Worksheets22. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_5.16–5.25
Total questions: 45
Worksheet time: 1hrs 17mins
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श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 5.16 में भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान के प्रभाव को निम्न में से किसके उदाहरण द्वारा समझाया है ?
आदित्य
शशांक
ब्रह्मज्योति
दीपक
निम्न में से हम जीवों के मोहग्रस्त होने का मुख्य कारण क्या है ?
कृष्ण को भूल जाना ।
इंद्रियतृप्ति में निमग्न हो जाना ।
निर्विशेष ब्रह्म में तदाकार हो जाना ।
इनमें से कोई नहीं है ।
जीव को पूर्ण ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ?
श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण करके ।
प्रामाणिक गुरु के प्रति समर्पण करके ।
प्रामाणिक शास्त्रों के प्रति समर्पण करके ।
सभी विकल्प उचित हैं ।
"जिस प्रकार सूर्योदय होने पर हमें सारी वस्तुएँ स्पष्टतः दिखने लगती हैं, ठीक उसी प्रकार कृष्णभावनामृत से भी सब कुछ प्रकट होने लगता है ।" इस कथन से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट करें ।
कृष्णभावनामृत द्वारा उदित वास्तविक ज्ञान से जीव को अपनी स्वाभाविक स्थिति स्पष्ट होती है ।
कृष्णभावनामृत द्वारा उदित वास्तविक ज्ञान से जीव को भगवान् की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होती है ।
कृष्णभावनामृत द्वारा उदित वास्तविक ज्ञान से जीव को भगवान् के साथ अपना वास्तविक संबंध स्पष्ट होता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
जीव का स्वयँ को ईश्वर मानना निम्न में से किसका लक्षण है ?
मोह
अहंकार
काम
प्रतिशोध
यदि किसी व्यक्ति को आत्मा विषयक पूर्ण ज्ञान है, परंतु वह आत्मा तथा परमात्मा में अंतर करने में असमर्थ हो, तो ऐसे में उसे क्या करना चाहिए ?
तो उसे प्रामाणिक गुरु की शरण ग्रहण कर कृष्णभावनामृत का अनुशीलन कर सीखना चाहिए ।
तो उसे स्वयँ (एकाकी) कृष्णभावनामृत के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित होना चाहिए ।
तो उसे कृष्णभावनामृत प्राप्त करने हेतु किसी विशेष पद्धति के अविष्कार में प्रयासरत हो जाना चाहिए ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता पर संसार के विभिन्न वर्गों के विभिन्न दार्शनिकों ने टीकाएँ लिखी हैं। कृपया बताएँ कि निम्न में से किस टीकाकार ने श्रीमद्भगवद्गीता के वास्तविक संदेश (परम दिव्य सत्य भगवान कृष्ण ही हैं।) को उद्घाटित किया है ।
बाल गंगाधर तिलक
विनोदा भावे
महात्मा गांधी
भक्तिवेदांत प्रभुपाद
निम्न में से परतत्त्व की पराकाष्ठा कौन हैं ?
ब्रह्म
परमात्मा
भगवान्
वैकुंठ जगत्
पूर्णतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के सारे कल्मष धुल जाते हैं । ऐसे व्यक्ति के क्या लक्ष्ण होते हैं ?
उसके मन, बुद्धि, श्रद्धा तथा शरण कृष्ण में होते हैं ।
उसके मन, बुद्धि, श्रद्धा तथा शरण में कृष्ण होते हैं ।
उसके मन, बुद्धि, श्रद्धा तथा शरीर कृष्ण में होते हैं ।
उसके मन, बुद्धि, श्रद्धा तथा शरीर में कृष्ण होते हैं ।
"कृष्ण में द्वैत है ।" इस से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट करें ।
यह कि आत्मा तथा परमात्मा समान आध्यात्मिक गुण वाले होते हैं । परंतु आत्मा तथा परमात्मा गुणों की मात्रात्मक दृष्टि से समान नहीं होते हैं ।
यह कि व्यष्टि आत्मा एक समय में किसी विशेष शरीर में उपस्थित हो सकता है जबकि परमात्मा एक साथ प्रत्येक शरीर में उपस्थित हो सकते हैं ।
यह कि व्यष्टि आत्मा को केवल अपने शरीर का ही ज्ञान होता है जबकि परमात्मा तो सर्वज्ञ होते हैं ।
यह सभी कथन कृष्ण की द्वैतता को स्पष्ट करते हैं ।
श्लोक संख्या 5.18 में प्रयुक्त हुए निम्न शब्दों में से, कौन से शब्द कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की विशेषताओं को प्रकट करते हैं ?
विद्याविनयसम्पन्ने
ब्राह्मणे
श्वपाके
गवि
निम्न में से कौन सा व्यक्ति पूर्णतः कृष्णभावनाभावित समझा जाएगा ?
वह व्यक्ति जो समस्त प्राणियों को परमात्मा के अभिन्नांश मानकर समान दृष्टि से देखता है ।
वह व्यक्ति जो निर्दयी तथा पीड़ित के प्रति समान करुणा भाव रखता है ।
वह व्यक्ति जो समस्त प्राणियों के भीतर परमात्मा रूप में ब्रह्म की उपस्थिति को देखता है ।
यह सभी व्यक्ति कृष्णभावनाभावित हैं ।
विद्वान् योगी की दृष्टि में यह शरीरगत् भेद अर्थहीन होते हैं । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि विद्वान् योगी को भौतिक योनियों या शरीरों की वास्तविक स्थिति का ज्ञान होता है ।
क्योंकि विद्वान् योगी को भौतिक स्थिर शरीरों के भीतर उपस्थित आत्मा की स्वाभाविक स्थिति का ज्ञान होता है ।
क्योंकि विद्वान् योगी को भौतिक शरीरों के भीतर आत्मा के साथ परमात्मा रूप में भगवान् की उपस्थिति विदित होती है । और दोनों के शाश्वत संबंध का भली-भांति बोध होता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
भगवान् प्रत्येक बद्धजीवात्मा के साथ सदैव परमात्मा रूप में क्यों विद्यमान् रहते हैं ?
ताकि जीवात्मा की इंद्रियभोग की समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो सकें ।
ताकि जीवात्मा भगवान् के सूचना तंत्र के अधीन ही उपस्थित रहे ।
ताकि जीवात्मा के लिए घर वापसी का रास्ता तुरंत सुलभ करवा सकें ।
भगवान् के प्रत्येक जीवात्मा के प्रति अप्रतिबंधित प्रेम के कारण ।
आत्मा तथा परमात्मा में क्या अंतर है ?
आत्मा एक शरीर के भीतर सचेतन रहता है, जबकि परमात्मा सभी शरीरों में सचेतन रहता है ।
परमात्मा चेतन, शाश्वत तथा आनंदमय है, जबकि बद्धजीवात्मा अचेतन, अशाश्वत तथा कलुषित है ।
परमात्मा समस्त ब्रह्माण्ड का रचयिता है, जबकि बद्धजीवात्मा प्रकृति के गुणों से अर्जित उनकी मात्रानुसार केवल अपने लिए ही एक भौतिक शरीर का निर्माण कर सकता है ।
परमात्मा गोचरागोचर सभी वस्तुओं का वास्तविक सृष्टा है, जबकि जीवात्मा उन सभी वस्तुओं का भोक्ता है ।
आत्म साक्षात्कार का मुख्य लक्ष्ण क्या है ?
मानसिक समता
बौद्धिक क्षमता
इंद्रिय समता
द्वैतता
बद्धजीवन से आपका क्या अभिप्राय है ?
जीव द्वारा भौतिक शरीर को ही आत्मस्वरूप मान लेना बद्धजीवन कहलाता है ।
केवल मनुष्य जीवन ही बद्धजीवन की श्रेणी में आता है, अन्य सभी योनियाँ मुक्त जीवन होती हैं ।
मनुष्य योनि कर्म योनि होने के कारण बद्धजीवन की श्रेणी में आती है ।
यह सभी कथन बद्धजीवन की व्याख्या हैं ।
"उसमें शरीर और आत्मतत्त्व के तादात्म्य का भ्रम नहीं रहता ।" इस कथन को स्पष्ट करें ।
व्यक्ति का भौतिक शरीर तथा आत्मा के भेद को भलीभांति समझना ।
व्यक्ति का स्वयँ को शरीर न मानकर आत्मा के शाश्वत अस्तित्व को स्वीकार करना ।
व्यक्ति का स्वयँ को भगवान् के भिन्नांश के रूप में जानना ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति का निम्न में से क्या लक्षण नहीं होता है ?
उसकी बुद्धि स्थिर अर्थात् व्यवसायात्मिका बुद्धि होती है ।
वह मोह से सदैव परे होता है ।
वह भगवद्विद्या को जानने वाला होता है ।
वह प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित होता है और अप्रिय वस्तु को पाकर विचलित ।
परमसत्य अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के ज्ञान को निम्न में से भलीभांति कौन जान सकता है ?
जो स्वयँ को भौतिक शरीर न मानकर आत्मा मानता हो ।
जो आत्मा को भगवान् का भिन्नांश जानता हो ।
जिसे आत्मा की स्वाभाविक स्थिति का ज्ञान हो ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन सी स्थिरबुद्धि कृष्णभावनामृत कहलाती है ?
"भगवान् जो करते हैं अच्छा ही करते हैं, जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे ।" ऐसी भावना वाली स्थिरबुद्धि कृष्णभावनामृत कहलाती है ।
"इस संसार में जो कुछ भी होता है वह भगवान् की इच्छा से होता है, यहाँ तक कि हमारे कर्म भी भगवान् की इच्छा से ही घटित होते हैं ।" ऐसी भावना वाली स्थिरबुद्धि कृष्णभावनामृत कहलाती है ।
स्वयँ को भौतिक शरीर न मानकर आत्मा मानने वाली तथा परब्रह्म में तदाकार के लिए कोई भी यत्न न करने वाली, स्थिरबुद्धि कृष्णभावनामृत कहलाती है ।
यह सभी कथन संबंधित प्रश्न का निराकरण करते हैं ।
बुद्धिमान् मनुष्य क्यों भौतिक इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख में भाग नहीं लेता है ?
क्षणिक होने के कारण ।
क्योंकि भौतिक सुख आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकता ।
भौतिक सुख जन्म- मृत्यु में बाँधता है ।
भौतिक सुख संसार में झगड़े बढ़ाता है ।
निम्निलिखत में से कौन सा भौतिक इिन्द्रयों का वेग नहीं है?
उपस्थ वेग ।
जीह्वा वेग ।
उदर वेग ।
कर्म वेग ।
स्वरूपसिद्ध व्यक्ति कैसे भौतिक सुख का त्याग कर पाता है,जबकि यह सामान्य व्यक्ति के लिए अत्यंत मुश्किल होता है ?
क्योंकि वह अपने निश्चय में दृढ़ होता है ।
क्योंकि वह अपने अंतःकरण में सुख का अनुभव करता है ।
क्योंकि उसने सत्य का दशर्न कर लिया है ।
क्योंकि उसने भौतिक संसार को दुखमय जान लिया है ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को कृष्ण की सर्वोच्चता पर संदेह क्यों नहीं रहता है ?
क्योंकि वह पाप रहित होता है ।
क्योंकि वह भगवद्गीता पर दृढ़ विश्वास करता है ।
क्योंकि वह गुरू के वचनों पर पूरा करने में विश्वास करता है ।
क्योंकि वह कृष्ण की भक्ति करता है ।
भगवद्गीता के अनुसार जब इं द्रियां अपने इन्द्रिय विषयों का स्पर्श करके भोग करती हैं तो अंततः निम्निलिखत में से किसको जन्म देती है ?
अनुभव को
दुख़ को
सुख को
स्मृति को
यामुनाचार्य जी को जब वे कृष्ण की दिव्य प्रेमा भक्ति में आनंद का अनुभव होने लगा तो उन्हें काम सुख का स्मरण आते ही वह इस विचार पर क्यों थूकने लगते तथा उनके होंठ अरुचि से क्यों सिमट जाते ?
क्योंकि यह विचार उन्हें फिर से माया में बाँध सकता था ।
क्योंकि मनुष्य शरीर अत्यंत घृणित वस्तुओं का बना है ।
क्योंकि वह स्त्री का दशर्न भी नहीं करना चाहते थे ।
क्योंकि वह भक्ति में बहुत आनंद प्राप्त कर रहे थे ।
मनुष्य का शरीर अत्यंत घृणित वस्तुओं से बना है जैसे कि रक्त, हड्डी, मांस इत्यादी इतने पर भी स्त्री व पुरुषों के मध्य आकषर्ण कैसे सशक्त रूप से बना रहता है ?
कृष्ण की इच्छा के कारण ।
माया के प्रभाव से एक दूसरे को भोग करने की इच्छा के कारण ।
प्रकृति के कारण ।
अपना वंश बढ़ाने की इच्छा के कारण ।
भौतिकता की दृष्टि से सवर्श्रेष्ठ सुख कौन सा है?
काम सुख ।
वात्सल्य सुख ।
अहंकार पूर्ति का सुख ।
निद्रा का सुख ।
मनुष्य योनि में इन्द्रियतृप्ति के लिए अत्याधिक श्रम करना निन्दनीय क्यों माना गया है ?
ऐसा सुख तो निम्न योनि के पशुओं को भी प्राप्त है ।
मनुष्य की भोग करने की क्षमता सीमित है ।
मनुष्य का जीवन क्षणिक और नश्वर है ।
बिना अत्याधिक श्रम किये भी आनंद का उपभोग किया जा सकता है ।
परम सत्य को राम क्यों कहा जाता है ?
क्योंकि योगीजन परम सत्य में रमण करते हुए अत्यंत दिव्य सुख प्राप्त करते हैं ।
क्योंकि परम सत्य सदा आनन्द में रमण करते हैं ।
क्योंकि परम सत्य ने जब महाराज दशरथ के घर बच्चे के रूप में जन्म लिया तो उन्होंने उनका नाम राम रखा ।
सभी विकल्प उचित हैं ।
परम सत्य को राम नाम से निम्न में से किस वैदिक ग्रंथ में संबोधित किया गया है ?
पद्म पुराण
वराह पुराण
कूर्म पुराण
मत्सय पुराण
कौन व्यक्ति इस संसार में सुखी रह सकता है ?
जो अपनी इन्द्रियों के वेगों को रोक सके ।
जो इन्द्रियतृप्ति करने में अत्याधिक निपुण हो ।
जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किठन परिश्रम कर सके ।
जिसने सुखी रहने की इच्छा का परित्याग कर दिया हो ।
कौन सा कार्य सबसे उत्कृष्ट मानव सेवा है ?
दरिद्र नारायण सेवा ।
कृष्ण के संदेश को सभी जीवों तक पहुँचाना ।
देश सेवा ।
प्रकृति का संरक्षण ।
कृष्णभावना का प्रचार सर्वोत्कृष्ट मानव सेवा क्यों है ?
क्योंकि यह कृष्ण के साथ हमारे नित्य संबंध को पुनः जागृत करता है ।
इससे हमारी धार्मि क भावना बलवान् होती है ।
इससे हमें भाग दौड़ वाले जीवन से छुटकारा मिलता है ।
मैं आपके परामर्श से सहमत नहीं हूँ ।
जीवन के संघर्ष की कठिनाइयों का वास्तिवक कारण क्या है ?
कृष्ण के साथ अपने संबंधों को भूलना ।
पूवर्जन्म में किए गए पाप कर्म ।
भौतिक संसार ही वास्तव में दुखमय हैं ।
बिना सोच विचार किए कार्य करने की प्रवृत्ति ।
भगवद्गीता किस प्रकार का शास्त्र है ?
योग शास्त्र
धार्मिक शास्त्र
अर्थ शास्त्र
नीति शास्त्र
ऐसा क्यों कहा जाता है कि जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली है उसने जन्म मृत्यु के बंधन को पहले ही जीत लिया है ?
क्योंकि उसका मन निरंतर कृष्ण पर स्थित रखता है ।
क्योंकि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत ।
क्योंकि हमारा मन भौतिक संसार में सुख भोगना चाहता है ।
उपरोक्त में से कोई नहीं ।
श्री भगवान् को तीसरे से पांचवें अध्याय तक कर्मियों की इतनी विशद् व्याख्या क्यों करनी पड़ी ?
क्योंकि कर्म की प्रक्रिया एक गहन विषय हैं ।
यह भगवान् की वाकपटुता को दशार्ता है ।
यह अजुर्न की नासमझी को दशार्ता है ।
सभी विकल्प सही हैं ।
कर्म योग क्या है ?
भगवान् को भोक्ता जानते हुए अपने सारे कर्मफलों को उन्हें अर्पित करना ।
ऐसा कर्म जिसमें योग भी सिम्मिलत रहता है ।
ऐसा योग जिसमें कर्म भी सम्मिलित रहता है ।
भगवद्गीता में सिखाया गया एक विषय ।
कर्मयोग और दिव्य ज्ञान प्राप्ति में सामंजस्य किस प्रकार बिठाया जा सकता है ?
कर्मयोग वास्तविकता में दिव्य ज्ञान से युक्त होकर कर्म करना है, जिसमें कृष्ण ही फलों के वास्तविक भोक्ता हैं ।
कर्मयोगी आत्म साक्षात्कार के लिए कमर्योग का मार्ग अपनाते हैं जबिक ज्ञान योगी दिव्य ज्ञान का ।
एक कर्मयोगी कभी ज्ञानी नहीं हो सकता और एक ज्ञानी कभी कर्मयोगी की भाँति कार्य नहीं कर सकता ।
यह प्रश्न असंगत है ।
