है ।
यह संसार दु:खालयम् शाश्वतम् है ।
क्या हमारा तथाकथित आर्थिक व आधुनिक विकास जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि जैसी समस्यायों को हल कर सकता है ? यदि नहीं, तो क्यों ?
क्योंकि भौतिक विकास की चकाचौंध इन समस्याओं को भुलाने में सक्षम है ।
क्योंकि ये समस्याएँ इस लोक की नहीं, अपितु पारलौकिक हैं ।
क्योंकि ये समस्याएँ अशाश्वतहैं और हमारा भौतिक विकास शाश्वत है ।
क्योंकि ये समस्याएँ शाश्वत हैं और हमारा भौतिक विकास अशाश्वत है ।
हमारे हृदय में व्याप्त क्लेश, अनर्थ, दुःख, भय, चिंता इत्यादि का शमन करने में इनमें से कौन सा महामन्त्र सक्षम है ?
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।
हरे कृष्ण हरे राम हरे कृष्ण हरे राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे राम हरे कृष्ण हरे राम हरे हरे ।।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण राम राम हरे हरे । हरे राम हरे राम कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।
भगवान् श्री कृष्ण ने भौतिक उपाधियों से अलंकृत अर्जुन को वास्तविक विद्वान की परिभाषा समझाकर, उसे अप्रत्यक्ष रूप से मूर्ख क्यों कहा ?
क्योंकि अर्जुन शरीर व आत्मा के भेद के ज्ञान से अनभिज्ञ होने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण से तर्क कर रहा था ।
क्योंकि अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण मित्र था इसलिए उन्होंने उसे व्यंग्यात्मक भाव से मूर्ख कह दिया ।
क्योंकि अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण के लिए युद्ध न करके, उनसे वाग्युद्ध कर रहा था ।
क्योंकि अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी चतुराई का प्रदर्शन कर रहा था ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किसके प्रति शोक न करने का उपदेश दिया ?
आत्मा के प्रति
सगे-सम्बन्धियों के प्रति
भौतिक शरीर के प्रति
कृपण-दुर्बलता के प्रति
जिस भौतिकतावादी बुद्धिजीवी व्यक्ति को शरीर व आत्मा के भेद के विषय में ज्ञान नहीं है, तो वास्तव में उसकी स्थिति कैसी है ?
वह ज्ञानी है ।
वह मूर्ख है ।
वह लोभी है ।
वह योगी है ।
श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान किस समाज या धर्म विशेष के लिए है ?
केवल हिन्दू धर्म के लिए
केवल तथाकथित सनातन धर्म के लिए
समस्त मानव समाज के लिए
मुस्लिम धर्म के लिए
भगवान् श्रीकृष्ण हमारी आंशिक स्वतन्त्रता (जोकि भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा ही प्रदान की गई है) में हस्तक्षेप क्यों नहीं करते हैं ?
ताकि हम अपनी इच्छाओं के अनुरूप अपने लिए आध्यात्मिक अथवा भौतिक जीवन का चुनाव कर सकें ।
ताकि हम अपना और अपने परिवार का अपनी इच्छाओं के अनुरूप पालन-पोषण कर सकें ।
ताकि हम इस संसार में मौज-मस्ती भरा जीवन यापन कर सकें ।
ताकि हम वैज्ञानिक शोध द्वारा अपने सुख-सुविधाओं के साधन जुटा सकें ।
श्रीमद्भगवद्गीता के 2.12 श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गए आत्मा के ज्ञान का क्या सार है ?
यह कि आत्मा का अस्तित्व क्षणभंगुर है।
यह कि आत्मा का अस्तित्व शाश्वत है।
यह कि आत्मा का विलयीकरण होता है।
यह कि आत्मा का स्वरूप परिवर्तित होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रारम्भ आत्मा व शरीर के ज्ञान से ही क्यों करते हैं ?
क्योंकि परम सत्य के ज्ञान को समझने के लिए सर्वप्रथम देहात्मिक बुद्धि के आवरण को भेदना आवश्यक होता है।
क्योंकि परम सत्य के ज्ञान को समझने के लिए सर्वप्रथम देहात्मिक बुद्धि संरचना करना आवश्यक होता है।
क्योंकि परम सत्य के ज्ञान को समझने के लिए सर्वप्रथम पूर्ववत् अवस्थित ज्ञान को आवृत्त करना आवश्यक होता है।
क्योंकि परम सत्य के ज्ञान को समझने के लिए सर्वप्रथम पूर्ववत् अवस्थित ज्ञान को अनावृत्त करना आवश्यक होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण को अधोक्षज क्यों कहा जाता है ?
क्योंकि वह भौतिक इन्द्रियों द्वारा प्राप्य हैं ।
क्योंकि वह भौतिक इन्द्रियों के अधीन हैं ।
क्योंकि वह भौतिक इन्द्रियों के बोध से परे हैं ।
क्योंकि वह आध्यात्मिक इन्द्रियों के बोध से परे हैं ।
इनमें से कौन सा दोष बद्धजीव में नहीं होता है ?
वह अनिवार्यतः भ्रमित होता है ।
वह सदैव ग़लती करता है ।
उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण होती हैं ।
वह दूसरों को धोखा देता है ।
आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करने के लिए कौन सी देह चाहिए।
भौतिक देह
आध्यात्मिक देह
स्थूल देह
सूक्ष्म देह
भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में मायावाद का समर्थन क्यों नहीं करते, जबकि निराकार या निर्विशेष ब्रह्म भगवान् की प्रथम अवस्था है ?
क्योंकि आत्मा का स्वभाव ब्रह्म से भिन्न होता है, अतः ब्रह्म इसका में विलयीकरण नहीं होता है ।
क्योंकि आत्मा भगवान् से ईर्ष्या करता है, अतः इसका ब्रह्म में विलयीकरण नहीं होता है ।
क्योंकि आत्मा ब्रह्म से भिन्न तत्व से निर्मित होता है, अतः इसका ब्रह्म में विलयीकरण नहीं होता है।
क्योंकि आत्मा का अपना पृथक शाश्वत अस्तित्व होता है, अतः इसका ब्रह्म में विलयीकरण नहीं होता है।
"अभक्तों द्वारा गीता के उपदेशों को समझने का प्रयास मधुमक्खी द्वारा मधु के पात्र को चाटने के सदृश है।" इस कथन से आप क्या समझते हैं ?
अभक्त श्रीमद्भगवद्गीता को वस्त्र में लपेट कर केवल इसकी पूजा करता है ।
अभक्त श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ तो सकता है परन्तु इसके मर्म को समझ नहीं सकता है ।
अभक्त श्रीमद्भगवद्गीता को केवल सांसारिक पुण्य अर्जन हेतु वितरित करता है ।
अभक्त श्रीमद्भगवद्गीता को केवल सुनने में ही आनंद लेता है ।
कृष्ण माया के अधीन हैं या माया कृष्ण के अधीन हैं – सत्य क्या है पुष्टि करें ।
कृष्ण माया के अधीन हैं ।
माया कृष्ण के अधीन है ।
दोनों एक दूसरे से स्वतन्त्र हैं ।
दोनों एक दूसरे के अधीन हैं ।
इनमें से श्रीमद्भगवद्गीता के गुह्यतम् ज्ञान को समझने का पात्र कौन है ?
अभक्त
अर्जुन
भक्त
संजय
"यदि अस्तित्व का अभिप्राय अनुभवगम्य ब्रह्माण्ड से है तो भगवान् द्वारा उपदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी ।" इस कथन से आप क्या समझते हैं ?
यह कि वास्तविक ज्ञान भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभवगम्य नहीं होता है ।
यह कि भौतिक इन्द्रियाँ वास्तविक ज्ञान द्वारा ही इस ब्रह्माण्ड को अनुभव करती हैं ।
यह कि जब जीवों का इस ब्रह्माण्ड के विषय में इतना सुन्दर अनुभव है, तो भगवान् के हस्तक्षेप की क्या आवश्यकता है ।
यह कि भगवान् का अनुभव हम जीवों से कहीं अधिक है, अतः भगवान् उपदेश दे सकते हैं ।
