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Worksheetsसमयसार गाथा ३६-३८
Total questions: 30
Worksheet time: 23mins
समयसार परमागम गाथा ३६ के अनुसार "राग-द्वेषरूप कलुषता भावकभाव होने से द्रव्यकर्मरूप जड़ पुद्गल द्रव्य की है जब यह कलुषता ज्ञान में ज्ञात होती है तो ज्ञान भी _______________
मलिन दिखाई देता है
मलिन हो जाता है
मलिन कहा जाता है
समयसार परमागम गाथा ३६ के अनुसार ज्ञान की और राग की भिन्नता जान ली जावे तो आत्मा अपने _______________ में अवश्य स्थित होता है
अनुभव
श्रद्धान
लीनता
ज्ञान
समयसार परमागम गाथा ३६ के अनुसार परस्पर साधारण अवगाह का निवारण करना अशक्य होने से मेरा आत्मा और जड़पदार्थ ____________की भाँति एकमेक हो रहे हैं
श्रीखण्ड
दही और चीनी
समयसार परमागम गाथा ३६ के अनुसार जाननेवाली ज्ञातृता और जानने में आनेवाला मोह यद्यपि अज्ञानी को अभेद ही अनुभव में आते हैं परन्तु ज्ञानी को क्या जानने मे आता है ?
आकुलतास्वादवाला मोह मेरा कुछ भी नहीं है
मैं तो निराकुलस्वादवाला ज्ञान ही हूँ
निराकुलस्वादवाला ज्ञान है
आकुलतास्वादवाला मोह है
सभी
समयसार परमागम गाथा ३६ मे कौनसे मोह की बात है ?
चारित्रमोह
दर्शनमोह
समयसार परमागम गाथा ३६ के अनुसार "भावकरूप मोह कर्म और उसकी ओर झुकनेवाले भावों के साथ मेरा कोई भी संबंध नहीं है" ऐसा किस आधार पर कहा गया
चैतन्यधातु ज्ञायकस्वभाव का परमार्थ से परभावरूप होना या भाव्यरूप होना अशक्य है
चैतन्यधातु ज्ञायकस्वभाव का परमार्थ से परभावरूप होना या भावकरूप होना अशक्य है
समयसार परमागम गाथा ३५ मे जिस स्व-संवेदनज्ञान को प्रत्याख्यान कहा था, उसे ही यहाँ ______________ कहते हैं।
निर्ममत्व या निर्मोहत्व
भाव्य -भावक
समयसार परमागम कलश ३० के अनुसार कौनसी बात सत्य नही है
मैं स्वयं ही अपने एक आत्मस्वरूप का अनुभव करता हूँ
मोह मेरा कुछ भी नहीं है
मैं तो एक शुद्धचिद्घन की महानिधि हूँ
ज्ञानानन्दस्वभावी ध्रुवतत्त्व हूँ, अपने अतीन्द्रिय आनन्द के रस से भरा हुआ हूँ
कोई नही
समयसार परमागम कलश ३० के अनुसार ' मैं चिद्घन' हु इसका विस्तार किसप्रकार किया जा सकता है ?
ज्ञानघन हूँ
दर्शनघन हूँ
आनंदघन हूँ
शक्तिघन हूँ
सभी
समयसार परमागम कलश ३० के अनुसार "मैं तो अनन्तगुणों का घनपिण्ड हूँ और मोहादि विकारीभाव और शरीरादि परपदार्थ मेरे में रंचमात्र भी नहीं हैं ऐसी भावना कबतक भाना?
जबतक चिद्घन आत्मा का अनुभव न हो जाय
जबतक हमारा उपयोग चिद्घनमय न हो जाये
दोनों
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार ज्ञेय कौन हैं ?
धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल
अपने आत्मा को छोड़कर अन्य सभी जीव
पंच परमेष्ठी
हमारे शरीर, मन, वाणी
सभी
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार "उपयोगमय निजभगवान आत्मा ही मैं हूँ और धर्मादि पदार्थ मेरे कुछ भी नहीं हैं" यह बात किसने बताई है ?
जो आत्मा के अनुभवी हैं
सिद्धान्त के पारगामी
स्वमत और परमत के विशेषज्ञ
सर्वज्ञ परमात्मा
सभी
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार ज्ञायक और ज्ञेय मे स्वादभेद का अर्थ क्या है ?
मेरी आत्मा का स्वाद अतीन्द्रिय आनन्द है
धर्मास्तिकाय आदि प्रगट स्वाद में आने पर स्वभावभेद के कारण वे मुझसे भिन्न हैं
ज्ञान का स्वभाव समस्त पदार्थों को जानने का है
सभी
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार क्या सही नही है ?
आत्मा स्वभाव से ही स्व को भी जानता है और पर को भी जानता है
वह पर को पर के कारण जानता है, अपितु अपने स्वभाव के कारण नही जानता है
पर भी जो पर पदार्थ सहजभाव से ज्ञान में ज्ञात होते हैं
अज्ञानी जीव उन्हें अपना मान लेता है, उनमें अपनत्व स्थापित कर लेता है
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार ज्ञेय भाव से भेद्ज्ञान का अर्थ क्या है ?
पर में से अपनापन टूटना, एकत्व टूटना
अपने में अपनापन आना
दोनों
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार "ज्ञेय- ज्ञायक संबंध _______________ कहा जाता है, ___________है नहीं
व्यवहार से, निश्चय से
निश्चय से, व्यवहार से
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार "ज्ञेय- ज्ञायक संबंध क्यों नही कहा जा सकता है?
ज्ञेय ज्ञेय में रहा, ज्ञान ज्ञान में रहा
ज्ञान ज्ञेय में नहीं गया और ज्ञेय ज्ञान में नहीं आया
दोनों पूर्ण स्वतंत्र ही रहे
सभी
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार "दर्शन-ज्ञान-चारित्र परिणत आत्मा यह जानता है कि निश्चय से मैं सदा ही ( एक से ज्यादा चुन सकते है )
एक हूँ
शुद्ध हूँ
दर्शन-ज्ञानमय हूँ
अरूपी हूँ
परमाणुमात्र भी मेरे नहीं हैं
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार क्या सही नही है ?
सादि मोहरूप अज्ञान से उन्मत्तता के कारण आत्मा अत्यन्त अप्रतिबुद्ध था
किसी के ध्यान दिलाने पर या स्वयं स्मरण आ जाने पर उसे देखे और आनन्दित हो
विरक्त गुरु के द्वारा निरन्तर समझाये जाने पर आत्मा को जानकर, उसका श्रद्धान सम्यक्प्रकार एक आत्माराम हुआ अतीन्द्रिय आनन्द को प्राप्त हुआ
जिसप्रकार कोई पुरुष अपनी मुट्ठी में रखे सोने को भूल गया हो उसीप्रकार अपने परमेश्वर आत्मा को भूल गया था
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार मै एक हु किस आधार पर सिद्ध नही होता ?
चिन्मात्र आकार के कारण समस्त क्रमरूप और अक्रमरूप से प्रवर्तमान व्यवहारिक भावों से भेदरूप नहीं होता
नरक गति, मोक्ष गति इत्यादि इत्यदि रूप नही होता
कषाय, लेश्या, ज्ञान का उघाड़ इत्यादि रूप नही होता
गुणस्थान और मार्गणा इत्यादि रूप नही होता
नर, नारकादि जीव के विशेष और अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध तथा मोक्ष स्वरूप व्यवहारिक नव तत्वों से भिन्न हु
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार मै शुद्ध हु किस आधार पर सिद्ध नही होता ?
व्यवहारिक नव तत्वों से टंकोत्कीर्ण एक ज्ञायक स्वभावरूप भाव के द्वारा अत्यन्त भिन्न हु
नरक गति, मोक्ष गति इत्यादि इत्यदि रूप नही होता
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से अत्यन्त भिन्न है
पुण्य-पाप के विकारी भावों से भगवान आत्मा भिन्न है
निर्मल पर्याय से भी भगवान आत्मा भिन्न है
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार मै दर्शन-ज्ञानमय हूँ किस आधार पर सिद्ध नही होता ?
मैं चिन्मात्र होने से सामान्य विशेष उपयोगात्मकता का उल्लंघन नहीं करता
दया, दान, व्रत आदि के विकल्परूप मैं नहीं हूँ, अल्पज्ञतारूप भी मैं नहीं हूँ
'मैं दर्शन वाला, ज्ञान वाला हूँ'
सामान्यज्ञानमय और सामान्यदर्शनमय हु
विशेष ज्ञानमय और विशेष दर्शनमय हु
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार मै अरुपी हूँ किस आधार पर सिद्ध नही होता ?
स्पर्श, रस, गंध और वर्ण जिसके निमित्त हैं - ऐसे संवेदनरूप परिणमित होने पर भी स्पर्शादिरूप स्वयं परिणमित नहीं होता
स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि को जानते हुए भी वे स्पर्शादि मुझमें आते नहीं है और मैं भी स्पर्शादिरूप से परिणाम नहीं होता
मेरा ज्ञान व स्पर्श आदि भिन्न-भिन्न ही रहते हैं
बाह्य पदार्थ मेरे ज्ञान में झलकते हैं यह तो विचित्र कार्य है
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार इन मे से क्या सत्य है ?
मैं सदा ही शुद्ध हूँ
मै शुद्ध हूँ
समयसार परमागम गाथा ३७ के अनुसार 'सदा' यह विशेषण किसके साथ लगा है ?
मैं (भगवान आत्मा) एक हूँ
मैं शुद्ध हूँ
मैं ज्ञान-दर्शनमय हूँ
मैं अरूपी हु
सभी
समयसार परमागम कलश ३२ के अनुसार ": अब हे लोक के समस्त लोगों! लोकपर्यन्त उछलते हुए उसके ________ में सब एकसाथ ही मग्न हो जावो"
शान्तरस
आनंदरस
सभी
वीतराग रस
समयसार परमागम कलश ३२ के अनुसार "जैसे समुद्र के आड़े कुछ आ जावे तो जल दिखाई नहीं देता इसीप्रकार यह आत्मा __________से आच्छादित था, तब उसका स्वरूप दिखाई नहीं देता था"
विभ्रम
मोह
राग
पुण्य
समयसार परमागम कलश ३२ के अनुसार "________________मेरे हैं, इनमें ही मेरा अस्तित्व है; जबतक ऐसी मिथ्यात्व रूपी चादर की आड़ है, तब तक ज्ञान समुद्र भगवान आत्मा दिखाई नहीं देता
राग व पुण्यादिभाव
मोह
ज्ञेय
समयसार परमागम कलश ३२ के अनुसार चैतन्यस्वरूप से विपरीत _________________अबतक ऐसी जो पर्याय बुद्धि थी, वही विभ्रम था
राग वह मेरा
एक समय की पर्याय वह मैं
दोनों
समयसार परमागम कलश ३२ के अनुसार समस्त जीवों को चाहिए कि वे __________ का अंधकार दूर कर विभ्रम की चादर को हटाकर भगवान आत्मा के दर्शन करें, उसके ज्ञान सागर में डुबकी लगावें
मिथ्यात्व
मोह
राग
द्वेष
