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Worksheets7. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_2.21 – 2.32
Total questions: 51
Worksheet time: 1hrs 8mins
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श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.21 के अनुसार, आत्मा विषयक ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त मनुष्य विनम्र क्यों हो जाता है ?
क्योंकि उसे ज्ञात हो जाता है कि इच्छाएँ हम जीवात्माएँ करते हैं न कि ये भौतिक शरीर । और जीवात्मा तो अविनाशी, अजन्मा, शाश्वत तथा अव्यय है ।
अन्य जीवात्माओं से भय के कारण ।
अन्य जीवात्माओं से विरोध के कारण ।
अन्य जीवात्माओं से प्रतिस्पर्धा के कारण ।
भगवान् श्रीकृष्ण श्लोक संख्या 2.21 के द्वारा अर्जुन के युद्ध न करने के लिए दिए गये किस तर्क का खण्डन करते हैं ?
श्लोक संख्या 1.36 में, अर्जुन के मतानुसार युद्ध में होने वाले अनावश्यक नरसंहार प्रत्युत्पन्न पापकर्म ।
श्लोक संख्या 1.39 में, अर्जुन के मतानुसार युद्ध में होने वाले अनावश्यक नरसंहार से कुल-परम्परा का नाश हो जाना ।
श्लोक संख्या 1.40 में, अर्जुन के मतानुसार युद्ध में होने वाले अनावश्यक नरसंहार से कुलस्त्रियों का दूषित हो जाना ।
श्लोक संख्या 1.41 में, अर्जुन के मतानुसार युद्ध में होने वाले अनावश्यक नरसंहार से पिण्डोदक क्रिया का लुप्त हो जाना ।
एक सैनिक सीमा की सुरक्षा के लिए शत्रुओं का संहार करता है तो उसे दण्डित नहीं अपितु सम्मानित किया जाता है, यदि वही सैनिक स्वहित के लिए किसी की हत्या कर देता है तो उसे दण्डित क्यों किया जाता है ?
ताकि अगले जीवन में उसे अपना यह पापकर्म न भोगना पड़े ।
ऐसे सैनिक को वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के कारण दण्डित किया जाना न्यायोचित (Justifiable) नहीं है ।
क्योंकि स्वहित के लिए हत्या भौतिक एवं वैदिक दोनों ही विधियों में निषिद्ध (Forbidden) अर्थात् यह पापकर्म है ।
क्योंकि सैनिक के ऐसा करने से जीवात्माओं के शुद्धिकरण (Purification) की गति तीव्र हो जाती है ।
आत्मा के द्वारा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं ?
वस्त्रान्तरण
स्थानान्तरण
गातान्तरण
देहान्तरण
श्लोक संख्या 2.22 में, श्रील प्रभुपाद के अनुसार “अणु-आत्मा द्वारा शरीर का परिवर्तन एक स्वीकृत तथ्य है ।” तो हमें यह ज्ञात क्यों नहीं है ?
अणु-आत्मा तो इस तथ्य को स्वीकार ही नहीं करता है वह तो स्वयं को केवल मात्र भौतिक शरीर ही मानता है ।
देहात्मबुद्धि जन्य अज्ञान के कारण जीवात्मा इन्द्रियभोग हेतु अपने भौतिक देहान्तरण के यथार्थ को भूल जाता है ।
अणु-आत्मा द्वारा शरीर के परिवर्तन को भौतिक वैज्ञानिक तो स्वीकार करते हैं परन्तु जीवात्मा को यह स्वीकृत नहीं है ।
अणु-आत्मा द्वारा शरीर का परिवर्तन वैदिक शास्त्रों में वर्णित केवल मात्र एक शुष्क ज्ञान है स्वीकृति योग्य तथ्य नहीं है ।
अणु-आत्मा की इच्छाओं की पूर्ति की स्वीकृति कौन प्रदान करता है ?
ब्रह्म
प्रकृति
परमात्मा
प्रकृति के गुण
इनमें से किन उपनिषदों में अणु-आत्मा और परमात्मा की उपमा दो मित्र पक्षियों से दी गई है ?
मुण्डक तथा कठोपनिषद्
श्वेताश्वतर तथा कठोपनिषद्
मुण्डक तथा गीतोपनिषद्
श्वेताश्वतर तथा मुण्डक उपनिषद्
एक ही वृक्ष पर बैठे दोनों पक्षियों का आपस में क्या वास्तविक सम्बन्ध है ?
दोनों एक दूसरे के सखा (मित्र) हैं ।
एक स्वामी है तथा दूसरा उसका सेवक है ।
एक वृक्ष का मालिक है और दूसरा वृक्ष का किराएदार है ।
एक भोक्ता है और दूसरा प्रदाता है ।
अणु-आत्मा भौतिक शरीर रूपी वृक्ष के किन फलों को खाने में संघर्षशील रहता है ?
अणु-आत्मा भौतिक शरीर की इन्द्रियों के माध्यम से भौतिक प्रकृति में व्याप्त इन्द्रिय विषय रूपी फलों को खाने में संघर्षशील रहता है ।
अणु-आत्मा भौतिक शरीर रूपी वृक्ष की शाखाओं पर लगने वाले फलों को खाने में सदैव निमग्न रहता है ।
भौतिक शरीर रूपी वृक्ष स्वेच्छा से जो भी फल अणु-आत्मा को खिला दे, वह उन्हीं को खाने में निमग्न रहता है ।
अणु-आत्मा भौतिक शरीर रूपी वृक्ष से उधर माँग-माँग कर अपना निर्वाह करने में ही संघर्षशील रहता है ।
परमात्मा अणु-आत्मा की आंशिक स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप (Interfere) क्यों नहीं करता है ?
परमात्मा इस आशय से अणु-आत्मा की आंशिक स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते, “कहीं समस्त जीवात्माएँ उनके विरुद्ध विद्रोह का विगुल न फूंक दें ।”
क्योंकि भगवान् ने परमात्मा को अणु-आत्मा की आंशिक स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं दिया है ।
क्योंकि आंशिक स्वतन्त्रता अणु-आत्मा का जन्मसिद्ध अधिकार है । उसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को अणु-आत्मा सहन नहीं करता है ।
ताकि अणु-आत्मा भौतिक भोग की चरम सीमा तक भोग करने के उपरान्त, स्वेच्छा से परमात्मा की ओर उन्मुख हो सके ।
अणु-आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का मुख्य कारण क्या है ?
शरीर का पुराना और व्यर्थ हो जाना ।
अपने स्वामी के साथ सम्बन्ध की विस्मृति ।
अणु-आत्मा को शरीर का पसंद न आना ।
अणु-आत्मा द्वारा आत्म हत्या कर लेना ।
अणु-आत्मा समस्त चिन्ताओं से कब मुक्त होता है ?
जब अणु-आत्मा भगवान् की ओर उन्मुख होता ।
जब अणु-आत्मा एक भौतिक शरीर त्याग कर दूसरा धारण करता है ।
जब अणु-आत्मा भौतिक शरीर त्याग कर आध्यात्मिक शरीर धारण करता है ।
जब अणु-आत्मा भौतिक भोगों में निमग्न रहता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 2.23 के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण आत्मा विषयक किस विशेषता की स्थापना करते हैं ?
यह कि आत्मा भौतिक पदार्थों में मिश्रित हो जाता है ।
यह कि आत्मा का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है ।
यह कि आत्मा किसी पारलौकिक ग्रह का प्राणी (Alien) है ।
यह कि आत्मा भौतिक अव्यवों से सदैव अप्रभावित रहता है ।
द्वितीय विश्व यद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान पर परमाणु बमों द्वारा आक्रमण कर हिरोशिमा नामक शहर में 1,50,000 और नागासाकी नामक शहर में 75,000 जीवात्माओं को मौत के घाट उतार दिया तथा बहुत सी जीवात्माओं को गंभीर रूप से घायल कर दिया ।
यह कथन सत्य है क्योंकि इतिहास इसका साक्षी है ।
यह कथन असत्य है, क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता इसका समर्थन नहीं करती है ।
यह कथन निराधार है ऐसा कुछ भी घटित नहीं हुआ था ।
इस कथन का श्रीमद्भगवद्गीता से कोई सम्बन्ध नहीं है अत: यह निरर्थक है ।
जीवात्मा का माया द्वारा आवृत्त होने का मुख्य कारण क्या है ?
जीवात्मा का भगवान् की संगति से पृथक होना ।
जीवात्मा का माया की शरण ग्रहण करना ।
माया द्वारा जीवात्माओं का हरण कर लेना ।
माया के आकर्षणों के प्रति जीवात्माओं का मोहित हो जाना ।
जीवात्मा को किसी भी शस्त्र द्वारा खण्ड-खण्ड क्यों नहीं किया जा सकता है ?
क्योंकि जीवात्मा अत्यंत सूक्ष्म होता है ।
क्योंकि जीवात्मा दिखाई नहीं देती है ।
क्योंकि जीवात्मा भगवान् का शाश्वत अंश है ।
क्योंकि शस्त्र भौतिक पदार्थों से बने होते हैं ।
इनमें से कौन सा गुण आत्मा का नहीं है ?
शाश्वत
सर्वगत्
अविकारी
व्ययम्
मायावादी सिद्धान्त अद्वैतवाद (Non-dualism) को क्यों व्यवहृत (Practically applicable) नहीं किया जा सकता है ?
क्योंकि अणु-आत्मा और परम-आत्मा अपने पृथक-पृथक शाश्वत अस्तित्व (Eternal existence) के कारण कभी भी एकीकृत (Merge) नहीं हो सकते हैं ।
क्योंकि अणु-आत्मा और परम-आत्मा पृथक-पृथक पदार्थों से बने होने के कारण कभी भी एकीकृत नहीं हो सकते हैं ।
मायावादी सिद्धान्त व्यवहारिक है, अत: यह कथन सत्य नहीं है ।
क्योंकि अणु-आत्मा और परम-आत्मा अपने-अपने अहंकार के कारण कभी भी एकीकृत नहीं हो पाते हैं ।
श्लोक संख्या 2.24 में, सर्वगत् शब्द से क्या अभिप्राय है ?
जीव तीनों लोकों में सर्वत्र व्याप्त हैं ।
जीव भगवान् की सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त हैं ।
जीव भगवान् की सृष्टि में स्वतन्त्र रूप से भ्रमण कर सकते हैं ।
जीव भगवान् से सर्वदा दूरी बनाए रखते हैं ।
इस भवसागर से जीव कितने प्रकार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ?
3
4
5
6
सायुज्य मुक्ति किसे कहते हैं ?
निर्विशेष (Impersonal) ब्रह्म में जीव का विलीन हो जाना ।
जीव का नारायण रूप प्राप्त करना ।
जीव का भगवान् के जैसा ऐश्वर्य (Opulence) भोगना ।
जीव का भगवान् के लोक (Abode) में रहना ।
सार्ष्टि मुक्ति किसे कहते हैं ?
निर्विशेष ब्रह्म में जीव का विलीन हो जाना ।
जीव का नारायण रूप प्राप्त करना ।
जीव का भगवान् के जैसा ऐश्वर्य भोगना ।
जीव का भगवान् के लोक में रहना ।
सारूप्य मुक्ति किसे कहते हैं ?
निर्विशेष ब्रह्म में जीव का विलीन हो जाना ।
जीव का नारायण रूप प्राप्त करना ।
जीव का भगवान् के जैसा ऐश्वर्य भोगना ।
जीव का भगवान् के लोक में रहना ।
श्रुति शास्त्र क्या होते हैं ?
भगवान् के श्वास व वाणी से उत्पन्न वेद, उपनिषद् इत्यादि श्रुति शास्त्र कहलाते हैं ।
समस्त अठारह पुराण श्रुति शास्त्र कहलाते हैं ।
केवल रामायण ही श्रुति शास्त्र है ।
रामायण, महाभारत, वेदान्त सूत्र इत्यादि श्रुति शास्त्र कहलाते हैं ।
इनमें स्मृति शास्त्र कौन से हैं ?
वेद
वेदान्त सूत्र
उपनिषद्
इनमें से कोई नहीं है ।
अनुभवगम्य (Realized) सत्य होते हुए भी आत्मा के अस्तित्व को समझने का एकमात्र प्रमाण क्या है ?
डार्विन की थ्योरी ही एकमात्र साधन है ।
सरकारी दस्तावेज ही एकमात्र साधन है ।
वेदाध्ययन ही एकमात्र साधन है ।
हमारे पूर्वज ही एकमात्र साधन है ।
इनमें से कौन सा विकल्प सही है ?
जीवन के प्रारम्भिक चरण में आत्मा बढ़ती है ।
आत्मा अपनी संतानें उत्पन्न करती है ।
जीवन के अन्तिम चरण में आत्मा बढ़ती है ।
आत्मा अव्यय, अपरिवर्तनीय होती है ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 2.26 के द्वारा किन दार्शनिकों (Philosophers) का खण्डन करते हैं ?
जो जीवन को भगवान् के कृपा मानते हैं ।
जो जीवन को भौतिक और रासायनिक तत्वों के संयोग की एक घटनामात्र मानते हैं ।
जो जीवन को जीव की इच्छाओं का परिणाम मानते हैं ।
जो जीवन को आध्यात्मिक और भौतिक पदार्थों की रासायनिक घटना मानते हैं ।
वैभाषिक दर्शन क्या होता है ?
वैभाषिक दर्शन आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता है ।
वैभाषिक दर्शन वैदिक ज्ञान के अनुकूल होता है ।
वैभाषिक दर्शन शरीर की सर्वोच्चता को व्यक्त करता है ।
वैभाषिक दर्शन आत्मा व शरीर के वैदिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है ।
आत्मा को एक भौतिक शरीर कितनी अवधि के लिए मिलता है ?
एक निश्चित अवधि के लिए मिलता है ।
जब तक उसकी मृत्यु नहीं होती है ।
एक विशिष्ट कर्म-अवधि के लिए मिलता है ।
जब तक उसे नया भौतिक शरीर नहीं मिल जाता है ।
इनमें से कौन सी व्यवस्था मानव समाज के लिए परम कल्याणकारी होती है ?
भौतिक शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था, जो हम जीवों को इस भौतिक जगत में सुख-सुविधाओं से संपन्न जीवन व्यतीत करने में सहायक होती है ।
गरीब व असहाय व्यक्तियों के लिए मुफ्त भोजन, वस्त्र, आश्रय, शिक्षा इत्यादि की व्यवस्था ।
बीमार व रोगियों के लिए मुफ्त दवाईयों, चिकित्सा की व्यवस्था ।
आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की व्यवस्था, जो हम जीवों को इस जन्म-मृत्यु के कष्टमय भवबंधन से हमेशा के लिए मुक्त करवा देती है ।
जीव का जन्म-मृत्यु के चक्र में निरंतर गमन का मुख्य कारण क्या है ?
जीव की भोग करने की अनवरत इच्छाएँ ।
जीव की अज्ञानता ।
जीव का स्वाभाव ।
जीव का स्वजनों के प्रति मोह ।
आत्म-साक्षात्कार की प्रारम्भिक अवस्था क्या है ?
आत्मा के अनस्तित्व और भौतिक शरीर के अस्तित्व का ज्ञान ।
आत्मा के अस्तित्व और भौतिक शरीर के अनस्तित्व का ज्ञान ।
आध्यात्मिक जगत् और भौतिक जगत् विषयक ज्ञान ।
जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि विषयक ज्ञान ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 2.29 में जिस आश्चर्य और अनभिज्ञता के विषय में कहा है, जीव में उसके उदय का क्या कारण है ?
देहात्मबुद्धि से उत्पन्न आत्म-साक्षात्कार के प्रति उत्सुकता ।
देहात्मबुद्धि से उत्पन्न वैदिक ज्ञान ।
देहात्मबुद्धि के कारण जीव की इन्द्रियभोग में सघन व्यस्तता और दृढ़ आसक्ति ।
वैष्णवों की संगति से उत्पन्न जिज्ञासा ।
अल्पज्ञ तथा दुराचारी व्यक्तियों के द्वारा अणु-आत्मा के चमत्कारों को न समझ पाने की क्या पराकाष्ठा होती है ?
ऐसे व्यक्तियों को यदि स्वयं श्रीकृष्ण भी समझाएँ तो भी वह नहीं समझ सकते ।
ऐसे व्यक्तियों को यदि स्वयं ब्रह्मा भी समझाएँ तो भी वह नहीं समझ सकते ।
ऐसे व्यक्तियों को यदि स्वयं शिव भी समझाएँ तो भी वह नहीं समझ सकते ।
ऐसे व्यक्तियों को यदि स्वयं सूर्यदेव भी समझाएँ तो भी वह नहीं समझ सकते ।
क्या परिवार के केवल एक सदस्य द्वारा हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से परिवार के अन्य सदस्यों का भी कल्याण हो जायेगा ?
हाँ, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार पिता अपने परिवार के सभी सदस्यों का पालन करता है ।
नहीं, इस प्रकार जप साधना से कुछ नहीं होता है ।
इसमें परिवार के सभी सदस्यों का एकमत होना बहुत आवश्यक होता है ।
नहीं, क्योंकि सभी व्यष्टि अणु-आत्माएँ हैं, प्रत्येक को अपने-अपने उद्धार के लिए स्वयं उद्यम करना होता है ।
आत्म-ज्ञान को समझने का सरलतम उपाय क्या है ?
केवल आत्म-चिंतन करना ही एकमात्र साधन है ।
तत्व ज्ञानियों से ईर्ष्या करके यह अत्यन्त शीघ्रता से समझ में आता है ।
अविचलित भाव से परम प्रमाण भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कथित भगवद्गीता के उपदेशों को ग्रहण करना ।
इस भौतिक जगत् में जीवन जीने के समस्त हथकंडों से अवगत व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी होता है ।
श्रीमद्भग्वद्गीता के श्लोक संख्या 2.11 से 2.30 तक भगवान् श्रीकृष्ण अपने उपदेशों द्वारा क्या स्थापित करते हैं ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण को प्रमाण मान कर भौतिक देह से भिन्न आत्मा के शाश्वत अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए ।
यह कि जीवन के लक्ष्ण विशिष्ट भौतिक रासायनों की अन्त:क्रिया के फलस्वरूप एक विशेष अवस्था में प्रकट होते हैं ।
यह कि आत्मा व भौतिक शरीर दोनों एक ही साथ मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ।
यह की आत्मा का भौतिक शरीर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है ।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्लोक संख्या 2.31 से 2.38 तक भगवान् श्रीकृष्ण किस विषय में ज्ञान देते हैं ?
स्वधर्म से इर्ष्या का ज्ञान देते हैं ।
स्वधर्म के पालन का ज्ञान देते हैं ।
स्वधर्म से जी चुराने का ज्ञान देते हैं ।
स्वधर्म को दूसरों पर टालने का ज्ञान देते हैं ।
कलियुग में आकर वर्णाश्रम व्यवस्था के नष्ट-भ्रष्ट होने का मुख्य कारण क्या है ?
रजोगुण की प्रधानता
सतोगुण की प्रधानता
तमोगुण की प्रधानता
अहंकार की प्रधानता
हम मनुष्य भौतिक जगत् के सारे कार्यकलापों से अनभिज्ञ (Ignorant) क्यों रहते हैं ?
क्योंकि भौतिक जगत् के सारे कार्यकलाप भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्ति के द्वारा करते हैं ।
क्योंकि भौतिक जगत् के सारे कार्य देवताओं द्वारा किये जाते हैं ।
क्योंकि भौतिक जगत् के सारे कार्य हमारे संयुक्त पाप और पुण्य कर्मों के प्रतिफल होते हैं ।
क्योंकि भौतिक जगत् के सारे कार्य हमारे पित्तरों की अचिन्त्य (Inconceivable) शक्ति के द्वारा होते हैं ।
इनमें से कौन सी कर्म योनि है ?
गधे की योनि
वृक्षों की योनि
पक्षियों की योनि
मनुष्य योनि
पूर्ववर्ती (Previous) युगों की अपेक्षा कलियुग में किसी भी यज्ञ या पूजा में पशु बलि उचित क्यों नहीं है ?
क्योंकि कलियुग में अल्पज्ञों द्वारा बलि के लिए अर्पित पशु को मनुष्य योनि प्राप्त नहीं होती है ।
क्योंकि कलियुग में राजकीय कानून के अनुसार पशु बलि अवैध है ।
क्योंकि कलियुग में पशु बलि को केवल पशु हिंसा समझा जाता है ।
क्योंकि कलियुग में पशु बलि से पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) असंतुलित हो जाता है ।
स्वधर्म का पालन अनिवार्य क्यों होता है ?
क्योंकि स्वधर्म का पालन करने से स्वर्ग लोकों में भोग करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है ।
क्योंकि स्वधर्म का पालन करने से क्षत्रिय वर्ण प्राप्त होता है ।
क्योंकि स्वधर्म का पालन करने से संसार में प्रतिष्ठा बढ़ती है ।
क्योंकि स्वधर्म का पालन करने से मनुष्य देहात्मबुद्धि से मुक्त होकर आध्यात्मिक बुद्धि में स्थापित हो जाता है ।
स्वधर्म का विधान किसने बनाया है ?
धर्मराज ने
ब्रह्मा जी ने
भगवान् ने
विधान देव
शारीरिक स्तर पर स्वधर्म को क्या कहते हैं ?
स्वर्गलोक की मुख्य अथवा गुप्त चाबी कहते हैं
आध्यात्मिक बोध का प्रथम सोपान कहते हैं
उच्चतर भौतिक भोगों के भंडार का द्वार
भौतिक प्रतिष्ठा की कुंजी
वर्णाश्रम में मनुष्यों का वर्गीकरण किस आधार पर होता है ?
जीवों की देवताओं से निकटता
जीवों द्वारा देवताओं की चापलूसी
जीवों द्वारा अर्जित गुणों के आधार पर
जीवों का सम्बंधित कुल में जन्म
